Thursday, March 9, 2017

बुढ़ापा, मात्र एक दिमागी फितूर -सतीश सक्सेना

यकीनन बुढापा दिमागी फितूर है , बड़प्पन का फितूर , लोग क्या कहेंगे का फितूर , अब हमारी उम्र हो गयी , का असर और कुछ नहीं , इसे नकारिये और पूरे जीवन स्वस्थ रहिये !
पूरा जीवन रोटी, कपड़ा, मकान , बच्चों की चिंता , पढ़ाई , भविष्य और बाद में उनकी शादी में ही निकल गया , शायद अपने लिए हंसने का भी समय नहीं मिला और जब इनसे निवृत्त हुए तो पता चला बाल सफ़ेद होने लगे लोग हमें बूढा समझने लगे हैं , हमारा आँगन नयी पीढ़ी ने कब का हथिया लिया , जिम्मेदारियों के बोझ तले पता ही नहीं चल पाया !
2014 में रिटायर होते समय ही फैसला कर किया था कि अब अपने लिए समय देना है , वे सारे काम करूँगा जो मन में दबे रह गए और पूरे नहीं कर पाया ! बच्चों की तरह खेलना , सुबह सुबह जाड़ों में शार्ट बनियान पहनकर दौड़ना , मुक्त मन हंसना , विश्व भ्रमण , गाना गाना , तबला बजाना , ड्रमर बनना , मोटरसाइकिल पर लंबी दूरियां तय करना , निर्जन पहाड़ियों में  फोटोग्राफी करना आदि सपने पूरा करने का सबसे बेहतरीन समय यही था !
मगर इन सपनों को पूरा करने में एक बाधा थी सही और बढ़िया स्वस्थ बलिष्ठ शरीर नहीं था मेरे पास , पूरे चालीस वर्षों से आराम भोगता, ढीली ढाली मांसपेशियों वाला शरीर, एयरकंडीशंड माहौल का आदी हो चुका था पैरों को चलने की आदत ही नहीं थी वे सिर्फ गाड़ी से उतर कर माल में एक दिन घूमने में थक जाते थे ! पेट इतना बड़ा हो चुका था कि जमीन पर उकड़ूं बैठना एक प्रोजेक्ट लगता था , रात भर पेट में भरी गैस और एसिडिटी के कारण नींद नहीं आती थी उसपर ब्लड प्रेशर बढ़ कर 160/100 को छूने लगा था ! दो मंजिल सीढियां चढ़ने में बुरी तरह हांफना सामान्य हो गया था ! कितने ही मित्र और परिचित इस मध्य हार्ट अटैक के शिकार होकर या तो चले गए थे अथवा ऑपरेशन में जीवन भर की कमाई लगाकर बीमारों की भांति घिसट घिसट कर रोज आसन्न मृत्युभय के साथ जी रहे थे !
मैंने जीवन भर हार का मुंह नहीं देखा था अतः 60 वर्ष बाद स्वास्थ्य को ठीक  निश्चय किया, इन दिनों मानव जाति को स्वस्थ रखने का झांसा देते मेडिकल व्यापारी आगे आकर सफल हो चुके थे , उनके अडवेर्टाइजमेंट इस हद तक सफल हो चुके थे कि उनके प्रोडक्ट , अस्वस्थता के साथ , दवा नाम से हर भयभीत मानव के साथ लिपट चुके थे ! किसी की अस्वस्थता में मिलने वालों का सबसे पहला प्रश्न, दवा ले आये ? पूंछना होता था , और यह हाल लगभग पूरे विश्व में था देश चाहे अविकसित हो या विकसित , मेडिकल व्यापार ने मानों पूरे मानवों को स्वस्थ रखने का ठेका ले लिया था , यह जानकर भयभीत मानवों की बुद्धि पर तरस आता था कि मानव मृत्य भय से, बुद्धि का प्रयोग बिना किये व्यापारियों के जाल में आसानी से कैसे फंस जाता है ! शायद ही किसी मानव ने इन निरर्थक जहरीली दवाओं के फायदे पर ध्यान दिया होगा कि आजतक यह तथाकथित मेडिकल साइंस अमेरिका के एक भी राष्ट्रपति या धनवान अरबपति की उम्र एक वर्ष भी बढ़ा नहीं सका , इसमें किसी भी बीमारी का  इलाज़ होता तो संसार के अरबपति आज सबसे अधिक जवान दिखते ,यह साइंस के नाम पर सिर्फ धोखा है इस विश्वास के साथ आजतक मैंने एलोपैथिक मेडिसिन का बहिष्कार किया हुआ था !
मेरे शरीर के अंदर उपस्थित वाइटल फाॅर्स बेहद ताकतवर है और वह अकेली ही मेरे शरीर को स्वस्थ रखने की शक्ति रखती है और यही उसका काम भी है , इस विश्वास के साथ मैंने अपने शरीर का पुनर्निर्माण करने का संकल्प लिया और सबसे पहले बॉडी कोर जिसमें हार्ट, फेफड़े, किडनी, लिवर, पेन्क्रियास एवं डायजेस्टिव सिस्टम शामिल थे, को शक्ति देने का फैसला किया और यह काम रनिंग से बेहतर कोई नहीं कर सकता था !
और मैंने यह काम सिर्फ 15 सितम्बर 2015 से शुरू करके फरबरी 2017 तक के समय में पूरा करने में सफलता प्राप्त कर ली , आज शरीर में 25 वर्षीय जवान की फुर्ती है जिसे शायद ही कोई मेडिकल व्यापारी स्वीकार करेगा और इसके लिए मैंने कोई गोली , विटामिन , पौष्टिक भोजन , जूस और दूध के बिना ही किया है ! इस बीच मैंने साधारण रोटी और भोजन लिया और कुछ नहीं , और मेरी वाइटल फाॅर्स ने अपनी शक्ति का सबूत देकर मेरे विश्वास की रक्षा की है ! भय रहित मानव मन किसी भी बीमारी को सही कर सकता है इसमें कोई संदेह नहीं !
इंडियागेट के खुशगवार माहौल में कल की हॉफ मैराथन से पहले, आज एक आसान रन पूरा किया , मेरे पिछले माह किये गए
संकल्प अनुसार इस माह, हर सप्ताह एक हॉफ मैराथन करने के बाद, सात सप्ताह में सात हॉफ मैराथन रन पूरे  हो जाएंगे  ! 2015 में जहाँ एक हॉफ मैराथन ( 21 Km ) की तैयारी में 3 माह और उसके बाद 15 दिन पैरों की थकान मिटाने में लगते थे वहीँ अब बिना थकान हर शनिवार 21 किलोमीटर दौड़ता हूँ एवं सप्ताह में एवरेज रनिंग 40 किलोमीटर की होती है ! अब रनिंग में वह आनंद आता है जिसे मस्ती कहते हैं , आज इंडियागेट पर दौड़ते हुए जो गाना गा रहा था उसे सुने  ....
https://www.youtube.com/watch?v=-11EKfRYU2o

