Monday, May 7, 2012

मदारी बुद्धि -सतीश सक्सेना

                   विलक्षण बुद्धि मदारी के लिए ,मन्त्रमुग्ध होकर सुनने वाली भीड़ जुटानी आसान है !और अक्सर मदारी अपना उद्देश्य तय कर चुके होते हैं !उसे पता है कि सीधे साधे  श्रद्धानत होकर सुनने वाले लोगों से फायदा उठाना आसान है !

                  ऐसे मजमें, हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी लगते देखे गए हैं !अक्सर कुछ समय बाद, सीधा साधा इंसान अपने आपको ठगा महसूस करता है ! इन्सान को भावनात्मक तौर पर ठगा जाना ,शायद सबसे आसान है सदियों से शैतान, और अब दुशाला ओढ़े, इंसान रूप में शैतान,रोज इसका फायदा उठाते देखे जा सकते हैं !आज हमारे देश में ऐसे स्वामियों की भीड़ है और हम लोग विवश होकर देखने सुनने को मजबूर हैं !

पहन फकीरों जैसे कपडे
परम ज्ञान की बात करें
वेद क़ुरान,उपनिषद ऊपर 
रोज नए व्याख्यान करें,
गिरगिट को शर्मिंदा करते हुनर मिला चतुराई का !
बड़ी भयानक शक्ल छिपाए रचते ढोंग फकीरी   का !

                 विश्व में सर्वाधिक अशैक्षिक लोगों के इस देश में, आज भी 90% लोग ग्रेजुएट डिग्री नहीं ले पाए हैं ! बचपन से पुरातन पुस्तकें पढ़कर, गुरु का सम्मान करना सीखे हम लोग, गुरुओं की पहचान भूल गए हैं ! आज हमें सौम्य मुद्रा में कुरता पायजामा, और धवल दुपट्टा डाले, मधुर आवाज में बोलता हर व्यक्ति, गुरु श्रद्धा के लायक लगता है !
                           सीधे साधे और अनपढ़ लोगों की श्रद्धा के साथ मज़ाक का, विश्व में सबसे बड़ा उदाहरण है जिसको हमारे देश में जम कर भुनाया जा रहा है ! "गुरु बिन मोक्ष नहीं " में भरोसा करने वाले हम लोग ,गुरु की तलाश में टीवी पर आसानी से अपनी पसंद के गुरु को चुन सकते हैं !लगभग हर न्यूज़ चैनल पर चलते प्रवचन श्रद्धा के साथ ग्रहण किये जाते हैं !सुबह सुबह किसी भी चैनल पर यह मनोहर गुरुजन शिष्यों से समस्याओं से मुक्ति के उपाय बताते मिलते हैं जिन्हें हमारे प्रथम गुरु (माताएं) बड़े लगन से ग्रहण करती हैं! बिना किसी विशेष शिक्षा और परिश्रम के, गुरु बनकर लोगों के दिल दिमाग पर छा जाना बेतहाशा फायदे का सौदा है !
                             अभी हाल में मेरे एक परममित्र जो भारत सरकार में कार्यरत हैं , ज्योतिष का एक कोर्स करने के बाद से टीवी पर आने में सफल रहे हैं और वे अब नौकरी छोड़ने की सोंच रहे हैं !
                           श्रद्धा और धर्म से जुड़े इन व्यवसाओं में सीधे साधे धर्म भीरु लोग न फंसे इसका कोई उपाय नहीं दिखता , शिक्षा और समझ का प्रसार इतना आसान नहीं हैं ! लोकतंत्र का दुरुपयोग और सरकारी तंत्र का बड़े फैसले करने का साहस न कर पाना, देश को आगे बढ़ने से रोकने में कामयाब होगा !

                       मैं निराश हूँ कि शायद ही मैं अपने जीवन काल में एक स्वस्थ लोकतंत्र देख पाऊंगा , लंगड़े लोकतंत्र जिसमें सही को सही कहने का साहस न हो , को सहना हमारी नियति रहेगी !

