Monday, March 7, 2011

गायब होती मान मनुहार -सतीश सक्सेना

पाश्चात्य प्रेम का अनुकरण बड़े उत्साह के साथ करते  हम लोग , आज अपने स्वाभाविक प्यार की शक्ति को, लगभग भूलते से जा रहे हैं ! अपने प्यारों को समझने और उसे अहसास करने के लिए समय ही नहीं मिलता ! 

अहंकार, जिसे अक्सर हम स्वाभिमान का नाम दे देते हैं, में डूबे हम लोग, अकसर अपनों से कड़वा बोलते, यह ध्यान नहीं कर पाते कि बरछी जैसे वाक्यों से, हम अपने प्यारों का दिल ही छलनी कर रहे हैं ! इस आहत दिल  को देख ,पास पड़ोस के परिजन भी, मलहम लगाने की जगह, अक्सर नमक छिडकते देखे जाते हैं ! और इन ईर्ष्यालु मित्रों की बदौलत, इस आग को और भड़कने का मौका मिलता है ! 

इससे बेहतर तो यह होता कि अपने दिल के ज़ख्म दिखाए ही न जाएँ , शायद समय के साथ भर जाते ! एक बार सुज्ञ जी ने यह शेर, मुझे भेजा था , आज भी भुला नहीं पाया हूँ ... 

क्यों दिखाते हो गहरे ज़ख्म,  अपने  सीने     के  ! 
लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं   !   

याद है, एक शब्द हमारी भाषा में बहुत प्रचलित था " मनुहार  " ! अक्सर हम इस शब्द का उपयोग अपने बड़ों को या उन्हें, जिन्हें देख हमारे चेहरे खिल जाते थे, को मनाने में उपयोग करते थे  ! मान सम्मान के साथ, जब भी मनुहार की जाती थी, उस समय  कठोर वज्र समान दिल को भी, पिघलते देर नहीं लगती थी  ! मगर आज कोई मान मनुहार नहीं करता , पहले से ही, हीन ग्रंथियों से जकड़ा कमजोर मन , मान मनुहार को, दासत्व का नाम देने में, बिलकुल नहीं हिचकता ! 

और जुड़ने की इच्छा लिए, हम लोग और दूर होते चले जाते हैं !

71 comments:

  1. सही कहा है गुरुदेव!! मनुहार बड़ा छोटा शब्द है, मगर इतने माधूर्य को समेटे है कि बस हृदय से अनुभव ही किया जा सकता है.. सचमुच लुप्त हो गई है यह मनुहार की परम्परा भी!!

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  2. सच लिखा आपने। पर आजकल मनुहार कौन करता है मान मनौव्वल मनुहार का अपना अलग ही मजा होता था ।

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  3. सतीश भाई, अपन तो आज भी करते हैं। कभी आजमा लीजिए।
    *

    मुझे लगता है यह शब्‍द मन हारने से बना होगा। पर आजकल मन हारता कौन है,सब तो जीतने में लगे रहते हैं। फिर मनुहार कौन करे।

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  4. सही कहा आपने।
    यह दौर मान मनुहार का नहीं रहा।
    तू शेर तो मैं सवासेर।
    यही चल रहा है दुनिया में।
    अच्‍छी और मनन करने योग्‍य पोस्‍ट।
    शुभकामनाएं आपको।

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  5. क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !
    .
    विवाह से पूर्व लड़की से राय अवश्य लें. Womens Day special

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  6. मनुहार का अपना महत्व है....


    क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !

    वाह!

    एक बढ़िया चिन्तन!

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  7. बातें किसी विशेष संदर्भ और खास मनोदशा से आई जान पड़ती है, एकतरफा सी. (चुपके से- और अगर आपको समाज में मान-मनुहार नहीं दिख पा रहा है, तो ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी और पोस्‍ट की मनुहार कम है क्‍या)

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  8. जब गुस्से में शब्दों की बरछी चल जाय तो मनुहार के अलावा कोई दूसरा मरहम दिल को टूटने से बचा नहीं सकता। मन हारे बिना मन जीता नहीं जा सकता।

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  9. एक मानिनी हैं गुमान किये बैठीं हैं सदियाँ बीत गयीं नहीं मानतीं -अब कैसे मनुहार की जाय -आप भी नए पुराने दर्द को हारा करते रहते हैं -कोई सफल मनुहार करने के गुर बताये तो बात भी बने -कम से कम यही बताया होता महराज !
    सवतिया(सौत ) को लाना भी मंजूर बस मिलाना ही जुलुम हो गया -बाद में सवतिया भी खिसक ली ...