Thursday, February 9, 2017

हम ब्लॉक माइंड देसी लोग : सतीश सक्सेना

महज़ 50 वर्ष पहले हमने ( देश का 95 प्रतिशत आम जन ) अपने गांव कस्बे में महाजन, ग्राम प्रधान,ठाकुर साहबों का रुतबा देखा था , उस समय उनकी शान शौकत देख मन में कसक उठती थी कि एक दिन हम भी धनवान बनेंगे ! और आज जब हम संपन्न हुए तो अधिकतर ने अपनी पूरी जिंदगी धन की गड्डियों इकट्ठा करने और उसे गिनकर खुश रहने में गुजार दी वहीँ कुछ हम जैसों ने अपने धन को, सुख साधन जोड़ने और भोगने में लगाया ! पहले प्रकार के लोग जहाँ धन को रखे हुए , उसका बिना उपयोग किये , उसे देख देख कर अपने आपको महाजन का सुख देते रहे वहीँ हम जैसे लोग एयरकंडीशंड घर और कार और ऑफिस , क्लब , पार्टी , और ऐशो आराम का जीवन गुजारते अपने आपको राजा समझते रहे ! इन पचास सालों में यह सब तो मिला मगर हमने क्या खो दिया यह समझने में बहुत देर कर दी , पचास का होते होते , किसी के घुटने बदल कर स्टील के लगा दिए गए तो किसी को जीवनभर परहेज की हिदायतें , ऑपरेशन के बाद मिल गयीं , कइयों का हुस्न
और व्यक्तित्व इस बीच बदलकर इतना भयावह बन चुका था जिसे शीशे में देख भरोसा नहीं होता था कि आठ दस वर्ष में वह जवानी कहाँ गायब हो गयी जिसे देख कभी गर्व होता था ! बस हर सप्ताह डॉ की हिदायतें और गोली समय पर खा लेना जी ...यही जिंदगी रह गयी थी !! कोई भी घर हालचाल जानने आता तो वह यह अवश्य हिदायतें देता कि दवा लाये या नहीं ? जैसे यह ब्रह्मवाक्य हो हम देसी ठस बंद दिमागों का !! मामूली समझ और बंद दिमाग लिए यह वाक्य हम सबके मन में जम गया है कि अस्वस्थ होने के साथ दवा लेना आवश्यक है , दवा लेते ही हम ठीक हो जायेंगे और फिर जलेबी,समोसे और आइसक्रीम खा सकेंगे ! आज सुबह दौड़ते हुए ग्रेटर नॉएडा के नजदीक एरिया में , आलिशान अपार्टमेंट और लंबी एयर कंडीशंड कारों के बीच से दौड़ता हुआ मैं, अपनी बुद्धि को धन्यवाद् कहते हुए अरबी मुहाबरे " देर आयद दुरुस्त याद " कहते अपनी पीठ ठोकते इन आलसी मानवों पर तरस खा रहा था जो मुझ अकेले को ट्रैफिक में दौड़ते हुए, पागल या पुलिस रिक्रूटमेंट का सिपाही उम्मीदवार समझ रहे होंगे ! पिछले तीस वर्षों की अकर्मण्यता और बिना किसी हिले डुले व्यायाम के , हमारी आंतें, लीवर , किडनी एवं ह्रदय अगर आज भी भोजन को पचाकर हमें पोषक तत्व दे रही हैं तो इसमें दवा का योगदान न होकर शरीर की अपनी प्रतिरक्षा शक्ति है जिसके कारण यह शरीर, इस अकर्मण्यता के बावजूद बीमार अवयवों को लेकर घिसट भर पा रहा है जबकि हम सोंचते हैं कि हम स्वस्थ हैं और ऐश कर रहे हैं ! और यह प्रकृति प्रदत्त मानव शरीर इतना मजबूत है कि हर उम्र में हर परिस्थिति में अपने को ढाल सकता है , तथाकथित वृद्धावस्था से निजात पाना हो तो जवानों का आचरण शुरू करने की हिम्मत करके आजमाइए इसे , कुछ दिनों में ही कायाकल्प महसूस करने लगेंगे ! और इसके लिए सिर्फ दृढ संकल्प चाहिए, दवा की गोली नहीं ! अगर सीढियां चढ़ने में हांफ रहे हैं तो मान लीजिये कि आपका ह्रदय संकट में है , इसकी रक्षा करें , कल से वाक करते हुए , आखिरी दो मिनट बिना हांफे दौड़ कर ख़त्म करें, आपका ह्रदय पूरे सौ वर्ष आपका साथ देगा ! याद रखें रनिंग , डायबिटीज , को तो ठीक करता ही है बल्कि ह्रदय की सबसे अच्छी एक्सरसाइज है !

