![]() |
| उर्मिला दीदी |
![]() |
रात रात भर ,सो गीले में ,
अपनी अंतिम बीमारी में ,
बच्चा कैसे जी पायेगा ,वे निश्चित ही रोई होंगी !
सबको प्यार बांटने वाली,अपना कष्ट छिपाती होंगी !
अपनी बीमारी में, चिंता
सिर्फ लाडले ,की ही होगी !
गहन कष्ट में भी , वे ऑंखें
मेरे कारण चिंतित होंगी !
अपने अंत समय में अम्मा ,मुझको गले लगाये होंगी !
मेरे नन्हें हाथ पकड़ कर ,फफक फफक कर रोई होंगी !
माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही, जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता ! अपने बचपन की यादों में उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !
मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....
जो कभी नही लिखना चाहता था !
-बुखार में तपते, अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....
इस दुनिया से लड़ते लड़ते , तेरा बेटा थक कर चूर हुआ !
तेरी गोद में सर रख सो जाएँ, इस चाह को लेकर बैठे हैं !
जब से होश संभाला, दुनिया में अपने आपको अकेला पाया, शायद इसीलिये दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस न करे इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी , करने के लिए तैयार रहता हूँ !
आज के समय में परस्पर स्नेह, जैसे परिवार से मिटता जा रहा है !असुरक्षित पुरानी पीढ़ी,अपने ही बच्चों से , अपने संसाधन, छिपाने में लगे रहते हैं ! अपने ही खून से,झूठ बोल, सहयोग व सेवा की उम्मीद, परिवार शब्द का मज़ाक बनाने के लिए काफी है ! बदकिस्मती से आज समाज में हर रिश्ता, एक दूसरे के प्रति अविश्वास के लिए अपराधी है !
किसी से भी आदर पाने के लिए निश्छल स्नेह और आदर देना आवश्यक होता है ! और यही मजबूत घर की बुनियाद होती है !हमारे होते , अपनों की आँख से आंसू नहीं गिरने चाहिए ,इन आँखों से गिरता हर आंसू , स्नेहमाला के टूटते हुए मोती हैं ....
गंभीर और कष्टकारक स्थितियों में, हमें अपने बड़ों का साथ देना चाहिए न कि हम उनका उपहास करें और उनकी कमियां गिनाते हुए उपदेश दें , ऐसे उदाहरण, मात्र क्रूरता माना जायेंगे ! ममता भरे आंसुओं को न पहचान सकने वाले अभागे हैं , भविष्य और इतिहास ऐसे लोगों को कभी प्यार नहीं करेगा !
सारा जीवन कटा भागते
तुमको नर्म बिछौना लाते
नींद तुम्हारी ना खुल जाए
पंखा झलते थे , सिरहाने
आज तुम्हारे कटु वचनों से, मन कुछ डांवाडोल हुआ है !
अब लगता तेरे बिन मुझको, चलने का अभ्यास चाहिए !
परिवार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बहू को, शायद ही बिना उसके दोष निकाले,अपनी बच्ची की तरह, कभी प्यार किया गया हो जबकि हर बेटी ईश्वर से दुआ मनाती हुई, नए घर में प्रवेश लेती है कि वहां उसे एक माँ और पापा मिल जाएँ , मगर अक्सर वहां माँ की जगह सास की तौलती निगाहें और पिता के स्नेह की जगह,ससुर की गंभीरता ही पाती है और शुरू होता है तनाव के साथ, बेमन एक घर में रहने की विवशता ! अक्सर पति , माता पिता और पत्नी में बैलेंस बनाने के प्रयास में त्रिशंकु बना रहता है !पुरानी पीढ़ी, अपने जमाने की सीखी सारी परम्पराएं, इन घबराई हुई लड़कियों(नव वधुओं) पर निर्ममता के साथ लादने की दोषी है ! मैंने कई जगह प्रतिष्ठित ओहदों पर बैठे लोगों के सामने भी यह परम्पराएं होती देखीं ! इन परम्पराओं के जरिये बहू को "शालीनता" के साथ बड़ों का "सम्मान" करना सिखाया जाता है ! कॉन्वेंट एजुकेटेड इंजिनियर और मैनेजर बहू, घूंघट काढ कर, बैठी रहे ...थकी होने पर भी सास ननद को काम न करने दे आदि आदि...