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  10. कोई बात नहीं ... दुनिया भले बदल जाय ... प्यार मुहब्बत ज़रूर रहेगा ... आप चिंता न करें ... अब मान भी जाइए !

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  11. चलो आज कुछ नया हो जाए
    किसी रूठे हुए को मनाया जाए ।

    लेकिन किस को ?

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  12. सबसे पहले आपकी बात सही नहीं है कि आजकल मान-मनुहार की परम्परा खतम हो गयी है। रोज पचासों किस्से मैं देखता हूं अपने आसपास। लोग रूठते हैं, मनाते हैं धड़ल्ले से अपने मित्रों से, घर-परिवार में, दफ़्तर में,सड़क पर, कारखाने में, इधर-उधर न जाने किधर-किधर।

    मानवीय संवेदनाओं के प्रकट करने के तरीके बदल रहे हैं। जहां समय कम है तो लोग जल्दी-जल्दी में रूठने-मनाने का काम करते होगे। जहां समय इफ़रात है वहां लोग तसल्ली से यह काम करते होंगे।

    आपको भी पता होगा कि मनुहार के साथ ही जुड़ा शब्द है मनौना। जब कोई ज्यादा मनौना करवाने लगता है तो मनुहार करने वाले का हौसला कमजोर पड़ता है। फ़िर लोग इस गली में आने से हिचकने लगते होंगे। सूत्र रूप में इसे इस तरह समझा जाये:
    १. मनौना < मनुहार (मामला पट जाता है)
    २. मनौना > मनुहार (गाड़ी अटक जाती है)
    शायर और कवि लोग भी दोषी हैं इस मामले में। जैसे एक शायर कहते हैं:
    मुमकिन है मैं तुझे भूल भी जाऊं लेकिन
    तू मेरी फ़िक्र से आजाद नहीं हो सकता।

    अब देखिये जब शायर ये विश्वास दे रहा है कि मनुहार करो चाहे न करो अगला याद करेगा ही। भूलेगा नहीं तो काहे के लिये कोई मनुहार में टाइम खोटी करेगा।

    एक और शायर जी कहते हैं:
    मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता/ कहा जाता है उसे बेवफ़ा, समझा नहीं जाता॥

    अब जब बताइये शायर ही कह दिया कि मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ सोचा ही नहीं जाता तो काहे का गुस्सा/ काहे का मनौना?

    खुश? अब तो मान जाइये। मुस्करा भी दीजिये। काहे इत्ता मनौना करा रहे हैं। :)
    ये पोस्ट पढिये (
    http://hindini.com/fursatiya/archives/6 )और साथ में ये शेर
    मोहब्बत में बुरी नीयत से कुछ भी सोचा नहीं जाता ,
    कहा जाता है उसे बेवफा, बेवफा समझा नहीं जाता.(वसीम बरेलवी)

    ये जो नफरत है उसे लम्हों में दुनिया जान लेती है,
    मोहब्बत का पता लगते , जमाने बीत जाते है.


    अगर तू इश्क में बरबाद नहीं हो सकता,
    जा तुझे कोई सबक याद नहीं हो सकता. (वाली असी)

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  13. मान मनौव्वल मनुहार का अपना अलग ही मजा होता था ।
    एक बढ़िया चिन्तन!

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  14. @ राजेश उत्साही ,
    बहुत बढ़िया राजेश भाई , शायद मनुहार ...मन हारने से ही बना होगा और हार में जो आनंद है वह जीत में कहाँ ??
    आपके स्नेह पर कोई शक नहीं !!
    सादर

    @ अरविन्द मिश्र ,
    हम तो आप के अनुयायी हैं गुरु , इस विषय पर एक पोस्ट लिखो तो आनंद आ जाए !

    @ अनूप शुक्ल ,
    वाह उस्ताद आज तो बड़े अच्छे मूड में दर्शन दिए ! आनंद आ गया ....

    मनौना की याद दिला आपने पोस्ट का अधूरापन समाप्त कर दिया ....हम तो मनुहार पढ़ते ही भाग खड़े होते हैं गले लगने के लिए , आजमाइएगा कभी ! मगर धोखा यहाँ भी होता है
    !!
    डॉ अरविन्द मिश्र के शब्दों में ...
    अपनी समझ ही ससुरी इत्ती सी है....

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  15. याद करने की कोशिश कर रहा हूँ कि आखरी बार मैने कब मनुहार किया था। या किसी ने मुझे मनाया था।
    कुछ याद नही आया
    इस शब्द से नाता टूट गया है, चलो पहले इसे ही मनाते है
    आभार

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  16. सच कहा ..मनुहार शब्द तभी कायम रह सकता है जब वाकयी मनुहार किया जाए ...

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  17. देख रहा हूँ ऐसे हालात अपने आस पास में इधर...
    वैसे वो शेर मैंने भी कभी किसी को सुनाया था..

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  18. सच मे मनुहार का अर्थ ही शायद लोग भूल गये हैं अब तो ज़ुबान से तीर ही निकलते है। ममता दया करुणा सब समाज से अलोप हो रहे हैं बस एक सूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृ्ति जन्म ले रही है। किसी का दुख दर्द बाँटना भी दिखावा मात्र रह गया है।
    गये बुझाने आग जो वही दिखायें तील्
    करें दिखावा शोक का दिल में ठोकें कील

    सब से कर ली दोस्ती किया न सोच विचार
    मतलव की दुनियाँ यहाँ कौन किसी का यार
    शुभकामनायें।

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  19. क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !

    ek to to ye sher...dusra rajesh bhaiya ka ye kathan...

    मुझे लगता है यह शब्‍द मन हारने से बना होगा। पर आजकल मन हारता कौन है,सब तो जीतने में लगे रहते हैं। फिर मनुहार कौन करे।

    dono baaten dil ko choo gayee..:)

    ReplyDelete
  20. क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !

    ek to to ye sher...dusra rajesh bhaiya ka ye kathan...

    मुझे लगता है यह शब्‍द मन हारने से बना होगा। पर आजकल मन हारता कौन है,सब तो जीतने में लगे रहते हैं। फिर मनुहार कौन करे।

    dono baaten dil ko choo gayee..:)

    ReplyDelete
  21. aapki batonse mai sahamt hon......
    manuhaar mere liye bahut kimti shabd hai....

    ReplyDelete
  22. बेमतलब का संवाद तो बढ गया है... पर दिलों में दूरियां आ गयी हैं..... बहुत प्रासंगिक और सुंदर विचार रखे आपने.....

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  23. rothne manane me na kahi choot jaye
    blogiyana........

    dekhiye ab aap man jaeeye ...... nahi to hum rooth jayenge..........

    pranam.

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  24. क्या होगा खुदा जाने, अब अगले जमाने में
    ये उम्र तो गुजरी है, बस उनको मनाने में

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  25. सतीश भाई आप बड़े मासूम हैं...

    रोबोटों की दुनिया में मानवीय गुण ढूंढते हैं...

    बशीर बद्र साहब के कहे को याद कीजिए...

    कोई हाथ भी न मिलाएगा,
    जो गले मिलोगे तपाक से,
    ये अजीब मिज़ाज का शहर है,
    ज़रा फ़ासले से मिला करो...

    जय हिंद...

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  26. .

    सुज्ञ जी के इकलौते शेर के मुकाबले में मेरे दो शेर :

    घूमते तो हम भी हैं नमक लेकर मुट्ठी में.
    जिसका कभी खाया उसे लौटाने के लिये.

    मीठा खिलाकर लोग ज़हर खिला देते हैं.
    इसलिये नमक पर ही ऐतबार कर.

    मनुहार :
    आप ऎसी आतिश हैं जो पुरानी पढ़ने पर भी तेज़ धमाका करती है.
    आपके द्वितीय नाम में शक्तिशाली सेना की ताकत है.
    ........... चरण छूकर माफी मांगते हैं.

