Friday, December 17, 2010

ब्लोगर मीटिंग,ब्लॉग जगत का एक खूबसूरत चेहरा - सतीश सक्सेना

ब्लॉग जगत में आने से पहले ही मैं एक व्यस्त सामाजिक प्राणी था जो अकेला रहना कभी पसंद नहीं करता था जो लोग मुझे अच्छे लगते रहे हैं, उनकी समस्याओं को अपनी पूरी शक्ति के साथ सुलझाने का प्रयत्न करना, मेरा जूनून रहा है, नतीजा हर समय व्यस्तता, जो मेरी अक्षय उर्जा को और शक्ति देता रहता है !

मानव समाज में मित्रता और मुहब्बत एक अजीब रंग है जो किस पर चढ़ जाए यह कोई नहीं जानता ! समान गुण स्वभाव के लोगों में परस्पर खिचाव स्वाभाविक ही है , सो ब्लॉग जगत में शुरुआत से ही जिन लोगों से आकर्षित रहा उनमें अनूप शुक्ल, अरविन्द मिश्र और समीर लाल प्रमुख रहे ...मुझे इन लोगों के लेख कहीं न कहीं प्रभावित करते रहते थे और हम मुरीदों में शामिल होते चले गए ! अभी इसी माह समीर लाल के साथ दिल्ली में समय बिताने का मौका मिला ! शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि प्रोफेशनल चार्टर्ड एकाउंटेंट समीर लाल, बिना किसी विशेष आधिकारिक डिग्री लिए, कम्पयूटर टेक्नालोजी में कनाडा स्टाक मार्केट में, सोफ्टवेयर विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हैं ! इस संवेदनशील, पारिवारिक और भावुक व्यक्ति की रचनाओं के जरिये, आप  इसमें छिपे एक सीधे साधे सरल व्यक्तित्व को आसानी से देख सकते हैं !   


गर्वरहित मगर प्रभावशाली  जाकिर अली रजनीश के साथ खड़े  डॉ अरविन्द मिश्र , से मिलने में लगा कि एक मस्त परमहंस से मुलाकात हो गयी ! मिलनसारिता और बेबाकी में सीमारहित, अरविन्द में, कई जगह मुझे अपना प्रतिरूप नज़र आया ! अगर आप खुलकर बात करना और कहना पसंद करते हैं तो बेबाक विद्वता के धनी , अरविन्द मिश्र के पास से हटने का दिल नहीं करेगा, और निस्संदेह विभिन्न विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाले अरविन्द, किसी को भी आसानी से, हँसते हँसते प्रभावित करने में सक्षम है !


 ब्लॉग जगत की शख्शियतों की चर्चा ही बेकार मानी जायेगी अगर अनूप शुक्ल का नाम नहीं लिया जाए ! हिंदी ब्लॉग साहित्य में, अपने योगदान की बिना चर्चा किये, अपनी ही छवि के साथ खिलवाड़ करने वाले इस विद्वान् लेख़क में गज़ब का जीवट है जो निर्ममता के साथ अपने व्यक्तित्व के साथ मज़ाक करता रहता है ! आप एक उदाहरण देखिये  "सतीश सक्सेना जी ने मासूम भाई को सुझाया कि वे अनूप शुक्ला से भी अमन का पैगाम लिखवा लें। मुझे लगा कि शायद सतीश जी अमन में हमारे मसखरेपन को शामिल करवाना चाहते हैं। हम कोई पैगाम देंगे तो लोग भले न हंसे हमको खुद हंसी आयेगी कि हम भी पैगाम देने लगे।" 
कई बार मुझे महसूस होता है की अगर हिंदी ब्लॉग में अनूप शुक्ल और समीर लाल न होते तो ब्लॉग जगत का आज का स्वरुप हमें कम से कम पांच साल बाद देखने को मिलता ! निस्संदेह ब्लॉग जगत को लोकप्रिय बनाने के प्रयासों में, ये दोनों हमेशा जाने जायेंगे !


