Saturday, May 18, 2013

भ्रष्टाचार हमारे खून में -सतीश सक्सेना

आजकल भारतीयों में भ्रष्टाचार पर बोलने का शौक चर्राया हुआ है , कुछ वर्ष पहले यह हवा में इतना नहीं फैला था,  हां कुछ ईमानदार राजनीतिक पार्टियाँ, जो बेचारी बहुमत न पा सकीं थीं जरूर सत्ता पार्टी के भ्रष्टाचार पर चीख  चीख कर देश वासियों को बताती रहती थीं कि देखो तुमने चोरों को वोट दिया है किसी तरह इन्हें सत्ता से हटाओ और हमें लेकर आओ और फिर आपकी दशा पलटने में देर नहीं लगेगी  !
उल्टा पेपर, गैर भाषा, पढ़ रहे विद्वान् हैं 


और हम लोग फिर इंतज़ार करते रहते कि  अब हमारे घर भी नोट बरसेंगे..

मानव जीवन में, पौराणिक काल से लेकर आजतक , कोई काल ऐसा नहीं हुआ जहाँ वे बुरे काम नहीं हुए जो इस समय हो रहे हैं , फर्क केवल संचार साधनों का है जो उस समय नहीं पाए जाते थे और बेईमानियाँ , चोरी , काम लोलुपता आदि आसानी से सामाजिक  भय के कारण छिपी रह जाती थीं .

अख़बारों में, आधुनिक स्कूलों में पढ़े लेखक, जिन्हें सुदूर गाँव, सूबों  की सामंत शाही , राजशाही के बारे में रंच मात्र भी पता नहीं ,शहरी वातावरण में अपने गाल बजाते रहते हैं ! जिन ख़बरों पर मिडिया अपने दर्शक बटोरने के लिए दिन रात भोंपू बजाती रहती है , सदियों से, ऎसी करोड़ों ख़बरें, बदनामी भय के आतंक तले, घुट कर दम तोडती रही हैं , इसका अंदाजा किसे है !  मानव की राक्षसी शक्ति बढाने की अपरिमित इच्छा एवं शारीरिक भूख की मांग को न दबाया जा सका है और न कोई दबा पायेगा  !    

मानव ईमानदारी संभव ही नहीं है , हर एक के मन में लालच है फर्क केवल  लालच की मात्रा का और मौके का है जिसे मौका नहीं मिल सका वह मजबूरी में ईमानदार है और बना भी रहेगा जब तक उसे जुगाड़ से  कुछ  अतिरिक्त  धन न मिल जाए !

बताइये, आपके जीवन में आये लोग कितने ईमानदार हैं जो केवल अपनी सही आय पर गुज़ारा करते हैं  ? इनमें से हर आदमी ने अपनी आय बढाने के तरीके निकाले हुए हैं ! 

इन सबके करप्शन पर पूरा एक लेख लिखा जा सकता है जिसे पढ़ कर आप भौचक्के रह जायेंगे !  हम दूसरों की बेईमानी जानकार चकित होते हैं और अपनी  किसी को बताते नहीं  ! अगर आपको यह लगे कि इस कार्य में कोई ऊपरी आमदनी नहीं है तो यह सिर्फ आपकी उस काम के प्रति अज्ञानता होगी और कुछ नहीं !

-काम वाली 
-सड़क पर झाड़ू लगाने वाला 
-रिक्शे वाला 
-दूकान दार 
-सब्जी वाला, फेरी वाला ,कबाड़ी वाला ,दूध वाला , पेपरवाला ,टैक्सी वाला ,हलवाई  
-पंडित जी ,जागरण वाले लोग , मंदिर 
-भिखारी 
- सरकारी विभाग के कर्मचारी 
-लाला के यहाँ कार्यरत लोग 
-सरकार के कुछ ईमानदार (डरपोक )अधिकारी जिनके घरों में नौकर और गाड़ी व्स अन्य अवैध सरकारी सुविधाएँ होती हैं  !
-गुरु जन एवं शैक्षिक संस्थाएं 
-डॉक्टर 
-घर बनाने वाले मिस्त्री और मजदूर 
-होली दीवाली अपने फायदे के लिए गिफ्ट ( रिश्वत ) बंटते / लेते, हम सब लोग
-घर के बाहर आसानी से कूड़ा फेंकते, थूकते  हम सब 

और एक शब्द जो हम सब घरों में आम है, वह है ...
इससे हमें क्या फायदा  ?
हम लालची लोग जब तक अपना फायदा नहीं देखते, कुछ नहीं करते , यही भ्रष्टाचार है ! 

मैंने अक्सर, अनजान लोगों को बिपत्ति में, अपना खून देते समय, अस्पताल के गेट पर छोड़ने  आते, ऊपर से कृतज्ञ  रिश्तेदारों के चेहरे पर राहत का, सुकून देखा है कि चलो एक मुर्गा तो फंसा  और मैं इन लालची गरीबों पर दया खाते हुए, संतोष पूर्वक ब्लड बैंक से बाहर आता हूँ !

ये अपने जीवनसाथियों को मृत्यु आसन्न पाकर भी, अपना खून तक नहीं देते और चले हैं दूसरों का भ्रष्टाचार रोकने !

Friday, May 17, 2013

अपने परिवार की महिलाओं के लिए कृपया इसे पूरा पढ़े - सतीश सक्सेना

                वे ही पूरे परिवार खुशियों के रंग भरती हैं ,सारे जीवन सुबह से शाम तक बिना थके पूरे परिवार की चिंता , भोजन , वस्त्र , घर का रख रखाव, आदि में बिना अपनी थकान याद किये व्यस्त रहती हैं ! उनकी अधिकतर बीमारियों के बारे में हमें पता ही नहीं चलता ! और शायद हम याद न रखने के भी दोषी हैं !

