Thursday, March 25, 2010

हिजड़े - क्या आपने कभी इनके बारे में सोचा है ? -सतीश सक्सेना

सवाल रोटी के इंतजाम का ...??
                  शादी विवाहों और ख़ुशी के अवसरों पर,  अकसर मनचाहे पैसे न मिलने पर जबान  चलाते हिजड़े आपको अवश्य याद होंगे ! हर ५-१० वर्षों में इन अवसरों पर अक्सर इनके द्वारा की गयी बेहूदगियों से  आपका मन भी अवश्य खराब हुआ होगा ! मगर क्या आपने कभी इनके बारे में सोचने के लिए अपना वक्त दिया है ?
                  अक्सर मैं भिखारियों को पैसा नहीं देता , हमारे देश में यह अब संगठित व्यवसाय बन चुका है , अतः मैं इस उद्योग की कोई मदद नहीं करता और चिल्लर गाड़ी में नहीं रखता ! मगर यदि मुझे कोई हिजड़ा, चौराहे पर भीख मांगता दिख जाये तो मैं उसे भीख न देकर, १०-५० रुपये तक की मदद हमेशा करने की कोशिश करता हूँ !
                    परमपिता परमात्मा से भी उपेक्षित, शारीरिक विकलांगता से ग्रसित यह इंसान ,पुरुष और  महिला वर्ग में न होने के कारण, जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए मजबूर है  ! शायद यही एक वर्ग ऐसा है जिसे परिवार से लेकर, बाज़ार तक भी कहीं कार्य नहीं दिया जाता  ! पूरा समाज  इन इंसानों की जो मज़ाक उड़ाता है  वैसा जानवरों  के साथ भी नहीं होता  ! क्या आपने कभी सोचा हैं कि .....
  • इन्हें हम  घर में नहीं घुसने देते और इनसे बिना दोष, नफरत करते हैं ! भिखारियों को खाना देते समय तक , हम इन्हें खिलाने की कल्पना तक नहीं करते ! समाज में गरीबों और भूखों को खाना खिलाने  में , पुण्य मिलने की बात कही गयी है ! मगर हिजड़ों को खाना खिलाते, आपने किसी को नहीं देखा होगा !   
  • इन्हें कोई मजदूरी का कार्य नहीं मिलता अतः आपने किसी दुकान ,माल में भी इन इंसानों को काम करते नहीं देखा होगा  ! 
  • शरीर के अस्वस्थ होने की स्थिति में, इनका इलाज़ कौन करेगा  ? समाज में हिकारत की द्रष्टि से देखे जाते यह लोग , बीमारी की स्थिति में अच्छे प्राइवेट डाक्टर की सुविधा से लगभग वंचित हैं  ?
  • किसी इंस्टीटयूशन में पढाई हेतु दाखिला इनके लिए एक स्वप्न ही है ? अच्छे परिवार के बच्चों के मध्य यह मानसिक विकलांग बच्चे, किसी कालेज में शिक्षा ले सकें, आधुनिक भारत में  अभी यह केवल एक कल्पना मात्र ही है !  
  • किसी मंदिर में इनके लिए विधिवत पूजा का कोई प्रावधान नहीं है ! अतः अक्सर इनकी  ईश आराधना एवं पूजा कार्य, अपने घर में ही सीमित होती है शायद इसीलिए इनकी प्रथाएं एवं अनुष्ठान लगभग गोपनीय होते हैं ! 
  • अपने खुद के परिवार में इनका स्थान बेहद दयनीय है  ! अक्सर परिवार के लोग, यह बताते हुए शर्मिंदा महसूस करते हैं कि यह उनके परिवार में पैदा हुए हैं ! अतः जन्म से लेकर म्रत्यु तक अपने परिवार, समाज से लगभग कटे रहते हैं !  
  • सामाजिक स्थल जैसे पार्क,रेस्टोरेंट, कम्यूनिटी सेंटर, स्टेडियम, आदि में, आम व्यक्तियों  के साथ इन्हें हिस्सा नहीं लेने दिया जाता  ? सामान्य जन के लिए बनाए पब्लिक स्वीमिंग पूल में कोई हिजड़ा स्नान करने की सोंच ही नहीं सकता !
              इन अभागों का पूरा जीवन, अपने लिए रोटी और बुढ़ापे के इंतजाम करने में बर्बाद हो जाता है ! पहले किसी जमाने में नवाबों,सुल्तानों ने इन्हें सिर्फ हरम की चौकीदारी के लिए ही योग्य पाया था या फिर ये लोग सिर्फ नाच गाने कर अपना पेट पालते थे ! आज समय के साथ, इनके यह दोनों काम भी ख़त्म हो गए ! अब जब दूसरों की खुशियों , शादी विवाह जैसे मौकों पर, अपना पारंपरिक कार्य नाच गाने का आयोजन करने का प्रयत्न करते हैं तो हम लोगों को लगता है कि  धन उगाहने के लिए, यह अनचाहे मेहमान यहाँ क्यों कर आगये !
             अधिकतर ऐसे मौकों पर यह लोग धन की मांग करने के लिए घेरा बंदी करते हैं ! इनकी दलील रहती है कि और किसी मौकों पर, उन्हें किसी प्रकार का धन नहीं दिया जाता अतः शादी अथवा बच्चा पैदा होने की ख़ुशी  में ही दानस्वरूप उचित पैसा मिलना ही चाहिए जिससे कि वे अंत समय तक के लिए, कुछ आवश्यक धन बचा सकें ! और अक्सर इसी कारण लोग इन्हें और भी हिकारत की  नज़र से देखते हैं !
            अफ़सोस है कि सरकार ने भी इनके पुनर्वासन के लिए अभी तक समुचित ध्यान नहीं दिया है !
कृपया बताएं , यह रोटी कहाँ से खाएं  ??