 १५ दिसंबर को अनूप शुक्ल का आमंत्रण था जेएनयू में आइये , चाय पीते हैं !गंभीर और बेहद भावुक, पीएचडी विद्यार्थी , अमरेन्द्र त्रिपाठी से मिलने की बहुत दिनों से तीब्र इच्छा थी इनके लिखे हुए कमेन्ट का मैं हमेशा से प्रसंशक रहा ! वहाँ पंहुच कर तो आनंद ही आ गया , मितभाषी डॉ आराधना चतुर्वेदी "मुक्ति",  ईमानदार श्रीश पाठक ,  और स्नेही मगर तीखे शिव कुमार मिश्र  ( फोन पर ) जैसे दिग्गज ब्लोगर्स से, एक साथ पहली मुलाक़ात कर, मेरा आज का दिन यादगार हो गया ! वह और बात है कि ( अनूप शुक्ल ) महागुरु ( घंटाल ) की रहस्यमय बातें और अंदाज़ आज भी मेरी समझ नहीं आती ;-)

ब्लॉग जगत में एक से एक बड़े विद्वान् लिख रहे है जहाँ मेरे जैसे जैसे लोग पासंग भी नहीं है...अगर इन लेखों के कारण इन विद्वानों से कुछ सीख सकूं अथवा इसी प्रकार इनका सामीप्य मिलता रहे तो यह ब्लाग लेखन धन्य हो जाए  ! काश प्यार और परस्पर सम्मान के साथ यह ब्लोगर मिलन चलते रहे और सब उन्मुक्त मन स्वागत करें तो शायद आनंद चौगुना हो जाए !

Sunday, December 12, 2010

सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी -सतीश सक्सेना

जिस पोस्ट को मैं स्नेह और प्यार की पोस्ट मान रहा था , उसका  उद्देश्य काफी हद तक कुछ गलतफहमियों के कारण खराब हो गया ! खैर सब कुछ अपने हाथ में नहीं होता ! 
महफूज़ ने मैसेज के जरिये कहा है कि मुझे दुःख है ...मुझे माफ़ कर दीजियेगा  ! धन्यवाद महफूज़ ! मगर फिर भी मैं अपना स्पष्टीकरण अवश्य देना चाहूँगा जिससे आप और खुद इंदु जी को मेरी ओर से ग़लतफ़हमी न रहे ! 
इन्दुपुरी को स्नेह वश ही विभिन्न संबोधनों से पुकारा गया था जिसमें इंदु माँ  अथवा स्नेह से बुढ़िया कहा गया !
फिर भी जो कुछ टिप्पणिया देखीं किसी संवेदनशील दिल के लिए दुखाने को काफी है ! मुझे इसका खेद रहेगा !


आइये एक बहुत प्यारा गाना  सुनते  हैं ...
सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी  

Saturday, December 11, 2010

एक ब्लागर की समझ -सतीश सक्सेना

पहले दिन - यार यह मुझे सतीश सक्सेना बहुत अच्छा लगता है, उसके लेख पढ़े ?
दुसरे दिन - मज़ा आ गया बहुत ईमानदार व्यक्ति है ऐसे लोग कम ही हैं ...?
तीसरे दिन - इनको गुरु बनाने का दिल कर रहा है 
चौथे दिन - अजीब बात है कैसे कैसे लोगों की तारीफें कर देते हैं गुरुदेव ! यह उस आदमी की तारीफ कर रहे हैं जो किसी लायक नहीं ! 
पांचवे दिन -( यह लेख तो बिलकुल बकवास लिखा है यह तो  @*&%^# की  भक्ति कर रहे हैं बहुत निराशा हुई इनके विचार जानकर !छटे दिन - यार आज मुझे गुरु पर बहुत गुस्सा आया इसका कमेन्ट देखकर ...मैं इसकी इतनी इज्ज़त करता हूँ और यह  ऐसे घटिया लोगों को इज्ज़त दे रहा है !
सातवें दिन - इसका लेख पढ़ा ? वाइन  के शौक़ीन है 
आठवे दिन : अपने बराबर उम्र की महिला को माँ कह रहा है  ...यह क्या बकवास है !     
नौवें दिन : अच्छा है इसकी असलियत दिख गयी आगे से इससे दूरी बना लो !
और सतीश सक्सेना को वह समझदार ब्लागर दोस्त पहचान गया .......