और अफ़सोस यह है कि शालीनता के पाठ को पढ़ाने में, उस घर की महिलायें सबसे आगे होती हैं ऐसा करते समय उन्हें अपनी बेटी की याद नहीं रहती जिसे यही पाठ जबरदस्ती दूसरे घर पढाया जाना है !
अपनी बच्ची के आंसू और घुटन महसूस होते हैं मगर दूसरों की बच्ची के आंसू हमें अपने नहीं लगते, २० साल बाद इसी गैर बच्ची(नव वधु) से,जो उस समय,घर की शासक होती है, हम प्यार और सहारे की उम्मीद करते हैं ! हमें अन्याय का विरोध, सड़क पर जाने से पहले,अपने घर से शुरू करना चाहिए !गृहस्वामिनी को,ससुराल में बेटी की चिंता करने से पहले, अपनी बहू का ध्यान रखना होगा ! समाज में बदलाव लाने के लिए हमें हिम्मत भरे काम करने होंगे ...
इस बार पकड़ना हाथ जरा, मजबूती से साथी मेरे !
इन रचनाओं में, परिवार में विभिन्न रिश्तों के मध्य तकलीफें बयान की हैं जो अगर हम सब महसूस करलें तो इन गीतों का लिखना सफल मानूंगा !सुनील -सुनीता के विवाह के अवसर पर पटियाला में, सुनील की तरफ से नव वधू के लिए लिखा, यह गीत मुझे बहुत पसंद है ...
उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
अर्पित , प्रणय संगिनी को
इस आशा के साथ , कि समझें भाषा अपने प्यार की ,
प्रेयसि पहली बार लिख रहा, चिट्ठी तुमको प्यार की !
लोग पूंछते तरह तरह के
प्रश्न , लिए शंका मन में ,
किसको क्या बतलाऊं कैसा
रंग चढ़ा व्याकुल मन में ,
गली गली में चर्चा चलती सजनी अपने प्यार की !
लिख लिख बारम्बार फाड़ता, चिट्ठी तेरे नाम की !
कवि ह्रदय की विशालता रचनाओं में अक्सर चर्चित रही है , एक निश्छल मन से बड़ा कोई नहीं , यह परमहंस सरीखा मन, समझना हर किसी के बस का नहीं ..
विस्तृत ह्रदय मिला ईश्वर से
सारी दुनिया ही, घर लगती
प्यार नेह करुणा और ममता
मुझको दिए , विधाता ने !
यह विशाल धनराशि प्राण, अब क्या में तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !
जिसको कहीं न आश्रय मिलता
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला , विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं, क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको , दवा न तुमसे मांगूंगा !
मानव जीवन का उपभोग पूरी उन्मुक्तता के साथ करने के बजाय , छिप छिप कर खुश होने के अवसर तलाशना ,न केवल अपनी शक्ति के साथ धोखा है बल्कि खूबसूरत मानव जीवन के प्रति अपराध है ! नाटक छोडिये और जीवन में आज का, एक एक क्षण का, आनंद लें क्या पता कल सुबह होगी भी या नहीं होगी ....
जो शब्द ह्रदय से निकले हैं
उन पर न कोई संशय आये
वाक्यों के अर्थ बहुत से हैं ,
मन के भावों से पहचानें !
मैंने तो अपनी रचना की, हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिखी
क्या जाने अर्थ निकालेगी, इन छंदों का, दुनिया सारी !
मैं एक नियमित खून दाता ( ओ प्लस ) हूँ और दिल्ली के कई हास्पिटल में अपना नाम लिखवा रखा है कि अगर किसी को मेरे खून की जरूरत पड़े तो मुझे किसी भी समय बुलाया जाए, उपलब्द्ध रहूँगा ! बीसियों मौकों पर,जब मैं अनजान लोगों को खून देने पंहुचा तो भरे पूरे परिवार के लोग कृतार्थ भाव से हाथ जोड़े खड़े पाए जाते हैं , कि चलो एक यूनिट मुर्गा तो फंसा, और रक्तदान के बाद मैं अक्सर इन स्वार्थी ,डरपोक रिश्तेदारों और तथाकथित दोस्तों पर हँसता हुआ ब्लड बैंक से बाहर आता हूँ !
एक फ़िल्मी गीत, जो बचपन से सबसे अधिक पसंद है, "सदियों जहान में हो चर्चा हमारा" अक्सर गुनगुनाता हूँ ! जीवन में कुछ ऐसा करने की तमन्ना रही है जो कोई और न कर सका हो , कुछ ऐसा, जो दूसरों के लिए किया जाए , मानवता के लिए उदाहरण बनें ! अपने लिए भरपूर जीना ,और खुश रहना, कोई जीना नहीं हुआ !
इस गीतखंड के छपने के अवसर पर, अपने परिवार के साथ मैं , आज याद करना चाहता हूँ अपने उन प्यारों को,जिन्होंने मुझे खड़ा करने में मदद की !

सबसे पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे उंगली पकड़ के चलना सिखाया , अगर वे हाथ मुझे सहारा न देते तो शायद मेरा अस्तित्व और यह भरा पूरा परिवार और मुझे चाहने वाले , कोई भी न होते ! उनमें से कुछ हैं और कुछ मेरी अथवा परिवार की लापरवाही के कारण, समय से पहले, छोड़ कर चले गए ! शायद उस समय उनकी अस्वस्थता पर मैंने उचित ध्यान दिया होता तो वे अभी मेरे साथ होते ! इन बड़ों के साथ, मैं अपने आपको हमेशा स्वार्थी महसूस करता हूँ , उनके साथ ही मैं सबसे कम कर पाया जिनके साथ सबसे अधिक करना चाहिए, हमेशा उनका ऋणी ही रहूँगा , उनका कर्जा लेकर मरना मेरी नियति होगी ...
विधि गौरव, ईशान गरिमा यह दोनों जोड़े बेहद मेहनती एवं कुशाग्र बुद्धि हैं , निश्छल मन के साथ मेरे यह बच्चे आसमान की ऊंचाइयां छुएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है !
अंत में आभारी हूँ ,गृहस्वामिनी दिव्या का जिनके सहयोग बिना मेरे गीत ही नहीं, परिवार भी अधूरा होता ,शायद पत्नी की अपेक्षाओं पर उतरना बेहद मुश्किल होता है और मैं भी अपवाद नहीं रहा ! जहाँ मैं उन्हें सहयोग नहीं दे पाया उसके लिए अपनी अयोग्यता को दोषी ठहराता हूँ...
रुचियाँ -जिनका कोई न हो उनकी मदद करना, "आँचल" ट्रस्ट का संस्थापक , सर्विस संगठन में कार्य करना, फोटोग्राफी , होमिओपैथी पढना और लिखना, जीवन को हँसना सिखाना ...
मेरे लेख पढ़ते समय कृपया ध्यान रहे कि मुझे गीत ,कविता और ग़ज़ल के शिल्प का कोई ज्ञान नहीं है, न ही हिंदी भाषा का विद्वान् हूँ तथा लिखते समय वर्तनी की गलतियाँ स्वाभाविक हैं !व्याकरण की समझ नहीं है अतः भाषागत त्रुटियों हेतु, गुरुजनों से क्षमाप्रार्थी रहूँगा !









मार डाला इस भूमिका ने ही...निचोड़ कर रख दिया....उफ्फ!!
ReplyDeleteकिताब छपते ही भेजो...न इन्तजार कर पायेंगे ज्यादा....आदेश सा ही मान लो इसे भाई!!
सर माथे भाई ...
Deleteपहली खेप उड़नतश्तरी के जरिये हो, इससे अच्छा क्या होगा !
मार्मिक प्रारब्ध ।
ReplyDeleteशुभकामनायें ।।
दीदी जैसा मुखड़ा मेरा, माथा तेरे जैसा ।
थोड़ी सी झुर्री भी डालो, दो चिंता की रेखा ।
पैरों में चक्कर थे मेरे, आँचल भीगा भीगा -
असमय तुझको छोड़ी बौआ,था किस्मत का लेखा ।
माएं तो सब एक सरीखी, बच्चों को तुम देखो-
उठा कूचिका चित्र बना लो, जो उन आँखों में देखा ।।
उठा कूचिका चित्र बना लो, जो आँखों में देखा ।।
Deleteआप दिल जीतने की कला जानते हैं रविकर भाई ,
Deleteइस प्यारी रचना( कमेन्ट ) के लिए आभारी हूँ ! !
सतीश जी, यह सरासर नाइंसाफ़ी है। जब आम आदमी (हम) टिप्पणी करने आये तब यहाँ दरवाज़ा बन्द था और दो बड़े कवि (समीर जी और दिनेश जी) आये तो टिप्पणी बक्सा खुल गया। खैर, पोस्ट बहुत मार्मिक है। जिन्होने अब तक न जाना हो उन्हें आपको पहचानने का अवसर भी मिलेगा।
ReplyDeleteहृदयस्पर्शी उदगार, भीगी आँखें! नव-प्रकाशन की हार्दिक बधाई!
बक्से का ताला खुला, पूरे तीन प्रयास |
Deleteभाई जी क्यूँ कर रहे, बड़े बड़े परिहास ||
:)
Delete@ अनुराग शर्मा
Delete@ रविकर भाई ,
उपरोक्त पोस्ट किताब की भूमिका है :)
सक्षिप्त भूमिका में अरुण रॉय को आनंद नहीं आया सो उनके अनुरोध पर यह लम्बी भूमिका लिखी गयी ! लम्बे लेख अथवा पोस्ट लिखने की मेरी आदत नहीं रही, लोगों को असुविधा न हो अतः कमेन्ट सुविधा बंद कर दी थी , मगर संजय तनेजा की बुलंद आवाज ..
बहुत नाइंसाफी है ठाकुर .....
तुरंत बक्सा खोल दिया , मेरे बस का नहीं है मों सम कौन.. की तीखी धार को झेलना
:-)
achha hua ke 'tikhi dhar ke maar se dar gaye varna vinmrata
Deleteke war se kahan bach pate'........
sankalan ke samiksha hetu 'post' ka bara hona sahi hai.
aap ke kai achhi rachnaon me bahut hi achhi panktiya bhut
bure tarike se 'rulati' hai......
pranam.
@ संजय झा ,
Deleteतीव्र कुशाग्र बुद्धि के साथ, बहुत बढ़िया पाठक हैं आप ....शुभकामनायें भविष्य के लिए !
एक बात हमेशा कचोटती है कि विचारों का ऐसा धनी व्यक्तित्व, लिखता क्यों नहीं ??
:(
...बड़ा भावुक कर गए आप...!
ReplyDeleteमाँ की याद से ज़्यादा कुछ नहीं.आपने तो पूरा जीवन-वृत्तान्त निचोड़ दिया !
एक जैसे हालात किसी को तोड़ देते हैं और कोई हिम्मत से उठ खड़ा होता है| जिन परिस्थितियों का आपने जिक्र किया है, किसी की मनोस्थिति हिला देने के लिए बहुत है| बड़ी बहन हम जैसों के लिए मां से कम नहीं होती, संयुक्त परिवार का महत्त्व और पारिवारिक मूल्य आप न समझेंगे तो कौन समझेगा? आपके बहुत सारे शेड्स देखने को मिले, और भी जान जायेंगे धीरे धीरे|
ReplyDeleteआप को बधाई, अरुण जी को साधुवाद और समीक्षा के लिए किसे किसे अग्रिम धन्यवाद देना है, सोचता हूँ :)
उपरोक्त पोस्ट किताब की भूमिका है :
Deleteसक्षिप्त भूमिका में अरुण रॉय को आनंद नहीं आया सो उनके अनुरोध पर यह लम्बी भूमिका लिखी गयी ! लम्बे लेख अथवा पोस्ट लिखने की मेरी आदत नहीं रही, लोगों को असुविधा न हो अतः कमेन्ट सुविधा बंद कर दी थी , मगर संजय तनेजा की बुलंद आवाज ..
बहुत नाइंसाफी है ठाकुर .....
तुरंत बक्सा खोल दिया , मेरे बस का नहीं है, मों सम कौन.. की तीखी धार को झेलना :)
:-)
अपनी तरफ से पूरी मोहब्बत दिखाता हूँ फिर भी किसी को लगता है तल्ख़ टिप्पणी कर दी, गुस्से में आकर पता नहीं क्या कर दिया, तीखी धार वगैरह वगैरह|
Deleteकोइ बात नहीं जी, बड़े हो आप लोग तो पंचायत का कहा सर मत्थे, .......... :)
तुम्हारे स्नेह पर कोई शक नहीं यार ...
Deleteबात संजय कलम की धार की है , उसमें कोई शक ??
:)
यह भूमिका सार है , जीवन दर्शन की पूर्णता के साथ . पौधे से वृक्ष तक के संशय्राहित अनुभवों से भरा दर्शन .... ढेरों शुभकामनायें इस गीत की धुन के लिए . . . इंतज़ार है ....
ReplyDeleteस्वागत है आपका ...
Deleteझलक मिल गयी है, आँखें नम हैं..
ReplyDeleteआभार प्रवीण भाई !
Deleteशुरू के ही प्रस्तरों में लग गया था कि यह परिवार सतीश जी के प्रथम काव्य संकलन की प्रस्तावना भर है ..
