Friday, March 12, 2010

प्रणय निवेदन - I - सतीश सक्सेना

बरसों पूर्व लिखा गया यह एक लयबद्ध प्रेमपत्र, युवाओं को समर्पित है  !

प्रथम प्यार का प्रथम पत्र 
है,भेज रहा मृगनयनी को !
उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में 
अर्पित, प्रणय संगिनी को !
इस आशा के साथ कि
समझें तड़प हमारे प्यार की !
प्रेयसि पहली बार लिख रहा, चिट्ठी तुमको प्यार की  !

अक्षर बन के जनम लिया 

है मेरे दिल के,भावों  ने !
दबे हुए,जो बरसों से थे 
लिखा उन्हीं  अंगारों ने !
शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , 
भाषा  ह्रदयोदगार  की  !
झुकी नज़र को इक पन्ने पर, भेंट हमारे प्यार की !

तुम्हे दृष्टिभर  जिस दिन 
देखा था सतरंगी रंगों में,
भूल गया मैं , रंग पुराने
भरे हुए थे ,  यादों  में !
उसी समय से,पढनी सीखी , 
गीता अपने,  प्यार की  !
प्रियतम पहली बार गा रहा,मधुर रागिनी प्यार की !

मुझे याद वे शब्द तुम्हारे
ह्रदय पटल पर लिखे हुए 
दुनिया वालों की नज़रों से
कब के दिल में छिपे हुए 
निज मन की बतलाऊं कैसे 
बाते हैं , अहसास की !
न जाने क्यों आज उठ रही, तड़प हमारे प्यार की !

अगला भाग पढ़ने के लिए प्रणय निवेदन - II पर क्लिक करें !

43 comments:

  1. प्रथम प्यार का प्रथम पत्र है
    लिखता निज मृगनयनी को
    उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
    अर्पित , प्रणय संगिनी को .nice

    ReplyDelete
  2. आज स्वप्न में, देख तुझे
    झंकार उठे वीणा के स्वर
    शायद जैसे तुमने मुझको
    याद किया , अंतर्मन से ,
    जैसे तड़प उठी हो सजनी , करके यादें प्यार की !
    लगता पहली बार महकती बगिया अपने प्यार की !

    पूरा गीत दिल को छू गया । और आखिरी पँक्तियाँ लाजवाब मगर कुछ बताने की जरूरत नही गीत बहुत कुछ कह रहा है। बधाई इस गीत के लिये और शुभकामनायें

    ReplyDelete
  3. शब्द नहीं लिखे हैं इसमें

    क्या कहना है.....इस के अलावा प्रेम में और कहा भी क्या जा सकता है.एक विदेशी वामपंथी आलोचक हुए हैं काडवेल उन्हों ने कहा था जो प्रेम कि कविता नहीं लिख सकता तो वह क्रान्ति की भी कविता नहीं लिख सकता.
    आप कामयाब कवि हैं भाई साहब.

    ReplyDelete
  4. अक्षर बन के जनम लिया
    है मेरे दिल के , भावों ने
    दवे हुए जो बरसों से थे
    भड़क उठे , अंगारों से
    शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , भाषा ह्रदयोदगार की !
    आशा है स्वीकार करोगी ,चाहत अपने प्यार की ! प्रेम निवेदन के भाव को ंशब्दों में सजा दिया, सच में किसी को लिखे थे क्या...

    ReplyDelete
  5. satishjee bahut pyara geet likha hai aapne...........

    तुम्हे द्रष्टि भर , जिस दिन
    देखा उन सतरंगी रंगों में ,
    भूल गया मैं रंग पुराने
    भरे हुए थे , स्मृति में
    उसी समय से पढनी सीखी , गीता अपने प्यार की !
    प्रियतम पहली बार गा रहा मधुर रागिनी प्यार की !

    देखा उन सतरंगी रंगों में ,
    भूल गया मैं रंग पुराने

    pyar ke alava duniya me rakha kya hai.
    kabhee kabhee ye chota mota bichoh ahsaaso ko ubharane me sahayak hota hai..........:)
    dekhiye huee na acche geet kee rachana.............
    भरे हुए थे , स्मृति में
    उसी समय से पढनी सीखी , गीता अपने प्यार की !
    प्रियतम पहली बार गा रहा मधुर रागिनी प्यार की !

    ReplyDelete
  6. प्रथम प्यार का प्रथम पत्र है
    लिखता निज मृगनयनी को
    उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
    अर्पित , प्रणय संगिनी को

    बहुत सुंदर गीत है जी, देखा.. जवानी मे लिखे गये प्रेम-गीत बुढापे में कैसे काम आते हैं?:)

    रामराम.

    ReplyDelete
  7. जनाब !