Tuesday, February 7, 2017

मानवीय प्रतिरक्षा शक्ति : सतीश सक्सेना

आज को पोस्ट बेहद महत्वपूर्ण है उनके लिए जो इसे ध्यान से पढ़ें और मनन कर समझ सकें हो सकता है यह उनके जीवन में एक नया अध्याय ही खोल दे , विषय सामान्य है शायद सभी जानते होंगे मगर शायद ही किसी ने इसपर कभी ध्यान दिया हो !
मेरा यह दृढ विश्वास है कि मानव शरीर लगभग 100 वर्ष जीने के लिए डिज़ायन किया हुआ है , और इसके लिए इसे किसी दवा, गोली या डॉक्टर की आवश्यकता नहीं होती बशर्ते हम इसके साथ अत्याचार न करें !
मानव लगभग एक लाख वर्ष से इस धरती पर है और इसने लगभग दस हज़ार वर्ष पहले सामाजिक ढर्रे में जीने का प्रयत्न शुरू कर दिया था ! उस वक्त हम लोग पानी के किनारे किसी गुफा में छिपकर रहना सीखे थे , जहाँ रोज भोजन के इंतज़ाम के लिए लगभग 10 किलोमीटर रोज शिकार के पीछे दौड़ना अथवा खूंखार जानवरों से जान बचाने के लिए भागना पड़ता था तब कहीं परिवार के लिए एक दिन के खाने का इंतज़ाम हो पाता था इसप्रकार उन दिनों पैरों का ,शरीर में लगभग पचास प्रतिशत हिस्सा होने की तरह, उनका योगदान जीवन रक्षा में लगभग इतना ही था ! आधा दिन दौड़ते रहने से human core की, जिसमें शरीर के महत्वपूर्ण अवयव थे, न केवल बेहतरीन एक्सरसाइज हो जाती थी बल्कि मसल्स भी खासे बलिष्ठ व कसे होते थे  ! हमारे पास मजबूत हाथ पैरों के साथ साथ, अन्य जीवों की तुलना में अधिक समझदार मानवीय मस्तिष्क, ने हमें अजेय बनाया था और हम जंगल में सबसे शक्तिशाली भी माने जाते थे !
आज हमने, अपने आलसी मन और स्वभाव के कारण , परिश्रम के शॉर्टकट तलाश कर लिए, नतीजा हमारा मजबूत बदन दयनीय हो गया है , आज के इंसान के पीछे अगर कुत्ता भी भागे तो वह बचने के प्रयत्न में निश्चित ही जमीन पर मुंह के बल गिरा नजर आएगा  क्योंकि उसके हाथ और पैरों में वह शक्ति नहीं बची जिसके लिए वह मशहूर था !

