Wednesday, January 27, 2016

आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ? - सतीश सक्सेना

क्या हुआ, ये सोच में  डूबी खुमारी किसलिए ?
आँधियों ने ओढ़ ली इतनी उदासी किस लिए ?

तुम तो कहते थे, न सोओगे , न सोने दो मुझे
आज ऐसा क्या हुआ,इतनी उबासी किस लिए ?

ऐसी क्या अवमानना की मानिनी की, प्यार ने
चमक चेहरे की हुई है,अमलतासी किस लिए ?

लगता घायल से हुए हो, जख्म गहरे दिख रहे
पागलों के पास जाकर मुंह दिखायी किसलिए ? 

ये भी अच्छा है कि पछतावा रहे , सरकार को
इक दीवाने के लिए भी जग हँसायी किसलिए ?

Saturday, January 16, 2016

यह आवाज,अजान नहीं है -सतीश सक्सेना

 चंदा तो  मेहमान नहीं है,
लोगों पर अहसान नहीं है !

अपने बच्चों को वर देना
वैसे भी, अनुदान नहीं है !

मंदिर ,मस्जिद, स्पीकर की ,
यह आवाज,अजान नहीं है !

बेबस निर्बल पशु हत्या है
ये कोई बलिदान नहीं है !

सब के मन की पूरा करना ,
इतना भी आसान नहीं है !

तुम्हें मुक्त कर हम सो जाएँ
और कोई अरमान नहीं है !

जितना संग दिया सपनों में
भुला सकें आसान नहीं है !


Monday, January 11, 2016

सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको - सतीश सक्सेना

भरी आँखें रुलायेंगी तेरी,  ताजिन्दगी मुझको ,
तुम्हारी याद के संग आयेगी शर्मिंदगी मुझको !

हमें अरसा हुआ दुनियां के मेलों में नहीं जाते 
सहज रहने नहीं देगी, तेरी मौजूदगी मुझको !

न मिलने की तमन्ना शेष न दीदार की ख्वाहिश
बहुत तकलीफ ही देगी,तुम्हारी बंदगी मुझको !

जमाने भर से लड़ने में कभी नज़रें न नीची कीं   
कहीं मज़बूर न कर दे, तेरी बेपर्दगी  मुझको !

खुदा के सहज बन्दे को, दिखावे ही नहीं आते, 
न जाने क्यों लगे अच्छी मेरी आवारगी मुझको !

Monday, January 4, 2016

शायर बनकर यहाँ गवैये आये हैं - सतीश सक्सेना

काव्यमंच पर आज मसखरे छाये हैं !
शायर बनकर यहाँ , गवैये आये हैं !

पैर दबा, कवि मंचों के अध्यक्ष बने,
आँख नचाके,काव्य सुनाने आये हैं !

रजवाड़ों से,आत्मकथाओं के बदले 
डॉक्ट्रेट , मालिश पुराण में पाये हैं !

पूंछ हिलायी लेट लेट के,तब जाकर 
कितने जोकर, पद्म श्री कहलाये हैं !

अदब, मान मर्यादा जाने कहाँ गयी,
ग़ज़ल मंच पर,लहरा लहरा गाये हैं !

Tuesday, December 29, 2015

एक अजनबी जाने कैसा गीत सुनाकर चला गया -सतीश सक्सेना

सो न सकूंगी आसानी से 
याद  दिलाती  रातों में !
बंद न हो पाएं  दरवाजे
कुछ तो था उन बातों में !
ले कंगन मनिहार बेंचने 
आया इकदिन आँगन में,
जाने कैसे सम्मोहन में , 
छेड़छाड़ कर चला गया !
पहली बार मिला, जूड़े में फूल सजा के चला गया !

रोक न पायीं अनजाने को
मंत्रमुग्ध सा आवाहन था !
सागर जैसी व्याकुलता में 
लगता कैसा मनमोहन था !
हृदय जीत ले गया चितेरा 
चित्र बनाकर, चुटकी में, 
सदियों से थे ओठ कुंवारे, 
गीले करके , चला गया !
बैरन निंदिया ऐसी आयी, मांग सज़ा के चला गया !  

उसके हाथ सुगन्धित इतने
मैं मदहोशी में खोयी थी !
उसकी आहट से जागी थी
उसके जाने पर सोयी थी !
केशव जैसा आकर्षण ले 
वह निशब्द ही आया था  
जाने कब मेंहदी से दिल का, 
चिन्ह बनाकर, चला गया !
कितनी परतों में सोया था दिल, सहला कर चला गया !

