Thursday, February 28, 2019

निरंकुश मीडिया बर्बाद कर देगा इस शानदार देश को,समाज को -सतीश सक्सेना

आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक वृद्ध मां को उसका बेटा निर्दयता पूर्वक जमीन पर घसीटता हुआ ट्रेक्टर के आगे ले जा रहा है ताकि उसे कुचल कर मार सके और यह घटना महाराष्ट्र 21जून की है जहाँ राष्ट्र गौरव की बातें सबसे अधिक की जाती हैं !
पिछले कुछ वर्षों में , हमारे देश में नफरत की खेती खूब की गयी है और उसका नतीजा भी नजर आने लगा है, मेरे अपने सर्किल में कई सरल ह्रदय व्यक्तियों के व्यवहार में फर्क आया साफ़ महसूस हो रहा है , पडोसी देश के प्रति उत्पन्न की गयी यह नफरत अब मोहल्ले, घर और ट्रैफिक में भी नजर आ रही है , सोशल मीडिया पर जिनके विचार हमसे न मिलें उन्हें अमित्र करना आम है ! अफ़सोस यह है कि नफरत फ़ैलाने वाले अधिकतर भोले लोग, यहाँ तक कि छोटे बच्चों तक के मानस में , टीवी पर चीखते एंकरों की बाते, अमिट निशान छोड़ रही हैं !

सीधा साधे शांत देश को , जिसमें समस्त जाति ,कौम के लोग आराम से रह रहे थे, इन लोगों ने अपने घरों में भी बच्चों को  झाग उगलते हुए गाली देना सिखा दिया है जिसे सब जोश के साथ आसानी से आत्मसात भी कर रहे हैं , इन जाहिलों को यह नहीं मालुम की स्नेह और प्यार की जगह अनजाने में तुम अपने घर में जहर बो रहे हो जिसकी आग में सबसे पहले तुम्हारे बच्चे ही झुलसेंगे जिन्हें इस माहौल में ही पूरी उम्र जीना है ! मानव की मानव के प्रति बढती हुई गुस्सा इन्हें जानवर बना देने में सक्षम है और शीघ्र यह सड़कों पर नजर आयेगी ! 

मारो , सबक सिखा दो के नारे लगाते, इन बेवकूफों को यह भी नहीं मालुम कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों में युद्ध का अर्थ , घना अन्धेरा होगा जिसमें दोनों ओर कोई नाम लेवा नहीं बचेगा , भारत पाकिस्तान में ताकत की तुलना सिर्फ पारम्परिक युद्ध होने तक ही संभव है , परमाणुशक्ति संपन्न देशों में यह तुलना सिर्फ मूर्खता पूर्ण विचार है , दोनों अपार जीव संहार और मानवता विनाश में सक्षम हैं यहाँ एक पक्ष के धन और जनशक्ति  का कोई मूल्य नहीं , परमाणु युद्ध होने पर लाखों सैनिकों, भरपूर हथियारों , हवाई जहाजों , और अरबों डॉलर का रिज़र्व धन एक क्षण में नष्ट हो जाएगा  और दो जाहिल शासकों के मनहूस स्मारक  के रूप में ,आसमान की जगह सिर्फ घना अन्धेरा बचेगा , जो सैकड़ों बरसों तक मानव की मूर्खता का अवशेष होगा !

यही कारण था कि विश्व का सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका का राष्ट्रपति आज वियतनाम आकर एक गरीब देश नार्थ कोरिया के राष्ट्रपति से हाथ मिलाने को विवश हो रहा है और यही समय की पुकार भी है कि परमाणुशक्ति संपन्न  देश आपस में युद्ध की सोंच भी न सकें ! 

आज मैंने अपने घर से ललकारने वाले समस्त चैनल विदा कर दिए , सौम्यता से बात करने वाले चैनल ही देखना है इस हेतु न्यूज़ चैनल कम से कम देखूंगा , देखना है कि इस युद्ध यूफोरिया पर लगाम लगाने के लिए हमारी सरकार कब कदम उठाती है ! दुआ करूंगा कि भारत पाकिस्तान नेपाल बंगलादेश एक साथ एक संघ राष्ट्र का निर्माण करें और हम ईद पर होली के उत्साह से ,गले मिलकर, नफरत की करवटें लेना छोड़, आराम की नींद सो सकें ! 