35 comments:

  1. सच कहा आपने। वैसे इनकी समस्याओं पर लिखता ही कौन है? वैसे एक लक्ष्मी जी है जो इनके लिए काफी कुछ कर रही हैं। पर उतना काफी नहीं है सरकारों को सोचना चाहिए इनकी समस्याओं पर। वैसे सुना है दिल्ली में इन्हें पैंशन मिलने लगेगी। कभी ऐसे ही विचलित होकर कुछ लिखा था अपने ब्लोग पर।

    ReplyDelete
  2. सर, आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है ,लेकिन मुझे लगता है कि इस मुल्क में प्राकृतिक हिजड़े बहुत कम होते है ,बल्कि ये जबरदस्ती बनाये जाते है . बहुत सारे जगहों पर ये समाज विरोधी कार्यों में लिप्त रहते है . और गैरकानूनी कामों में लिप्त पाए जाते है. मेरा मानना है कि पैदायशी हिजड़े कम होते है , बल्कि अपने व्यवसाय में लाने ले लिए ये बनाये जाते है. इनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जैसा की एक अपराधी के साथ होता है.

    ReplyDelete
  3. @अनाम ,
    मुझे बेहद अफ़सोस है कि शायद आपने बिना पढ़े ही, अपने विचार व्यक्त कर दिए हैं, आपको इसलिए छाप रहा हूँ कि यह मानसिकता भी लोग जान पायें !

    ReplyDelete
  4. bhai sahab aapne bahut hi achcha mudda uthaya.mujhe ek din in logon ne chakit hi kar diya.unka ek blog bhi hai.aadha sach ke nam se.lekin maine hamzabaan ardhnarishvar shirshak se poora sach k nam se uska link diya hai.

    really inke dard ki kalpna hi nahin ki ja sakti.

    ReplyDelete
  5. गुरुवार, २५ फरवरी २०१०
    लैंगिक विकलांगों को सेक्स का खिलौना बनाने के बौद्धिक प्रयास
    http://adhasach.blogspot.com/

    ReplyDelete
  6. अच्छा विषय उठाया है आपने सतीस जी ! इनका दर्द शायद ही कोई समझ सके ! किसी शुभ कार्य या दिन पर ही इन्हें अपनी आमदनी और पेत्भारने के जुगाड़ पर निर्भर रहना पड़ता है !

    विषय से हटकर एक गुस्ताखी करूंगा;
    मैं तो इनकी हरकतों को देखने के लिए रोज संसद समाचार सुनता हूँ :)

    ReplyDelete
  7. आपका सवाल व्यथित करता है. इस समस्या पर ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है.