उसके सारे काम, हमारी
जगती आँखों मध्य हुए थे !
जाने कैसी बेसुध थी मैं ,
अस्तव्यस्त से वस्त्र हुए थे !
सखि ये सबके बीच हुआ
था, भरी दुपहरी आँगन में ,

पास बैठकर हौले हौले ,
लट सहला के चला गया !
एक अजनबी जाने कैसा, गीत सुनाकर चला गया !


Saturday, December 26, 2015

कौन गुस्ताख़ छेड़ता है हमें - सतीश सक्सेना

कौन छिप छिप के देखता है हमें ,
जैसे जनमों से , जानता है हमें !

जिसने आवाज दी, यहाँ आये 
कौन ग़ुस्ताख़ , छेड़ता है हमें ?

वह बे मिसाल हौसला, लेकर  
गहरी मांदों में खोजता है हमें ! 

नासमझ आशिक़ी सलामत है 
इतनी शिद्दत, से चाहता है हमें !

इश्क़ ने दर्द , बेहिसाब  दिया ,
कौन सपनों में , हंसाता है हमें ! 

Tuesday, December 22, 2015

नाम नदियों का रखे, देश में नाले देखे -सतीश सक्सेना

मैंने इस गाँव में,कुछ घर बिना ताले देखे !
बुझे चूल्हे मिले और बिन दिये,आले देखे !

कभी जूठन,कभी पत्ते औ ज्वार की रोटी
किसने मज़दूर के घर,खाने के लाले देखे !

आ गया हाथ चलाना भी इन गुलाबों को 
आज भौंरों के बदन में , चुभे भाले देखे !

कैसे औरों का गिरेबान दिखाते हाक़िम  
तेरे महलों की दिवारों में भी जाले देखे !

भला हुआ कि सरसती है,जमीं के नीचे
नाम नदियों का रखे,देश में  नाले देखे !

Saturday, December 12, 2015

खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत - सतीश सक्सेना

जिन दिनों लेखन शुरू किया था उन दिनों भी, एक भावना मन में थी कि अगर मेरी कलम ईमानदार है तो किसी से प्रार्थना करने नहीं जाऊंगा कि मेरे लेखन को मान्यता मिले, आज नहीं तो कल, देर सवेर लोग पढ़ेंगे अवश्य !
आश्चर्य होता है कि यहाँ के स्थापित विद्यामार्तंड, किस कदर चापलूसी पसंद करते हैं ……… 
 हमें हिंदी के सूरज और चांदों का विरोध करना चाहिए और जनता के सामने लाना चाहिए हो सकता है इन ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने से, इनके गुस्से का सामना करना पड़े मगर हमें इस तरह के घटिया सम्मान की परवाह नहीं करनी चाहिए ! मंगलकामनाएं हिन्दी को, एक दिन इसके दिन भी फिरेंगे !

कैसे कैसे लोग यहाँ पर
हिंदी के मार्तंड कहाए !
कुर्सी पायी लेट लेट कर 
सुरा सुंदरी, भोग लगाए !
ऐसे राजा इंद्र  देख कर , 
हंसी उड़ायें मेरे गीत !
हिंदी के आराध्य बने हैं, कैसे कैसे लोभी गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी
कैसे  बनें यशस्वी गीत  ?
बेच प्रतिष्ठा गौरव अपना, पुरस्कार हथियाते गीत !


इनके आशीषों से मिलता
रचनाओं का फल भी ऐसे
एक इशारे से आ जाता ,
आसमान, चरणों में जैसे !
सिगरट और शराब संग में 
साकी के संग बैठे मीत !  
पाण्डुलिपि पर छिड़कें  दारु, मोहित होते मेरे गीत !

चारण, भांड हमेशा रचते
रहे , गीत  रजवाड़ों के  !
वफादार लेखनी रही थी
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ही, 
खूब सुनाये  स्तुति गीत !
खूब पुरस्कृत दरबारों में फिर भी नज़र झुकाएं गीत !

Wednesday, October 21, 2015

कौन आये साथ मेरे दर्द सहने के लिए -सतीश सक्सेना

कौन आये साथ , गहरे दर्द सहने के लिए,
हम अकेले ही भले,जंगल में रहने के लिए !

