Tuesday, June 11, 2013

लोगों का क्या,चलते फिरते, सूरज पर थूका करते हैं -सतीश सक्सेना

लोगों का क्या,चलते फिरते,सूरज गरिआया करते हैं !
रोशनी भूलकर गरमी पर , कोहराम मचाया करते  हैं  !

गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों जान गवाँया करते हैं !

जीवन भर, जोड़ घटाने में, न मदद किसी की कर पाए !

अब बिखरे सब रिश्ते नाते,फिर क्यों पछताया करते हैं !

जब शक्ति बहुत थी भूल गए अपने ही संगी साथी को !
अब घर में बैठ, जवानी  के, यश गान सुनाया करते हैं ! 

अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें ! 
मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत जगाया करते हैं !

54 comments:

  1. जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के , गुणगान सुनाया करते हैं ..

    बहुत खूब सतीश जी .. जीवन की सच्चाई को बाखूबी लिखा है ...
    आनंद आ गया ...

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  2. जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के , गुणगान सुनाया करते हैं ..
    बहुत सुन्दर.बहुत बढ़िया लिखा है .शुभकामनायें आपको !

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  3. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं!
    जीवन की सच्चाई से परिपूर्ण ,सुंदर प्रस्तुति,,,बहुत उम्दा सतीश जी,,,

    recent post : मैनें अपने कल को देखा,

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  4. बहुत सुन्दर, जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के ,यश गान सुनाया करते हैं !

    अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें !
    मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत,जगाया करते हैं !

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  5. बढ़िया ग़ज़ल....
    जीवन की कडवी हक़ीकत बयां कर डाली....

    सादर
    अनु

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  6. लोगों का क्या,चलते फिरते, सूरज पर थूका करते हैं !
    रोशनी भूल कर गरमी पर,कोहराम मचाया करते हैं !
    सार्थक पंक्तियाँ है ....लोगों का काम ही है कोहराम मचाना
    आज गरमी पर कोहराम मचाएंगे कल बारिश पर !

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  7. क्या कहिये ऐसे लोगों को।

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  8. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें !

    बहुत सुंदर लिखा

    माउस का राईट क्लिक disable या कॉपी पेस्ट disable साईट या ब्लॉग से कोई सा भी वॉलपेपर कैसे डाउनलोड करें

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  9. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं !
    जीवन भर, जोड़ घटाने में, न मदद किसी की कर पाए !
    अब सब बिखरे रिश्ते नाते,फिर क्यों पछताया करते हैं !
    ..बहुत बढ़िया ...

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  10. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन यात्रा रुकेगी नहीं ... मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  11. जीवन की कडवी हक़ीकत बयाँ करती बेहतरीन प्रस्तुती,आभार.

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  12. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं !

    जीवन भर, जोड़ घटाने में, न मदद किसी की कर पाए !
    अब सब बिखरे रिश्ते नाते,फिर क्यों पछताया करते हैं !
    जीवन की हकीकत बयां गजल -बहुत सुन्दर

    latest post: प्रेम- पहेली
    LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

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  13. प्रभावशाली रचना..

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  14. अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें !
    मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत,जगाया करते हैं !
    दुआ चंदन
    बस रहे पावन
    जहाँ भी रहे !

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  15. Waaah... Kya baat hai Satish bhai....

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  16. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज मंगलवार ११ /६ /१ ३ के विशेष चर्चा मंच में शाम को राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी वहां आपका स्वागत है

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  17. जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के ,यश गान सुनाया करते हैं !

    आपकी गजल निजी और देश, दोनों ही परिपेक्ष्य में सटीक है. हम अपने वर्तमान के कर्तव्यों से विमुख होकर भूतकाल के गुण गान में ही लगे रह्ते हैं. बहुत ही शानदार.

    रामराम.

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  18. अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें !
    मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत,जगाया करते हैं !

    काश आपकी बात मानकर इन भूतों से पीछा छुडवाकर वर्तमान की हंसी वादियों में विचरना शुरू करदें, नमन है आपको.

    रामराम.

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  19. जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के ,यश गान सुनाया करते हैं !
    बहुत खूब एकदम सटीक.

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  20. सुंदर रचना !

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  21. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 14-06-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।


    जय हिंद जय भारत...

    कुलदीप ठाकुर...

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  22. ज़िन्दगी की सच्चाई बयाँ करती रचना मन को भा गयी।

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  23. अब तो छोडो बीती बातें , हंस कर, अपनों से बात करें !
    मांगलिक कार्य के मौकों पर,क्यों भूत,जगाया करते हैं !

    सही सन्देश.

    -जीवन के सच को जस का तस रचना में लिख दिया.
    बहुत खूब!

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  24. सही... सटीक.... सुन्दर....!!!

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  25. वाह वाह भाई जी। आज तो बहुत सारी काम की बातें कह डाली।
    बेहतरीन प्रस्तुति।

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  26. आपकी इस आह्वान का तत्काल असर हुआ है !

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  27. बदले में जब वापस मिलते अपने ही व्यवहार...फिर मूढ़ मनुज क्यूँ घबड़ाया करते हैं...
    एक पंक्ति मैंने भी लिख दी...
    बहुत अच्छी ग़ज़ल है आपकी...सादर बधाई !!