33 comments:

  1. पहन फकीरों जैसे कपडे

    परम ज्ञान की बात करें

    वेद क़ुरान,उपनिषद ऊपर

    रोज नए व्याख्यान करें,
    वाकई यही सब कुछ हो रहा है इस मुल्क में। लाखों लोग निर्मल बाबा बनकर भोली जनता को लूट रहे हैं।

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  2. बात बड़े पते की कही है भाई जान आपने -मगर जिस देश के न्यायविद ,राष्ट्रनायक ,नीति नियोजक ,वैज्ञानिक तक गंडा तावीज धारण करते हों और दसो उँगलियों में गृह शान्ति रत्न जटित अंगूठी पहनते हों उस देश को एक बार नेस्तनाबूद हो जाना ही श्रेष्ठ है

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  3. बात बड़े पते की कही है भाई जान आपने -मगर जिस देश के न्यायविद ,राष्ट्रनायक ,नीति नियोजक ,वैज्ञानिक तक गंडा तावीज धारण करते हों और दसो उँगलियों में गृह शान्ति रत्न जटित अंगूठी पहनते हों उस देश को एक बार नेस्तनाबूद हो जाना ही श्रेष्ठ है

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    1. अंधविश्वास की अति है इस देश में मजेदारी यह है की हम दासों उँगलियों में अंगूठियाँ पहने इन लोगो से देश और जनता के भले की कामना करते हैं !

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  4. श्रद्धा और धर्म से जुड़े इन व्यवसाओं में सीधे साधे धर्म भीरु लोग न फंसे इसका कोई उपाय नहीं दिखता , शिक्षा और समझ का प्रसार इतना आसान नहीं हैं !

    बिलकुल सही बात .....शिक्षा भी तो मज़ाक ही बन गई है....न पढाने वालों को रूचि न पढ़ने वालों को .....बस पैसा ही सब कुछ है .....कहाँ से उत्थार हो देश का .....??????

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  5. सही मायने में शिक्षा न के बराबर है ...

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  6. वाणी के व्यवसाय में, सदा लाभ ही लाभ ।
    न हर्रे न फिटकरी, मस्त माल-मधु चाभ ।

    मस्त माल-मधु चाभ, वकालत प्रवचन भाषण ।
    कोई नहीं *प्रमाथ, धनिक खुद करे समर्पण ।

    गुंडे गंडा बाँध, *सांध पर मारे धावा ।
    पाले पोषे फ़ौज, चढ़े नित चारु चढ़ावा ।

    *बलपूर्वक हरण ।
    *लक्ष्य

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  7. विश्व में सर्वाधिक अशैक्षिक लोगों के इस देश में, आज भी 90% लोग ग्रेजुएट डिग्री नहीं ले पाए हैं ! बचपन से पुरातन पुस्तकें पढ़कर, गुरु का सम्मान करना सीखे हम लोग, गुरुओं की पहचान भूल गए हैं ....

    सटीक अभिव्यक्ति.. आभार

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  8. अपना उल्लू साधने के लिये धर्म-भीरुओं को प्रभावित करना तो जाने कब से चला आ रहा है, अब तो फिर भी लोगों में चेतना आ रही है !

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  9. एक अच्छा चर्चित विषय चुना है आपने सभी बातों से सहमत हूँ !
    सबसे अच्छी बात यह लगी कि,जिस प्रथम गुरु माताओं क़ी बात आप कर रहे है
    वो ही अगर इन अंधश्रद्धाओं में विश्वास करने लगे तो भावी पीढ़ी कैसी होगी
    आप समझ सकते है ! इस वैज्ञानिक युग में इसप्रकार क़ी अंधश्रद्धा सोचकर ही बुरा लगता है !
    बधाई इस पोस्ट के लिये !

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  10. गिरगिट को शर्मिंदा करते , हुनर मिला चतुराई का !
    बड़ी भयानक शक्ल छिपाए रचते ढोंग फकीरी का !