डॉ गीता (कैंसर कंसल्टेंट ) के शब्दों में ..
She lights up everyone's lives. She is an enigma,a pillar of strength- she is the sunshine, the rainbow, the gentle breeze,the earth, all enduring, selfless and patient.She gives endlessly.Let us care for her, nurture her and keep her healthy because our existence is inextricably linked to her.She means the world to us, so let us paint her canvas in pink and ensure she is aware of her own self and submits herself to a check even if she is ostensibly well.'
Sent from BlackBerry® on Airtel

                 ब्रैस्ट कैंसर पर जागरूकता हेतु यह कविता कल फेस बुक पर पोस्ट की थी जिसमें महिलाओं से अपना ध्यान रखने के लिए अपील थी चूंकि हम ब्लागर साथियों में पढने की आदत बेहद कम होती है और सरसरी नज़र से देख कमेन्ट करते हैं फिर भी पहली बार मैंने उसे शेयर करने की अपील की थी तथा उनके नाम भी टैग किये थे जिससे वे इसे कुछ अधिक महत्व दें !


मगर सुबह वही हाल ..

लाइक की भरमार थी वहां मगर या तो शेयर करना आवश्यक नहीं लगा उन्हें ... :(
अथवा अपील ही नहीं पढ़ी :(

महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर बेहद घातक  हो सकता है अगर वे वक्त पर लापरवाही न दिखाएँ , अफ़सोस है कि अक्सर वे इसको छुपाती हैं और नतीज़ा परिवार के लिए बहुत खराब होता है !

फेस बुक पर जाकर इसे शेयर करने के लिए दुबारा अपील कर रहा हूँ , आशा है इस पुनीत कार्य में सब का उत्साह मिलेगा !
https://www.facebook.com/satish1954?ref=tn_tnmn

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200296055257322&set=a.10200263590885733.1073741827.1031990443&type=1&theater


Monday, May 6, 2013

काश ! काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है दीवानों की .. -सतीश सक्सेना


दुनिया वाले क्या पहचाने,फितरत हम मस्तानों की !
गंगटोक 30 मार्च 13 

कहाँ से लायेंगे, उजला मन, आदत पड़ी बहानों  की  !

हँसते हँसते सब दे डाला , अब इक जान ही बाकी है !
काश काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है ,दीवानों की !

रहे बोलते जीवन भर तुम,हम किससे फ़रियाद करें ! 
खामोशी का अर्थ न समझे,हम फक्कड़ मस्तानों की ! 

मन संकुचित कहाँ पहचाने, परमपिता को आँखों से !  
नज़र नहीं उठ पायें वहां तक,आदत पड़ी गुलामों की !

सूफी संतों  ने  सिखलाया , मदद न मांगे, दुनिया से !   
कंगूरों को, सर न झुकाया, क्या परवा  सुल्तानों की !

प्यार बाँटते, दगा न करते , भीख न मांगे दुनिया से !
ज्वालामुखी मुहाने  जन्में , क्या  चिंता  अंगारों की  !

अभिशापित जीवन पाया है, क्या हमको  दे पाओगे !
जाओ, जाकर, बाहर घूमो ,रौनक लगी बाजारों की  !

बंजारे  को  ख्वाब दिखाते , महलों और मेहराबों के !
बरगद तले, बसेरा काफी, मदद न लें इन प्यारों की !

Friday, May 3, 2013

कुछ लिखने का मन नहीं करता -सतीश सक्सेना

मेरा लिखने को मन नहीं करता जब ...

  • कोई अपना,अपने मन की बात चाहते हुए भी न कह पाए.. 
  • किसी विधवा माँ का खाली बटुआ,बच्चों को नज़र नहीं आये ...
  • विवाह के बाद विदा होने के बाद, भाई को बरसों, अपनी बहन की याद नहीं  आये .....
  • जब बेटे बहू को, बाहर डिनर पर जाते समय ,दरवाजा बंद करने आती, माँ के आंसू नज़र नहीं आयें  .. 
  • बेहद नजदीकी रिश्तों में भी धन को महत्व दिया जाए.. 
  • दूसरों का नुकसान करके भी,अपना फायदा देखा जाये .....
  • धनवान,अपने बच्चों से भी धन पाने की आशा करे...
  • सम्मान लालचियों का भी सम्मान किया जाए ..
  • साधुओं को भुला दिया जाये... 

Tuesday, April 2, 2013

ये बेचारे ... -सतीश सक्सेना

निम्न पंक्तियाँ, एक कमेन्ट के रूप में  श्री गिरधारी  खंकरियाल की  " ये बेचारे -रिक्शे वाले " शीर्षक वाली

रचना पर लिखी गयी हैं ! शीर्षक के शब्द उन्ही के हैं , आभार सहित  वही कमेन्ट / रचना आपकी नज़र है ...

कौन समझना, चाहे इनको
काम बहुत,क्या देखें इनको
वजन खींचते, बोझा ढोते
दर्द न जाने दुनिया वाले
ये बेचारे रिक्शे वाले

माँ की दवा,बहन की शादी
जाड़ा गर्मी हो या पानी
इक अनजानी चिंता इनको
खाए जाती हौले हौले  !
ये बेचारे रिक्शे वाले