Monday, April 7, 2014

मूर्खों को हर बार,चेताना पड़ता है ! -सतीश सक्सेना

जीवन में कितना, पछताना पड़ता है !
गलती का भुगतान चुकाना पड़ता है !

राजनीति में, धन का धंधा होता है,
ऐसे क्यों हर बार ,बताना पड़ता है !

नाग देख के , कौवे  शोर मचाते हैं !
मूर्खों को हर बार,चिताना पड़ता है ! 

हम पर हमले से पहले तो, सोचोगे !
बीच में अपने,राजपुताना पड़ता है !

रोटी,पानी,कपडे, दवा और दारु को  
उनको कितनी बार,सताना पड़ता है !

21 comments:

  1. जीवन भर कैसे, पछताना पड़ता है !
    कैसे बेमन समय, बिताना पड़ता है !

    nice lines....

    ReplyDelete
  2. सतीश सर , बहुत ही बेहतरीन रचना , एक अनूठा संगम हैं आपकी रचनाओं में , धन्यवाद ।
    नवीन प्रकाशन -: साथी हाँथ बढ़ाना !
    नवीन प्रकाशन -: सर्च इन्जिन कैसे कार्य करता है ? { How the search engine works ? }

    ReplyDelete
  3. दम घुट रहा होता है बिना धुँऐ के जहाँ
    सिगरेट बीड़ी का बहाना बनाना पड़ता है
    नये कपड़े की सोच कैसे बनाये कोई
    फटे बोरे में टल्ला बार बार लगाना
    बहुत ज्यादा जहाँ सुहाना लगता है :)

    बहुत उम्दा ।

    ReplyDelete
  4. haan ji sahi kaha ....kai baar jage huon ko bhi jagana padta hai

    ReplyDelete
  5. सटीक अभिव्यक्ति ...
    बहुत सुंदर...

    ReplyDelete
  6. बुल्ला की जाणा मैं कौन...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  7. जीवन है अनमोल स्वयं को रोज बताना पडता है ।
    कुछ आवश्यक छूट न जाए याद दिलाना पडता है ॥

    ReplyDelete
    Replies
    1. वाह …
      स्वागत है आपका !!

      Delete
  8. बहुत खूब...सुंदर...

    ReplyDelete
  9. हमेशा की तरह सटीक रचना !

    ReplyDelete
  10. सच को सच का भान कराना पड़ता है।

    ReplyDelete
  11. very right .! रामनवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

    ReplyDelete
  12. आपकी इस प्रस्तुति को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी मंगल पाण्डेय और हास्यकवि अलबेला खत्री - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete
  13. The fourth stanza is little difficult. I feel it is a buffer or shield available to politicians before taking any action against them. Other wise it is a fine poem. Regards.

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका स्वागत है :)
      - ग़ज़ल में हर शेर का एक दुसरे से लिंक रखना आवश्यक नहीं है ! हर शेर अपने आप में सम्पूर्ण होना चाहिए और विभिन्न परिस्थितियों और सोंच के हिसाब से उसका अर्थ भिन्न भिन्न होना चाहिये !
      - इस नाते आपका अर्थ भी फिट बैठता है और इसे परिवार में सोंचे तो अगर बहिन अपने स्नेही भाई की नाराजी से बचना चाहे तो पिता को ढाल की तरह उपयोग कर सकती है !
      सादर

      Delete
  14. जब चुनाव आयें भारत में
    नेताओं को घर घर जाना पड़ता है

    यथार्थवादी कविता..

    ReplyDelete
  15. नाग देख के , कौवे शोर मचाते हैं !
    मूर्खों को हर बार,चिताना पड़ता है !

    बहुत शानदार...

    ReplyDelete
  16. बहुत सही कहा आपने.

    रामराम.

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,