    रामराम.

    ReplyDelete
  8. सतीश जी आपका कहना सही है ... पर कभी कभी इनके व्यवहार से दुख भी होता है .. पैसा वसूलने के नाम पर पर ये कुछ भी करते हैं और पैसे की डिमांड कभी कभी इतनी ज़्यादा होती है की आम आदमी के बस में नही होता ... मैने देखा है शादी ब्याहॉं पर १०-१५,००० तक की माँग करते हुवे ... अब पता नही ये कहाँ तक जायज़ है ...

    ReplyDelete
  9. जी हां सतीश जी, उनके दर्द की कल्पना नहीं की जा सकती. वैसे मेरा-तेरा से करने से हमें फ़ुरसत मिले तब न हम किसी मानवीय मुद्दे पर सोचें?
    ये सही है, कि इस वर्ग पर बच्चों को अपहृत कर उन्हें किन्नर बनाने के आरोप हैं, अपराधों में लिप्त होने के भी आरोप हैं, लेकिन इन अपराधियों की सामान्य वर्ग के अपराधियों के सामने क्या औकात है? सारे स्तरीय अपराध तो सामान्य वर्ग ही कर रहा है.
    ये तो व्यक्तिगत और सामाजिक कुंठा और मिलने वाली हिकारत , दुत्कार के चलते अपराध की ओर प्रवृत्त होते हैं, सामन्य वर्ग क्यों अपराध कर रहा है?

    ReplyDelete
  10. saksena ji...aapki lekhni k prasang apki samvedensheelta batate hai...

    aur ye prasand...is mudde par kabhi itni gehrayi se maine bhi kabhi nahi socha tha...bas inke chehro ki musukurahat meri socho ko inke ander k dard tak kabhi le hi nahi ja payi.

    sach me aapne prashn jo uthaya he sochne par mazboor kar raha he..ab sochungi aur tab bataungi..

    ReplyDelete
  11. सतीश जी , पता नहीं पर ज्यादातर तो मस्त ही नज़र आते हैं।
    वैसे मैंने कभी इन्हें किसी भी ओ पी डी में इलाज़ के लिए खड़े नहीं देखा ।
    पता नहीं बीमार नहीं पड़ते क्या।
    लेकिन एक जगह इनकी भीड़ लगी रहती है --ए आर टी क्लिनिक में -- जहाँ एड्स का इलाज़ किया जाता है ।
    अब इसे क्या कहें। शायद हालात की मजबूरी या फिर बेहतर इंसानों की दरिंदगी।

    ReplyDelete
  12. @ सतीश सक्सेना


    सर, मैंने आपके लेख को पूरी तरह से ध्यान से पढ़ा है. आप भावनात्मक रूप में बात कर रहे है . तथ्यों में नहीं . आप क्या यह बता सकते है कि पैदायशी हिजड़े कितने होते है , और कितने मात्र बनाये जाते है . आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में मात्र १००० हिजड़े पैदायशी है , १५ लाख हिजड़े बनाये गए है . आप मात्र भावना में बह कर बात कर रहे है. इनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जैसा कि एक अपराधी के साथ होता है. आप क्या यह नहीं जानते कि वैश्यावृति में इनका बहुत बड़ा हाथ होता है , अवैध वसूली ,चोरी और लूट में ये लिप्त रहते है.

    ReplyDelete
    Replies
    1. mr / miss/ mrs anonymous - where did you get this data ? assumed ? discussed over a teacup with a gossipy friend ? why - the government census collectors don't even ask about the transgender .. they have only columns for "boys / girls" then how would they get the authentic data ? the parents are too scared of society to reveal - they oft discard the newborn child to the community of hijdas - then ?

      Even if they were FORCEFULLY MADE - then ? how does it make them eligible for prosecution ? if someone kidnaps a small kid and does a surgery to convert the child to that state, we should punish the child for it ???

      satish ji - thanks for this pot. i often think the same as you are saying . but don't find much i can do to change the situation .. :(

      Delete
    2. u r welcome sir - i am thanking u for having written this post at all - how many people would do it ?