Tuesday, February 26, 2019

६५ वर्ष में फ़िटनेस उम्र 52 वर्ष -सतीश सक्सेना

जीपीएस वाच मेरी एक्टिविटी रिकॉर्ड करती है , उसके एप्प टॉमटॉम स्पोर्ट्स के अनुसार 65 वर्ष की उम्र में, मेरी फ़िटनेस ऐज 52 वर्ष है जबकि पिछले वर्ष फिटनेस ऐज 47 वर्ष थी , इसका अर्थ है कि मैंने पिछले वर्ष की तुलना
में इस वर्ष कम एक्टिविटी की हैं नतीजा एक वर्ष में 5 वर्ष उम्र बढ़ गयी , पिछले चार माह से दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारण, सुबह दौड़ना केवल नाममात्र को ही रहा, आज भी सुबह आरामदेह कम्बल से दुखी मन तभी निकला जब खुद को ढेरों गालियाँ देनी पड़ीं !

इतिहास गवाह है कि सफलता मानव को पागल बना देती है, वह अपने किये हर काम को श्रेष्ठ मानना शुरू कर देता है , हम सब भी धन और सम्मान पाते ही उसका अनजाने में दुरुपयोग शुरू कर देते हैं , धन का उपयोग सबसे पहले आराम करने में लगाते हैं , सुख सुविधाओं के होते सबसे अधिक ह्रदय रोग और डायबिटीज (शाही रोग) धनवान और सम्मान सज्जित लोगों को ही होते हैं , मैंने आजतक एक भी मेहनतकश व्यक्ति को ह्रदय रोग से मरते नहीं सुना और न उसे डायबिटीज हुई जबकि चीनी भी वह सबसे अधिक खाता रहा ,इन बीमारियों का शिकार सबसे अधिक सम्मानित और बड़े लोग ही होते हैं जिनके प्रभामंडल पर समाज को नाज होता है ! वे पूरे समाज को दिशा देने में समर्थ होते हैं मगर शारीरिक मेहनत और पसीना बहाना उन्हें भी निरर्थक लगता है !

मजबूत मानवीय शरीर के इंजन के विभिन्न अवयवों को शक्ति सप्लाई देने के लिए , हाथ पैरों का निर्माण किया गया है ,लगातार चलते हुए हाथ पैर शारीरिक इंजिन को ईंधन देते रहते हैं ताकि वह अंत तक कार्यशील रहे ,
इसीलिये पुराने समय में लोग बहुत कम बीमार पड़ते थे ,रोग अपने आप ठीक हो जाते थे ! उद्यम शीलता के होते ढाई लाख वर्ष के मानव जीवन में मेडिकल व्यापार का दखल पिछले दो सौ वर्षों से ही हुआ है और यकीन मानिए इसके बदौलत मानव उम्र में कोई ख़ास योगदान नहीं हुआ है सिर्फ धन बहने के एक श्रोत का सर्जन अवश्य हुआ है आज एक ऑपरेशन होते ही इंसान के जीवन की आधी एक्टिविटी और उत्साह नष्ट हो जाता है बचा जीवन धीरे धीरे बात करते हुए ही गुजरता है !

रिटायरमेंट के बाद मैंने पहली बार शारीरिक मेहनत का सुख महसूस किया, पिछले 41 माह में 638 बार घर से दौड़ने निकला हूँ और लगभग 5000 Km दौड़ चुका हूँ, प्रति सप्ताह 30 km एवरेज रनिंग करने के साथ 26 बार हाफ मैराथन रेस (21Km) पूरी करने में सफलता प्राप्त की !

६५ वर्ष की उम्र में लगातार ढाई घंटा दौड़ने के बाद पूरे शरीर से बहते पसीने का आनंद का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता उसे केवल महसूस किया जा सकता है , चेहरे और पेट का भारी वजन, कोलेस्ट्रोल , डायबिटीज , बढ़ा बीपी , पेट के रोग , जोड़ों के दर्द कब गायब हो गये, पता ही नहीं चला ! भरोसा नहीं होता कि मैं वही सतीश हूँ जिनका फोटो नीचे लगा है ! यह सब करने के लिए मैंने आत्मविश्वास के साथ लीक से हटकर चलने की आदत डाली और सफल रहा !
सस्नेह आप सबको ...

