कई दिन बाद,आज सुबह, लम्बा दौड़ने का फैसला कर दौड़ते हुए 13.20 Km का फासला बिना रुके , बिना पानी के तय किया ! यह दूरी 1घंटा 36 मिनट में तय की गयी ! रनिंग के तुरंत बाद, बॉडी कूल डाउन के लिए लगभग 6 km तेज वाक किया ! अब लग रहा है कि जैसे काफी दिन बाद शरीर तरो ताजा और आत्मविश्वास से लबालब हुआ !
मेरा मानना है कि ६४ वर्ष की उम्र में कम से कम 64 प्रतिशत शरीर का क्षरण अवश्य हुआ है और मेरे शरीर का हर अंग की क्षमता भी उसी हिसाब से कम हुई होगी वह और बात है कि मैं अपनी मशीनरी को अधिकतर एक्टिव रखने में कामयाब हूँ सो मेरे शरीर की चुस्ती और स्टेमिना, उम्र के हिसाब से कहीं अधिक है , यकीनन मैं बाद में बिस्तर पर लेटकर बीमारियाँ भोगने से काफी हद तक बचा रहूंगा !
बूढों को देखते ही,संभावित बीमारियों का टेस्ट कराने के लिए , अक्सर परिवारजन सलाह देते देखे जाते हैं , मुझे मेडिकल व्यवसाय से अधिक प्रभावी विज्ञापन आजतक देखने को नहीं मिले जहाँ बीमार होते ही पूंछा जाए कि दवा ले आये ? मतलब शरीर में जो बीमारी बरसों में पैदा हुई है वह गोली खाते ही ठीक हो जायेगी इसीलिए मेडिकल पढ़ाई की फ़ीस करोड़ों तक पंहुचती है क्योंकि उस धंधे में पैसों की कोई कमी नहीं , साठ से ऊपर का हर आदमी अपने जीवन भर की कमाई बचाए बैठा रहता है कि उसे देकर इलाज हो जाएगा उसे उससे आगे की सोंचना ही नहीं कि बाद में बचोगे कितने साल ?
हर शहर में मेडिकल टेस्ट लेब्स की भरमार है और एक एक लैब में रोज सैकड़ों टेस्ट सैंपल लिए जाते हैं कोई ज्ञानी यह समझने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या इस लैब में इतने टेस्ट करने की क्षमता और मशीनें भी हैं ? एक सामान्य टेस्ट करने में ही लगभग आधा घंटा लगता है पूरे दिन में एक तकनीशियन सिर्फ 12 टेस्ट कर पायेगा फिर यह रोज की 100 टेस्ट रिपोर्ट क्या मंगल वासियों द्वारा किये गए हैं ?
खैर ....दोस्तों से निवेदन है कि भारत डायबिटीज और ह्रदय रोगों की राजधानी बन चुका है, रोज जवान और असमय मृत्यु सुनने को मिलती है सो इनसे और मेडिकल व्यवसाइयों से बचने के लिए खुद को दौड़ना सिखाइए और जीवन का आनंद लीजिये !
सस्नेह सादर ..
आज की पंक्तियाँ जो गाते हुए दौड़ा ....
भाड में जाए धड़कन दिल की
कमर दर्द , कमजोर हड्डियां
मरना है तो , मरो सड़क पर
मगर आज हों, ब्रेक बैरियर !
लोग सोंचते होंगे कि यह किस्मत वाले वाले हैं कि इन्हें 64 वर्ष की उम्र में भी कोई बीमारी नहीं है , मगर यह सच नहीं है , सत्य है कि मुझे भी बीमारियाँ हैं और परेशान करने वाली बीमारियों हैं मगर मैं उन्हें याद ही नहीं रखता और न दवा खाता अन्यथा बचा जीवन कब का मेडिकल व्यापारियों की भेंट चढ़ गया होता !
मेरा मानना है कि ६४ वर्ष की उम्र में कम से कम 64 प्रतिशत शरीर का क्षरण अवश्य हुआ है और मेरे शरीर का हर अंग की क्षमता भी उसी हिसाब से कम हुई होगी वह और बात है कि मैं अपनी मशीनरी को अधिकतर एक्टिव रखने में कामयाब हूँ सो मेरे शरीर की चुस्ती और स्टेमिना, उम्र के हिसाब से कहीं अधिक है , यकीनन मैं बाद में बिस्तर पर लेटकर बीमारियाँ भोगने से काफी हद तक बचा रहूंगा !बूढों को देखते ही,संभावित बीमारियों का टेस्ट कराने के लिए , अक्सर परिवारजन सलाह देते देखे जाते हैं , मुझे मेडिकल व्यवसाय से अधिक प्रभावी विज्ञापन आजतक देखने को नहीं मिले जहाँ बीमार होते ही पूंछा जाए कि दवा ले आये ? मतलब शरीर में जो बीमारी बरसों में पैदा हुई है वह गोली खाते ही ठीक हो जायेगी इसीलिए मेडिकल पढ़ाई की फ़ीस करोड़ों तक पंहुचती है क्योंकि उस धंधे में पैसों की कोई कमी नहीं , साठ से ऊपर का हर आदमी अपने जीवन भर की कमाई बचाए बैठा रहता है कि उसे देकर इलाज हो जाएगा उसे उससे आगे की सोंचना ही नहीं कि बाद में बचोगे कितने साल ?
हर शहर में मेडिकल टेस्ट लेब्स की भरमार है और एक एक लैब में रोज सैकड़ों टेस्ट सैंपल लिए जाते हैं कोई ज्ञानी यह समझने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या इस लैब में इतने टेस्ट करने की क्षमता और मशीनें भी हैं ? एक सामान्य टेस्ट करने में ही लगभग आधा घंटा लगता है पूरे दिन में एक तकनीशियन सिर्फ 12 टेस्ट कर पायेगा फिर यह रोज की 100 टेस्ट रिपोर्ट क्या मंगल वासियों द्वारा किये गए हैं ?
खैर ....दोस्तों से निवेदन है कि भारत डायबिटीज और ह्रदय रोगों की राजधानी बन चुका है, रोज जवान और असमय मृत्यु सुनने को मिलती है सो इनसे और मेडिकल व्यवसाइयों से बचने के लिए खुद को दौड़ना सिखाइए और जीवन का आनंद लीजिये !
सस्नेह सादर ..
आज की पंक्तियाँ जो गाते हुए दौड़ा ....
भाड में जाए धड़कन दिल की
कमर दर्द , कमजोर हड्डियां
मरना है तो , मरो सड़क पर
मगर आज हों, ब्रेक बैरियर !



