      Delete
    3. hijade banaye kaise jate hai

      Delete
  13. निश्चित ही आपने एक अहम मसला उठाया है. तकलीफ होती है जब इस दृष्टिकोण से सोचिये किन्तु फिर जब इनके द्वारा अपने अधिकारों और मांगों के लिए ज्यादति की जाती है, जैसे शादी विवाह आदि अवसरों पर बेहिसाब अनुचित माँग (हम तो २१००० से कम में नहीं मानेंगे) और इसे पूरा कराने के लिए धमकी से लेकर बेइज्जत तक करने वाली बातों को देखकर अफसोस भी होता है.

    इसके बावजूद भी इनकी विकलांगता और मजबूरी निश्चित ही दिल दुखाती है.

    ReplyDelete
  14. सामाजिक विसंगति है । जगह सबकी होनी चाहिये समाज में ।

    ReplyDelete
  15. युरोप मै इन हिजडो को बिलकुल आम आदमी की तरह ही देखा जाता है यह यहां हम सब् की तरह स्कुल जाते है नोकरी करते है, यानि इन की कोई अलग पहचान नही, क्या हम यूरोप वालो से यह एक अच्छी आदत नही ले सकते, यह लोग भी हमारी तरह से इंसान ही तो है

    ReplyDelete
  16. main jo kahna chahti thi bhatiya ji ne kah dia..akhir kyon ham inhen samany jeevan ke haq nahi de sakte.

    ReplyDelete
  17. सतीश जी, वैसे तो तमन्ना जैसी फ़िल्में कुछ-कुछ बताती हैं इन बदकिस्मत लोगों के बारे में.. लेकिन अभी कुछ दिन पहले कुछ दोस्तों द्वारा बनाया गया एक ड्रामा काफी चर्चित रहा जो कि इनकी निजी जिंदगी में झांकता हुआ सा था और उसमे कई दृश्य रुला देने वाले थे. कैसे पैदा होने पर इन्हें घर से निकाल कर किसी किन्नर समुदाय को दे दिया जाता है और कैसे मर जाने पर इनकी लाश को पीटा जाता है कि दोबारा इस रूप में ना जनम लेवें. ये भी सोचनीय है कि मरने पर इन्हें जलाते हैं या दफनाते क्योंकि कभी किसी किन्नर को मरते या उसे जलाते या दफनाते ना देखा ना सुना सिवाय उस नाटक के. अभी नाम नहीं याद आ रहा.. याद आने पर ब्बतौंगा जरूर क्योंकि किन्नरों के जीवन पर बनाया गया वो नाटक कई सवाल क्खाड़े करता है और कईयों के जवाब भी देता है.. अफ़सोस कि इनके नाम को ही एक गाली बना दिया गया है.

    ReplyDelete
  18. आपने मुद्दा तो अच्‍छा उठाया है लेकिन समाज में परिवर्तन लाना यह भी एक समस्‍या है। अक्‍सर देखने में आता है कि परिवर्तन वहीं होता हैं जब पीड़ित व्‍यक्ति के द्वारा क्रांति का सूत्रपात होता है। पूर्व में इनकी संख्‍या इतनी कम थी कि इनका पोषण गाँव वाले कर देते थे। लेकिन आज ये भी संगठित हैं और केवल पैसा कमाने के तरीकों पर ही काम करते हैं। जिस दिन इनमें स्‍वयं ही इच्‍छा शक्ति जागृत नहीं होगी तब तक ये समाज की मुख्‍यधारा में नहीं मिल सकेंगे। ये भी भिखारियों की तरह ही संगठित व्‍यवसायी हो गए हैं। यह भी अंदेशा है कि ये भी अपने व्‍यवसाय को बढ़ाने के लिए बच्‍चों का अपहरण कर उन्‍हें अपने जैसा बनाते हैं। इसलिए भिखारी को पैसा नहीं देना और इन्‍हें देना कुछ समझ नहीं आता है।?

