Thursday, December 1, 2011

भीड़ चाल -सतीश सक्सेना

              संसार का शायद ही कोई आदमी ऐसा होगा जो अपने आपको कम अक्ल मानता होगा , हमारे देश में सामान्यतः यह कमी कहीं नज़र नहीं आती बल्कि बहुतायत ज्ञान सिखाने वालों की है ,जो हर गली कूंचों में बिखरे पड़े हैं !
              मगर विकिपीडिया  कुछ और ही कहती है , सन २००८ के आंकड़ों को देखें तो,  उसके हिसाब से २५ प्रतिशत लोग अभी भी अनपढ़ हैं तथा  मात्र १५ % भारतीय छात्र हाई स्कूल एवं ७ % ग्रेजुएट बन  पाते हैं  ! महिलाओं में स्थिति पुरूषों के मुकाबले और अधिक ख़राब है ! 
              आधुनिक भारतीय समाज के पास मनोरंजन का साधन , और दुनिया से जुड़े रहने के लिए टेलीविजन एक मात्र माध्यम है और उस पर दिखाई गयी बातों पर गहरा विश्वास करते हैं ! आज भी अक्सर शर्त लगाने पर जीत अक्सर उसकी  होती है, जो प्रमाण स्वरुप , उसे लिखा हुआ कहीं दिखा दे ! चाहे लिखा किसी भ्रष्ट बुद्धि ने ही हो :-) 
              अक्सर पूंछा जाता है कि कहाँ लिखा है ...?  दिखाओ तो जाने ? से हमारी लेखन और लेखक के प्रति आस्था का पता चलता है ! 
              ऐसी परिस्थिति में , नोट कमाने के लिए मार्केट में उतरे , टेलीविजन कैमरा और उनके लिए ढोल बजाते नगाडची , भारतीय  भीड़ को अपनी सुविधानुसार, राह दिखाने में खूब कामयाब हो रहे हैं !

          आम जनता के नाम पर, टीवी कैमरे के सामने खड़े, एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़  को  अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !   
          पूरे राष्ट्र को, सरेआम बेवकूफ बनाते, मीडिया के इन धुरंधरों के खिलाफ, कोई कानून नहीं है  !

67 comments:

  1. आपकी इस अभिव्‍यक्ति में हम भी साथ हैं।

    ReplyDelete
  2. मिडिया के खिलाफ काहे बोल रहे है सर जी ... ??? आपके काफी सारे दोस्त भी तो मिडिया वाले है ... सब एक साथ मोर्चा खोल देंगे आप के खिलाफ ... फिर कोई आपको तानाशाह कहेगा ... कोई फासीवादी ... कोई कुछ ... कोई कुछ ... मिडिया वाले भले ही कुछ भी करें ... कुछ भी कहें ... वो हमेशा ठीक होते है ... भाई वो मिडिया है ना इस लिए ... निजी अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ !

    ReplyDelete
  3. आम जनता के नाम पर, टीवी कैमरे के सामने खड़े एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़ को अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !

    I AGREE
    but i also feel that we need to raise this kind of contempt against all those who try to fool the mass by getting people to speak for them

    AND
    I FULLY AGREE WITH SHIVAM MISHRA

    ReplyDelete
  4. बिल्‍कुल सही कहा है आपने ...आभार ।

    ReplyDelete
  5. नैतिकता का सवाल उठाना ही शायद अब सबसे बड़ा गुनाह है -मीडिया ही क्यों? कुत्सित मानसिकताएं हर ओर तो है .....अब तो यही लगता है कि एक परमाणु बम गिर जाए और मानवता फिर पल्लवित हो .....

    ReplyDelete
  6. क्या खुशदीप जी ने पढी आपकी पोस्ट? मै हाँ मे हाँ मिलाना चाहती हूँ मगर उसे नाराज नही कर सकती आखिर भाई भतीजावाद की परंपरा अभी इस देश मे है ना। शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  7. आपके सरोकार वाजिब हैं. लेकिन अनपढ़ और गँवार मीडिया का क्या किया जाए. मीडिया तो अपने पति (उद्योगपति) की भाषा बोलता है और धन-प्रवाह की दिशा देख कर ही कुछ कहता है. बढ़िया आलेख.

    ReplyDelete
  8. एक ही तरीका मेरी समझ में आता है ..अधिक से अधिक चर्चा करना ..जहाँ भी जिस फोरम पर भी संभव हो सके ...अगर गलत लग रहा है तो तो ऊँगली उठाना हमारा काम है और शायद नैतिक जिम्मेदारी भी ..लोग भी अब काफी समझने लगे हैं ..और बड़ी तेजी से ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रहि है जो मीडिया के चोंचले समझने लगे हैं.

    ReplyDelete
  9. आपकी बात से पूर्णतः सहमत...बिलकुल सही कहा है..

    ReplyDelete
  10. @ निर्मला कपिला ,
    खुशदीप सहगल का काम मेरी नज़र में आदरणीय है....वे अपवाद हैं !

    ReplyDelete
  11. आपकी बातों से सहमत हूँ ...समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

    ReplyDelete
  12. " उसूलो की बुनियाद अपवादों से कमज़ोर होती है !! "

    ReplyDelete
  13. आपके विचारों से सहमत हूँ ..

    ReplyDelete
  14. Satish ji, media ab keval breaking news ke liye hi kaam karta hai... Sansani faila kar news bechna dhandha banta jaa raha hai...

    ReplyDelete
  15. बड़े भाई! ब्लॉग जगत में भी वही हाल है.. कहीं कोई बात, किसी सन्दर्भ में कहीं उद्धृत की नहीं कि दसियों टिप्पणियाँ आनी शुरू हो जाती हैं कि लिंक दीजिए... अरे भाई जो बात मेरे स्वर्गीय पिताजी अपने श्रीमुख से उवाच गए हैं, उसका लिंक कहाँ से लाऊँ और उन्हें झूठा कह दूं यह भी मर्यादा/परम्परा के विरुद्ध है... क्या खा जा रहा है इससे अधिक बल इस बात पर होता है कि किसने कहा है!!
    और मीडिया वाली बात पर तो मैं शिखा जी के साथ हूँ..
    हम हंस दिए हम चुप रहे
    मंज़ूर था पर्दा तेरा!!

    ReplyDelete
  16. मीडिया का तो वास्‍तविक रूप मैंने बहुत करीब से देखा है। नकारात्‍मकता का विस्‍तार करना ही मीडिया का कार्य है। मैं पहले सोचती थी कि इस समाचार में कुछ तो होगा तभी म‍ीडिया इतना लिख रहा है लेकिन जब स्‍वयं पर बीती तब पता लगा कि मीडिया कुछ भी कर सकता है। उसका कोई चरित्र नहीं है। बस आदर्श व्‍यक्तियों का चरित्रहनन करना उसका प्रथम कर्तव्‍य है।

    ReplyDelete
  17. भाई जी , टी वी चैनल्स के रिपोर्टर्स पर आसकरण अटल जो एक मशहूर कवि हैं , ने बहुत सुन्दर हास्य कवितायेँ लिखी हैं । कभी अवसर मिला तो सुनाऊंगा । हालाँकि अच्छी बातें भी दिखाते हैं ।

    ReplyDelete
  18. सतीश भाई ,
    लिखा दिखाओ वाली बात गज़ब कही आपने है :)

    मीडिया की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर रिसर्च रिपोर्ट को बेस कर पहले कुछ पोस्ट लिखी थीं ,आपको लिंक दूं तो शायद कुछ दिलजोई हो :)

    बाकी तो सब ठीक है ! आज आप इतने गुस्से में क्यों हैं ? आपकी रचना का रेफरेंस (प्रेरणा स्रोत) बतायेंगे तो मुझे बेहद खुशी होगी !

