Friday, May 13, 2022

68 वर्ष में मेहनत के बाद का सुख -सतीश सक्सेना

आज पूरे घर और कार की सफाई धुलाई के बाद का संतोष चेहरे पर साफ़ दिखता है ! मुझे याद है जब मैं 30-35 का था तब वृद्ध लोगों को आदर भाव से देखता था और सोंचता था कि इनकी मदद करनी चाहिए जबकि आज मैं सोचता हूँ कि इन जवानों की मदद करनी चाहिए !
प्रणाम आप सबको !

अकर्मण्यता की आदत से, है कितना लाचार आदमी !
जकड़े घुटने पकड़ के बैठा , ढूंढ रहा उपचार आदमी !

5 comments:

  1. वाह ! यह कविता याद आ गयी, कुछ काम करो, कुछ काम करो !

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१४-०५-२०२२ ) को
    'रिश्ते कपड़े नहीं '(चर्चा अंक-४४३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. सच है आज लाचार है इंसान ... और ये लाचारी इस उम्र में इंसान खुद ही लाता है ...

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  4. इंसान खुद ही जिम्मेवार है ...

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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