    .

    ReplyDelete
  27. दरअसल आज की दौड़ती -भागती जिंदगी में लोगों के पास समय ही नहीं है, पत्रों की जगह ईमेल या एसेमेस ने ले ली है और मान-मनुहार में जो वक्त जायेगा उतने में तो दो चार एस एम एस लिखे ही जा सकते हैं ...

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  28. चिंतनशील पोस्ट और उस पर उतने ही मनन के साथ की गयी टिप्पणियाँ...
    अच्छा लगा पढ़कर.

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  29. @ प्रतुल वशिष्ठ ,
    ऐसा न कहें प्रतुल , आप ब्लॉग जगत के गौरव शाली स्तंभों में से एक हैं जिनके कारण यहाँ अच्छा लगता है !

    कहीं मुझसे तो कोई भूल नहीं हो गयी गुरुदेव ??
    :-))

    ReplyDelete
  30. चचा ग़ालिब का एक शेर याद आ गया. उसी के जरिएअपनी बात कहे देते हैं -

    मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहे जिस वक्त
    मैं गया वक्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूं :)

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  31. और जुड़ने की इच्छा लिए, हम लोग और दूर होते चले जाते हैं !


    bilkul sach kaha aapne.

    ReplyDelete
  32. पहले के शादी-समारोहों में पंगत के भोजन में मनुहार के सार्वजनिक रुप से बडे पैमाने पर दर्शन हो जाते थे जहाँ माल किसका लगता, पेट किसका फूलता, लेकिन पुरसगारी करने वाले नहीं साब एक लड्डू तो मेरे हाथ से खाना ही पडेगा की तर्ज पर थोक में मनुहार के द्वारा परिचितों को भी उपकृत कर दिया करते थे, अब बफे सिस्टम ने उस मनुहार को तो गायब करवा दिया । बची व्यक्तिगत मनुहार तो उसमें भी विकृत स्वाभिमान के रुप में अहम् ने अपनी मौजूदगी अधिक सशक्तता से दर्ज करा रखी है, जबकि मनुहार तो वैसे ही धीमे असर वाली प्रक्रिया जैसे- "जरा हौले-हौले चलो मेरे साजना, हम भी पीछे हैं तुम्हारे". की स्टाईल में चलती है और वर्तमान में हम इन्स्टन्ट युग में जी रहे हैं, इसलिये ये मानलें कि जो है जैसा है बस ठीक है ।
    (आज सुबह से लाईट बन्द थी और आपकी टिप्पणी मोबाईल के बस की नहीं थी)

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  33. @अहंकार, जिसे अक्सर हम स्वाभिमान का नाम दे देते हैं, में डूबे हम लोग, अकसर अपनों से कड़वा बोलते, यह ध्यान नहीं कर पाते कि बरछी जैसे वाक्यों से, हम अपने प्यार का दिल ही छलनी कर रहे हैं ! इस आहत दिल को देख ,पास पड़ोस के परिजन भी, मलहम लगाने की जगह, अक्सर नमक छिडकते देखे जाते हैं ! और इन ईर्ष्यालु मित्रों की बदौलत, इस आग को और भड़कने का मौका मिलता है ! ...
    बहुत सही और यथार्थ लिख गये आप,धन्यवाद-अच्छी पोस्ट.

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  34. आज तो एक कटु सत्य कह दिया आपने. अब कुछ कहने को बचा नही है.

    रामराम.

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  35. मनुहार ! मनौना !
    पोस्ट तो बड़ा मनोरम हो गया है!
    इसे पढ़कर तो बड़े-बड़े अंहकारी पाला बदल लेंगे।

    ReplyDelete
  36. चिंतनशील पोस्ट और उस पर उतने ही मनन के साथ की गयी टिप्पणियाँ...अच्छा लगा पढ़कर.
    मेरे मन की बातों को अनूप शुक्ल जी ने अपने शब्दों में कह दी उनका भी धन्यवाद.. आज आदमी के पास काम से इतनी फुर्सत नहीं है की वो अधिक देर तक मान मनुहार करेगा.
    तुम्हे अपने गम से नहीं फुर्सत, हम अपने गम से कब खाली
    चलो अब हो चूका मिलना , न तुम खाली ना हम खाली
    ऐसे उपयोगी लेख के लिए बहुत सारी शुभ कामनाएं आपको !!