इस कमजोरी के फलस्वरूप मानव में अपने जीवन रक्षा के लिए भय का संचार हुआ फलस्वरूप मेडिकल बिजिनिस की शुरुआत हुई ! आज मेडिकल साइंस की तथाकथित कामयाबी पर फूल कर कुप्पा होते मानव को शायद यह सोंचने की भी फुरसत नहीं कि आज भी मानव संरचना और जटिल मस्तिष्क के बारे में मेडिकल साइंस को एक प्रतिशत भी जानकारी नहीं है अन्यथा कबका कृत्रिम मानव निर्माण हो चुका होता !
हर शारीरिक प्रतिक्रिया बुखार , खांसी , जुकाम जैसी सामान्य मानवीय प्रतिक्रियाओं  (जो कि वास्तव में मानव प्रतिरक्षा शक्ति द्वारा चलाये गए जीवाणु संक्रमण के आंतरिक उपचार मात्र हैं ) को जिसे मानव, बीमारी का नाम देता है, भयवश समाप्त करने के लिए , एंटी बायोटिक्स और खतरनाक स्टीरॉइड्स का प्रयोग किया जाता है , जिसके जहरीले असर से लड़ते लड़ते मजबूत मानवीय रक्षा तंत्र बेकार हो जाता है !
मानवरक्षा के लिए शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र हमेशा मजबूत और चौकन्ना रहा है, कोई भी बाहरी आक्रमण , गोली , घाव , या आंतरिक व्यवधान जैसे अनियंत्रित टिश्यू बढ़वार को इसी प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा प्रभावी तौर पर निष्क्रिय किया जाता रहा है और उसके लिए किसी डॉ की या ऑपरेशन की आवश्यकता, शरीर को नहीं पड़ती , हजारो सैनिकों के शरीर में युद्ध के समय घुसी जहरीली गोलियों के चारो और एक ऐसा मजबूत टिश्यू आवरण लपेट दिया जाता है जिसे भेदकर वह जहर अथवा अनियंत्रित टिश्यू का गुच्छा ( कैंसर ) बाहर निकल ही न सके ! लाखों लोग जिनपर मेडिकल बिजिनिस की नजर नहीं पड़ी , आज भी बड़े बड़े ट्यूमर लेकर जिन्दा ही नहीं हैं बल्कि अपने सारे कार्य आसानी से कर रहे हैं , मारा वह गया जो घबराकर इन्हें चेक कराने डॉ के पास पंहुच गया और ऑपरेशन से शरीर प्रतिरक्षा शक्ति द्वारा किये गए इस प्रयास को काट कर फेंक दिया गया !
मैंने रिटायर होने के बाद नयी नौकरी ज्वाइन करने की न सोंच अपने शरीर की इस शक्ति को परखने का निश्चय किया और संकल्प लिया कि पुराणों में लिखी गयी भीष्म पितामह की शक्ति प्राप्त क्यों न करूँ कि जब चाहूँ तब मरुँ  ..... 
मैंने अपने पूरे जीवन में कभी व्यायाम , स्कूल में पीटी आदि तक कभी नहीं की , मैंने अपने शरीर की इस प्रकृति प्रदत्त शक्ति को परखने का निश्चय किया और तमाम बीमारियों ( बढ़ा कोलस्ट्रोल, ब्लड प्रेशर , क्रोनिक खांसी, ब्रोंकाइटिस, खराब फेफड़े , क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन, कमजोर आँखे, स्पोंडिलायटिस, मानसिक तनाव एवं कमजोर हड्डियों के साथ दिल्ली की प्रदूषित हवा में रहते हुए , बिना किसी टॉनिक और बेहतरीन भोजन के अपने बीमार कमजोर शरीर की कायाकल्प  करने में सफलता प्राप्त की !
पहली बार जब भागने गया था तब मुझे याद है कि 500 मीटर वाक् और 30 मीटर जॉगिंग कर पाता था , मगर मन में दृढ संकल्प लिया था कि मैंने एक वर्ष के अंदर स्वेटर जैकेट के बिना सिर्फ बनियान में कड़ाके की ठण्ड में कम से कम 2 km दौड़ना है और मैं सफल रहा मानवीय शरीर वाकई बेहद ताकतवर सिद्ध हुआ , सिर्फ स्वच्छ हवा को अंदर बाहर निकालते हुए बंद फेफड़े पूरे खोलने में सफल ही नहीं रहा , दौड़ते हुए पेट के अंदर, अवस्थित शरीर के महत्वपूर्ण अंग, बेहतरीन तौर पर दौड़ने से एक्टिव हो गए , लगा जैसे 25 वर्ष का जीवन दुबारा पा लिया हो !
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य याद रखें , डरना नहीं है , बिना डरे हुए अपनी जीवनीशक्ति पर विश्वास करें कि वे जियेंगे और कायाकल्प कर जवानों की भांति जियेंगे, इसके लिए सिर्फ हंसना , हवा , जल और प्राकृतिक भोजन काफी है हमारा जीवन बदलने के लिए , दवाओं पर निर्भरता हमारे शरीर की शक्ति को कमजोर बनाता है , हमें सिर्फ अपनी शारीरिक शक्ति पर भरोसा करना है ! एकबार ठान लें कि मैं यह कर सकता हूँ , मैं स्वस्थ हूँ और रहूँगा , अपने आपको कभी नेगेटिव सलाह न दें , बुढापा या वृद्धावस्था कुछ नहीं होती है , इसे नकारें आपमें उत्साह बना रहना चाहिए जिस दिन नयी रुचियां अथवा उत्साह समाप्त हुआ समझिये बुढापा आ गया ! उम्र बढ़ने के साथ हम इनएक्टिव होते जाते हैं , हमारे हड्डियों के जॉइंट्स , दांत अथवा घुटने उपयोग न करने के कारण कमजोर होते जाते हैं , मैंने इन सबका उपयोग करते हुए इन्हें वृद्धावस्था में सक्रिय कर दिया और यह मजबूत हो गए किसी भी नौजवान की तरह ! अपनी शक्ति पर भरोसा होने के कारण मुझे शरीर की किसी शक्ति का क्षरण महसूस आज तक नहीं हुआ !
आप अपने शरीर को दौड़ना सिखाएं , ध्यान रखिये यह काम धीरे धीरे ही सिखाना है अन्यथा शरीर इसे रिजेक्ट कर देगा , शुरू में शरीर की सामर्थ्य  के हिसाब से ही उसे मेहनत कराना शुरू करें , जबरदस्ती न करें हाँ विश्वास बनाये रखें कि मैं यह कर सकता हूँ , जल्द देखेंगे कि वाकई आपके शरीर ने यह कर दिखाया ! 
स्वच्छ हवा में उपलब्ध ऑक्सीजन रनिंग या वाक् के समय फेफड़ों के प्रदूषण को दूर करते हुए खून को पतला व अधिक शक्तिशाली बनाती है, जिससे ह्रदय रोग व् डायबेटीज़ का भयावह ख़तरा समाप्त होगा !  

