Saturday, May 25, 2013

क्यों मैं तुमसे प्यार करूँ -सतीश सक्सेना

गहरे घाव दिए, श्रद्धा ने , क्यों  सत्ता स्वीकार करूँ !
कौन सहारा दिया तुम्ही ने ,जो मैं तुमसे प्यार करूँ !

माँ  समझातीं, पिता डांटते, अन्तर्यामी प्रभू  बताते ,    
कहते, सब कुछ,तब होता है,जब तेरा सत्कार करूँ ?  

कहते,तुम दौड़े आते हो,अपमानित द्रोपदी, देखकर
अब तो तुलसी हर घर रोये क्यों मैं तुमसे प्यार करूँ !

आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार,राक्षसी कौम भी !
पतित मानवों का हिस्सा हो क्यों अच्छा व्यवहार करूँ !

आज राक्षसी,अपने बच्चे, छिपा रही,मानवी नज़र से 
मानव कितना गिरा विश्व में,मैं ही क्यों उपकार करूँ !

53 comments:

  1. आज के हालात पर दर्द भरे जज्बात,सार्थक प्रस्तुति.

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  2. सतीश भाई,
    प्यार को लेन देन के सिलसिले से मत जोड़िये ! वो कैसा है यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आप कैसे हैं यह ध्यान रहे ! प्रेम से लबालब बने रहिये और उसे बांटिये जी भर के !

    स्मरण रहे प्रेम अच्छे अच्छों को सुधार देता है फिर वो क्या...? प्रेममय आप छलकते रहें बस !

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  3. आज राक्षसी अपने बच्चे,छिपा रही मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ ! aakrosh jaayaj hai .....bahut acchhi prastuti ....

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  4. आज राक्षसी अपने बच्चे,छिपा रही मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !
    @ वर्तमान मानव पर तगड़ा व्यंग्य

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  5. आज राक्षसी अपने बच्चे,छिपा रही मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !

    अत्यंत मार्मिक और गहरी संवेदनात्मक कविता, मानवता का स्तर बहुत नीचे चला गया है, यह जानते भी हैं और दुखद भी है पर किया क्या जा सकता है? सभी कुओं में तो भांग पडी हुई है, किसी भी कुएं का पानी निकाल कर देख लें. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  6. हाँ! अब तो कुछ ऐसे ही भाव उठते हैं..

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  7. मूल्य और मान्यताएँ अब बहुत बदल चुकी हा .

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  8. काफी कुछ बुरा देखने में आ रहा है । निराशा स्वाभाविक ही है । लेकिन अभी काफी कुछ अच्छा भी है और रहेगा यह उम्मीद भी कम नही होनी चाहिये ।

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  9. गहरे घाव, गहरे भाव

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  10. इन्‍सान की फ़ि‍तरत है, बदलती कहां है

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  11. सच ऐसे निराशावाले भाव का आना स्वाभाविक है...
    बेहद मार्मिक प्रस्तुति....
    सादर
    अनु

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  12. सटीक और सामयिक रचना। दुर्दिन में हताशा स्वाभाविक है लेकिन रात कितनी भी गहरी हो सुबह होती ज़रूर है ...

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  13. आज राक्षसी अपने बच्चे,छिपा रही मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !

    स्थितियाँ देखकर निराशा के भाव आना स्वाभाविक है,,,उम्दा गजल

    RECENT POST : बेटियाँ,

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  14. बढिया भाव, अच्छी रचना
    बहुत सुंदर

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  15. मानव के कुकृत्यों ने मानव जाति को शर्मशार किया ही है
    प्रभावपूर्ण मार्मिक ....
    सादर!

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  16. ठीक है कि इस दुनिया में बहुत कुछ नकारात्मक है,पर मुझे लगता है कि उससे यदि अधिक नही तो उतनी सकारात्मकता भी जरूर है अन्यथा सर्वत्र अराजकता ही नजर आती.दूसरे अँधेरे में भी यदि हम एक तारे की टिमटिमाहट देख सकें तो जिंदगी के लिए इतनी सी उम्मीद भी हौसला देने वाली बन जाती है. भावपूर्ण सुंदर प्रस्तुति!साधुवाद!

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  17. क्यों मैं तुमसे प्यार करूँ...

    क्योंकि आप चीज़ ही ऐसी हैं...