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  37. @ अनूप शुक्लः
    सूत्र में यदि मनौना = मनुहार तो उस स्थिति को क्या कहा जाए! कृपया स्पष्ट किया जाये!

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  38. सुकुल चचा की बात पर मुहर रहेगी...
    मनुहार तो आज भी होती है.. पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका के बीच तो मनुहार कभी खत्म हो ही नहीं सकती... शायद आपने जिस बात की ओर इशारा किया है वो ये कि आजकल छोटों में बड़े-बुजुर्गों की मनुहार करने की परम्परा कम हो चली है... इसपर पूरी सहमति है... इसलिए बुजुर्ग बेचारे ही आजकल रूठना कम कर दिए हैं...

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  39. सामायिक चिंतन/व्यथा है ....................

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  40. मान मनुहार से प्रेम और स्नेह नित बढ़ता ही है।

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  41. क्यों दिखाते हो सुर्ख आँख,अपने गुस्से के !
    लोग मुट्ठी में अक्सर ,बकनी-ए-मिर्च लिए फिरते हैं:)
    शुक्रिया.... नवाज़िश.... ज़र्रानवाज़ी :) :) !

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  42. मान मन्नावल में बड़ा रस है....अब तो लोग रूठे बच्चों को भी प्रेम से मनाने की बजाय उसकी अभीष्ट वास्तु देकर पिंड छुडाना चाहते हैं....

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  43. बड़े भाई,
    ऐसी पोस्ट बिना लेखक का या ब्लॉग का नाम दिये बगैर भी पढ़ते तो हम समझ जाते कि किसने लिखी है। आपके व्यक्तित्व के अनुरूप ही है पोस्ट।
    आप जैसों के कारण यह मनुहार-मनव्वल वगैरह भावनायें जीवित हैं, इसलिये आपकी तारीफ़ कर रहे हैं, वरना सब हम जैसे हो जायें तो रूठने पर न मानें और न मनाये:)

    ReplyDelete
  44. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!!

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  45. सतीश जी आपका लेख और उस पर आयी सभी टिप्पणियां अच्छी लगी पर मासूम साहब की टिपण्णी सबसे बढ़िया है.



    क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !


    इसलिए

    विवाह से पूर्व लड़की से राय अवश्य लें.

    ReplyDelete
  46. क्यों दिखाते हो गहरे ज़ख्म, अपने सीने के !
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !

    kya baat hai ,man khush ho gaya padhkar ,manuhaar apnatav se ot-prot ,magar ab istemaal nahi ho paa rahi .hum aadhunik jo ho gaye hai .

    ReplyDelete
  47. इस शब्द का वाकई अनुवाद नहीं हो सकता बहुत सुंदर ढंग से आपने इस शब्द की व्याख्या किया है |

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  48. bahut sach likha hai aapne ....

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  49. क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं
    सच में बहुत गहरी बात है इस शेर में सतीश जी ...
    और जहाँ तक मनुहार की बात है ...वो आज कल प्रायः लुप्त ही होता जा रहा है .. तेज़ी का जमाना जो आ गया है ... बटन दबाते ही काम होना चाहिए ... और मनुहार में तो मज़ा, रूठना और लाड करना भी है ...

    ReplyDelete
  50. रूठना-मनाना तो जारी है सतीश जी, हां अब लोग ज़्यादा देर तक रूठे नहीं रहते, जानते हैं, मनाने वाले के पास समय नहीं है, कहीं मनाना ही छोड़ दे तो? एक-दो बार के बाद मनाये ही न तो?

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  51. आपकी पोस्ट पढके कई बातें दिमाग में आयीं..
    टिप्पणी करने आ ही रहा था कि पाण्डेय जी (विचार शून्य) की टिप्पणी पर नज़र पड़ गयी....
    और हँसते हँसते पेट में बल पड़ गए....
    और बाकी सारा कुछ भूल गया...
    इसलिए विषय पर कोई कमेन्ट नहीं कर पाया....

