Monday, April 27, 2015

इतना देकर दुःख वे भी थक जाती होंगीं -सतीश सक्सेना

इतना दुःख देकर,वे भी थक जातीं होंगीं
करवट ले ले खुद को,खूब जगातीं होंगीं !

दिन तो कटता जैसे तैसे , मगर रात भर,
स्वयं लगाए ज़ख्मों को , सहलातीं होंगीं !

शब्द सहानुभूति के विदा हुए , कब के !
अब सखियों में बेचारी, कहलातीं होंगीं !

जीवन भर का संग लिखा कर लायीं  हैं , 
फूटी किस्मत पा कितना पछतातीं होंगीं !

जाने कितनी बार तसल्ली खुद को देकर , 
अभिमानों को स्वाभिमान,बतलातीं होंगीं !

14 comments:

  1. सही है..अन्यों को दुखी करने वाला खुद की नींद भी गंवा बैठता है..उन्हें करुणा की नजर से देखना चाहिए..

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  2. बहुत सुंदर एवं भावपूर्ण.

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  3. कविता सम्वेदना और कोमल भावों से परिपूर्ण है .

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  4. संवेदनशील मन के भाव ... कष्ट देने वाले को सुख कहाँ मिलता है ...

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  5. ये तो आपके खुद के मन के आकलन हैं--पर सोच जानदार है।

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  6. संवेदनाओं से परिपूर्णं रचना।

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  7. जीवन भर का संग लिखा कर ले आयीं ,
    फूटी किस्मत पा कितनी पछतातीं होंगीं !

    एक तरफ कटाक्ष और दूसरी तरफ व्यंग्य की झलक है इन पंक्तियों में ।

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  8. सुंदर एवं भावपूर्ण रचना...बधाई

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  9. जीवन भर का संग लिखा कर ले आयीं ,
    फूटी किस्मत पा कितनी पछतातीं होंगीं !

    बहुत सुंदर सतीश जी.

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  10. jitna idhar hai utna idhar hai. Good.

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  11. This comment has been removed by a blog administrator.

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- सतीश सक्सेना

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