जिस जगह जाओ वहां बौछार फूलों की रहे 
तुम बनाये ही गए , सम्मान पाने के लिए !

शिष्ट सुन्दर सुखद मनहर देवता आदर करें
क्या जरूरत जंगली से, प्यार करने के लिए !

माँद के अंदर न जाएँ, ज़ख्म ताजे बह रहे
समय देना है,बबर के घाव भरने के लिए !

जाति,मज़हब,देश से इंसान भी आज़ाद हो,  
पक्षियों  से सीखिये,उन्मुक्त उड़ने के लिए !




Tuesday, September 15, 2015

मन के हारे, हार है - सतीश सक्सेना

 स्नेही दिनेशराय द्विवेदी  (फेस बुक पर ) जी के एक कमेंट के कारण, यह पोस्ट लिखने को विवश होना पड़ा !

" बड़े भाई घुूटनों के कार्टिलेज का ध्यान रखना। मैं उन्हें बरबाद कर चुका हूँ। बस चैक कराते रहना। शुभकामनाएँ!
इच्छा शक्ति की कोई कमी नहीं। अभी भी वह तो एवरेस्ट जाना चाहती है। पर हम प्रेक्टिस में अपने शरीर के किसी हि्स्से को इस कदर बरबाद न करें कि फिर से ठीक न हो सके। उम्र भी कोई चीज है। इस कारण लगातार निर्धारित अन्तराल से मेडीकल चैक अप जरूरी है। सभी स्पोर्टस्मेन के लिए "

यहाँ पर मैं आपसे सहमत नहीं हो पा रहा , दुनियां में अदम्य इच्छा शक्ति के लाखों उदाहरण हैं भाई जी जहाँ लोग उम्र की बिना परवाह किये लक्ष्य हासिल करते रहे हैं ! मैंने इससे पहले पिछले ४० वर्षों से कभी भी १०० मीटर नहीं भागा, ४५ मिनट का सामान्य वाक् अवश्य पिछले ४ वर्षों से शुरू किया है वह भी कभी नियमित नहीं रहा ! मगर काफी दिनों से सोंच रहा था कि मैं जल्दी ही रिटायर होने के बाद दौड़ना शुरू करूंगा और मुझे यह मौक़ा दिल्ली हाफ मैराथन (21Km दौड़ ) ने दे दिया !

आज दिनांक १५ sept २०१५ के मेरे प्रेक्टिस सत्र  पर नज़र डालें :
लक्ष्य : दिनांक 29 नवंबर 2015, दिल्ली हाफ मैराथन दौड़ = 21.097 किलोमीटर
सतीश सक्सेना- उम्र मात्र ६१ वर्ष , रेस में हिस्सा पहली बार, 40 वर्ष बाद ! जीवन की प्रथम रेस दिल्ली हाफ मैराथन2015 , उद्देश्य - जो समझना चाहें उन्हें अपरिमित मानव शक्ति का अहसास दिलाना …
15 september: (ट्रेनिंग दिन चौथा)
बिना रुके लगातार तेज वॉक एवं हलकी स्पीड दौड़ = 1घंटा 29 मिनट, कुल steps =9354,तय की गयी दूरी= 8.94 km, कैलोरी बर्न =549 , Max Speed=12.6km/h for a distance of 600meter, Avg. Speed=5.96km/h
जब मैंने यह रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा तो उसमें एक विकल्प सीनियर सिटिज़न के लिए ५ किलोमीटर दौड़ भी था जिसकी फीस भी नाम मात्र की थी , दूसरा विकल्प १० किलोमीटर दौड़ का था और अंतिम विकल्प २१ किलोमीटर दौड़ का था जो अभी लगभग ११ सप्ताह आगे का था और मैंने इसे चुना ही नहीं बल्कि फेसबुक पर शेयर भी किया !
२९ नवंबर को होने वाली इस रेस के लिए मैंने रजिस्ट्रेशन १२ सितंबर को कराया है , मैंने इस रेस में अपनी हिम्मत बढ़ाने के लिए, अपने फेसबुक मित्रों से अपील की है कि वे आज से नित्य सुबह ५ बजे अपने घर से बाहर निकल कर अपनी सामर्थ्य अनुसार वाक् शुरू करें इससे मुझे हौसला मिलेगा कि मेरे मित्र जो व्यक्तिगत तौर पर मुझे जानते तक नहीं, वे भी प्रोत्साहित कर रहे हैं ! मैं जानता हूँ कि कुछ कलमधनी मित्र इसका मज़ाक बनाएंगे मगर मेरा सोंचना है कि अगर एक मित्र भी मेरे साथ मुझ पर भरोसा करते हुए अपने घर के पार्क में आ गया तो मेरी मेहनत सफल कर देगा और आज ही कम से कम ३ मित्रों ने सुबह टहलना शुरू कर दिया और कुछ ने जीवन में पहली बार किया है इससे बड़ी मेरी जीत और हिम्मत अफ़ज़ाई क्या हो सकती है , मैं बेहद खुश हूँ और उन मित्रों का आभारी भी जो इसे सकारात्मक भाव से ले रहे हैं !
https://www.facebook.com/hashtag/delhihalfmarathon2015?source=feed_text&story_id=10205861039018438&pnref=story