ReplyDeleteभाई इंतज़ार रहेगा इस कालजयी कृति का ......
अग्रिम बधाईयाँ !
यू आर जस्ट आसम भाई !
आपसे प्रेरणा मिलती है डॉ अरविन्द मिश्र ..
Deleteआभार आपके स्नेह के लिए !
आपके गीत बहुत बार पढ़े हैं आज उनके पीछे की दास्तां भी जान ली, बहुत बहुत शुभकामनायें...बहुत सार्थक पोस्ट !
ReplyDeleteमां तो है मां, मां तो है मां...
ReplyDeleteमां जैसा है कोई और कहां...
और इंतज़ार कालजयी रचना का...
लख लख बधाइयां...
जय हिंद...
बचपन से लेकर ज़वानी तक के संस्मरण --उफ़ ! निशब्द करने वाला अनुभव .
ReplyDeleteआपके गीतों में आपके जीवन के अनुभवों से उत्पन्न संवेदनाएं साफ झलकती हैं .
काश सभी ऐसा ही सोचें और अनुसरण करें .
पुस्तक तो आनी ही चाहिए . शुभकामनायें आपको .
आप जैसे विद्वानों की संगति में अगर कुछ भी निखार आया है तो मैं खुशकिस्मत हूँ डॉ दराल !
Deleteशब्द - शब्द यूँ जैसे भावनाओं के संगम पे खड़े हों हम जिधर नज़र जाती उधर एक भाव स्नेह का ...
ReplyDeleteशुक्रिया ध्यान देने के लिए .....
Deleteबेहद ख़ुशी हुई संकलन के प्रकाशन की.लेकिन गालों पर बेतहाशा गिरते अश्क में आपकी इस पोस्ट का मर्म भी है.
ReplyDeleteशहरोज़, आपका अनुज
आभारी हूँ शहरोज़ ...
Deleteआपके यह दो शब्द मेरे लिए अमूल्य हैं ! और शहरोज़ जैसे अनुज, मैं गदगद हूँ ! अपना फोन नंबर भेजो बात करनी है !
आदर सहित
किताब छपने की बधाई! अब विमोचन उसके बाद समीक्षा का इंतजार है।
ReplyDeleteविमोचन क्या होता है जानता ही नहीं और शौक भी नहीं है ...
Deleteसमीक्षा तो आप ही शुरू करें गुरु मगर उससे पहले पढ़ लेना यार :)
( पांव छू कर अर्ज कह रहा हूँ महा पंडित )
उफ़..रुला दिया आपने ..पूरा पढ़ ही नहीं पाई ..फिर आउंगी.
ReplyDeleteआप जैसी विदुषी के यह शब्द पढ़कर लगता है यह पुस्तक कामयाब होगी ...
Deleteआभार शिखा !
भावुक करने वाली भूमिका। पुस्तक का इंतजार रहेगा।
ReplyDeleteस्वागत है आपका ....
Deleteबहुत ही भावपूर्ण रचना......
ReplyDeletebehad bhawbhini.......
ReplyDeleteशुक्रिया आपके आने का ...
Deletebehad bhawbhini.......
ReplyDeletekitab chapi nahi lekin dararon se chhan kar aati roshni hi itni sukhdayak, utsukta jagane wali hai to ander ka drishy kya hoga...kya mujhe ye pustak padhne ka saubhagy milega ya nahi...sochti hun...
ReplyDeletebahut sunder
स्वागत है आपका ...
Deleteअपना पता भेजिएगा अवश्य भेजेंगे !
dil ko chu gayi aapki ye post....every song has a story :)
ReplyDeleteमत भेद न बने मन भेद - A post for all bloggers
शुक्रिया ...
Deletesundar yadon ki ladiyan .
ReplyDeletebhawon se saji kadiyan.
स्वागत है आपका ...
Deleteकितने भूले-बिसरे पल याद आते गए और आंखों की नमी बूंद-बूंद बन बाहर आती रही।
ReplyDeleteलिखना सफल हो गया मनोज भाई ...
Deleteआभार !
बहुत प्रभावशाली लेखन ,व्यक्तित्व का परिचय कराता हुआ !
ReplyDeleteआपका आशीर्वाद प्रेरक है ...
Deleteभावनाओ के ज्वार पुरे उफान पर पलके भिगो गई . काव्य संग्रह की हार्दिक शुभकामनाये .
ReplyDeleteशुक्रिया आशीष जी ...