Thursday, December 9, 2010

अमरेन्द्र को पढना और समझना - सतीश सक्सेना

सतीश सक्सेना ने आपकी पोस्ट " द्वंद्व और काव्य का विकास . " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
बाप रे बाप !
इसे समझने के लिए गिरिजेश राव से विनती करनी पड़ेगी और वे हमें( प्रौढ़ शिक्षा क्लासें) पढ़ाने आयेंगे नहीं सो क्या करें भैया ??
अगली बार शराफत से कुछ ऐसा लिखो जो हमें भी इंटरेस्ट आये नहीं तो तुम्हे हूट करके एक पोस्ट पेल दूंगा.... देते रहना वहां आई टिप्पणियों के जवाब !
सुबह सुबह ब्लॉग पठन का सारा मूड खराब कर दिया ...जा रहा हूँ अपनी पुरानी खोपड़ी सहलाते
सतीश सक्सेना  


@ सतीश जी ,
सर जी , आप स्वयमेव काव्य-प्रेमी हैं , आपके लिए इतना भी टफ नहीं है . यह सब बातें तो जीवन-जगत की हैं . उसी जीवन - जगत की जहां हम आप सब रहते हैं . द्वंद्व है और हम उनका शमन , सामजस्य करते ही रहते हैं , जीवन चलता रहता है और कविता उसकी अभिव्यक्ति भी करती है . एतनेही बात है .
और सर जी , मुझको धमकी :-) हा हा हा ! ग़ालिब ने कहा है - ' मुश्किलें इतनी पडीं की आसां हो गयीं ' ! और आप मुझपर कुछ लिखकर मुझे फेमस ही करेंगे , इतना विश्वास है , काश ऐसा हो !! :-)

आप तो मेरे शुभकामी है .. और देखिये न , मैं तो अपने प्यारे दुश्मनों ( जानबूझकर बहुवचन में शब्द को प्रयोग कर रहा हूँ , वैसे तो जानता हूँ कि मेरे खिलाफ एक या आधे-तीहे ही .... बेचारे ... ) का भी शुक्रगुजार हूँ , बशीर बद्र जी की समझाईस भी तो है ---


'' मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है
   मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ ! ''