२१ जून को रोम घूमते समय वारिश में स्लिप हो जाने के कारण मैंने अपना एंकल बुरी तरह से घायल कर लिया था इस समय भी वहां सूजन है , और एक साइड छूने पर दर्द भी होता है सामान्य स्थिति में मुझे स्वत रोकने के लिए यह खतरनाक चोट काफी होती मगर मुझे विश्वास है कि मैं इसके बावजूद दौड़ ही नहीं पूरी करूंगा बल्कि अपनी इच्छाशक्ति एवं प्राणशक्ति से इस घायल लिगमेंट को ठीक भी कर लूंगा  और वह भी बिना दवाओं के ! मानवीय शक्तियों की परख के लिए यह एक ऐसा प्रयोग है जिसे पूरा करने के लिए मुझे रिटायरमेंट तक का इंतज़ार करना पड़ा और अगर मैं स्व ट्रेनिंग में घायल नहीं हुआ तो मुझे विश्वास है कि इस प्रयोग में कामयाब रहूँगा और सबूत दूंगा कि बेकार रिटायर्ड व्यक्ति का तमगा लगाये एक सामान्य व्यक्ति ( नॉन एथलेटिक ) भी जवानों के लिए उदाहरण बन सकता है ! 

मेरा यह विश्वास है कि एलोपैथिक मान्यताओं को दृढ इच्छा शक्ति एवं मानवीय प्राणशक्ति आसानी से झूठा सिद्ध करने की क्षमता रखती है ! बीमारियों को ठीक करने का कार्य इंसान का है ही नहीं हमने शरीर की सेल्फ हीलिंग सिस्टम पर भरोसा खोकर अपना बहुत बड़ा अहित किया है ! मानवीय मुसीबत पर विजय पाने के लिए हमें अपने ऊपर विश्वास करना सीखना ही होगा !
मैंने बुढ़ापे को कभी स्वीकार ही नहीं किया अतः यह २१ किलोमीटर की दौड़ महज एक कौतूहल है साथ ही विश्वास है कि अगर इतने लोग कर रहे हैं तो मैं क्यों नहीं , उम्र मेरे लिए बाधा हो ही नहीं सकती क्योंकि मैंने कभी नहीं माना कि अधिक उम्र वाले जल्दी थक जाते हैं , उन्हें यह नहीं करना चाहिए उन्हें वो नहीं खाना चाहिए !

अतः ६१ साल की उम्र में, अपनी जीवन की पहली रेस ( २१ किलोमीटर ) को हँसते हुए पूरी करने की तमन्ना है कि अपने से छोटों और मित्रों को दिखा सकूँ कि अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर शरीर कितना मज़बूत हो सकता है ! शायद इसी विश्वास पर आज मैंने लगातार केवल चार दिनों के प्रैक्टिस में, डेढ़ घंटा दौड़ कर बिना थके ९ किलोमीटर की दूरी बिना रुके तय की है जबकि दिल्ली मैराथन का आयोजन २९ नवंबर को है और अभी मेरे लिए ढाई माह बाकी है !

आप यकीन रखें यह काम वाहवाही अथवा प्रभामंडल विस्तार के लिए नहीं कर रहा इस स्टेटस को मेरे बच्चे,परिवार सब देख रहे हैं पिछले मात्र चार दिन की प्रैक्टिस से मुझे विश्वास है कि मैं यह दौड़ हँसते हँसते पूरी करूंगा बस अनुरोध है कि मेरे मित्रगण भी मेरा साथ दें और इस प्रयोग के गवाह रहें ! 