    सतीशजी आपने सही कहा,......
    सीधे साधे और अनपढ़ लोगों की श्रद्धा के साथ मज़ाक का, विश्व में सबसे बड़ा उदाहरण है जिसको हमारे देश में जम कर भुनाया जा रहा है ! "गुरु बिन मोक्ष नहीं " में भरोसा करने वाले हम लोग.......

    RECENT POST....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  11. @मैं निराश हूँ कि शायद ही मैं अपने जीवन काल में एक स्वस्थ लोकतंत्र देख पाऊंगा , लंगड़े लोकतंत्र जिसमें सही को सही कहने का साहस न हो , को सहना हमारी नियति रहेगी

    आप कैसे नैराश्य के चंगुल में फंस गए.

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    1. बाबाओं का चक्कर है दीपक बाबा :)

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  12. भ्रष्टाचार , धर्म भीरुता , अज्ञान और अंध विश्वास के मिले जुले कारणों से पनप रहे हैं बाबा , गुरु , ज्योतिषी आदि .
    इस (अ) शुभ कार्य में योगदान दे रहे हैं प्रतिस्पर्धा के मारे टी वी चैनल्स .
    सही कहा , हमारे जीते जी तो कुछ सुधरने वाला लगता नहीं .
    शुभकामनायें ही दे सकते हैं भाई .

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  13. कुछ हद तक सरकारी तंत्र के साथ हम भी जिम्मेवार हैं इस व्यवस्था के लिए ...
    बदलाव की गति में तेज़ी लानी होगी ...

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  14. कहता है जोकर सारा ज़माना,
    ​​आधी हक़ीक़त आधा फ़साना​,
    ​चश्मा उतारो फिर देखो यारों,​
    ​दुनिया नई है, चेहरा पुराना...
    ​​
    ​​
    ​जय हिंद...

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  15. सही कहा आपने...बहुत अच्छा लगा!

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  16. पता नहीं हम अपना विश्वास अपने से इतना दूर स्थापित कर देते हैं कि अच्छे और बुरे का भान ही नहीं रहता है।

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  17. स्‍वस्‍थ्‍य समाज, बेहतर तंत्र की रचना करता है.

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  18. सभी बातों से सहमत हूँ मैं..सही कहा आपने..सशक्त प्रस्तुति..सतीश जी

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  19. सही लिखा है आपने ...सब तरफ बस यही हो रहा है ...

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  20. ...अगर फिर भी हम मूल्यों को याद करते हैं
    तो कहीं न कहीं एक आस बची है,
    रोशनी मद्धम हुई है पर बुझी नहीं !

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  21. ये निराशा केवल आपकी ही नहीं है .. कितने आधुनिक होते जा रहे हैं हम कि...

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  22. ये निराशा केवल आपकी ही नहीं है .. कितने आधुनिक होते जा रहे हैं हम कि...

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  23. पढ़ा लिखा व्यक्ति भी आज अनपढ़ों वाला व्यवहार करता हैं ...इन बाबाओं के चक्कर में

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  24. बड़े भाई.. यह कविता तो आपने हमपर लिखी थी करीब साल-दो साल पहले!! मगर जो भी लिखा था आपने आज भी सामयिक है!!

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  25. डिग्रीधारी ही सही मायने में शिक्षित हों यह भी ज़रूरी नहीं !
    माहौल बदलेगा भी कैसे , जो नैतिक शिक्षा बच्चों को घूंटी की तरह पिलाई जाती थी , वही आजकल बुद्धिजिवियों को उपहास की बात लगती है .

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  26. fakiri/babagiri se apan ko koi parhej nai hai......lekin iska(babagiri/fakiri) ka shakl gar nirmal/sri ghat/asha bapu ke roop me shrinkhlabadh tarike se aate rahe to 'bharoshe' ka uth jana tai hai.....

    pranam.

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  27. सहमत हूँ आपसे...यही चलन बनता जा रहा है.

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  28. होता चर्चा मंच है, हरदम नया अनोखा ।

    पाठक-गन इब खाइए, रविकर चोखा-धोखा ।।

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.in

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  29. समसामयिक विषय उठाया है .... अशिक्षित ही नहीं शिक्षित लोग भी खूब झांसे में आते हैं ...

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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