    ReplyDelete
  19. जिसके भी हाथ माइक आ जाता है वहीं बुद्धिजीवी हो जाता है चाहे वह मीडिया में या राजनीति में

    ReplyDelete
  20. आम जनता के नाम पर, टीवी कैमरे के सामने खड़े एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़ को अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !


    han ab to vishwas karna bahut hi mushkil ho gaya hai...koi no. aisa ho jahan shikayat kar ke inko bandi bana liya jaye.

    ReplyDelete
  21. स्थिति विकट ही है। जो ज़ोर लगाकर कह दे बात उसकी सच मान ली जाती है। और आपने सही ही कहा है कि एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़ को अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !

    ReplyDelete
  22. हां, लिखे हुए को ही प्रामाणिक माना जाता है यहां :)

    ReplyDelete
  23. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद। ।

    ReplyDelete
  24. अब अधिकतर मीडिया समूह केवल व्यावसायिक हिट साधने में लगे हैं इसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों तरह के लोग शामिल हैं.अब खबरें चिल्लाकर सनसनी-सी पैदा करने का चलन हो गया है.अपनी तईं ख़बरें भी अब प्लाट की जा रही हैं !

    ReplyDelete
  25. अब अधिकतर मीडिया समूह केवल व्यावसायिक हिट साधने में लगे हैं इसमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों तरह के लोग शामिल हैं.अब खबरें चिल्लाकर सनसनी-सी पैदा करने का चलन हो गया है.अपनी तईं ख़बरें भी अब प्लाट की जा रही हैं !

    ReplyDelete
  26. सत्य को सबसे ऊपर रखना पड़ेगा, किसी भी हालत में।

    ReplyDelete
  27. आम जनता के नाम पर, टीवी कैमरे के सामने खड़े एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़ को अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !


    बिल्कुल... आपकी ये बात आज के पूरे हालात को बयां करती है......

    ReplyDelete
  28. मित्र ! पहले मैं माफ़ी चाहूँगा ,बाहर होने की वजह व अति व्यस्तता के कारन बच्चों को स्नेहाशीष नहीं दे सका , मेरी हृदय से शुभकामनाये, उज्जवल भविष्य ,व चिरायु होने की,सफलता के सोपानों के आरोहन की /
    आज का परिदृश्य ऐसा है -- सूरज भी कभी दिन में बादलों से अवसान की स्थिति प्राप्त कर लेता है ,तो लगभग स्वाभाविक स्थिति mani जाती है ,/पर अमावास की रात्रि में सूरज उग आये तो ,छद्म या वाचक को असंतुलित मनः-स्थिति की संज्ञा दी जाती है... / मिडिया को आज जहाँ आईना बनना था ,मशीहा बनने लगा है, शायद उन्हें पता होगा ,मशीहा कभी -2 प्रकट होता है / तथ्य और कथ्य में कितना अंतर है ,विश्लेषण परिलाषित है ......../बहुत तीक्षण प्रहार किया है ,वास्तु स्थिति के अनुरूप ...सफल सार्थक आलेख ......शुक्रिया मित्र /

    ReplyDelete
  29. सार्थक, सटीक और सामयिक प्रस्तुति, आभार.

    ReplyDelete
  30. सार्थक, सटीक और सामयिक प्रस्तुति, आभार.

    ReplyDelete
  31. .


    आदरणीय सतीश जी
    नमस्कार !

    आपकी बात से असहमत होने काप्रश्न ही नहीं …
    भाषा - शैली प्रभावित करती है -
    नोट कमाने के लिए मार्केट में उतरे , टेलीविजन कैमरा और उनके लिए ढोल बजाते नगाड़ची
    उपयोगी और दायित्वपूर्ण पोस्ट के लिए आभार !

    मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  32. .


    आदरणीय सतीश जी
    नमस्कार !

    आपकी बात से असहमत होने काप्रश्न ही नहीं …
    भाषा - शैली प्रभावित करती है -
    नोट कमाने के लिए मार्केट में उतरे , टेलीविजन कैमरा और उनके लिए ढोल बजाते नगाड़ची
    उपयोगी और दायित्वपूर्ण पोस्ट के लिए आभार !

    मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  33. ओहो अच्छा अच्छा , हम भी कहे कि सतीश भाई हैं कहां ..दुनाली साफ़ करते करते अर्सा हो गया ..दागे नहीं । और देखिए पहिला से लेकर आखिरी गोली तक .एकदम कायदे से कान पे कट्टा सटा दिए हैं । धार बनाए रखिएगा , बहुत जरूरत है इस तेवर की

    ReplyDelete
  34. आपका लेख आज के वक़्त के मुताबिक सही है ....पर मीडिया भी हर वक़्त गलत नहीं होती ...बहुत बार मीडिया का रोल भी बहुत सही साबित होता है ...आभार

    ReplyDelete
  35. सतीश भाई,
    आपके स्नेह के लिए शुक्रिया नहीं कहूंगा...क्योंकि छोटे भाई बड़ों से सब कुछ लेते रहते हैं, बदले में आदर के सिवा देते कभी कुछ नहीं...

    अब एक सवाल मेरे कुछ शुभचिंतकों से...

    ब्लॉगिंग में मेरी पहचान मेरे लेखन से है या मेरे उस प्रोफेशन की वज़ह से जो मेरी रोज़ी-रोटी का ज़रिया है...जैसे औरों की ब्लॉगिंग से उनके प्रोफेशन का कोई नाता नहीं है, वैसे मापदंड से ही मुझे भी देखा जाना चाहिए...मैं अपने दायित्वों के लिए ईमानदार हूं या नहीं, ये वही जान सकते हैं जिन्होंने मुझे करीब रह कर परखा है...जैसे आप सब अपने प्रोफेशन का सम्मान करते हैं, वैसे ही मैं भी अपने प्रोफेशन की पूजा करता हूं...

    क्या मेरे प्रोफाइल में कहीं मेरा प्रोफेशन लिखा हुआ है...एक पोस्ट को छोड़कर मैंने क्या कभी किसी पोस्ट में अपने मीडिया से जुड़े होने का हवाला दिया है...

    सतीश भाई से मेरी दोस्ती मेरे प्रोफेशन की वजह से नहीं इंसानियत के उस रिश्ते की वजह से है जिसकी सतीश भाई अपने आप में अकेली मिसाल है...

    निर्मला कपिला जी को जो दर्ज़ा मेरे लिए है, उसके मुताबिक वो मुझे डांट तो क्या, डंडा लेकर मेरी पिटाई भी कर सकती हैं...मेरे लिए उनके आशीर्वाद से बढ़ कर कुछ नहीं...ये उनका स्नेह ही है कि मेरे लिए उन्होंने अपने दिल की बात को भी दबा लिया...

    आखिर में एक बात...क्या ये ज़रूरी है कि दोस्ती या रिश्ता वहीं तक रहता है, जब तक एक दूसरे की हां में हां मिलाते रहा जाए...क्या दो दोस्तों के विचार अलग नहीं हो सकते...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  36. ज्ञान सिखाने वालों की हर गली कुचों में भरमार है
    सही बात कही है आपने ! सिखाना जितना आसान है
    स्वयं आचरण करना उतनाही कठिन है ! शायद इसीलिए ......
    अच्छी पोस्ट आभार !

    ReplyDelete
  37. यह आलेख पढकर अभय तिवारी की कविता बँटा हुआ सत्य याद आ गयी।

    ReplyDelete
  38. और हाँ, निर्मला जी की टिप्पणी बहुत अच्छी लगी।

    ReplyDelete
  39. मीडिया की दुकानों पर भी वही सेल्समैन सफल है जो ज्यादा से ज्यादा ग्राहक को बेवकूफ बना सके।

    प्रणाम

    ReplyDelete
  40. अपवाद हर जगह है !

    ReplyDelete
  41. सही कहा आप ने..मैं पूर्णतः सहमत हूँ.....आभार ।

    ReplyDelete
  42. सहमत हूँ आपसे..एक अनुशासन , एक मर्यादा जरुर होनी चाहिए मीडिया के द्वारा की गयी अभिव्यक्तियों में.

    www.belovedlife-santosh.blogspot.com

    ReplyDelete
  43. हम्म! आपसे असहमत होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, लेकिन सभी जगह सभी लोग एक जैसे नहीं होते.

