Tuesday, February 25, 2014

जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने -सतीश सक्सेना

इक दिन सूरज को गुस्से में देखा था असमानों नें !
भारी अफरातफरी  देखी  , दुनियाँ के मैदानों ने !

अपने घर में सेंध लगाई ,  चालाकों मक्कारों ने
कुछ तो सरदारों  ने लूटा, बाकी  साहूकारों ने !

धुएं के छल्लों ने देखा है, मदहोशी के आलम में
जो कुछ साकी से बच पाया लूटा था मयखानों ने !

ऐसे क्यों पहचान न पाये, अपने प्यारे लोगों को !
कुछ तो लूटा था यारों ने, कुछ लूटा अरमानों ने !

माँ से झपटा,बाप से छीना, पाई पाई जोड़ी थी,
जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने !

17 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. माँ से झपटा,बाप से छीना , पाई पाई जोड़ी थी !
    जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने !
    यही शायद आखरी दांव -------सुन्दर प्रस्तुति !
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    New post शब्द और ईश्वर !!!

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  3. धुएं के छल्लों को मालुम है,मदहोशी के आलम में,
    जो कुछ छोड़ा था साकी ने,लूट लिया मयखानों ने ..

    भाई वाह ... कुछ अलग से इस शेर की बात ही अलग है ... लाजवाब गीत की बधाई सतीश जी ...

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  4. शायद हँसी और आंसू इंसान का आखरी दांव है ...बहुत सुन्दर !
    New post चुनाव चक्रम !
    New post शब्द और ईश्वर !!!

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  5. माँ से झपटा,बाप से छीना, पाई पाई जोड़ी थी,
    जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने !
    ....वाह...क्या बात है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  6. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति...बधाई..सतीश जी..

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  7. वाह, अन्तिम पंक्तियों ने मन मोह लिया।

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  8. बलि जाऊं उन मुस्कानों की

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  9. माँ से झपटा,बाप से छीना, पाई पाई जोड़ी थी,
    जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने !
    फूल के बीज बोए थे, बबूल उग आया है. ऐसा
    कभी नहीं हुआ, न होगा, कही कुछ गड़बड़ है !

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  10. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन सर डॉन ब्रैडमैन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  11. किसने बोला था लुटने जाओ पहले ये जानना जरूरी है बताओ बताओ :)

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  12. माँ से झपटा,बाप से छीना, पाई पाई जोड़ी थी,
    जैसे तैसे बचा के रख्खा, लूट लिया मुस्कानों ने !

    बहुत खूब,सुंदर गजल ...!

    RECENT POST - फागुन की शाम.

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  13. प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

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  14. गहरी बात...मन मोह लिया...सतीश जी

    RECCENT POST-- खुशकिस्मत हूँ मैं

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  15. लुटते-लुटते-----सांझ हुई,घर लौटे हैं
    चादर तान--सो गये,देखें कहीं
    सपनों का भी चोर कहीम छिपा ना बैठा हो
    अपने ही दालानों--
    गनीमत है,सपने नहीं लुट सकते,आंख खुली---और वो
    अपने भी नहीं रहते.
    सुंदर प्रस्तुति.

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- सतीश सक्सेना

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