Saturday, July 12, 2014

हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना

तुम जुगनू के व्यापारी हो 
हम प्रकाश ,फैलाने वाले !
तुम गीतों के सौदागर हो
हम निर्भय हो गाने वाले !
हमको कब हिन्दी दल्लों की, 
जीवन में परवाह रही है !
रचनाएं,कवियों की जग में,इकबालिया गवाह रही हैं !

सबक सिखाने की मस्ती में 
शायद, साँसे भूल गये हो !
चंद दिनों की हँसी और है 
शायद मरघट भूल गए हो ! 
स्वाभिमान को सबक सिखाने,
चेष्टा बड़ी,अदाह रही है !
हमको भी,तुम पर लिखने की इच्छा बड़ी अथाह रही है !

अरे ! तुम्हारा चेला  कैसे 
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले 
औ वो पद्मविभूषण पाया  !
कोई सूर बना गिरिधर का, 
कोई मीरा रसदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !

सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर  
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे,हुक्का भरकर 
तितली जगह जगह इठलाकर,
करती खूब विवाह रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ से ? दुनियां  में  अफवाह रही है !

बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो 
जीवन भर जो पाँव दबाये 
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , 
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित,चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

गुरुवर तेज बनाये रखना 
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बलपर 
इनको कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों 
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने करली, उतनी ही तनख्वाह रही है !

26 comments:

  1. बहुत बढ़िया ।
    पर चिकने घड़ों का आज तक किसने क्या किया ?:)

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    1. प्रोफ. जोशी
      कमाल के दलाल हैं हिंदी जगत में , इन दल्लों के आशीर्वाद के बिना, किसी भी बेहतरीन कवि अथवा रचनाओं को हिंदी में जगह नहीं मिल सकती , इन धूर्तों के बिना किसी जगह आपकी रचनाएं नहीं छप सकतीं , यह लोग स्वाभिमानी हिन्दी सेवकों को वाकायदा आमंत्रित करवा कर, उनका अपमान करा कर, उन्हें यह अहसास दिलाते हैं कि बिना उनके आशीर्वाद के किसी कलम का कोई वजूद नहीं !
      यह रचना मैंने अपने उन्हीं मित्रो को समर्पित की है जो अपने आपको हिन्दी का पर्याय समझते हैं ! माँ शारदा के लिए बने अभिषेक अपने अपने गले में लटकाए ,इन हिंदी के धुरंधरों को इनकी औकात समझानी बेहद आवश्यक है !
      सादर !

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    2. सतीश जी कहाँ नहीं हैं दलाल ? और
      आज जिसने हिम्मत कर
      डाल लिया चोला दलाल का
      दुनियाँ उसकी मुट्ठी में
      लाइसेंस मिले हराम के माल का
      100 में से 99 दलाल हैं
      भारत माँ के लाल हैं
      सौंवाँ बेवकूफ लिखता है
      लेकिन लिखता है कमाल का
      क्या किया जाये इसी तरह
      चलते चले जाना है
      क्या पता किसी दिन
      पलटे मिजाज कुछ कुछ काल का :)

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  2. अक्षर - अक्षर फूँक - फूँक कर क़लम आज तक सीख रही है ।
    अपने बडे - बुज़ुर्गों से वह आज भी कुछ - कुछ सीख रही है ।

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  3. अरे ! तुम्हारा चेला कैसे
    तुम्हें भूलकर पदवी पाया
    तुम गद्दी को रहे सम्हाले
    औ वो पद्मविभूषण पाया !
    कोई सूर बना गिरिधर का, कोई मीरा रसदार रही है !
    हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !
    बहुत बढ़िया

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  4. बेहतरीन कटाक्ष ...आज के सच्चाई से रु-बरु करता...... बहुत सुन्दर रचना .........

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  5. हकीकत को बयां करती सुंदर रचना.

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 13/07/2014 को "तुम्हारी याद" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1673 पर.

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  7. मेरा सौभाग्य रहा को यह गीत मैंने आपके मुखारबिंद से सुना भी. मंचीय कवियों के चरित्र और साहित्यकारों के पाखंड पर अद्भुत कविता है यह हिंदी कविता का स्वरुप हिंदी के कवियों ने बिगाड़ दिया, वही फूहड़ लोगो के प्रवेश पर कविता हास्यास्पद हो गयी. आपकी कविता ऐसे कवियों को रास्ता दिखा सकती है

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  8. हिंदी साहित्य में यही सब हो रहा है आजकल. बहुत अच्छा और सही चित्रण किया है आपने इस कविता के माध्यम से...

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  9. मेरा सौभाग्य रहा को यह गीत मैंने आपके मुखारबिंद से सुना भी. मंचीय कवियों के चरित्र और साहित्यकारों के पाखंड पर अद्भुत कविता है यह हिंदी कविता का स्वरुप हिंदी के कवियों ने बिगाड़ दिया, वही फूहड़ लोगो के प्रवेश पर कविता हास्यास्पद हो गयी. आपकी कविता ऐसे कवियों को रास्ता दिखा सकती है

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  10. शब्‍दश: गहनता लिये सशक्‍त अभिव्‍यक्ति
    सादर

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  11. सटीक कटाक्ष किया है रचना में,
    @रचनाएं,कवियों की जग में,इकबालिया गवाह रही हैं !
    यही सत्य है !

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  12. इन्हीं तेवरों की जरूरत थी भैया ...

    बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित , चमचों पर रसधार बही है !
    आत्मतुष्टि के लिए समर्पित,चेतन मुक्त प्रवाह बही है !

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  13. बेहतरीन कटाक्ष

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  14. Superb! Chha gaye sir ji aaj !
    भौरों के गीत लेकर कलियाँ गुनगुना रही है
    वाह कहने वाले वाह कह रहे हैं

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  15. बहुत गहरी चोट की है आपने!

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  16. आजकल इस जग की रीत यही है...

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  17. बहुत सुंदर प्रस्तुति.....बेहतरीन कटाक्ष

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  18. सटीक रचना

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  19. वाह सतीश जी जियो ... क्या धमाकेदार गीत है ... सचाई लिखी है ...
    मज़ा आ गया ...

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  20. वाह क्या बात है....गज़ब लिखा आपने...वाह..

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  21. अच्‍छा दि‍या है, भि‍गो कर.

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  22. sachchai ki kya khubsurati se geet me dhale.....lazbab

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- सतीश सक्सेना

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