आज कल कुछ जगह हमारे कुछ शास्त्रार्थ पंडित एक दूसरे की हजारों वर्षों पुरानी आस्थाओं को अपनी आधुनिक निगाह से देखते हुए, जम कर प्रहार कर रहे हैं ! चूंकि दोनों पक्ष विद्वान् हैं अतः शालीनता भी भरसक दिखा कर अपने अपने जनमत की वाहवाही लूट रहें हैं !
पुराने धार्मिक ग्रंथों में समय समय पर लेखकों अनुवादकों की बुद्धि के हिसाब से कितने बदलाव हुए होंगे फिर भी पूर्वजों और पंडित मौलवियों के द्वारा पारिभाषित ज्ञान को बिना विज्ञान की कसौटी पर कसे, हम इज्ज़त देते हैं और उसमें ही ईश्वर को ढूँढ़ते रहते हैं और निस्संदेह हमें फल भी मिलता है !
ईश्वर चाहें उसके कितने ही नाम क्यों न हो अपने विभिन्न रूपों में हमारी आस्था का केंद्र रहा है और हमें शक्ति देता रहा है ! मगर यह कौन सी भावना और ज्ञान है जिसमें हम दूसरे घर की पूजा पद्धति को गालियाँ दें जिससे हमारा कुछ भी लेना देना नहीं !
यह विशुद्ध द्वेष और मूर्खता परोस कर हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं ??



28 comments:
एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !
- सतीश सक्सेना