Tuesday, February 19, 2019

अनमोल जीवन के प्रति लापरवाही, पछताने का मौक़ा भी नहीं देगी -सतीश सक्सेना

बिना पूर्व तैयारी लम्बे रन दौड़ने का प्रयत्न करना, सिर्फ जोश में, बचकाना पन ही कहलायेगा , मानव देह को धीरे धीरे किसी भी योग्य बनाया जा सकता है वह हर स्थिति के अनुसार अपने आपको ढाल सकती है और इसके लिए उम्र बाधा कभी नहीं होती बशर्ते सोंचने वाले की समझ ब्लाक न हो !शरीर के जोड़, मूवमेंट के लिए बनाए गए हैं
अगर बरसों से आपने धनवान बनने के बाद, सिर्फ आराम किया है तो पक्का आपके जॉइंट जकड चुके हैं और शरीर में फ्लेक्सिबिलिटी समाप्त होने के कगार पर होगी , अधिकतर लोग इसी अवस्था को ही बुढापा कहते हैं जब यहाँ 50 वर्ष से ऊपर हर इंसान के चेहरे पर, उम्र जनित गंभीरता दिखती है , हँसना उनके विचार से जवानों का काम होता है अधिक उम्र में उन्मुक्त हंसना तो उन्हें बेहूदगी लगने लगता है ! हंसने के नाम पर वे अक्सर पार्क में हमउम्र बुड्ढों के साथ खड़े होकर हो हो हो हो कर जोर से आवाज निकाल कर हंसने को ही, हंसना मान लेते हैं !

मेरे विचार से जो उन्मुक्त मन हंस नहीं सकते वे निश्चित ही असमय बुढापे का शिकार हो चुके हैं , कारण चाहे कुछ भी हो , अपने अपने कष्टों के नीचे जीने की इच्छा खो बैठना, मानवता के प्रति सबसे बड़ा गुनाह है , ऐसे लोग अपनों के प्रति, अपने कर्तव्य भुलाकर , रोते रोते जीवन काटते हुए मानव के खूबसूरत जीवन के प्रति अपराध कर रहे होते हैं !

इंसान वही जो हँसते हुए उनके लिए जिए जिन्हें उसकी जरूरत है, इसके लिए मन में स्फूर्ति एवं सतत शौक
रखना और उन्हें सीखने की प्रक्रिया आवश्यक है , इच्छाओं और स्फूर्ति का मरना ही मृत्यु है , सो हंसने के लिए पार्क में अवसाद युक्त चेहरों के साथ खड़े होकर हो हो हो हो करने की निरर्थकता पर गौर करना होगा , हंसना आवश्यक है और उसके लिए नेचुरल उन्मुक्त हँसना, सीखना होगा !

सुबह लगभग एक घंटा पसीना बहाने की आदत डालिए आप इतने में ही उम्र्जनित अवसाद से मुक्त हो जायेंगे , तेज वाक के अंत को एक या दो मिनट तक दौड़ कर समाप्त करें और यह अधिक तेज न हो कि हांफना पड जाए ! इस प्रक्रिया से आपका शरीर दौड़ना सीख जाएगा , शुरू के एक साल शरीर में तरह तरह के दर्द होंगे जो मसल्स के पुनर्निर्माण की पहचान है , उनकी परवाह न करें ! रन /वाक से पहले और बाद में स्ट्रेचिंग और स्ट्रेंग्थ एक्सरसाइज अवश्य करें अन्यथा मांसपेशियां चोटिल हो सकती हैं !

अगर आप 5 km दौड़ना चाहते हैं तो सप्ताह में आराम से 10km दौड़ने का पूर्व अभ्यास बिना हांफे होना चाहिए , 10 km और 21Km के लिए यह दूरी क्रमश 20 और 40 Km होती है ! इसी तरह 5 Km दौड़ने से एक सप्ताह पहले आप कम से कम एक रन में, 4 km बिना हांफे दौड़ चुके हों , तभी शरीर को 5 km दौडाने का प्रयत्न करना चाहिए ! 10km और 21km की रेस के लिए यह दूरी 8 km और 18 km होगी !

50 वर्ष के ऊपर के नवोदितों के लिए 21 km की लम्बी दौड़ सिर्फ तब दौडनी चाहिए जब वे पिछले छह माह में कई बार 17km रन, दौड़ने के अभ्यस्त हों अन्यथा 8-10 km दौड़ने के अभ्यस्त को 21km दौड़ना घातक हो सकता है ! 21 km दौड़ते समय शरीर के तमाम अवयवों में लगातार कम्पन होता है और एनर्जी लॉस होता है , लगातार तीन घंटे , तक दौड़ने का जोश में किया गया, प्रयत्न जान लेने में समर्थ है और इसी भूल में कई धुरंधरों की मौत दौड़ते समय हुई हैं जो कई
मैराथन दौड़ चुके थे ! एक रनर जो अपने शरीर की आवाज नहीं पहचानता उसे दौड़ने से दूर रहना चाहिए , खतरनाक पलों और दिनों का अहसास शरीर अपने मालिक को महीनों पहले बताना शुरू कर देता है कि आप जबरदस्ती न करें अन्यथा बुरा घट सकता है !

हर शरीर अलग होता है, अधिक उम्र वाले वर्ष में दो या तीन हाफ मैराथन या एक मैराथन दौड़ना काफी होता है , अधिक संख्या में दौड़ने का अर्थ आपके कमजोर शरीर को खतरनाक ही साबित होगा ! अतः जल्दबाजी न करें , शरीर को धीरे धीरे कठिन मेहनत का अभ्यस्त बनाएं , तभी आप समझदार कहलायेंगे और शरीर को बीमारियों से मुक्त करने में दौड़ सहायक होगी !


Thursday, February 7, 2019

तू अमरलता, निष्ठुर कितनी -सतीश सक्सेना

वह दिन भूलीं कृशकाय बदन,
अतृप्त भूख से , व्याकुल हो,  
आयीं थीं , भूखी, प्यासी सी 
इक दिन इस द्वारे आकुल हो 
जिस दिन से तेरे पाँव पड़े  
दुर्भाग्य युक्त इस आँगन में !
अभिशप्त ह्रदय जाने कैसे ,
भावना क्रूर इतनी मन में ,
पीताम्बर पहने स्वर्णमुखी, तू अमरलता निष्ठुर कितनी !

सोंचा था मदद करूँ तेरी
इस लिए उठाया हाथों में ,
आश्रय , छाया देने, मैंने 
ही तुम्हें लगाया सीने से !
क्या पता मुझे ये प्यार तेरा,
मनहूस रहेगा, जीवन में ,
अनबुझी प्यास निर्दोष रक्त
से कहाँ बुझे अमराई में ! 
निर्लज्ज,बेरहम,शापित सी,तुम अमरलता निर्मम कितनी !

धीरे धीरे रस  चूस लिया,
दिखती स्नेही, लिपटी सी !
हौले हौले ही जकड़ रही,
आकर्षक सुखद सुहावनि सी
मेहमान समझ कर लाये थे 
अब प्रायश्चित्त, न हो पाए !
खुद ही संकट को आश्रय दें 
कोई प्रतिकार न हो पाये !
अभिशप्त वृक्ष, सहचरी क्रूर , बेशर्म चरित्रहीन कितनी !


Wednesday, January 16, 2019

हे प्रभु ! मेरे देश में ढोरों से बदतर, लोग क्यों - सतीश सक्सेना

हे प्रभु ! इस देश में इतने निरक्षर , ढोर क्यों ?
जाहिलों को मुग्ध करने को निरंतर शोर क्यों !

अनपढ़ गंवारू जान वे मजमा लगाने आ गए 
ये धूर्त, मेरे देश में , इतने बड़े शहज़ोर क्यों ?

साधु संतों के मुखौटे पहन कर , व्यापार में   
रख स्वदेशी नाम,सन्यासी मुनाफाखोर क्यों !

माल दिलवाएगा जो, डालेंगे अपना वोट सब 
देश का झंडा लिए सौ में, अठत्तर चोर क्यों !

आखिरी दिन काटने , वृद्धाएँ आश्रम जा रहीं !
बेटी बिलख रोई यहाँ,इस द्वार टूटी डोर क्यों !

Saturday, January 5, 2019

अब एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में -सतीश सक्सेना

खांसते दम ,फूलता है 
जैसे लगती जान जाए 
अस्थमा झकझोरता है, 
रात भर हम सो न पाए
धुआं पहले खूब था अब  
यह धुआं गन्दी हवा में 
समय से पहले ही मारें,
चला दम घोटू पटाखे ,
राम के आने पे कितने 
दीप आँखों में जले,अब 
लिखते आँखें जल रही हैं ,जाहिलों के शहर में !