    जय हिंद...

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  18. जो कुछ इन्सान को ईश्वर की ओर से मिली है क्या वह उन क्षमताओं का सदुपयोग कर रहा है?अपराध मानव-समाज का है जहाँ एक के बाद एक कुकृत्य होते चले जाते हैं और यह भी सच है कि कुछ लोगों के पापों का परिणाम सब को झेलना पड़ता है.

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  19. क्षमा बड़े भाई, क्षमा। क्षमा ही वह मूल मंत्र है जिससे प्रेम के बीच अंकुरित हो सकते हैं। क्रोध तो आता है पर...

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  20. भावुक ...बहुत बढ़िया

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  21. आज के हालत का सटीक चित्रण ...मर्मस्पर्शी रचना

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  22. आज राक्षसी,अपने बच्चे,छिपा रही,मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !
    सटीक रचना ...

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  23. कर्म हमारे, कमी तुम्हारी..
    वाह वाह.

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    Replies
    1. यही तो प्यारे मानव है ...

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  24. सुहृद कहीं पर हम तुम जैसा इस दुविधा पर रोता होगा,
    प्यार दिया, अधिकार दिया, विश्वास पूर्णतः खोता होगा।

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  25. सटीक और सामयिक रचना,बहुत बहुत बधाई।

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  26. आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार, राक्षसी कौम भी !
    पतित मानवों का हिस्अ सा हूँ,फिर क्यों आराधना करूँ ?
    आज राक्षसी,अपने बच्चे,छिपा रही,मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !
    वर्तमान मानव समाज की क्रूरता से तंग हो आई व्वयस्था पर ईश्वर से ही पूछते हुए करारा व्यंग -अच्छी रचना

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  27. आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार, राक्षसी कौम भी !
    पतित मानवों का हिस्अ सा हूँ,फिर क्यों आराधना करूँ ?
    आज राक्षसी,अपने बच्चे,छिपा रही,मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !
    वर्तमान मानव समाज की क्रूरता से तंग हो आई व्वयस्था पर ईश्वर से ही पूछते हुए करारा व्यंग -अच्छी रचना

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  28. आज आप काफी परेशान लग रहे हैं..शायर का मन इतना व्यथित हो जाए तो जरूर कोई बिसेष कारण होगा ..मुझे ना जाने क्यूँ लगा की एक बार ब्लॉग पर अपने परिचय के बारे में लिखे आपके बिचारों तक जरुर जाऊं ...लेकिन अंत में मुझे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया जो प्यार करता है वही रूठता भी है वही लड़ता भी है ..जब बिधाता पर फिर प्यार आ जाए तो लिखियेगा ..इन्तेज़ार रहेगा ..आपके ब्लॉग से बहुत पहले ही जुड़ा था पर आपके रच्राच्नायें डेश बोर्ड पर नहीं मिलती हैं तो आज फिर ट्राई कर रहा हूँ

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  29. आज आप काफी परेशान लग रहे हैं..शायर का मन इतना व्यथित हो जाए तो जरूर कोई बिसेष कारण होगा ..मुझे ना जाने क्यूँ लगा की एक बार ब्लॉग पर अपने परिचय के बारे में लिखे आपके बिचारों तक जरुर जाऊं ...लेकिन अंत में मुझे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया जो प्यार करता है वही रूठता भी है वही लड़ता भी है ..जब बिधाता पर फिर प्यार आ जाए तो लिखियेगा ..इन्तेज़ार रहेगा ..आपके ब्लॉग से बहुत पहले ही जुड़ा था पर आपके रच्राच्नायें डेश बोर्ड पर नहीं मिलती हैं तो आज फिर ट्राई कर रहा हूँ

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  30. आज आप काफी परेशान लग रहे हैं..शायर का मन इतना व्यथित हो जाए तो जरूर कोई बिसेष कारण होगा ..मुझे ना जाने क्यूँ लगा की एक बार ब्लॉग पर अपने परिचय के बारे में लिखे आपके बिचारों तक जरुर जाऊं ...लेकिन अंत में मुझे अपने प्रश्न का उत्तर भी मिल गया जो प्यार करता है वही रूठता भी है वही लड़ता भी है ..जब बिधाता पर फिर प्यार आ जाए तो लिखियेगा ..इन्तेज़ार रहेगा ..आपके ब्लॉग से बहुत पहले ही जुड़ा था पर आपके रच्राच्नायें डेश बोर्ड पर नहीं मिलती हैं तो आज फिर ट्राई कर रहा हूँ

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  31. गहरे घाव दिए, श्रद्धा ने , क्यों सत्ता स्वीकार करूँ !
    कौन सहारा दिया तुम्ही ने ,जो मैं तुमसे प्यार करूँ !