Deleteआपकी यादों का जो सिलसिला मन से निकला है बहुत भावनात्मक, मार्मिक और मन को द्रवित करने वाला है.
ReplyDeleteसतीश जी,
ReplyDeleteआपके आत्मकथ्य ने द्रवित कर दिया।
काव्य संग्रह के प्रकाशन के लिए बधाई।
शुक्रिया महेंद्र भाई
Deleteबहुत ही भावुक हैं आप.
ReplyDeleteआपकी प्रस्तुति मार्मिक और अति हृदयस्पर्शी है.
भाव और अभावों से हर जीवन गुंथा है.
आपको पढकर आपके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला.
ईश्वर की बगिया का एक सुन्दर फूल हैं आप.
यह फूल बगिया को सदा सदा महकाता रहे,
यही दुआ है मेरी.
आपकी शुभकामनायें और विश्वास महत्वपूर्ण हैं, निस्संदेह मुझे बल मिलता है !
Deleteआभार भाई जी !
बहुत बहुत बधाई आपको !
ReplyDeleteआशा करती हूँ पुस्तक की एक प्रति मुझे भी भेज देंगे :}
थोड़ी व्यस्त थी आपकी पोस्ट देरसे पढ़ रही हूँ माफ़ी !
आपकी इतनी प्यारी टिप्पणी के बाद, कोई शिकायत हो ही नहीं सकती! आप हर बार देर से आया करें :)
Deleteसादर
बहुत भावुक भूमिका है... लिफाफे से ख़त का मजमून पता चल रहा है।
ReplyDeleteपुस्तक छपने की बधाई । फुसत्क की एक सशक्त भूमिका लिखी है आपने । यह पुस्तक कहाँ उपलब्ध है ?
ReplyDeleteशीघ्र छप रही है, आपको खबर करूंगा ! आभार आपके आने का !
Deleteब्लॉग बुलेटिन में एक बार फिर से हाज़िर हुआ हूँ, एक नए बुलेटिन "जिंदगी की जद्दोजहद और ब्लॉग बुलेटिन" लेकर, जिसमें आपकी पोस्ट की भी चर्चा है.
ReplyDeleteसतीश जी ,
ReplyDeleteहर पंक्ति संदेश दे रही है .... पुस्तक भूमिका आपके जीवन दर्शन को बता रही है ... बहुत संवेदनशील और मार्मिक ...
पुस्तक प्रकाशन के लिए बधाई और शुभकामनायें ... पुस्तक पढ़ने की उत्कंठा है ...
माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही, जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता !
ReplyDeleteसमझ सकता हूँ...................? बहरहाल अभी पोस्ट को सरसरी तौर पर ही पढ़ रहा हूँ , एक बार पुन: फुर्सत लेकर आना होगा यकीनन तब टिपण्णी रूप-स्वरूप भिन्न और निर्णायक होगा...............
यहाँ तक उपरोक्त सुंदर प्रस्तुति हेतु आपका आभार.
माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही, जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता !
ReplyDeleteसमझ सकता हूँ...................? बहरहाल अभी पोस्ट को सरसरी तौर पर ही पढ़ रहा हूँ , एक बार पुन: फुर्सत लेकर आना होगा यकीनन तब टिपण्णी का रूप-स्वरूप भिन्न और निर्णायक होगा...............
यहाँ तक उपरोक्त सुंदर प्रस्तुति हेतु आपका आभार.
दद्दा इतना भावुक क्यों कर देते हैं आप.
ReplyDeleteजब जब आपकी ये पोस्ट पढ़ी ...तब तब सोचा कि कुछ बहुत अच्छी सी टिप्पणी लिखूं ...पर नाकाम रही ...क्यूंकि किसी अपने को खोने का दर्द बहुत अच्छे से जानती हूँ ....आपकी पहली किताब (आने वाली )की भूमिका को पढते पढते ...आँखे नम हो गई...शब्द नहीं हैं कुछ और कहने के लिए भाई जी ........बस आने वाला संग्रह कामयाबी के ऊँचे आयाम छु ले ...ये कामना करती हूँ ....
ReplyDeleteबहुत बार इस भूमिका को पढ़ने आया, हर बार नि:शब्द होकर लौट गया.आज भी कहने को कुछ नहीं.
ReplyDeleteभाव , शब्द कैसे बनें ? ये बेचारे मूक
परिभाषित हो किस तरह, कोयलिया की कूक.
सफलता हेतु शुभकामनायें
bdhai
ReplyDelete