Monday, January 20, 2020

थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी -सतीश सक्सेना

मुर्दा हुए शरीर को , जीना सिखाइये !
रोते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !

थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी 

गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये !

गद्दार कोई हो , मगर हक़दार सज़ा के 
उस्ताद, मुसलमां को ही चलना सिखाइये  !

अनभिज्ञ निरक्षर निरे जाहिल से देश को !
सरकार, शाही खौफ से,डरना सिखाइये !

अखबार, मीडिया, सभी ताली बजा रहे ,
किन्नर के रोजगार को, बचना सिखाइये ! 

नज़रें उठायीं तख़्त पे दिलदार, तो खुद को,
सरकार के डंडों को भी,सहना सिखाइये ! 

8 comments:

  1. "थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी
    गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये!"

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  2. हमेशा की तरह तीखा। एक लम्बे अर्से के बाद टूटती चुप्पी जैसे।

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  3. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 23 जनवरी 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. 'सरकार के डंडों को भी सहना सिखाइए'
    लेकिन इस से फ़ायदा क्या होगा? हम डंडों से डरना अगर सीख भी गए तो उन्हें अपने मनोरंजन के लिए हम पर गोली चलाने से कौन रोकेगा?

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  5. रचना का शीर्षक पूरी रचना पर छाया हुआ है.बहुत सुन्दर.... बहुत दिनो के बाद आपको लिखते देखकर खुशी हुई।

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  7. शानदार कटाक्ष
    वाह

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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