    ReplyDelete
  19. आपने मुद्दा बहुत सही उठाया है...पर अब तो ये चुनाव में निर्वाचित हो कर भी आ रहे हैं...लेकिन आवश्यकता है समाज में इनको सामान्य इंसान समझने की...लेकिन बदलाव आसानी से नहीं होता...उसके लिए इन जैसे लोगों की इच्छा शक्ति और संवेदनशील व्यक्तियों को मिल कर ही कुछ करना होगा ..
    जिन बातों पर आपने ध्यान दिलाया है वो नि:संदेह विचारणीय हैं

    ReplyDelete
  20. bilku sach,
    jahan kisi ka dhyan nahi jata.

    ReplyDelete
  21. सतीश साहब ,
    सादर नमन ,
    आज ही मैं कोशिश करती हूँ कि इस बिरादरी के लिए कुछ करूँ ,खोजना पड़ेगा कि ये कहाँ रहते हैं?
    इलाज तो कर ही सकती हूँ ,वो भी नफरत से नहीं पूरे प्रेम से

    ReplyDelete
  22. bahut achha ...aap dil se bahut bhauk ho gaye ha. bahut se logon ne ise bhi bijnes bana liya ha. aaye din khabro ma ata hi rahta ha ki farji hijde pakde gaye .. is liye jara dhyan rakhna ki kabhi koi aapka dil na tod de.

    ReplyDelete
  23. @अनाम भाई !
    आपने रूचि लेते हुए दुबारा कमेंट्स दिया , अच्छा लगा ! अपने जा डाटा दिए हैं उसके बारे में मुझे अधिक ज्ञात नहीं की यह सर्वे कितना ठीक हुआ होगा ! मगर मैंने इनका सिर्फ मानवीय पक्ष उजागर करने का प्रयत्न किया है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है , परिस्थितियों वश जो कार्य यह करने को मजबूर हैं उनकी बात मैंने यहाँ नहीं उठाई है ! आप अगर मेरे नज़रिए से इस लेख को पढेंगे तो लेख के साथ न्याय होगा ऐसा मेरा मानना है !
    आपने इस टिप्पणी में ऐसी कोई बात नहीं राखी जो आपतिजनक हो फिर अनाम क्यों ??
    आप अगर अपने नाम से आते तो मुझे बेहद अच्छा लगता , ९८११०७६४५१ पर आप मुझसे बात कर सकते हैं !
    सादर

    ReplyDelete
  24. अरे वाह सतीश जी.. आपने बहुत गंभीर मुद्दे पर कलम चलाई है... वाकई इनकी हालत बहुत सोचने लायक है.. अब तक हमने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं.. आपके जज्बे को सलाम.. लेकिन ये भी सच है, कि शादी-ब्याहों में कई बार ये ज़रूरत से ज्यादा मजबूर कर देते हैं.. वैसे मानवीय पक्ष बहुत बढ़िया है...

    ReplyDelete
  25. आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
    हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

    ReplyDelete
  26. satish sir aapki bhavnao ki izzat karta hu par ye sari baatein kehne sunne me hi achhi lagti he vyavhaar me nahi sach to ye hai ki koi aisa apradh nahi he jo inse bacha hua ho,sirf rape ko chad kar kyun ki iske liye vo bane nahi he,in the current time trains me inke dwara ki jane wali wasooli se adhiktar passengers pareshan rehte hain,shadi me ye itni demand karte he ki itna paisa dena bhari pade,so moral of story that aapne achha mudda uthaya par ye log itni daya ke haqdar nahi jitna aapna likha he, plz dont mind,this is my personal openion i didnt mean to heart anybody.

    ReplyDelete
  27. hello sir, abhi to mai jyada kuch nhi bol paunga kyunki mai prepare nhi hu bt mai apni tip jrur dunga, ye ek aisa mudda hai jo kafi sensitive hai,aur kuch logo k liye incurable bhi shayad.....

    ReplyDelete
  28. sir me inke lie kuch kam karina chita hi...
    ple.con.number.9922961847

    ReplyDelete
  29. पंजाबी भाषा की एक नामचीन लेखिका ने अपने घर में एक किन्नर को डोमेस्टिक हेल्प के रूप में अपने परिवार के सदस्य की तरह ही रखा था और उनका अनुभव बहुत अच्छा रहा था|

    वैसे 'अनाम' के नाम से जो कमेंट्स हैं, वो भी मेरी नजर में गलत नहीं है|

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना