Friday, April 13, 2012

मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा होकर बैठे हैं ! -सतीश सक्सेना

हम जी न सकेंगे दुनियां में
माँ जन्मे कोख तुम्हारी से
जो दूध पिलाया बचपन में ,
कैसे ऋण चुके, उधारी से
जबसे तेरा आँचल छूटा,

हम हँसना अम्मा भूल गए !
हम अब भी आंसू भरे , तुझे टकटकी लगाए बैठे हैं !

कैसे अपनों ने घात किया ?

किसने ये जख्म,लगाये हैं !
कैसें टूटे , रिश्ते -नाते ,
कैसे , ये दर्द छिपाए हैं ?
कैसे तेरे बिन  दिन बीते, 

यह तुझे बताने का दिल है !
ममता मिलने की चाह लिए,बस आस लगाये बैठे हैं !

बचपन में जब मंदिर जाता ,
कितना शिवजी से लड़ता था ?
छीने क्यों तुमने माँ, पापा
भोले से नफरत करता था !
क्यों मेरा मस्तक झुके वहां,

जिसने माँ की ऊँगली छीनी !
मंदिर के द्वारे बचपन से , हम गुस्सा  होकर  बैठे  हैं !

इक दिन सपने में तुम जैसी,
कुछ देर बैठकर चली गयी ,
हम पूरी रात जाग कर माँ ,
बस तुझे याद कर रोये थे !
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , 

तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !

एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
कुछ साथ बिताने आ जाओ
एक दिन बेटे की चोटों को
खुद अपने आप देख जाओ
कैसे लोगों संग दिन बीते ? 
यह तुम्हें   बताने बैठे  हैं !
हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

51 comments:

  1. एक बेटे का मां के लिए भावुक गीत... मां जैसा नि:स्वार्थ प्रेम फिर नहीं मिल पाता..

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  2. बचपन में माँ के साथ गुजारे हुए वे पल!...जीवनभर के साथी बन जाते है!...बहुत सुन्दर भावोक्ति!....आभार!

    बैशाखी की शुभकामनाएं!

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  3. माँ की यादों को सँजोये सुंदर भाव ...

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  4. आखे भार आई आपकी रचना पढकर ... माँ याद आ गयी !

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  5. कुछ कहने लायक बन नहीं पा रहा है... :-/

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  6. कविता पढ़ने के बाद भवनाओं का तूफान उठा और मन भिंगा कर चला ग अया।

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  7. भावुक करता गीत .

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  8. माँ की ममता दुनिया की सबसे अनमोल वस्तु है . सुँदर भाव और विचार

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  9. वाह!! मार्मिक शिकायत!!

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  10. बचपन में जब मंदिर जाता
    कितना शिवजी से लड़ता था?

    पढते पढ़ते आँखें भर आईं...आगे लिखने के लिए कुछ दिख ही नहीं रहा.
    माँ तो बस माँ होती है.

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  11. भाव हार्दिक -
    माँ की याद से दिक्
    गीत मार्मिक ||

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  12. oh no
    :(
    :(
    maaaaaa
    ma ma hoti hai ....

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  13. एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
    कुछ साथ बिताने आ जाओ
    एक दिन बेटे की चोटों को
    खुद अपने आप देख जाओ
    कैसे लोगों संग दिन बीते ? कुछ दर्द बताने बैठे हैं !
    हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

    ..... क्या कहूँ

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  14. दिल को छू लेने वाला गीत !

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  15. एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
    कुछ साथ बिताने आ जाओ
    एक दिन बेटे की चोटों को
    खुद अपने आप देख जाओ
    कैसे लोगों संग दिन बीते ? कुछ दर्द बताने बैठे हैं !
    हम आँख में आंसू भरे, तुझे कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

    उफ्फ इन पंक्तियों ने तो आँख ही नहीं मन भी भीग गया है :(

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  16. माँ कि याद से भरी ...बहुत भावुक अभिव्यक्ति ..
    शुभकामनायें .

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  17. एक मर्मस्पर्शी गीत .....कही कुछ कचोटता सा ..
    निःशब्द!

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  18. सुन्दर रचना ....
    भावुकता से युक्त ..

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  19. सुन्दर. अभी माँ को सुना कर आई हूँ.
    घुघूतीबासूती

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  20. बस बड़े भाई!!
    सिर्फ सिर झुकाकर आपको प्रणाम और अम्मा की स्मृति को नमन!!

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  21. माँ की याद कभी जब आती
    अपनी भी ,आँखे भर जाती

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  22. सतीश जी,
    नमस्ते.
    अभी हाल ही में मेरी माँ काल का ग्रास बनी.
    जब वो जूझ रही थी जीवन के लिए, तो मैं कई बार रोया.
    लेकिन उसके जाने पर या जाने के बाद नहीं, आज भी नहीं.
    उससे मिलकर रोऊंगा.
    आप भी आंसू संजो कर रखिये, मेरी तरह.
    सादर,
    आशीष
    --
    द रिवोल्ट ऑफ़ ए कन्फयूज़्ड सोल!!!

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  23. एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
    कुछ साथ बिताने आ जाओ
    एक दिन बेटे की चोटों को
    खुद अपने आप देख जाओ
    BITE DIN AUR BITE PAL KE SATH RISHTON KA LENA DENA .

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  24. अनुपम भाव लिए दिल को छूती माँ की स्मृति में सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट के लिए सतीश जी बधाई,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  25. हर पंक्ति मन में आकुलता भर देती है - मार्मिक अभिव्यक्ति ! .

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  26. बचपन बीता,गया पालना
    डोरी लौट नहीं आयेगी
    जाग-जाग कर मुझे सुलाती
    लोरी लौट नहीं आयेगी.
    ममता का आँचल ना सर पर
    दुनियाँ ने बरसाये पत्थर
    मुझे बचा लेती वो मैय्या
    मोरी लौट नहीं आयेगी.
    भूख लगी है,खाना दे माँ !
    सिर्फ मुझे एक आना दे माँ !
    पैर पटक कर करता जोरा-
    जोरी लौट नहीं आयेगी.

    सतीष जी, बहुत भावुक कर दिया आपने.........

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  27. खुश होकर याद करिये.....
    वो देख रहीं हैं ..............................बच्चों के आँसू माँ नहीं देख सकती...

    सुंदर रचना.

    सादर.

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  28. घुघूती बासूती की कार्यवाही और सलिल जी की भावनाओं से सहमत !

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  29. एक दिन सपने में तुम जैसी,
    कुछ देर बैठकर चली गयी ,
    हम पूरी रात जाग कर माँ ,
    बस तुझे याद कर रोये थे !

    ऐसी ही अनुभूतियां होती हैं …सच !

    मेरे पूज्य पिताजी का स्वर्गवास हुए 21 वर्ष पूरे हो गए इस 3मार्च को …
    सपने आते ही रहते हैं उनके…
    मन एकदम उदास हो जाता है , बच्चों और परिवारजनों से छुप कर कभी फफक भी पड़ता हूं … हमेशा लगता है , कल तो साथ ही थे पिताजी ! 21 साल बाद भी क्यों नहीं भूल पाया ज़रा भी !

    सबकी यही कहानी होती है शायद… प्रियवर सतीश जी भाईसाहब
    !

    बहुत अंदर तक भीग रहा हूं आपके गीत में …
    यहां शिल्प की कलाकारी ढूंढना अर्थ ही नहीं रखता …

    न मां कम होती है न पिता !
    ये तो सच है कॅ भगवान है
    है मगर फिर भी अनजान है
    धरती पर रूप मां-बाप का
    उस विधाता की पहचान है

    …बस, जाने वाले कभी नहीं आते … जाने वालों की याद आती है … … …

    ♥आपकी पूज्य माताजी की स्मृतियों को नमन !♥

    शुभकामनाओं सहित…

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  30. हृदयस्पर्शी , सुंदर भावाभिव्यक्ति

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  31. माँ अगर नहीं भी पास है
    उसकी ही ये साँस है,
    दूर भले ही बैठी हो
    उसको तो एहसास है !

    ReplyDelete
  32. एक दिन सपने में तुम जैसी,
    कुछ देर बैठकर चली गयी ,
    हम पूरी रात जाग कर माँ ,
    बस तुझे याद कर रोये थे !................बहुत सुन्दर भावोक्ति!....आभार!
    बैशाखी की शुभकामनाएं!

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  33. मार्मिक अभिव्यक्ति.......

    ReplyDelete
  34. सतीश जी, नव-प्रवेशी हूं ब्लॉग-जगत में. एक लिंक से होते हुए पता नहीं कहां कहां घूम आई. आपकी रचनाएं पढीं, लगता है जैसे मानवता के जज़्बे को कूट-कूट के भर दिया हो ईश्वर ने आप में.

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  35. कहो और किससे कहें, ढहते हृदय का दर्द..

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  36. दर्द जब हद से गुज़रे तो गीत बनता है, मार्मिक अभिव्यक्ति!

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  37. एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
    कुछ साथ बिताने आ जाओ
    एक दिन बेटे की चोटों को
    खुद अपने आप देख जाओ
    bahut sundar bhav

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  38. दिल से निकला है प्रत्‍येक शब्‍द। बधाई।

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  39. माँ और ममता प्रकृति की सतत प्रक्रिया है. इसकी आस हमेशा बनी रहती है. बहुत सुंदर कविता और भाव.

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  40. जबसे तेरा आँचल छूटा, हम हँसना अम्मा भूल गए,

    भावुक करती सुंदर रचना...
    सादर

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  41. एक दिन सपने में तुम जैसी,
    कुछ देर बैठकर चली गयी ,
    हम पूरी रात जाग कर माँ ,
    बस तुझे याद कर रोये थे !
    इस दुनिया से लड़ते लड़ते , तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
    तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !

    मां की ममता को स्मरण करती मर्मस्पर्शी रचना।

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  42. कितने अभागे हैं वो जो मां के जीते-जी उसकी कदर नहीं करते और मंदिरों की चौखट पर जाकर पाप धोने के लिए भगवान ढूंढते हैं...
    ​​
    ​जय हिंद...

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  43. बहुत सुंदर । आपकी इस कविता से मराठी कवि यशवंत जी की 'प्रेमस्वरूप आई' कविता याद आ गई ।

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  44. भावुक कर देने वाली रचना ।
    बेहतरीन ।

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  45. कृपया इसका अवलोकन करें vijay9: आधे अधूरे सच के साथ .....

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  46. :'(..............

    no words....

    so touchy.... tears not getting stopped....
    people are lucky who got their parents love...

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  47. Jai Mata Di...

    bhavotprerak.....

    sadhuwaad bhai ji......

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  48. एक दिन ईश्वर से छुट्टी ले
    कुछ साथ बिताने आ जाओ
    एक दिन बेटे की चोटों को
    खुद अपने आप देख जाओ--ओह! काश ऐसा हो पाता। दिल की गहराइयों से लिखी रचना जो दिल छू गई।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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