सादर आपका !

Sunday, August 16, 2015

बेशर्म गज़ल - सतीश सक्सेना

आजकल हिंदी में चोरों की बहुतायत है और अधिकतर चोर हैं जो दूसरों की शैली और रदीफ़ बेशर्मी के साथ कापी करते हैं ! मज़ेदार बात यह है कि उनका विरोध करने कोई आगे नहीं आ पाता क्योंकि ऐसा उन्होंने भी किया है अतः उनके पास इसे सही ठहराने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता ! सो हिंदी में ग़ज़ल लिखने वालों की धूम है ,और तालियां बजाने वालों की कोई कमी नहीं ! सो सोंचा आज हम भी हाथ फिरा लें दुष्यंत कुमार पर  …। 

माल बढ़िया लगे तो मुफ्त उड़ा लो यारो 
कौन मेहनत करे,हराम की खा लो यारो !

इसे लिख के कोई दुष्यंत मर गया यारो  !
उसकी शैली से ज़रा नाम कमा लो यारो ! 

बड़े बड़ों ने इस रदीफ़ का उपयोग किया
सबको अपनी ही तरह चोर बता लो यारो !

ग़ज़ल रदीफ़ तो , सब ने ही बनाये ऐसे ,
मीर ग़ालिब पे भी इलज़ाम लगा लो यारो ! 

बुज़दिलों जाहिलों में नाम कमाओ जमके 
बेहया आँख से , इक  बूँद गिरा लो यारो !

Friday, August 14, 2015

जब तुम पास नहीं हो मैंने, सब कुछ हारा सपने में -सतीश सक्सेना

ऐसा क्या करता है आखिर संग तुम्हारा सपने में
कितनी बार विजेता होकर तुमसे हारा सपने में !

पूरे जीवन हमने अक्सर  छल मुस्काते पाया है,
निश्छल मन ही रोते देखा, टूटा तारा सपने में !

सारे जीवन थे अभाव पर,महलों के आनंद लिए
बेबस जीवन को भी होता एक सहारा सपने में !

कई बार हम बने महाजन कंगाली के मौसम में
कितनी बार हुई धनवर्षा,स्वर्ण बुहारा सपने में !

यादें कौन भुला पाया है, जाने या अनजाने ही,
धीरे धीरे भिगो ही जाता, एक फुहारा सपने में !

Thursday, July 16, 2015

बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता -सतीश सक्सेना

कहीं बंध जाएँ खूंटे से आवारा दिल नहीं करता !
भरोसा करके सो जाए बंजारा,दिल नहीं करता !

दया पाकर कोई भिक्षा,फकीरों को नहीं भाती 
तुम्हारे  द्वार जाने को, दुबारा दिल नहीं करता !

मेरे हिन्दोस्तां की शान खो जायेगी , नफरत में  
बड़ी पहचान छोटी हो,गवारा दिल नहीं करता !

जमाने भर के भोजन को, मेरे पुरखों ने खोला है,
ये लंगर बंद करने को, हमारा दिल नहीं करता !

जिन्होंने साथ छोड़ा था मुसीबत में , पहाड़ों पर 
उन्हीं बैसाखियों का लें सहारा दिल नहीं करता !

