Wednesday, May 6, 2015

ये ग़ज़ल कैसी रही ? - सतीश सक्सेना

गर्दिशों में खिलखिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !
आंसुओं में झिलमिलाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

इस उदासी का सबब, कैसे बताएं,आप को,
सिर्फ रस्मों को निभाती, ये ग़ज़ल कैसी रही !

काबा, कंगूरों से चलकर, मयकदे के द्वार पे 
खिदमतों में सर झुकाती ये ग़ज़ल कैसी रही !

मीर गालिब औ जिगर ने शौक से गहने दिए
हाथ जीवन भर पकड़ती ये ग़ज़ल कैसी रही !

कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ! 

13 comments:

  1. यादों में तड़पती,आँसुओं के संग झरती--ये ग़ज़ल दिल में उतरती चली गई ---वाह !

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  2. कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
    क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?
    kam se kam ye gazal to zabariya vaah nahi kahlva rahi .very nice .vaah vaah !

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  3. हर गजल की तरह ये गजल भी
    एक बहुत सुंदर गजल :)

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  4. भाव - भीनी गुनगुनाती यह गज़ल अच्छी लगी
    मुरकियॉ लेती थिरकती यह गज़ल अच्छी लगी ।

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  5. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 26/06/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  6. जो खींच के ले जाये उसे गज़ल कहते हैं !
    जिसमें खुद ही खिचां चला जाये उसे सतीश भाई की गज़ल कहते हैं !
    I.A.S.I.H - ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  7. सुन्दर रचना...

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  8. बहुत अच्छी लगी ग़ज़ल … आभार

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  9. बहुत सुन्दर गजल एक से एक नायाब शेर है
    मुझे खास कर यह शेर लगा …
    इस उदासी का सबब, कैसे बताएं भीड़ को,
    उनकी यादों में तड़पती,ये ग़ज़ल कैसी रही ?
    जो यादे दुखदायी हो उनसे दूर रहना ही अच्छा है :)
    "उदासी का सबब न बताये भीड़ को
    आपको गीत गाना जो आ गया है "
    (मतलब जीवन गीत )

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  10. हर भूमिका में सफल रही ,बड़ी मनभावन गज़ल रही !

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  11. बेजोड़ पंक्तियाँ.... खूब कही

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  12. जा रहे हो छोड़ शायद ,अब हमेशा के लिए ?
    आंसुओं के संग झरती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?

    कैसे शायर है जबरिया,तालियां बजवा रहे,
    क़दरदानों को रुलाती, ये ग़ज़ल कैसी रही ?

    वाहवाही क्यों लुटाते,हर किसी रुखसार पर
    खुद मुरीदों को मनाती , ये ग़ज़ल कैसी रही ?
    लाजवाब

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- सतीश सक्सेना

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