अमरेन्द्र त्रिपाठी  
आखिरी शेर बहुत अच्छा है अमरेन्द्र ! किसी भी हालत में मानव को डगमगाना नहीं चाहिए ! जहाँ तक मानव मन और स्वभाव की बात है मैंने आज तक कोई "अच्छा आदमी "नहीं देखा मैं खुद ऐसी लापरवाहियां, जल्दवाजियाँ  कितनी बार कर चुका हूँ !जो यह दावा करे कि उसका चरित्र पूरी तरह स्वच्छ और निर्दोष है तो मैं केवल मुस्करा सकता हूँ ! 
अमरेन्द्र जैसे बेहतरीन लेख़क की बेचैनी, इनकी पंक्तियों से जान, अच्छा नहीं लगा ...उससे भी अधिक खराब लगा हिंदी ब्लॉग जगत से, एक शक्तिशाली कलम को, लेखन से लगभग अलग कर लेना !
हिंदी ब्लॉग जगत में अच्छे लेखकों के मध्य मित्रता (खास तौर पर डॉ अरविन्द मिश्र से क्षमा याचना सहित ) के बाद, विवाद  तकलीफदेह और अनुचित है ! मनमुटाव के बाद, अगर स्वस्थ सम्बन्ध संभव नहीं हैं तो अलग हो जाइए ! व्यक्त कडवाहट तो आपको कमजोर ही करेगी ! अगर आप लोग बेहतरीन कलम के मालिक हैं, तो यकीन मानिये लोग आपका सम्मान, अपने आप करेंगे इसके लिए चिंतित क्यों  ?? 
ईमानदारी बोलती है  ! ठीक उसी प्रकार जैसे चोरी, कभी कभी न कभी खुलती जरूर है !  
काश भाई लोग इन बेहतरीन लोगों के, पैरों में लगे कांटे निकाल, इनमे मरहम लगाने का प्रयत्न करने में, बिना उपहास उडाये, मदद करें ( अनूप शुक्ल का आभार ) ! इस समय खराब लगते इन पैरों को ठीक होने दीजिये, आप कहेंगे कि , 
" वाकई ये पाँव बहुत खूबसूरत हैं "
ये हिंदी ब्लॉगजगत को बड़ी ऊंचाइयों पर ले जाने में समर्थ हैं !
किसी का  अपमान करने से खिन्न मन को क्षणिक राहत भर मिलती है , जबकि  तारीफ करने से, लगेगा कि कुछ नया सृजन किया !
( टिप्पणी कर्ताओं से अनुरोध है कि किसी व्यक्ति विशेष को लेकर विवाद युक्त टिप्पणी  न करें यह लेख हर पक्ष का सम्मान करता है ) )  

Monday, December 6, 2010

हिंदी ब्लॉग जगत में वात्सल्यमयी महिलायें- - सतीश सक्सेना

पिछले माह देर रात मोबाइल पर एक महिला की अधिकार पूर्ण आवाज, पहिचानों कौन बोल रही हूँ ? 
"सुनो बाबा ...तुम्हे बड़े मन से , अपनी  बेटी के विवाह पर न्योता दे रही हूँ, आना न भूल जाना ...!" यह आवाज और बेहद अपनापन के साथ न्योता दे रही थी , इंदु पुरी गोस्वामी , जिनके बेपनाह स्नेह के कारण अक्सर गूगल बज्ज़  मैं  "इंदु माँ " के नाम से संबोधित करते रहा हूँ ! ब्लॉग जगत के आभासी रिश्ते इतने करीब आ सकते हैं ,यह मैंने सिर्फ इनसे ही महसूस किया ! उनके स्नेह पूर्ण आमंत्रण को स्वीकार करते हुए ,काफी देर तक सोचता रहा कि  इन दिनों व्यस्ततम दिनों  से, समय निकाल कैसे पहुँच पाऊँगा चित्तौड़ गढ़, और इस स्नेहमयी का आमंत्रण टालना मेरे बस की बात नहीं !
और आखिरकार , मैं पूर्व नियोजित कार्यक्रमों की वजह से, चित्तौड़ गढ़ नहीं जा सका ! मगर तिलयार में, जो कुछ वहाँ के बारे में  ललित शर्मा ने बताया, वह इनके बारे में, मेरे अंदाज़ से भिन्न नहीं था !
जो ब्लोगर ( पद्म सिंह , ललित शर्मा  आदि )वहाँ पंहुचे थे और उनका इस विवाह में, जो आदर सत्कार , भोजन, भेंट ,तिलक किया गया था , उस भरपूर स्नेह और प्यार से अभिभूत ये ब्लागर ,महसूस ही नहीं कर पाए कि इन्दुपुरी को वे , बरसों से नहीं जानते हैं !  शायद ब्लॉग जगत में,  प्यार की परिभाषा, सिखाने में वे अग्रणी हैं !
इस स्नेहमयी को, सादर अभिवादन  !