Saturday, June 27, 2015

डूबती हिंदी बिचारी और हम बेबस खड़े - सतीश सक्सेना

भाषा सहोदरी पत्रिका के लिए हिंदी पर लिखने का अनुरोध पाकर उलझन में हूँ,  मैं हिंदी विद्वान नहीं हूँ और न इस कष्टकारक और नीरस विषय पर लिखने में सिद्धहस्त मगर आपका अनुरोध टाला भी नहीं जा सकता अतः एक कवि होने के नाते हिंदी की दुर्दशा और कारणों का विश्लेषण अपनी अल्प बुद्धि अनुसार करना चाहूँगा !
आज कवि और साहित्यकार धन ,नाम और पुरस्कारों के लालच में भांड होकर रह गए हैं , प्रभावी लोगों के पैर चाटते हुए कवि और लेखक अब प्यार ,स्नेह,समाज सुधार पर नहीं लिखते, बल्कि धन कमाने के लिए बेहद आवश्यक अपने प्रभामंडल विस्तार के लिए, अख़बारों पत्रिकाओं में छपने के लिए लिखते हैं ! 
आज के समय में साहित्यकारों को समझना होगा कि धन और प्रशंसा के लालच में उनकी  भावनाएँ समाप्त हो गयीं हैं अतः सामान्य जन से उनकी रचना बहुत दूर चली गयी है , आज उनकी रचनाएं जनमानस पर प्रभाव छोड़ पाने में असमर्थ हैं और वे सिर्फ महत्वपूर्ण पदों पर बैठे, हिंदी के मशहूर टटपूंजी ठाकुरों के, आशीर्वाद की अभिलाषी रहती हैं !
प्रभावी भाव अभिव्यक्ति के लिए रचनाकार की ईमानदारी व मधुर कोमल भावनाएं सर्वाधिक प्रभावी भूमिका निभाती हैं , जो बनावटी रचनाकारों में दूर दूर तक नहीं मिलतीं अतः उनके सृजन में व्यावसायिक छाप और नीरसता नज़र आना निश्चित है ! हिंदी के ज़रिये नाम व धन कमाने की होड़ में आगे पंहुचने का संक्षिप्त रास्ता, सिर्फ हिंदी मठाधीशों और अधिकारियों  के घर से होकर जाता है और  चाटुकारिता कर्म आसानी से उसकी समझ में आ जाता है !  उसके बाद शुरू होता है, जोड़तोड़ और पैर दबा कर उच्च पद पर बैठे एक सड़ियल व्यक्ति के साहित्य कर्म की तारीफों का पुल बाँधना, इस क्रम में  उसे हिंदी साहित्य सम्राट की पदवी देने वालों की लाइन लग जाती है ! विडम्बना यह है कि इन मठाधीशों के दरवाजे पर कुछ सम्मानित हिंदी विद्वान भी शर्म से सर झुकाये, बेमन ही सही पर घुटनों के बल बैठे नज़र आते हैं !
चापलूसों को भी कुछ सम्मान मिलना चाहिए ,
इनकी मेहनत का वतन से मान मिलना चाहिए !
काम इतना सा है यारों,जब भी नेताजी दिखें, 
शक्ल कुत्ते सी लगे और पूंछ हिलना चाहिए !
कवियों का हाल और भी बुरा है,बेचारे हिंदी रचनाकारों की भीड़ में अपनी पहचान के लिए अपने नाम से पहले कवि लिख कर मंचों पर भावभंगिमाओं और फूहड़ चुटकुलों के साथ घटिया दर्शकों से तालियां बजवाकर अपने आप को कवि बनाये रखने की आवश्यक मानसिक खुराक पाता रहता है ! किसी गंभीर किस्म के व्यक्ति को आजकल के कवि मंचों को झेलना आसान नहीं ये सिर्फ शराबी  रिक्शे वालों और नौटंकी देखने वाली मानसिकता का सस्ता मनोरंजन मात्र रह गए हैं ! 
इंटरनेट ने लेखन को बेहद आसान और सस्ता बना दिया है , मगर इसके दुर्गुण भी कम नहीं ! हिंदी के धुरंधर विद्वान भी दूसरों की रचनाओं में भाव और शैली खोजते रहते हैं , इन उस्ताद विद्वानों के लिए, कम प्रसिद्द मगर प्रभावीशाली रचनाकारों की शैली , शब्दों और संवेदनशील अभिव्यक्ति की चोरी करना बेहद आसान है, सिर्फ थोड़ा सा बदलाव कर बड़ी आसानी से प्रभावशाली रचना बन जाती है और इनके मशहूर नाम के साथ यह बेईमान रचना बहुत सारे अखबार और पत्रिकाओं में आसानी से स्थान पा 
जाती है !  वास्तविक लेखक को पता चल जाने पर भी वह इस उस्ताद का कुछ नहीं बिगाड़ पाता और न कोई आसानी से उस पर भरोसा करता है , थोड़ा रोने पीटने के बाद वह बेचारा चुप बैठ जाता है और हिंदी उस्तादों का कार्य, इस बेधड़क चौर्यकर्म के साथ चलता रहता है !
सहज रचनाकार किसी की शैली का दास नहीं हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि रचना सोंच कर नहीं की जाती उसका अपना प्रवाह है जो भावनाओं में डूबने पर अपने आप बहता है, अगर उसमें अतिरिक्त बुद्धि लगायेंगे तब भाव विनाश निश्चित होगा ! 
तुलसी,मीरा,रसखान,  कालिदास और कबीर ने किसी नियम का पालन नहीं किया था और न उसके पीछे कोई लालसा थी  ! आज भी, उनके कुछ संवेदनशील शिष्य यहाँ वहां बिखरे हैं जिनको कोई नहीं जानता हाँ उनकी यह रचनाएं, खादी पहने मोटी तोंदों वाले प्रभावशाली हिंदी गिद्धों की दृष्टि की शिकार अक्सर होती रहती है ! और हिंदी इन चुराई हुई मिश्रित रचनाओं से फल फूल रही है यह और बात है कि इन गिद्धों के नोचने से नए प्रभावशाली रचनाकार उभर नहीं पा रहे ! 
आज गीत और कवितायें खो गए हैं समाज से , मैं अकिंचन अपने को इस योग्य नहीं मानता कि साहित्य में अपना स्थान तलाश करू और न साहित्य से, अपने आपको किसी योग्य समझते हुए, किसी सम्मान की अभिलाषा रखता हूँ ! बिना किसी के पैर चाटे और घटिया मानसिकता के गुरुओं के पैरों पर हाथ लगाए , अंत समय तक इस विश्वास के साथ  लिखता रहूंगा कि देर सवेर लोग  इन रचनाओं को पढ़ेंगे जरूर !
अंत में यही कि भाषा बेहद मधुर है बशर्ते वह सही सृजन के माध्यम से निकले , वर्तमान में हिंदी की दशा बेहद दयनीय है , अनाथ हिंदी को जब तक एक माई बाप नहीं मिलता यह समाज का सम्मान नहीं ले पायेगी ! इसकी मधुरता तभी तक है जब तक हिंदी को प्यार करने वाले रचनाकार उसे सहारा देते रहेंगे !
कड़वाहट कैसे कर पाए, अनुवाद गीत भाषाओँ का  !
संवेदनशील भावना से, संवाद विषम  भाषाओँ का !