Friday, December 30, 2016

मक्कारों के दरवाजे से ये दीप नहीं बुझने पाए ! -सतीश सक्सेना

पहचान बने, गद्दारों की,
खादी पहने मक्कारों की !
दोनों हाथों से लूट रहे ,
इस घर के बेईमानों की !
इनकी चौखट पर जा जाकर
इक दीप जलाएंगे ऐसा 
जिससे विशेष पहचान रहे
दुनियां में इन दरवाजों को 
बारिश हो या तूफ़ान मगर यह दीप नहीं बुझने पाये !

धूर्तों के  दरवाजे  जाकर 
इक अक्षयदीप जलाना है 
जो देशभक्त का रूप रखे
उनका चेहरा दिखलाना है
बस्ती समाज बरबाद किये
बरसों से  श्वेत दीमकों ने !
जाकर थूकें, घर को खाते 
इन ध्यान लगाए बगुलों पर  
बेईमानी के उद्गम  पर,  श्रमदीप नहीं बुझने पाये ! 

यह दीपक आँखें खोलेगा
मूर्खों को राह दिखायेगा  
मानव की सुप्त चेतना को
ये दरवाजे, दिखलायेगा !
धूर्तों के चेहरे, नोच तुम्हें 
असली चेहरे दिखलायेगा
भ्रामक विज्ञापन के जरिये  
आस्था गरीब की बेच रहे 
बाबाओं के दरवाजे से, जनदीप नहीं बुझने पाये !

Saturday, December 10, 2016

हेल्थ ब्लन्डर्स (पार्ट 3) -सतीश सक्सेना

-रनिंग से डरने वाले यह जान लें कि मैंने अपने जीवन की रनिंग सीखने की शुरुआत अपना बीपी, हार्ट पल्पिटेशन, कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए 61 वर्ष की उम्र में शुरू की थी , इससे पूर्व मैंने विद्यार्थी जीवन में भी रनिंग नहीं की !