    बुरा लगे तो कोई बात नहीं मैं आपको मना लूँगा.... और नहीं तो क्या मान-मनुहार मैं थोड़े न भूला हूँ....:D

    ReplyDelete
  52. ek dil ko chune wali post lagata hai saxena ji ke saath blogger meet karni hi hogi......

    jai baba banaras....

    ReplyDelete
  53. मनुहार के लिए प्रेमभरा दिल चाहिए लेकिन आज तो हम दिलों में अहंकार भरकर चल रहे हैं।

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  54. ह्म्म्म... ये आप कह रहे हैं???
    आप तो इस शब्द से कितने अच्छे से वाकिफ हैं... और हमें भी इसका सही अर्थ समझाया है...
    पोस्ट अच्छी है... पर उन लोगों के लिए है जो लोग ये शब्द भूल गए हों...
    पर अच्छा लगा... आज फ़िर कुछ सीखने को मिला...
    :)

    ReplyDelete
  55. मान सम्मान के साथ, जब भी मनुहार की जाती थी, उस समय कठोर वज्र समान दिल को भी, पिघलते देर नहीं लगती थी ! मगर आज कोई मान मनुहार नहीं करता .
    aaj ki sachchyee ko samne lakar khara kar diye aap.....achcha kiye shayad kuch fayeda ho jaye....

    ReplyDelete
  56. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  57. .
    .
    .
    @ विचार शून्य,

    हा हा हा हा,

    इसलिए विवाह से पूर्व लड़की से राय अवश्य लें.

    ली थी दोस्त, इसीलिये रोजाना मनुहार करते हैं और मनौनापन झेलते हैं... :(

    और सतीश जी, कोई गलती तो नहीं हो गई मुझसे... हुई हो तो मान जाइये न... :)


    ...

    ReplyDelete
  58. shabdon se bane mantra ,udhharak ya
    sangharak bante hai ,yah vyakti par nirbhar karata hai ki vah kya chunata hai .manuhar srijanatmak path
    pradan karta hai ,bas prayog to karen
    sarthak bahas ke liye sadhuvad ji,saksena sahab .

    ReplyDelete
  59. manuhaar... kitna dam tha isme , kitni khilkhilati hansi thi, ab to sabkuch banawti ho chala hai , sabkuch nibhane jaisa ho gaya hai

    ReplyDelete
  60. 'मान-मनुहार' पुराने ज़माने की बात हो गई .अब तो अपने-अपने अहं इतने प्रबल हो गये हैं कि न मानों तो न मानो ,तुम्हारी इच्छा !
    सब कुछ बहुत औपचारिक होता जा रहा है . सगे संबंध भी अब उतने सगे कहाँ ,और छोटे-बड़े की वह मर्यादा भी लोग भूलते जा रहे हैं .
    शायह वह समय फिर लौटे !

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  61. मैं ज़रूरी काम में व्यस्त थी इसलिए पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ सकी!
    आपने बिल्कुल सही कहा है! मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ! उम्दा पोस्ट!

    ReplyDelete
  62. बहुत सही कहा है की आज के दौर में मनुहार करना लगभग लुप्त हो गया है..लेकिन कभी कभी मन करता है की कोई अपना हमें मनाये और मनुहार करे...बहुत सुन्दर आलेख..

    ReplyDelete
  63. बहुत सही एवं सटीक बात कही है आपने ...आभार ।

    ReplyDelete
  64. सही कहा सतीश जी , मगर फागुन में क्या कहना !



    "नैन सैन चितवन चुभन , मान और मनुहार |

    अँगुरी दाबे रस चुवै , गुझिया जैसा प्यार |

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  65. मनुहारों के खंडहर पर अहम की उठती मीनारें

    सार्थक चिंतन है!!

    ReplyDelete
  66. आपने बिल्कुल सही कहा है| मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ| धन्यवाद|

    ReplyDelete
  67. मनुहार को लैंगिक भेदभाव के साथ वापरिये ज़मीन आसमान का फर्क नज़र आएगा :)

    ReplyDelete
  68. क्यों दिखाते हो दोस्त अपने दिल के जख्मों को
    लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं !

    बहुत खूब... सशक्त आलेख...
    सादर.

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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