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  28. बहुत बढिया

    ये दुनिया के लोग ऐसे ही है जो बनते काम यूँ ही बिगाड़ा करते हैं

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  29. waah .....badi-badi baaton ko ..chhote-chhote shabdon me kh diya ....

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  30. बर्दाश्त की इक सीमा होती, क्यों अन्याय खतम नहीं होता?
    इसे गीत नहीं समझो भैय्या 'सतीश' बंदूक चलाया करते हैं।

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  31. हाँ ,अब तो चेतें जितना सँभाल लें उतना ही सही!

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  32. बहुत तत्वपूर्ण बातें कहीं ,जिन्हें मानने में ही कल्याण है .

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  33. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं !

    बहुत सुन्दर शेर कहा है.

    ReplyDelete
  34. .
    .
    .
    बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से पाय ?

    अच्छा लगा इसे पढ़ना...


    ...

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  35. जब शक्ति थी तब भूले, कितने लोगों को यह पंक्तियाँ छू गई हैं जीवन का मर्म हैं इनमें

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  36. बहुत सुंदर रचना, ऐसी रचनाएं कभी कभी ही पढ़ने को मिलती हैं।
    हां एक बात और, मैं देख रहा हूं कि जब ब्लाग पर आता हूं यहां आपकी
    तस्वीर बदल जाती है। ये ट्रिक समझ में नहीं आ रहा है। हाहाहहा


    मीडिया के भीतर की बुराई जाननी है, फिर तो जरूर पढिए ये लेख ।
    हमारे दूसरे ब्लाग TV स्टेशन पर। " ABP न्यूज : ये कैसा ब्रेकिंग न्यूज ! "
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/06/abp.html

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  37. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं !
    बहुत ही सुन्दर,आज के सामाजिक जीवन की कलई खोल कर रख दी है आपने,आभार

    ReplyDelete
  38. गर्वीले मद में,जीवन भर,अपमान किया था अपनों का ,
    निज घर में ही,लुट जाने पर,क्यों शोर मचाया करते हैं !
    बहुत ही सुन्दर,आज के सामाजिक जीवन की कलई खोल कर रख दी है आपने,आभार

    ReplyDelete
  39. विचारणीय कडवे सच की उम्दा प्रस्तुति.

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  40. सोचने पर मजबूर करती रचना ...!!

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  41. सोचने को मजबूर करती रचना ....सतीश जी ...

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  42. जीवन भर, जोड़ घटाने में, न मदद किसी की कर पाए !
    अब सब बिखरे रिश्ते नाते,फिर क्यों पछताया करते हैं !

    घमंड, ग्लानि, पछतावा, अनावश्यक दर्प आपकी रचना या गीत का मूल भाव लगा आपने श्लोक की भांति गीत की माला लिखी संग्रहनीय और अनुकरणीय लाजवाब

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  43. बहुत खुबसूरत ...सच्चाई भरे अहसास !
    खुश रहें गुरु भाई जी !

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  44. कुछ लोग होते ही आदत से कमाल हैं :-(

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  45. अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत!
    ढ़
    --
    थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!

    ReplyDelete
  46. साहब। भूत भी तो कभी कभी खुद ही जग जाता है - बिना जगाए :)

    आपका प्रोफाइल पर दिया गया ईमेल कुछ गलत मालूम पड़ता है , कृपया चेक कर ले ....

    लिखते रहिये ..

    ReplyDelete
    Replies
    1. ठीक है यार ...
      satish1954@gmail.com

      Delete
  47. Delivery to the following recipient failed permanently:

    saitsh1954@gmail.com

    Technical details of permanent failure:
    The email account that you tried to reach does not exist. Please try double-checking the recipient's email address for typos or unnecessary spaces. Learn more at http://support.google.com/mail/bin/answer.py?answer=6596

    ------------

    हमारा संदेसा तो लौटा दिया जा रहा है ... आप कहें तो सतीश१९६४ , 1974 या और नवीन संस्करण आजमाएँ :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. आजमाने में हर्ज़ भी क्या है मशाल अर्र रर मजाल सर ..
      वैसे आप स्पेलिंग ठीक करें, सतीश की
      satish1954@gmail.com
      जबकि आपके वाले में saitish1954 hai ...
      pl remove I ..
      यह वैसे भी बहुत खतरनाक है :)

      आभार आपका बार बार याद करते हो लगता है पुराना याराना है !
      छुप छुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है :)

      Delete
  48. जब शक्ति बहुत थी भूले थे ,जीवन के संगी साथी को !
    अब घर में बैठ, जवानी के ,यश गान सुनाया करते हैं !

    ...आज के यथार्थ की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  49. सतीश जी, पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर ! बेहतरीन रचना !! और आपके परिचय को पढ़ कर नतमस्तक !!

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  50. बड़े कमज़र्फ हैं वो गुब्बारे जो चंद साँसों में फूल जाते है
    हवा की ज़रा सी रवानगी पाकर अपनी औकात भूल जाते है...

    जय हिंद...

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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