- आज मैं 62 वर्ष की उम्र में लगातार बिना रुके 21 km तक दौड़ता हूँ , और तमाम बीमारिया गायब हो चुकी हैं !
-अगर रनिंग का पहला कदम बढ़ाने की हिम्मत आज आप में आयी है तो यह विश्वास रखिये कि अगले दो तीन महीने में आप 5 km दौड़ रहे होंगे !
-रनिंग और वाक में फर्क है कि रनिंग के समय आपके हर गिरते कदम पर बॉडी का तीन गुना वजन पड़ता है और यह तमाम वजन आपकी हड्डियां और मसल्स सँभालते हैं , अगर आप नौसिखिये हैं शुरुआत में आपको सावधान रहना पड़ेगा कि शरीर पर एक साथ प्रेशर न पड़े , आपका शरीर धीरे धीरे हर आदत को स्वीकार करने को तैयार होगा बशर्ते आप उसके साथ जबरदस्ती न करें !
-शुरुआत में चार मिनट वाक के बाद एक मिनट रनिंग , या लगातार आधा घंटा वाक समाप्त करने के बाद 2 मिनट की रनिंग बिना हांफे , रनिंग की स्पीड और समय धीरे धीरे ही बढ़ाना है अगर आप इन दो मिनट में दौड़ते समय बात कर पा रहे हैं तब आप ठीक भाग रहे हैं बिना अपना बीपी बढाए, यह सबसे पहला मंत्र है !
- वाकिंग/रनिंग से पहले और बाद में 5-10 मिनट व्यायाम कर, स्ट्रेचिंग अवश्य करें , यह बेहद आवश्यक है , जो व्यायाम आवश्यक हैं उनमें body weight squats, pushup, lunges एवं planks उपयोगी हैं ! थकी हुई मसल्स को यह व्यायाम रिलैक्स देते हैं और मसल्स इंजरी का खतरा काम हो जाता है !
-हर रनर के लिए पानी बेहद आवश्यक होता है , डिहाइड्रेशन होने की स्थिति में आप मसल्स इंजुरी को आमंत्रित कर रहे हैं यह ध्यान रहे
- हमेशा हलके और आरामदेह जूते पहनकर दौड़ते समय पैरों की पोजिशन का ध्यान रहे , गड्ढे या ऊबड़खाबड़ रास्ते आपको जख्मी कर सकते हैं
-अगर जीपीएस वाच न हो तब strava या endomondo नामक app अपने स्मार्टफोन में इंसटाल कर लें यह जीपीएस सिस्टम के जरिये दौड़ते समय आपकी लोकेशन एवं समय रिकॉर्ड करता है ताकि बाद में आप एनालिसिस कर सकें
-दौड़ते समय पानी की 300 ml की पानी की बोटल हाथ में लेकर गला सूखने की स्थित में सिप ले कर अपने को सहज रखें
-दौड़ते समय स्पीड बिलकुल न बढ़ाएं सिर्फ सहज भाव से जॉगिंग करें , शरीर को धीरे धीरे अभ्यस्त बनाएं

हेल्थ ब्लन्डर्स II - सतीश सक्सेना


मानवीय शक्ति अपरिमित है और हम उसका अपने मस्तिष्क की तरह शतांश भी उपयोग नहीं करते , अक्सर 40 वर्ष का होते होते अपने आपको समझाना शुरू कर देते हैं कि चढ़ना नहीं, दौड़ना नहीं , गिर जाओगे ! असुरक्षा इस कदर होती है कि शरीर को , दांतों को , मजबूत बनाने के लिए तुरंत डॉक्टर की शरण में भागते हैं बिना सोंचे कि न केवल हम अपने बेहद मजबूत शरीर , जो बिना दवा के 90 वर्ष के लिए डिजाइन है, को न केवल केमिकल जहर दे रहे हैं बल्कि दवा विक्रेताओं के निर्मम और निर्दयी उद्योग को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे अधिक मानव शरीर का नुकसान, विश्व में किसी ने नहीं किया है !
मैं जब भी सामान्य रोगों में एलोपैथिक दवा खाते किसी व्यक्ति को देखता हूँ तब मुझे उसके शरीर की सुरक्षा शक्ति की स्पष्ट चीत्कार सुनाई देती है , हमारा शरीर लंबे समय जीने के लिए डिज़ाइन है , जिसमें हर बीमारी का उपचार करने के लिए शक्तिशाली रोग प्रतिरोधक शक्ति निहित है जो कि संक्रमण होने पर शरीर में तुरंत सक्रिय हो जाती है और उसके एक्शन को मानव विभिन्न रूपों में जैसे प्यास,पसीना, बुखार, जुकाम ,खांसी,बीपी, गांठे, खुजली, आदि के रूप में अनुभव करता है और अगर ऐसा न होता तो लाखों वर्ष की मानव यात्रा यहाँ तक पंहुचती ही नहीं इसकी रक्षा के लिए मेडिकल व्यवसाय कुछ ही वर्षों से है !

