Saturday, September 11, 2010

आँखें - सतीश सक्सेना

कई बार मन के अस्थिर होने के कारण कुछ नया लिखने का मन नहीं करता , आज एक एक बहुत पुरानी रचना  ,प्रकाशित कर  रहा हूँ  ! शायद आपलोग इसे पसंद करें !


यह दर्द उठा क्यों दिल में है
यह याद कहाँ की आई है 
लगता है कोई चुपके से
दस्तक दे रहा चेतना की
वे भूले दिन बिसरी यादें ,क्यों मुझे चुभें शूलों जैसी  

लगता कोई अपराध मुझे,है याद दिलाये ,कर्मो की 


रजनीगंधा की सुन्दरता
फूलों की गंध उठे  जैसे 
उन भूली बिसरी यादों से ,
ये गीत सजे अरमानों के
मैं कभी सोचता क्यों मुझको, संतोष नहीं है जीवन में

यह क्यों उठती अतृप्त भूख,सूनापन सा इस जीवन में


लगता है जैसे इंगित कर
है मुझको याद करे कोई
लगता कोई हर समय मेरी
भूलों पर रोता है जैसे ,
वे कोई भरी भरी आंखे, यादों से जुड़ी हुईं ऐसे !

दिल में कोई भी दर्द उठे,सम्मुख जीवित होती आंखे !


14 comments:

  1. its amazing..
    "लगता कोई हर समय मेरी
    भूलों पर रोता है जैसे "

    The pain to realize the fault and being hapless...
    It was delight to read the creations here...

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  2. धन्यवाद कबीर ! आशा है भविष्य में सुझाव भी दोगे !

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  3. बहुत ही खूबसूरत कविता है। पिछले कुछ लेख भी पढ़े। अच्छे लगे। इस कविता में अकूलाए मन का काफी अच्छा वर्णण किया है आपने। वैसे भूली-बिसरी यादों में कौन है..इस बारे में कब लिखेंगे। लिख चुके हैं तो लिंक दें। (ये रिक्वेस्ट है..लोगो की दुखती औऱ सुखती रग पर हाथ रखना हमारा प्यारा शगल है..हीहीहीही)

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  4. भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें!
    अद्भुत सुन्दर रचना!

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  5. मन की अस्थिरता भी एक अनुभव है ,कामना करती हूँ कि संयत हो कर आप और भी अच्छा लिखें .यों तो यह कविता भी 'वे भूले दिन बिसरी यादें'पास लाती सुन्दर रचना है .

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  6. वे भूले दिन बिसरी यादें
    क्यों मुझे चुभें शूलों जैसी
    सर , आपने तो दिल को झकझोर दिया / इन पंक्तियों को पढ़कर दिल मैं चुभन सी होने लगी हैं / सर आगे कुछ लिखा ही नहीं जा रहा .............

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  7. कुछ भूली बिसरी यादें अक्सर आकर हमें झकझोरती हैं चुभती हैं और दे जाती हैं एक टीस । जिनके हम अपराधी हैं वे तो अब पास नही हैं या बहुत बहुत दूर चले गये हैं इसी से दर्द का यह अहसास ही प्रायश्चित रह जाता है ।

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  8. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे

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  9. यादों के मेघ से घिरी ....अकुलाहट की वर्षा कर रही हैं ...भीग कर भी यादें और गहरी हो रहीं हैं जैसे ...
    बहुत सुंदर रचना ...!!

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  10. रजनीगंधा की सुन्दरता
    फूलों की गंध उठे जैसे
    उन भूली बिसरी यादों से ,
    ये गीत सजे अरमानों के....

    खुबसूरत गीत है....
    सादर बधाई...

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  11. रजनीगंधा की सुन्दरता
    फूलों की गंध उठे जैसे
    उन भूली बिसरी यादों से ,
    ये गीत सजे अरमानों के

    बहुत अच्छी लगी कविता।

    सादर

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  12. बेह्द खूबसूरत कविता

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  13. बहुत खूबसूरत रचना ! मन की अकुलाहट को बहुत कुशलता के साथ शब्दबद्ध किया है ! बहुत भावपूर्ण एवं मर्मस्पर्शी ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  14. man ki vytha ko bkhubi prstut kiya hai apne...

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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