    सतीश जी !
    बड़ी सुरमय लय और सहज अल्फाज की जुगलबंदी साथ नायक के हृदय में नायिका की अनुभूति क्या मायने ले सकती है वो अपने रोचक और गुदगुदाने वाले अंदाज में पेश किया है / उम्र का तकाजा वक्ती दुश्वारी बने तो भी कवी हृदय तो सदासय ही होता है जो लफ्जो के जरिये अपना अंदाज नुमाया कर ही देता है / बंदगी तो किसी चौखट की आपने तब की होगी मगर जुबान ने साथ आज की तारीख में दिया है /
    पुनश्च , लफ्जो के जरिये जो वीणा के तार आपने तरंगित किये है वो निः संदेह हर चुके हुए दिल की जुबान है लिहाजा अफ़सोस किस निस्बत कि कविता केवल युवाओं को समर्पित है /
    सुन्दर और सहज शब्दों में अपने मनोभावों को दर्शाने का शुक्रिया !शुक्रिया !शुक्रिया !

    ReplyDelete
  8. स्नेह की सहज, सुन्दर अभिव्यक्ति।
    बधाई।

    ReplyDelete
  9. इस आशा के साथ , कि समझें भाषा अपने प्यार की ,
    प्रेयसि पहली बार लिख रहा, चिट्ठी तुमको प्यार की !
    बहुत बढ़िया भाव .... प्रेमिका को पहली चिठ्ठी प्यार की ...

    ReplyDelete
  10. आपकी रचना रजनीगन्धा के सुवासित फूलों की तरह लगी ..जिनकी मादक सुगंध मन मोह लेती है

    ReplyDelete
  11. भाई सतीशजी, इतनी लम्‍बी पाती, वो भी पहली बार? या तो प्रेयसी निहाल हो गयी होगी या फिर निढाल हो गयी होगी। सारा दिल एक साथ ही निकाल कर रख दिया। बेहद मधुर और दिल को छूने वाली रचना। सम्‍भाल कर रखिए हमारे यहाँ कई युवा है, चोरी ना कर लें। बधाई।

    ReplyDelete
  12. Satish ji,
    Bahut hi sundar giit.
    padh kar hi jhurjhuri aa gayi.
    kaya din the ve.......
    kaya din hain ye......

    ab pata chala kii chitthiyan likh
    likh aapne bhi khub fadi hai:)

    shubhkamnayen.................

    ReplyDelete
  13. बस भाव ही भाव है यहाँ शब्द तो दीखते ही नहीं -प्रेमिक अनुभूति की शायद ऐसी ही शब्दहीन भाषा होती हो सीधे दिल में उतरती चली जाने वाली !

    ReplyDelete
  14. अरे सतीश भईया मुझे तो पता ही नहीं आप इतनी अच्छी कविताएं भी लिखते हैं , लाजवाब ।

    ReplyDelete
  15. शब्द नहीं हैं मन के भाव उड़ेले हैं । ईश्वर करे आपके भावों को सतत अभिव्यक्ति मिलती रहे ।

    ReplyDelete
  16. प्रेम ही सच्‍चाई और सच्‍चाई ही पूजा और पूजा ही प्रेम।

    ReplyDelete
  17. प्रथम प्यार का प्रथम पत्र है
    लिखता निज मृगनयनी को
    उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
    अर्पित , प्रणय संगिनी को
    बहुत सुंदर भाव लिये है आप का यह पहला प्रेमपत्र, आप ने इस मै भाव को शव्दो का रुप दे दिया.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  18. सतीश जी ,
    श्रृंगार रस की उत्तम कृति ,
    बहुत सुंदर,
    अक्षर बन के जनम लिया
    है मेरे दिल के , भावों ने
    दवे हुए जो बरसों से थे
    भड़क उठे , अंगारों से
    शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , भाषा ह्रदयोदगार की !
    वाह!

    ReplyDelete
  19. गली गली में चर्चा चलती सजनी अपने प्यार की !
    लिख लिख बारम्बार फाड़ता, चिट्ठी तेरे नाम की !
    यह पाती भिजवा ही दें वर्ना यही कहना पडेगा
    काश यह पाती
    मैं भिजवाता
    और
    वह पाती

    ReplyDelete
  20. बेहतरीन लिखा आपने ...खूबसूरत रचना !!
    ______________

    "पाखी की दुनिया" में देखिये "आपका बचा खाना किसी बच्चे की जिंदगी है".

    ReplyDelete
  21. प्रथम रागिनी प्यार की , बड़ी मधुर लगी ।
    दिल ज़वान तो हम ज़वान।

    ReplyDelete
  22. वाह, आप तो वर्षों पहले भी यही धार रखते थे !

    ReplyDelete
  23. अक्षर बन के जनम लिया
    है मेरे दिल के , भावों ने
    दवे हुए जो बरसों से थे
    भड़क उठे , अंगारों से
    शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , भाषा ह्रदयोदगार की !
    आशा है स्वीकार करोगी ,चाहत अपने प्यार की
    बेहद खूबसूरत गीत..निसंदेह.