शक्तिशाली धनवान मेडिकल व्यवसाय की मेहरबानी है कि हम शरीर की प्राकृतिक रोगनाशक शक्ति के हर आवश्यक उत्पन्न प्रतिक्रिया (बुखार , गांठे आदि ) से भयभीत होकर उसे गोलियां खाकर अथवा ऑपरेशन कराकर बेकार कर देते हैं और अपने ताकतवर शरीर को एक शक्तिशाली भयानक जकड़न के हवाले कर देते हैं जिसका इलाज मानव प्रदत्त उपचार मात्र है ! ऐसा करते हम भूल जाते हैं कि हम मानव शरीर के जटिल रक्षातंत्र को, अपने अविकसित मस्तिष्क ( ढाई प्रतिशत ) द्वारा निर्दयता पूर्वक बर्वाद कर रहे हैं ..... कैंसर की गांठों के ऑपरेशन एक सामान्य उदाहरण है , जिसे हमारे शरीर ने रोक लिया था और हमने उसे कटवाकर मुक्त दिया !

मानव शरीर की इस रक्षा शक्ति के दो उदाहरण देने आवश्यक हैं यहाँ ......
पंजाब के एक दबंग किसान को उसके दुश्मनों ने रात को जंगल में पकड़कर उसके दोनों हाथ और दोनों पैर काट डाले थे , डॉक्टरों को आश्चर्य था कि उसका खून नहीं बहा था , क्योंकि उसके मन में हाथ पैर कटते समय भय न होकर, उन लोगों से बदला लेने की भावना इतनी प्रबल थी कि उसकी सुरक्षा शक्ति ने उसका खून नहीं बहने दिया और वह जीवित बच गया !
जीवित रहने की प्रबल भावना के कारण ही उसकी प्रतिरोधक शक्ति ने उसकी रक्षा की !

हमारे देश में ही ऐसे कितने ही फौजी मिल जाएंगे जिनके शरीर में लगीं दसियों गोलियों में से डॉक्टरों द्वारा खतरनाक गोलियां ही निकाली जा सकीं बाकी शरीर में ही छोड़ दी गयीं , जहरीले लेड से बनीं गोलियों के चारो ओर शरीर की प्रतिरोधक शक्ति, एक जैली जैसा मजबूत कवच चढ़ा देती है जिसके अंदर से कोई भी इंफेक्शन , इन्फेक्टेड टिश्यू अथवा , जहर बाहर नहीं आ सकता मगर आज हम सबसे पहले इन सुरक्षा करती गांठों को काट कर निकाल देते हैं !

आश्चर्य जनक धूर्तता यह है कि हमारे पाठ्यक्रम में शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता या हम ( मेडिकल व्यापारी ) पढ़ाना ही नहीं चाहते अन्यथा उनका पूरा व्यवसाय ही नष्ट हो जाने का खतरा है !

आज मैं बहुत थक गया हूँ , इस उम्र में अब यह हमारे काम नहीं , कभी हम भी मोटर साइकिल चलाते थे , जैसे वाक्य हमारी मजबूत आत्मिक शक्ति को कमजोर मानने के लिए मजबूर कर देते हैं ! ऐसे शब्दों का उपयोग की जगह कहना यही चाहिए कि मैं भी यह कर सकता हूँ और नौजवानों से अधिक बेहतर कर सकता हूँ क्योंकि मैं उनसे अधिक अनुभवी हूँ ! अपने शरीर की शक्ति पर विश्वास करें यह आपको शर्मिंदा नहीं होने देगी !

अपने ऊपर विश्वास पैदा करें कि आप यह कर सकते हैं !! सो आप कायाकल्प आसानी से कर सकते हैं !

Friday, December 9, 2016

बीपी की गोलियां बंद करने के लिए सबसे पहले सहजता अपनाएँ (पार्ट -1)

@मेरा रक्तचाप असहज है।
ये शर्मनाक है मेरे लिए। मूर्ख हूं मैं। संसार को ठीक होने की नसीहतें बकता रहता हूं लेकिन खुद के प्रति लापरवाही करता हूं। ये निपट चूतियापा है।