धूर्त बाबा बन बताते 
अनपढ़ों को राज्यशोषित 
और नेता कर रहे हैं ,  
स्वयं को अवतार घोषित 
चोर सब मिल गा रहे हैं 
देशभक्ति के भजन ,
दिग्भ्रमित विस्मित खड़े 
ये,भेडबकरी मूर्खजन !
राजनैतिक धर्मरक्षक 
देख ठट्ठा मारते, अब 
राम बंधक बन चुके हैं , कातिलों के शहर में !

सुगन्धित खुशबू बिखेरें
फूल दिखते ही नहीं हैं
जाने कब भागीरथी भी
मोक्षदायिनि सी रहीं हैं 

कृष्ण की अठखेलियाँ भी 
थीं, कभी कृष्णा किनारे
उस जगह रोती हैं गायें , 
अपने केशव को पुकारें 
किस गली खोये स्वर्ण
अवशेष  मेरे देश के  ?
हाँ , एक जमुना नाम का नाला है , मेरे शहर में !

Wednesday, December 19, 2018

घर में बिन बुलाया मेहमान अलेक्ज़ेन्ड्रियान पैराकीट -सतीश सक्सेना

विश्व में हमारे अलावा अन्य कितने ही जीव हैं ,जो हमारी तरह सांस लेते हैं,सोते हैं,जागते हैं,भोजन करते हैं, बात करते हैं, चलते हैं,उड़ते हैं मगर बहुत कम इंसान हैं जो अपने पूरे जीवन में कभी अन्य जीवों के बारे में  सोंचते भी हैं और निश्चित ही यह कमी मानव जीवन को एक महत्वपूर्ण आनंद से वंचित रखती है ! मैं उन खुशकिस्मत इंसानों में से एक हूँ जो इन जीवों से बात करने का प्रयत्न करता रहा हूँ और इनसे दोस्ती बनाए रखने में सफल हूँ ! आप यकीन करें या न करें प्यार का प्रत्युत्तर देने में यह सब जीव मानवों से बेहद आगे हैं ! इंसानों को सबसे अधिक प्यार करने वाले कुत्तों ( जिन्हें हम जाहिलों ने गाली का दर्जा दिया ),स्मार्ट खरगोश , खूबसूरत गिनी पिग ,के बाद पिछले दिनों अचानक एक अजनबी तोता हमारे घर आ गया जिसकी समझदारी ने हमारी धारणाओं को उड़ाकर रख दिया !

हमने इसे पकड़ने की कोशिश न करके इसके लिए भोजन में अमरुद, हरी मिर्च, सेब , बिस्किट आदि रखे और इसने सब कुछ खाया , बेहतरीन बात यह कि अगर मैंने रस को चाय में डुबोकर खाया तो इसने भी दिए गए रस (rusk ) को पहले सामने रखे पानी या दूध में उठाकर डाला और बाद में पलट कर
गुड़िया के साथ 
डाला ताकि और नरम हो जाए और बाद में उसे निकाल कर खाया ( वीडियो देखें ) , इंसान की आवाज की नक़ल करना उसका जवाब देने का इनसे मुकाबला और कोई जीव नहीं कर पायेगा ! कुछ ही दिनों में इसे मुझपर इतना विश्वास हो गया है कि अब मेरे ही साथ मेरे कम्बल में घुसकर एक घंटे से अधिक समय तक सोता रहा है जो इसकी प्रकृति के विपरीत है !
चाय पीते समय गरम कप में मुंह डाल कर अपनी जीभ जला चुका है ! मिट्ठू अच्छा बच्चा है जितनी बार मैं कहता हूँ यह हर बार जवाब देता है कि हाँ यह अच्छा बच्चा है !

 काश हम अपने को श्रेष्ठ न मानकर प्रकृति के अन्य जीवों को ध्यान से समझने का प्रयत्न करें तो शायद अलौकिक आनंद का अनुभव हो !मुसीबत में सिर्फ भगवान याद आते हैं जो हमें मिलने कभी नहीं आते हम उनके बनाये अन्य स्वरूपों को देखने, समझने का प्रयत्न ही नहीं करते !




Sunday, December 9, 2018

सारी धरती लोहा माने , इंसानी इकबाल का ! -सतीश सक्सेना

सत्येन दादा,उन लोकप्रिय लोगों में से एक हैं जिन्हें मैं सम्मान के साथ पढने ,समझने का प्रयत्न करता हूँ , हर एक
के प्रति संवेदनशील, स्नेही सत्येन भंडारी को अगर पढ़ना शुरू करें तो समाप्ति से पहले रुक नहीं पायेंगे , उनकी सहज अभिव्यक्ति,आसानी से आपको मुक्त नहीं करेगी बल्कि सोंचने को विवश कर देगी, ऐसी है उनकी लेख्ननी !
स्नेही संवेदनशील लोग अगर लेखक हों तो वे निस्संदेह उनके लेखन में अनूठापन और ईमानदारी स्पष्ट नजर आएगी ऐसे लोग अपनी तारीफ नहीं चाहते और न इसका प्रयत्न करते हैं सो अक्सर यह बहुमूल्य व्यक्तित्व साहित्य जगत में गुमनामी में ही रहते हैं ,हाँ, ढोल बजाते प्रशस्ति पत्र पाते लोगों से कोसों दूर इन लोगों की कुटिया में उनके भले मित्रों की कोई कमी नहीं होती !

आज Anand भाई के एक कमेन्ट के द्वारा Satyen Bhandari की अस्वस्थता के बारे में ज्ञात हुआ, सुनकर खराब लगा , हाइपरटेंशन वाकई खराब बीमारी है खासतौर पर यदि 50 के बाद हो तब, मैं खुद इसका 55-60 वर्ष की उम्र में शिकार रहा हूँ , पेट के इर्दगिर्द वजन , और चेहरे का भारी होना इसकी शुरुआत मानता हूँ ! इसके साथ ह्रदय आर्टरीज में रूकावट होने का खतरा हमेशा सामने रहता ही है ! आज सर्वाधिक डायबिटीज और ह्रदय रोगी हमारे देश में ही हैं जिनसे मेडिकल व्यवसाय जबरदस्त तरीके से फलफूल रहा है !

सर्विस रिटायरमेंट (2014) के समय मुझे यह सारी समस्याएं, जन्मजात भावुकता एवं संवेदनशीलता के साथ मौजूद थीं, किसी भी जीव के कष्ट में खुद को आत्मसात कर लेना , इस खतरे को चर्म सीमा पर पंहुचाने के लिए 
काफी था मगर मैं इस उम्र में रगड़ रगड़ कर मरना नहीं चाहता था और इन्हीं दिनों मैं अपनी जिम्मेवारियों से
मुक्त हुआ था और अब खुद के लिए जीने की तमन्ना थी सो बड़प्पन को एक तरफ झटक अभी तो पार्टी शुरू हुई है, के नारे के साथ शरीर को निरोग बनाने का फैसला , अभूतपूर्व विश्वास के साथ कर 61 वर्ष की उम्र में नियमित वाक शुरू किया था ...

पौराणिक कहानियों में मैंने भीष्म पितामह से एक सबक लिया कि जीवनीशक्ति पर किया आत्मविश्वास आपको विजयी बनाएगा बशर्ते इसपर कोई संशय न हो ! अगर आसन्न मृत्यु उन्हें डिगा नहीं पायी तो मैं अभी उस भयावह अवस्था में नहीं हूँ बस सबसे पहले यह ठान लेना होगा कि मुझे अगले 20 वर्ष बेहद मजबूती के साथ जीना हैं और उसके बाद तदनुसार खानपान सम्बन्धी उचित आचरण करना होगा !

लोग अक्सर मुझसे मेरे स्वास्थ्य का राज पूंछते हैं , ऐसा नहीं कि मुझे बीमारियाँ नहीं होतीं हर वर्ष जाड़ों में खांसी की समस्या मेरे बढ़िया स्वास्थ्य में रुकावट रही है ! पिछले दो माह से दिल्ली के प्रदूषण में दौड़ने का प्रयास और फलस्वरूप गले में इन्फेक्शन के कारण लगभग तीन किलो वजन बढ़ा है साथ ही स्वाभविक तौर पर लम्बी दूर की दौड़ पर प्रतिकूल प्रभाव भी दिख रहा है मगर यह समस्याएं आत्मविश्वास नहीं तोड़ पाएंगीं , कुछ दिनों में अन्धेरा दूर होगा और फिर वजन घटेगा और सतीश दौड़ेगा ...

अपने ऊपर यह भरोसा तुम्हें हर बीमारी से मुक्त रखेगा , हाँ यह सब एक दिन में न होकर काफी लम्बे समय में होगा जब तक जीना है शरीर को एक्टिव बनाए रखना होगा अन्यथा हल्की से मायूसी और खुद पर अविश्वास उसी दिन शरीर को जमीन पर लिटाने के लिए काफी होगा !

जिस व्यक्ति को यही नहीं मालूम कि उसके शरीर का मोटापा क्या खाने से बढ़ रहा है वह यकीनन अपने जीवन के प्रति लापरवाह है ! हर शरीर अलग है, अगर एक शरीर पर, मीठा वजन बढाने का दोषी है तो दूसरे शरीर पर चना या दूध यह काम बखूबी कर रहा होगा और यह पता करना कोई अधिक मुश्किल काम नहीं, 
याद रहे बढ़ा हुआ वजन हर बीमारी बढाने में समर्थ है !

हर व्यक्ति को लगभग ५ km रोज धीरे धीरे दौड़ना चाहिए , इतना दौड़ना शरीर को सिखाने के लिए , लगभग २ माह का समय लगता है ! और मजबूत शरीर के लिए आवश्यक दौड़ सीखने के लिए हर रोज वाक का आखिरी 200 मीटर, बिना हांफे भाग कर समाप्त करना चाहिए ! मानवीय बॉडी कोर में अवस्थित महत्वपूर्ण अवयव, दौड़ने से उत्पन्न कम्पन पाकर अपने आपको धन्य समझेंगे और नए जोश से आपके शरीर को नवऊर्जा संचार देंगे ! आपकी आन्तरिक शारीरिक प्रतिरक्षा शक्ति आपको धन्यवाद् देगी कि चलो इस उम्र में ही सही बुड्ढे में बुद्धि तो आई ....

और २०१५ में ६१ वर्ष की उम्र में मेरा बीपी कब ठीक होगया पता ही नहीं चला , हैं मैंने शरीर के साथ जबरदस्ती नहीं की धीरे धीरे उसे एथलीट बनाया और सफल भी रहा !

मैराथन आसान ,भरोसा हो क़दमों की ताल का
साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा तिरेसठ साल का !

इसी हौसले से जीता है, सिंधु और आकाश भी
सारी धरती लोहा माने , इंसानी  इकबाल का !

Wednesday, November 21, 2018

मेहनत का कोई विकल्प नहीं -सतीश सक्सेना

अकेले लॉन्ग रन पर जाने में , मन बहुत व्यवधान पैदा करता है ! कल सुबह बेमन घर से निकला कि 10 km दौड़ना है अन्यथा Millennium City Marathon - 4th Edition 2nd Dec 2018​ जिसमें कई अंडर ब्रिज की चढ़ाइयाँ पार करते हुए 21 km दौड़ना इतना आसान नहीं होगा ! पहले दो सौ मीटर दौड़ने में ही तरह तरह के
बहाने नजर आने लगे , आज कोहरा बहुत है  ...अन्धेरे में पैर गड्ढे में आ सकता है ...कुत्ते हो सकते हैं हाथ में डंडा भी नहीं है  ...आज पैर में दर्द है आदि आदि !

मगर मजबूत इच्छा शक्ति ने, मन को धमकाया कि हर हालत में आज लंबा दौड़ना है और मुश्किल रस्ते से जाना है जहाँ फ्लाईओवर आदि मिलें ! अगर बेमन रोते हुए दौड़े तो बेट्टा आज 25 किलोमीटर दौड़ने की सजा मिलेगी इसलिए चुपचाप 17-18 km दौड लो कोई बहाना मंजूर नहीं ! और मजबूत इच्छा शक्ति की इस धमकी के आगे मन अपना मन मसोस कर चुपचाप कोने में बैठ गया और पैरों को एक लम्बे नए रूट पर मजबूत संकल्प के साथ मुड़ते देखता रहा !

और इस चौसठ वर्षीय नवजवान ने तीन चार ब्रिज की चढ़ाइयाँ पार करते हुए लगभग 20 km की दूरी भारी ट्रेफिक के बावजूद, अकेले दौड़ते हुए , तय करने में सफलता प्राप्त की जिसके लिए मात्र ३ वर्ष पहले 100 मीटर भी दौड़ना एक बुरा सपना था !

पेन्क्रियास और ह्रदय की सुरक्षा के लिए आइये, दौड़ना सीखें, मेडिकल व्यवसाइयों से बचें, वे बेहद खतरनाक हैं , वे आपको बचाने की कोशिश भी नहीं करते हैं और न उनके हाथ में हैं , वे सिर्फ आपके गलते शरीर पर दवाओं का प्रयोग कर आपको प्रभावित करने का कामयाब प्रयत्न करते हैं ! 

Sunday, November 11, 2018

मरना है तो,मरो सड़क पर मगर आज हों, ब्रेक बैरियर ! -सतीश सक्सेना

कई दिन बाद,आज सुबह, लम्बा दौड़ने का फैसला कर दौड़ते हुए 13.20 Km का फासला बिना रुके , बिना पानी के तय किया ! यह दूरी 1घंटा 36 मिनट में तय की गयी ! रनिंग के तुरंत बाद, बॉडी कूल डाउन के लिए लगभग 6 km तेज वाक किया ! अब लग रहा है कि जैसे काफी दिन बाद शरीर तरो ताजा और आत्मविश्वास से लबालब हुआ !


लोग सोंचते होंगे कि यह किस्मत वाले वाले हैं कि इन्हें 64 वर्ष की उम्र में भी कोई बीमारी नहीं है , मगर यह सच नहीं है , सत्य है कि मुझे भी बीमारियाँ हैं और परेशान करने वाली बीमारियों हैं मगर मैं उन्हें याद ही नहीं रखता और न दवा खाता अन्यथा बचा जीवन कब का मेडिकल व्यापारियों की भेंट चढ़ गया होता !
मेरा मानना है कि ६४ वर्ष की उम्र में कम से कम 64 प्रतिशत शरीर का क्षरण अवश्य हुआ है और मेरे शरीर का हर अंग की क्षमता भी उसी हिसाब से कम हुई होगी वह और बात है कि मैं अपनी मशीनरी को अधिकतर एक्टिव रखने में कामयाब हूँ सो मेरे शरीर की चुस्ती और स्टेमिना, उम्र के हिसाब से कहीं अधिक है , यकीनन मैं बाद में बिस्तर पर लेटकर बीमारियाँ भोगने से काफी हद तक बचा रहूंगा !

बूढों को देखते ही,संभावित बीमारियों का टेस्ट कराने के लिए , अक्सर परिवारजन सलाह देते देखे जाते हैं , मुझे मेडिकल व्यवसाय से अधिक प्रभावी विज्ञापन आजतक देखने को नहीं मिले जहाँ बीमार होते ही पूंछा जाए कि दवा ले आये ? मतलब शरीर में जो बीमारी बरसों में पैदा हुई है वह गोली खाते ही ठीक हो जायेगी इसीलिए मेडिकल पढ़ाई की फ़ीस करोड़ों तक पंहुचती है क्योंकि उस धंधे में पैसों की कोई कमी नहीं , साठ से ऊपर का हर आदमी अपने जीवन भर की कमाई बचाए बैठा रहता है कि उसे देकर इलाज हो जाएगा उसे उससे आगे की सोंचना ही नहीं कि बाद में बचोगे कितने साल ?

हर शहर में मेडिकल टेस्ट लेब्स की भरमार है और एक एक लैब में रोज सैकड़ों टेस्ट सैंपल लिए जाते हैं कोई ज्ञानी यह समझने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या इस लैब में इतने टेस्ट करने की क्षमता और मशीनें भी हैं ? एक सामान्य टेस्ट करने में ही लगभग आधा घंटा लगता है पूरे दिन में एक तकनीशियन सिर्फ 12 टेस्ट कर पायेगा फिर यह रोज की 100 टेस्ट रिपोर्ट क्या मंगल वासियों द्वारा किये गए हैं ?

खैर ....दोस्तों से निवेदन है कि भारत डायबिटीज और ह्रदय रोगों की राजधानी बन चुका है, रोज जवान और असमय मृत्यु सुनने को मिलती है सो इनसे और मेडिकल व्यवसाइयों से बचने के लिए खुद को दौड़ना सिखाइए और जीवन का आनंद लीजिये !

सस्नेह सादर ..

आज की पंक्तियाँ जो गाते हुए दौड़ा ....

भाड में जाए धड़कन दिल की
कमर दर्द , कमजोर हड्डियां
मरना है तो , मरो सड़क पर
मगर आज हों, ब्रेक बैरियर !
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