झन्नाटेदार शब्द निकलें,जब झाग निकलते होंठों से,
ये शब्द वेदना क्या जानें, अरमान क्रूर भाषाओं का !

सावन का अंधा क्या समझे जीवन स्नेहिल रंगों को,
संदिग्ध नज़र जाने कैसे, माधुर्य सहज भाषाओं का !

अपने जैसा ही समझा है सारी दुनियां को कुटिलों ने   
ये शब्द समर्पण न जानें,अभिमान हठी भाषाओं का !

आस्था, श्रद्धा, विश्वास कहाँ, उम्मीद लगाये बैठे हैं,
भावनाशून्य कैसे समझें,आचरण सरल भाषाओं का !
सिर्फ एक आशा है कि इंटरनेट ने बहुत सारे लेखकों को सुविधा दी है लिखने की , मुझे उम्मीद है कि इन रचनाकारों में से कई बेहद प्रभावी सिद्ध होंगे हाँ हिंदी धुरंधरों के कारण उनकी पहचान में भले बरसों लगे क्योंकि लेखन अमर है, सो वह कभी न कभी पढ़ा अवश्य जाएगा बस यह समाज के लिए हितकारी रहे यही दुआ है !
जहाँ तक मेरी बात है मैंने लगभग ५०० रचनाएं की हैं उनमें कविता और हिंदी ग़ज़ल लगभग २५० होंगी बाकी सब लेख हैं जिनमें अधिकतर समाज के मुखौटों के खिलाफ लिखे हैं ! 
भारत सरकार से अवकाश प्राप्त अधिकारी , नॉएडा में निवास 
http://satish-saxena.blogspot.com/
http://satishsaxena.blogspot.com
satish1954@gmail.com

Monday, June 15, 2015

तेरे झंडों से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा - सतीश सक्सेना

जो यहाँ जन्में उन्ही का देश माना जाएगा !
तेरे झंडों  से न, हिन्दोस्तान जाना जाएगा !

साधू,बाबा,तांत्रिकों ने देश शर्मिन्दा किया 
आस्था से धन कमाने का ज़माना जाएगा !

शहर जीता जब उन्होंने तब नशे में लोग थे 
होश आने दे शहर को ये ठिकाना जाएगा !

शुक्र है अब नौजवां, अंधे नहीं इस देश के
नबी के बच्चों से झगडे का बहाना जाएगा !

मिटा पाओगे निशां,अल्बर्ट,सेखों,हमीद के ?
सरजमीं पे उन्हीं का अधिकार माना जाएगा !
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