मेरी जरूरत है मुझे और हमारे अपनों को। जैसे मुझे जरूरत है उनकी तो... पहली शर्त कि सब ठीक रखने की जरूरत है। केवल मन ही नहीं तन और धन भी।
... तो जय हो!
अब बस! बहुत हुआ.... बहुत हुई लापरवाही और बहाने, टाला जाना। तंग आ गया हूं मैं खुद से। अब और नहीं।
ये धोखा है, खुद से, अपनों से, उनसे जो आपसे प्यार करते हैं। ये सही नहीं है।
...आप मुझे सुधारने में मेरी मदद करें प्लीज। लताड़िए मुझे।
*********************************************************
ये हैं कृष्ण आनंद चौधरी के ये सहज शब्द जो बिना किसी दिखावे के बोले गए, पढ़कर आनंद आया, थोड़ा गुस्सा भी कि अगर इन जैसा भव्य व्यक्तित्व भी बीमारियों का शिकार होगा तो सामान्य जन से क्या शिकायतें करनी , आनंद इसलिए आया कि आनंद के लिए अपना बीपी बिना दवा के सहज रखना बेहद आसान है , रनिंग जैसी मस्ती सीखते ही बीपी के साथ ह्रदय रोग की चिंताएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी !
हमारे पिछड़े समाज में बहुत कम लोग हैं जो बिना दिखावे के सहज हो सकें , वे असहज हैं क्योंकि उन्हें खुलापन पसंद नहीं , वे असहज हैं क्योंकि वे सोंचते हैं कि मजाक करने और खुलकर बोलने पर न जाने लोग क्या सोंचेंगे , वे असहज हैं क्योंकि वे हर हंसी के पीछे कुछ कारण ढूंढने लगते हैं , दुनियाभर के कॉम्प्लेक्स लिए ये लोग , खुल कर हंसना चाहते हैं पर दूसरों के सामने हंस नहीं पाते ! आइये मुक्त अंदाज़ सीखिये आज और बीमारियों को भगाइये ....
- सबसे पहले शुरुआत करते हैं एक मस्त गाने से इसे सुनिए और गाकर दिखाइए और हो सके तो नाचिये भी झूम के, अगर शर्म आये तो सोंचिये कि आपको कोई नहीं देख रहा ....
https://www.youtube.com/watch?v=-11EKfRYU2o
...... क्रमश:

Monday, December 5, 2016

मेरे जाने पर मेरी आँख, गुर्दे, ह्रदय, लीवर जलाना नहीं - सतीश सक्सेना

जिन मित्रों को मेरी उम्र पता चल जाती है वे मेरे नाम के साथ आदरणीय लगाना शुरू कर मुझे अपने से दूर कर देते हैं, मुझे लगता है आदर देने की जगह अपनापन और उन्मुक्त व्यवहार मिलता तो अधिक अच्छा था , उसमें मुझे अधिक फायदा होता ! अक्सर अधिक उम्र वालों को आदर देकर हम अपने से दूर रखने में सफल होते हैं जबकि उन्हें इस आदर से अधिक मित्रता की आवश्यकता अधिक होती है !
मेरे यहाँ कई मित्र हैं जिन्हें मैं बुड्ढा कहता हूँ , अपनी बेटी को नसीहत देते समय, बुढ़िया, और कई महिला मित्रों को उनके जबरदस्त स्नेही स्वभाव और अपनापन के कारण अम्मा कहने में आनंद आता है ! पूरे जीवन हम अपने आपको ढंके रहते हैं , घर परिवार , यहाँ तक कि बच्चों तक से औपचारिक व्यव्हार करने के आदि हो गए हैं ! आदर हो या स्नेह , खुल कर करें , यही ईमानदारी है ! अपनापन को दिखावा क्यों ?

बरसों से खूनदान के लिए कई हॉस्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि वे मुझे खून की कमी के वक्त बुला सकते हैं ! मरते दम तक किसी के काम आ जाएँ तो जीवन सफल हो इस इच्छा को निभाते हुए , बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में अपने शरीर के सारे अंग और शरीर दान कर चुका हूँ !

यह लिख रहा हु ताकि सनद रहे और मित्र मेरी मृत्यु पर परिवार को मेरा संकल्प याद दिलाएं कि यह ऑंखें , गुर्दे, ह्रदय और लीवर किसी को जीवनदान देने में सक्षम हैं !

Thursday, December 1, 2016

बंदरों के हाथ में , परमाणु बम है -सतीश सक्सेना

झूठ,मक्कारी, दिखावे भी न कम है,
सौ करोड़ों को नचाने का भी दम है !

ध्यान लोगों का न घोटालों पे जाए
ये बताओ खूब कि खतरे में हम हैं !

दुश्मनी से देश को खतरा तो है पर 
वोट बरसेंगे जभी खतरे में जन है !

धन कुबेरों के लिए , खोले खजाने
इन ग़रीबों के लिए तो आँख नम है !

हो सके तो देश अपने को बचा लो
बंदरों के हाथ में , परमाणु बम है !

Friday, November 25, 2016

ईद को ख़तरा बताते, आज भी कुछ लोग हैं - सतीश सक्सेना

देश को बरबाद करते, आज भी कुछ लोग है
नफरतों का गान करते,आज भी कुछ लोग हैं !


रूप त्यागी सा, प्रबल आवाज, मन में धूर्तता !
देश का विश्वास हरते,आज भी कुछ लोग हैं !

रंग,सिवइयां जाने कब से, ही रहे  थे साथ में,
ईद को ख़तरा बताते, आज भी कुछ लोग हैं !


धूर्त मन,मक्कार दिल,पर ओढ़ चादर केसरी
देश पर खतरा बताते,आज भी कुछ लोग हैं !


हमको लड़ना ही पड़ेगा, इन ठगों के गांव में,
कौम को ज़िंदा बताते,आज भी कुछ लोग हैं !

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