दिल की परतों में सोये हो ,
लगते तो कुछ अपने जैसे
तुम्हें छिपायें बोलो कैसे ,
जबसे तुमको देखा मैंने , पलकें अपनी बंद रखी हैं !
कौन जान पायेगा तुमको,कैसी है पहचान तुम्हारी !
जब भी आये, द्वार तुम्हारे !
तुम छिप गए लाज के मारे
आखें खोज रही तुमको ही
कब से देखो, बिना सहारे !
बरसों बीते बिन देखे ही ,
कैसी है ? यह प्रीत हमारी !
कैसी है ? यह प्रीत हमारी !
लोकलाज वश कहाँ छिपायीं,तुमने मेरी प्रेम निशानी !
अभी कुछ दिनों पहले तुमने
प्रणय गीत कुछ गाये तो थे
पीड़ा मेरी कुछ सुनकर ही
आँख, अश्रु भर आये तो थे !
मुझे ख़ुशी है उस घटना की,
तुमको भी है याद पुरानी !
तुमको भी है याद पुरानी !
कौन समझ पायेगा जग में,मेरी तेरी अमर कहानी !


