    ReplyDelete
  24. सक्सेना जी
    नमस्कार
    आपकी रचना में
    बहुत अच्छे भाव है.
    - विजय तिवारी ' किसलय

    ReplyDelete
  25. प्रथम प्यार का प्रथम पत्र है
    लिखता निज मृगनयनी को
    उमड़ रहे जो भाव, ह्रदय में
    अर्पित , प्रणय संगिनी को

    Behad Sundar geet itana anupam patra paane wali ko bhi bahut bahut baadhaiya jinake prem ne itana sundar srajan karwadiya aapse.
    Padanane ke liye dhanywaad.

    ReplyDelete
  26. dhanyewad sir..aap mere blog par aaye aur apni amulye tippani di..jiske maadhyam se me bhi aap tak pahuch saki aur aapko padhne ka mauka mila..bahut acchhi poem likhi hai..har shabd sundar mala me gutha hua..ek dam perfect kavita.
    badhayi.

    ReplyDelete
  27. सतीश जी, गीत की हर पंक्ति...
    अपने आप में मुकम्मल हो गई हैं....
    बहुत कुछ कहा जा सकता है...
    लेकिन सबका सारांश...यही है...
    लाजवाब...बह्त खूबसूरत..

    ReplyDelete
  28. Behatreen rachna ke liye badhai.. Main kyoon is tarah nahin likh pata??? :(

    ReplyDelete
  29. 'अक्षर बन के जनम लिया
    है मेरे दिल के , भावों ने '
    ----
    मन में आता है बतला दूं , सबको बातें प्यार की !
    लगता सारा गगन पढ़ रहा ,पोथी अपने प्यार की !
    वाह!वाह!!
    बरसों पूर्व बहुत ही सुन्दर प्रेम गीत लिखा गया था !
    क्या बात है!
    प्रेम भावों की बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति.

    ReplyDelete
  30. बहुत ही ख़ूबसूरत भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार गीत लिखा है जो काबिले तारीफ है! बहुत बढ़िया लगा! इस बेहतरीन पोस्ट के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

    ReplyDelete
  31. कोई जवाब नही लयबद्ध और भावपूर्ण भी...बढ़िया प्रेम गीत..एक पत्र में सारी भावनाएँ सिमट कर आ गई...क्या लेखनी है सतीश जी बहुत बहुत धन्यवाद....

    ReplyDelete
  32. इस विलक्षण रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें...शब्द किस ख़ूबसूरती से भावों में पिरोये हैं की पढ़ कर बरबस मुंह से वाह वा निकल रही है...
    नीरज

    ReplyDelete
  33. सतीश जी
    नमस्कार ,
    कबीरा अन्योनास्ति पर आगमन के लिए आप का हार्दिक धन्यवाद ,
    आप की जानकारी के लिए बतादूँ की मैं प्रवीण जी नहीं हूँ प्रवीण जी से संभवतः आप का आशय प्रवीण शुक्लाजी से है वेदिल्ली से हैं ,मैन्फैज़बाद यु पि से हूँ|
    मुझे आप 'कबीरा ''के नाम से संबोधित कर सकतेहैं | आजकल इन्टरनेट से दूर हूँ संभवता सेप्टेम्बर से २३ फरबरी सें नेट कटा हुआ है इसी कारन से आप डेट नहीं है \
    पुनः धन्यवाद

    ReplyDelete
  34. प्राणों से प्यारी से शादी....मैंने प्यार किया...

    सात साल बाद....मैंने प्यार क्यों किया...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  35. आपके प्रथम प्यार का प्रथम पत्र बहुत भाया ।
    अक्षर बन के जनम लिया
    है मेरे दिल के , भावों ने
    दवे हुए जो बरसों से थे
    भड़क उठे , अंगारों से
    शब्द नहीं लिखे हैं इसमें , भाषा ह्रदयोदगार की !
    आशा है स्वीकार करोगी ,चाहत अपने प्यार की !
    वाह वाह !

    ReplyDelete
  36. बहुत बहुत सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  37. अरे वाह सतीश जी!! आपका ये पक्ष तो पहली बार देखा! सुन्दर रचना. बधाई.

    ReplyDelete
  38. प्रेम की प्रथम पाती बिलकुल इसी तरह होती है ।

    ReplyDelete
  39. ऐसा लगता हैं जैसे आपने मेरा भूतकाल मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया है ,आगे कुछ कहते नहीं बन रहा है ,बस ..." भीग जाती हैं पलके तन्हाई मैं ,कांप उठता हूँ दर्द मेरा कोई जान न ले . और भी डरता हूँ ऐसे मैं ,मेरी आँखों मैं उसे देख कर कोई पहचान ना ले ".

    ReplyDelete
  40. ऐसा लगता हैं जैसे आपने मेरा भूतकाल मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया है ,आगे कुछ कहते नहीं बन रहा है ,बस ..." भीग जाती हैं पलके तन्हाई मैं ,कांप उठता हूँ दर्द मेरा कोई जान न ले . और भी डरता हूँ ऐसे मैं ,मेरी आँखों मैं उसे देख कर कोई पहचान ना ले ".

    ReplyDelete
  41. आपकी रचना रजनीगन्धा के सुवासित फूलों की तरह लगी ..जिनकी मादक सुगंध मन मोह लेती

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,