Saturday, December 4, 2010

यह स्थल निस्संदेह देव रहित हैं -सतीश सक्सेना

                       देव और शक्तिस्थल हमारी संस्कृतियों के अभिन्न अंग रहे हैं ! अपने आपको सुरक्षित रखने
की मानव चाह, हमें इन पूजाग्रहों की तरफ खींचती रही हैं और इन दर्शनों के लिए उठी व्यग्रता जब पूरी होती है तो अक्सर एक नया शक्तिसंचार होता है और हम नए जोश के साथ अपने कार्य में लग जाते हैं ! मेरे विचार से मानव जीवन के लिए,सहारे के रूप में , यह आस्था केंद्र बहुत आवश्यक हैं !    
श्रद्धा कमज़ोर दिलों को बड़ी राहत देती है ! लोग अपनी अपनी समझ और मान्यताओं के अनुसार इन स्थानों पर जाते हैं, और और विश्वास के बदौलत, वास्तविक लाभ भी लेते हैं ! 
जहाँ एक ओर यह शक्ति पुंज, श्रद्धालुओं के लिए फल देते हैं वहीँ यह केंद्र ,बेईमानों के द्वारा सीधे साधे लोगों के लिए लूटने का एक साधन भी हैं ! दिन भर थके हारे लोगों से नोट कमाना और रात में पूरे दिन की थकान को शराब और अफीम के साथ उतरते हुए सो जाना, यही दिनचर्या है इन धर्म पुजारियों  की !
आस्था स्वरुप, पितरों के प्रति प्रतिबद्ध मैं , आजतक इन पंडों पुजारिओं के होते काशी या गया जाने की हिम्मत, चाहते हुए भी नहीं जुटा पाया !
आज किसी भी शक्तिस्थल में चारो ओर यही लोग अधिक दिखाई देते हैं बस देव कहीं नहीं दिखते ...
शनि, माँ कालका और भैरव के मंदिरों की दुर्दशा देखी नहीं जाती.... इनमें ईश प्राण प्रतिष्ठा का अहसास तक नहीं होता  !  
लगता है विवश होकर, आराध्य देव अपना मंदिर, इन्हें सौंप खुद कही और चले गए.....

Friday, December 3, 2010

ये कुत्ते - सतीश सक्सेना

अगर आप अकेलापन महसूस करते हैं तो एक कुत्ता पाल लें यकीन मानिये (बशर्ते गिरिजेश राव जी से ना पूंछे  ;-) ) आपको अकेलापन नहीं खलेगा ! आदिकाल से मानव के साथ साथ रहने वाला यह परम मित्र , घर की सुरक्षा के साथ साथ, अपनी  छटी इन्द्रिय के लिए मशहूर है ! आपकी आहट यह लगभग  एक किलोमीटर से महसूस कर लेता है और यदि आप बीमार है यह घर के अन्य सदस्यों से पहले ही  महसूस कर लेगा ! आपके दुःख की छाया इसके चेहरे से कोई भी जान सकता है !
आज के समय में यह गूंगा दोस्त , प्यार की एक मिसाल है !आप शायद यकीन भी न करें मगर चित्र में आदेश मानने की मुद्रा में बैठा गूफी ,३० - ३५ लोगो के परिवार में हर किसी को भली भांति उनकी आदतों के साथ पहचानता है ! किसी को भी आपस में लड़ते देख तुरंत बीच बचाव के लिए धक्का देता है ! 
पूरे परिवार में सबसे निर्दोष और निष्छल सिर्फ यही "कुत्ता " है जो हम मानवों को स्नेह का पाठ पढ़ाने की कोशिश करता रहता है ! 