    बेहतरीन पंक्तियाँ।
    संसार दुष्टों और दुष्कर्मों से भरा पड़ा है। हमें अपना फ़र्ज़ तो फिर भी निभाना पड़ता है।

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  32. .
    .
    .
    पोल तुम्हारी खुल चुकी अब, नहीं कुछ है बस में तेरे
    समय रहते क्यों न अब मैं, इस सत्य को स्वीकार करूँ

    यह सब कुछ बिगाड़ा है हम ने, हम ही इसको संवारेंगे भी
    है हौसला,फिर फिर उठकर-डटकर, अन्यायों का प्रतिकार करूँ


    ..

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  33. हम दिल भी रखते हैं और दिल में दर्द भी ?
    शुभकामनायें भाई जी !

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  34. आज राक्षसी अपने बच्चे,छिपा रही मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !

    निराशा भी एक नयी आशा का संचार करती है.

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  35. आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार, राक्षसी कौम भी !
    पतित मानवों का हिस्सा हूँ,फिर क्यों आराधना करूँ ?

    आज राक्षसी,अपने बच्चे,छिपा रही,मानवी नज़र से
    मानव कितना गिरा,विश्व में, क्या तेरी वन्दना करूँ !

    अंतर्मन को झकझोरती खुद पर शर्मिंदा करती

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  36. बहुत गहरा दर्द लिए रचना. सच में ऐसे ही खयालात आते हैं अब मन में.

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  37. साहब , हमारे हिसाब से अगर आप भाव को पकड़ कर उसे शब्दों का रूप देने से पहले अपने भूवों को काबों में करे तो बेहतर ग़ज़ल बनेगी , भावों में बह कर ग़ज़ल नहीं बनती ... अंग्रेजी में इसे कहते है ' रांट ' : )

    जारी रखिये ...

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  38. गहरे घाव दिए, श्रद्धा ने , क्यों सत्ता स्वीकार करूँ !
    कौन सहारा दिया तुम्ही ने ,जो मैं तुमसे प्यार करूँ !

    सुंदर रचना !!!
    लेकिन सतीश जी यदि बात प्यार और स्नेह की है तो लेन देन से दूर ही होगी न :)

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  39. कभी कभी मन वाकई में निष्ठुर हो जाता हैं फिर आराधना तो क्या उसके वजूद को नही स्वीकारता

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  40. मनुष्‍य बन गया राक्षस और बेचारे भगवान को गाली? वाह भई वाह।

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  41. श्रद्धा शंका ही देती है,अहोभाव इसलिए करो
    निज चेतना रहे, सत्ता को, चाहे अस्वीकार करो

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  42. आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार, राक्षसी कौम भी !
    पतित मानवों का हिस्सा हूँ,फिर क्यों आराधना करूँ ?
    ..पुकारे भी तो किसे ..सही कहा आपने

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  43. कहते,तुम दौड़े आते थे , अपमानित द्रोपदी, देखकर
    आज तो तुम बच्चे नुचवाते,क्यों मैं तेरा नमन करूँ ..

    हालात के प्रति विद्रोह उमड़ता है मन में ऐसे ही ... आपका संवेदनशील दिल के क्या कहने ... हर छंद लाजवाब ... सटीक चोट करता है ...

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  44. मन क्षुब्ध तो है मगर मनुष्य हम बने रहें

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  45. व्यथित करने वाली हर घटना ईश्वर के प्रति हमारी गहरी नाराजगी प्रकट करती है। क्षुब्ध मन की सार्थक अभिव्यक्ति

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  46. शिकायत जायज़ है

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  47. gahan aur marmik bhav ....kya kaha jaye ...!!
    sarthak geet ...

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  48. vyathit hriday ...marmik geet ....kshubdh man kii prarthana prabhu zaroor sunenge ... .....

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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