Monday, October 1, 2018

तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा -सतीश सक्सेना

"ऊर्जा को उसकी जड़ों तक पहुँचाने के लिए शरीर को अस्त व्यस्त कर देने वाली विधियों की ज़रूरत है, दौड़ना उन में से एक बेहतरीन विधि मानती हूँ मैं " सुमन पाटिल के इस कमेन्ट ने मुझे अपने तीन वर्ष दौड़ने के अनुभव के बारे में सोंचने को मजबूर कर दिया !

अभी तक साइंस,शरीर के बारे में नौसिखिया स्टेज पर ही है कि वे कौन से कारण हैं कि यह शारीरिक मशीनरी 100 वर्ष तक बिना थके चलने में समर्थ है ! बिना साइंटिफिक बुद्धि का उपयोग किये, हम सोंचें तो इसे सौ वर्ष चलाने के लिए जंगलों खेतों से जो भी खाने योग्य मिले वह थोड़ा सा भोजन, जल और हवा ही काफी है ! शरीर की बनावट ही ऎसी है कि इस जलपान को जुटाने के लिए आपको घर से निकलकर चलना पडेगा और चलते समय पैरों का उपयोग होगा तो हाथ खुद ब खुद चलने लगेंगे सारी मशीनरी हाथ पैरों द्वारा मेहनत करने पर ही निर्भर है 


शरीर के अधिकतर महत्वपूर्ण अंग पेट के अन्दर हैं उनको हर हालत में व्यस्त रखना आवश्यक है ! आधुनिक युग में मानव ने धन का उपयोग खुद को आराम देने के लिए करना शुरू किया और श्रम को निर्धनों की मजबूरी मान लिया ! इस मूर्खता पूर्ण सोंच से उनका शरीर तो बेडौल हुआ ही, शक्ति लगभग समाप्त ही हो गयी !

मानवीय शरीर को दुरुस्त रखने के लिए, आवश्यक हवा, भोजन, पानी के लिए चलना और दौड़ना बेहद

आवश्यक हैं दौड़ने से ही पेट (बॉडी कोर) के अंदरूनी अंगों में कम्पन होगा, उनमें जमा चर्बी पिघलेगी एवं वे अंग लम्बे समय तक शरीर को शक्ति देने योग्य रहेंगे ! आज आलसी लोगों से धन कमाने का सबसे बढ़िया तरीका,उन्हें विज्ञापन दिखाते रहिये कि चिंता न करें उनकी बरसों के आलस्य से पैदा बीमारी और मोटापे को ठीक करने के लिए १ ग्राम की मेडिकल गोली काफी होगी और उस डरपोक और काहिल इंसान की समझ को, बरसों तक जिन्दा रहने का एक फर्जी तरीका मिल जाता है !

लोग उम्रदराज होते ही सीखना बंद कर देते हैं और आने आसपास के हर व्यक्ति को सिखाने में और उसे अपना शिष्य बनाने में लग जाते हैं ! उन्हें लगता है किउनके प्रभामंडल से अधिक प्रतिभा और कहीं है ही नहीं काश वे अपनी बेवकूफियों को बताने वालों का सम्मान कर सकते तो निस्संदेह समझ के साथ उनकी उम्र में भी इजाफा होता !

मजेदार बात यह है कि यह सोंच मूर्खों में हो, ऐसा नहीं है, यहाँ के बड़े बड़े तथाकथित विद्वान् एवं सैकड़ों पुरस्कार पाए और आगे का जुगाड़ भिड़ाते , चेलों को आशीर्वाद देते मूर्ख गुरुजन, शामिल हैं ये जाहिल लोग अपने ऊपर मंडराते खतरे को देख ही नहीं पाते सिर्फ अपने जुगाडू नाम पर बजती तालियों से शक्ति पाकर खुश हो जाते हैं काश वे अपनी असमय ह्रदयघात से हुई मौत पर नकली आंसू बहाते अपने मित्रों को देख पाते तो उन्हें अहसास होता कि उन्होंने विद्वता के नशे में अपने ऊपर निर्भर परिवार जनों के साथ कितना बड़ा धोखा किया है !

किसी भी उम्र में सीखना अपमान नहीं है बल्कि समझदारी है इससे निस्संदेह आपका फर्जी आत्मविश्वास, वास्तविक रूप में निखरेगा अपने जीर्ण होते मजबूत शरीर को निखारने के लिए, मेहनत करना सीखिये उसे लम्बी दूर तक दौड़ना सिखाइए !

उठो त्याग आलस , झुकाओ न नजरें
भले मन ही मन,पर सुधरना तो होगा !

असंभव कहाँ, मानवी कौम में कब ?
तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा !

4 comments:

  1. तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा !

    बदलवा के छोड़ेंगे आप :)

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आदर्शों-शिक्षाओं को अपनाना सच्ची श्रद्धांजलि : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. सच कहा आपने दिखावे के लिए और अपनी नासमझ विद्वता दिखाने के चलते अपने को कितना खोखला कर देते हैं आजकल लोग। बड़े-बड़े लोग तो सड़क, पार्क या कहीं भी पैदल चलना अपनी तौहीन समझते हैं, उन्होंने जो अपनी कैटेगरी बना ली है वे उसी में रहना पसंद करते हैं, निम्न समझे जाने वाले तबके के साथ चलना उन्हें किसी भी कीमत में रास नहीं आता
    बहुत अच्छी खरी-खरी बातें

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  4. प्रेरणादायक पोस्ट..

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- सतीश सक्सेना

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