    ReplyDelete
  44. बिकुल २४ कैरेट खरी बात !

    ReplyDelete
  45. आप की बात ठीक है लेकिन सूचना पाने का कोई और उपाय भी तो नहीं .

    ReplyDelete
  46. मीडिया वन-वे ट्रेफिक है...जब लोगों ने पढना छोड़ दिया...तो देखो वो जो दिखाएं...

    ReplyDelete
  47. सही कहा आपने

    ReplyDelete
  48. अब तो चौथेखंभे के गिरने का सवाल उठता है,
    जिन सवालों के लिए थे वो, उसपर सवाल उठता है।
    हर सवालों के सवाल से हम वाकिफ है,
    ना खुदा तुम नहीं, तुमको भी खुदा हाफीज है।।


    aapke post parne ke bad yahi vichar man me uthe.

    ReplyDelete
  49. पढ़े-लिखे और अक्लमंद में अंतर होता है। कई पढेलिखे मंद बुद्धि के मिल जाएंगे- ठोक के भाव :)

    ReplyDelete
  50. आपसे सहमत हूँ बड़े भैय्या... आभार

    ReplyDelete
  51. सुन्दर प्रस्तुति |मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वगत है । कृपया निमंत्रण स्वीकार करें । धन्यवाद ।

    ReplyDelete
  52. आपसे सहमत हूँ...सतीश जी

    ReplyDelete
  53. सतीश जी ... इस बिके हुवे मीडिया से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है ...

    ReplyDelete
  54. sahi soch hai shyad aaj aesa hi ho raha hai.
    rachana

    ReplyDelete
  55. शब्दशः सहमत हूँ आपके विचार से. अब तो झूँठ को तरह तरह से बोल के सच बनाने की कला के लिए सलाम करना पड़ेगा मीडिया को.

    ReplyDelete
  56. मीडिया भी भाई साहब बहु -रूपा नारी की तरह हो गया है .मीडिया तेरे रूप अनेक .कोई कुछ कहता है कोई कुछ साधारणीकरण ऐसे में हो ही नहीं पाता है .

    ReplyDelete
  57. ज़िम्मेदारी हर कहीं से गायब होती नज़र आ रही है |हालात गंभीर हैं ...!!

    ReplyDelete
  58. दोनों ही पक्ष हैं - मीडिया अपरिपक्वता भी करती है, परन्तु वही मीडिया समाज के नेगेटिव पक्षों को सामने भी लाती है | सब मीडिया कर्मी एक ही मिटटी से तो बने नहीं हैं न ?

    मुद्दा तो बहुत अच्छा है - इस पर कुछ करने की भी आवश्यकता है - पर कहाँ से शुरू किया जाए - यह समझ में नहीं आता |

    ReplyDelete
  59. सच कह रहे हैं सर । बचपन में हम भी अपनोी बात की पुष्टि के लिये कहते थे किताब में लिखा है । उस समय वह सही भी था पर आज किताबों में अखबारों में सच और झूट की नामालूम मिलावट होती है ।

    ReplyDelete
  60. आम जनता के नाम पर, टीवी कैमरे के सामने खड़े एक सामान्य घबराए व्यक्ति से, मनचाहे शब्द बुलवाकर , हर न्यूज़ को अपने मन मुताबिक़ शक्ल देकर, आम जनता को भ्रमित करना, राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए !


    आपका आक्रोश वाजिब है सतीश भाई.
    मिडिया का प्रभाव दिलो दिमाग पर पड़ता ही है.
    ऐसे में मिडिया को जिम्मेवार होना चाहिये.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मुझे लिखना याद दिला कर क्या आप भूल गए
    सतीश भाई.जल्दी आईये वर्ना...

    ReplyDelete
  61. बिल्कुल सही कहा....इस हेतु भी अनशन करना होगा..

    ReplyDelete
  62. अब तो मीडिया से भरोसा ही उठ सा गया है .

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,