Thursday, December 2, 2010

अनूप शुक्ल और डॉ अरविन्द मिश्र की नोकझोंक उर्फ़ जुगलबंदी - सतीश सक्सेना

लगभग एक माह के बाद अनूप शुक्ल जी ने बापस आकर आखिर एक लेख लिख ही डाला , उसे तथा टिप्पणिया पढ़ते हुए, बहुत दिन बाद खूब हंसा  ! सो दिल किया ब्लॉगजगत के दो महा गुरुओं के बीच की, टिप्पणिया प्रति टिप्पणियां आपसे साझा की जाएँ  !
अनूप भाई ने अपना कष्ट बड़े मार्मिक भाव से सुनाया है, आप भी इसका आनंद लें !  अरे रे रे आनंद नहीं उनकी तकलीफ सुनकर, आपका  ब्लागिंग से मन ही हट जाएगा ...
"इस बीच कलकत्ते गये थे। वहां सोचा शिवकुमार मिसिरजी से चर्चा करेंगे अपने ब्लॉग का स्तर उठाने के लिये लेकिन उनको लगता है कि हमारे आने की भनक लग गयी थी सो वे बचने के लिये इलाहाबाद सरक गये। जित्ते दिन हम कलकत्ता में रहे उत्ते दिन वे बाहर रहे कलकत्ता को प्रियंकर जी के हवाले करके। हम प्रियंकर जी से मिलने गये तो वे मंच पर चढ़कर भाषण देने लगे और हमसे कट लिये। हम अनमने से बने रहे और ब्लॉग लिखने से जी उचाट हो गया।"

शिव जी 
हमेशा की तरह अनूप भाई ने अपने लेख में थोडा साहित्यकार होने का चूरन डालते हुए, नागार्जुन को पेल दिया कि उन्हें उनकी रचना याद आ गयी " कौवे ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद " यह भी बताया कि वे ब्लागिंग कैसे करते हैं !और साथ में तुर्रा यह कि सारे ब्लागर ऐसे ही हैं   "जब आप अपने किसी विचार को बेवकूफी की बात समझकर लिखने से बचते हैं तो अगली पोस्ट तभी लिख पायेंगे जब आप उससे बड़ी बेवकूफी की बात को लिखने की हिम्मत जुटा सकेंगे " 
नतीजा डॉ अरविन्द मिश्र ताव खा गए और उनकी टिप्पणी थी कि ....( कृपया ध्यान से पढ़ें )
  1. आप इत्ते दिनों बाद लिक्हे तो हम भी इत्मीनान से पडधे…शब्द दर शब्द ..
    बस इत्ता बता दीजिये कि कौए ने किस चीज से पांखे खुजलाये ? तब हम जान जायं कि सचमुच वजन है आपकी समझ में .न जाने काहें ये डाउट ससुरा बना ही रहता है आपको लेकर !
    दुसरे कई और प्राणी गायब हैं ….जो हम सरीखे बिचारों के विचारों को तरह तरह कुरेदता है …….
अनूप भाई का पांसा देखिये ...
अरविन्द मिश्र ने भी एक धोबीपाट मारने कि कोशिश कि 
  1. मैं जानता था कि आप यही गलत सलत जवाब देगें क्योंकि अबके कवि कोई बाबा तुलसी या नागार्जुन नहीं हैं जो प्रकृति ,पशु पक्षियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं -कौए ने अपनी चोंच से पंख खुजाये …..आप कौए को भी भैंस समझ गए :) कुत्ता होता तो वह अपने दायें पैर खुजाता ….थोड़ा पशु पक्षियों के भी हाव भाव निहारा करिए न शुकुल जी ..केवल ब्लॉग जगत पर ही गिद्ध दृष्टि ठीक नहीं .. :) हा हा
अबकी बार गुरुदेव समझ गए कि अरविन्द मिश्र चाहते क्या है नतीजा गंभीर होकर चश्मा पहन कर जवाब दिया 
ब्लागिंग में निर्मल हास्य  लिखने वाले  ताऊ रामपुरिया और अनूप शुक्ल ही हैं जिनके ब्लॉग पर जाकर हंसने का दिल करता है ! लगता है कुछ लोग यहाँ हैं जो अपने खुद पर व्यंग्य कर सकें ख़ास तौर पर ऐसी जगह ( हिंदी ब्लॉग जगत पर ) जहाँ भाई लोग उसे आसानी से सच ही मान लेंगे ! 
;-)

