Saturday, May 24, 2008

पापा मुझको लंबा करदो - सतीश सक्सेना


मेरी पहली कविता ! दिनांक ३०-१०-१९८९ में, मेरी ४ वर्षीया बेटी के नन्हें मुख से निकले शब्द कविता बन गए ! इस कविता का एक एक शब्द उस नन्हें मुख की जिद का सच्चा वर्णन है, यह बाल कविता स्वर्गीय राधेश्याम "प्रगल्भ" को समर्पित की गई थी, जो की उस समय "बालमेला" नाम की पत्रिका का संपादन कर रहे थे !


पापा मुझको लंबा करदो
भइया भी तो लंबा है
झूले पे चढ़ जाता है
गुस्सा मुझको आता है
मन मेरा ललचाता है, पापा मुझको लंबा कर दो !

मेरी टांगे छोटी हैं
ऊपर टाफी रक्खी है
मुंह में पानी आता है
हाथ पहुँच नहि पाता है, पापा मुझको लंबा कर दो !

मुझको मां बहलाती हैं
खूब सा दूध पिलाती है
मीठी मीठी बातें कहकर
बुद्धू खूब बनाती है , पापा मुझको लंबा कर दो !

कहती लम्बी हो जाओगी
दूध जलेबी जब खाओगी
कब लम्बी हो पाऊँगी ?
झूले पै चढ़ पाऊँगी ? पापा मुझको लंबा कर दो !

पाउडर नहीं लगाने देती
रोटी नहीं बनाने देती
छत पर नहीं भागने देती
कहती तुम मर जाओगी, पापा मुझको लंबा करदो !

मुझे खिलौने नही चाहिये
मेरी इतनी बात मान लो
भइया जितना लंबा कर दो
और कुछ नहीं मांगूंगी, पापा मुझको लंबा करदो !


5 comments:

  1. bahut pyari si kavita hai,nanhi gudiya ki,papaji gudiya ki ichha puri kar do,gudiya ko lambi kar do.taki khub toffi khaye.

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  2. बहुत खूब कहा गुडिया रानी ने :)

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  3. this is one of the best work, shall I say from u or gudia....after all we all r poets, it is who gives the word to the sentiments..... I hope u understand what I means.

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- सतीश सक्सेना

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