Wednesday, December 1, 2010

हमारी देसी आदतें - सतीश सक्सेना

खुशदीप सहगल के द्वारा अपनाए जा रहे देसी ट्रेफिक नियमों की लिस्ट देख , हमारा भी, देसियों के द्वारा अपनाए जा रहे कुछ और नियम, बताने का दिल कर गया ! सो हमारे कुछ देसी रूल देखिये !
  • विश्वस्तरीय मेट्रो की सफाई देख कर बड़ा गुस्सा आता है ....उस पर लिख रखा है कि थूकने पर जुरमाना ! स्टील के थूकदान में थूकना अच्छा नहीं लगता ! मुँह में भरी पीक, निगाह बचा कर कोने में पिचकारी मानने में कितना आनंद है, यह जानने के लिए पान खाना सीखिए ! 
  • ट्रेफिक लाइट पर खड़े खड़े, गाड़ी से फालतू कागज़, रबर मैट को सड़क पर झाड़ना, खाली फ़ूड रैपर , पानी की बोतल आदि सड़क पर फेंकने में कोई बुराई नहीं है  ! समय बचता है !
  • ग्रीन लाइट पर भी , पैदल चलने वालों को , तेज निकलती गाड़ियों को, हाथ से रुकने का इशारा देते हुए,निकलने का मज़ा ही कुछ और है ! पैदल चलने वालों का चालान नहीं होता अतः निश्चिन्त रहें ! 
  • आपात स्थिति में, रास्ते से हटने के लिए सायरन बजाती एम्बुलेंस , के आगे अपनी गाडी को रखें और चलते जाएँ ! रास्ता साफ़  मिलता है  ! एम्बुलेंस में, जीवन से जद्दोजहद करते व्यक्ति से, कौन हमारा कोई रिश्ता है ? 
  • जगत माता के नाम पर, जागरण के लिए पैसे उगाहने के लिए कोई मना नहीं कर पायेगा ! फिर उस रात पूरे मोहल्ले के बच्चों को पढने मत दीजिये ! वृद्ध और बीमारों को नींद आये न आये , क्या फर्क पड़ता है  ?
  • शाम को पार्क में बैठ परिवार के साथ पिकनिक मनाइये और खाली बियर केन,चिप्स पैकेट प्लास्टिक थैली और बोतल वहीँ डाल दीजिये ताकि सनद रहे कि हम यहाँ बैठे थे  !

Sunday, November 28, 2010

जब हम जवान थे - सतीश सक्सेना

चले सावन की मस्त बहार
हवा में उठती एक सुगंध,
कि मौसम दिल पर करता चोट
हमारे दिल में उठे हिलोर,
किन्ही सुन्दर नैनों से घायल होने का दिल करता है !

किसी चितवन की मीठी धार
किसी के ओठों की मुस्कान
ह्रदय में उठते मीठे भाव
देख के बिखरे काले केश
किसी के दिल की गहरी थाह नापने का दिल करता है !

किसी के मुख से झरता गान
घोलता कानों में मधुपान,
ह्रदय की बेचैनी , बढ़ जाए
जान कर स्वीकृति का संकेत
कहीं से लेकर मीठा दर्द, तड़पने का दिल करता है !

कहीं नूपुर की वह झंकार ,
कहीं कंगन की मीठी मार
किन्ही नयनों से छूटा तीर
ह्रदय में चोट करे, गंभीर !
कसकते दिल के गहरे घाव दिखाने का दिल करता है !

झुकाकर नयन करें संकेत ,
किसी के मौन ह्रदय की थाह
किसी को दे डालो विश्वास
कहीं पूरे कर लो अरमान !
किसी की चौखट पर अरमान लुटाने का दिल करता है !


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