Thursday, November 20, 2008

स्वप्न में आयीं वामा सी, स्नेहमयी तुम कौन हो ? - सतीश सक्सेना

स्वप्न में आयीं वामा सी, 
स्नेहमयी तुम कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया, 
करुणमयी तुम कौन हो ?
बाल बिखेरे प्रेयसि जैसे, 
आँख में ममता माता जैसी
नेह भरा स्पर्श लिए तुम ,  
प्रकृति सुंदरी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

तपती धरती पर सावन की
बूँद गिरी हरियाली आयी
जैसे पतझड़ के मौसम में
अमराई भर आई हो !
ऐसे आईं तुम जीवन में
महक उठी दुनिया सारी
मैं निर्धन पहचान न पाऊँ ,
राजलक्ष्मी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

कितना समझाता हूँ मन को
पर असफल ही रहता हूँ
कैसा प्यार चाहता तुमसे
यह मुझको मालूम नहीं
कजरारी आँखों की भाषा
चातक के दिल की परिभाषा
निश्छल मन मैं जान न पाऊँ ,
राजनंदिनी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

दो गुलाब की पंखुड़ियों से 
प्यासे ओठों  को छू जाना 
तपते चेहरे को आंचल
से ढांक मधुरिमा पहुँचाना 
ऐसा प्यार तुम्हारा पाकर, 
इतना क़र्ज़ तुम्हारा लेकर 
मैं याचक पहचान न पाऊँ , 
प्रणय सुंदरी  कौन  हो   ??
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?   

Tuesday, November 11, 2008

प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ? -सतीश सक्सेना

शीतल मनभावन पवन बहे
बादल चहुँ ओर उमड़ते हैं !
जिस ओर उठाऊँ दृष्टि वहीं
हरियाली चादर फैली है !
मन में उठता है प्रश्न, 
पवन लहराने वाला कौन ?
बादलों के सीने को चीर बूँद बरसाने वाला कौन?

कलकल छलछल जलधार
बहे,ऊँचे शैलों की चोटी से 
आकाश चूमते  वृक्ष लदे   
स्वादिष्ट फलों औ फूलों से
हर बार, रंगों की चादर से , 
ढक जाने वाला कौन ?
धरा को बार बार रंगीन बना कर जाने वाला कौन ?

चिडियों का यह कलरव वृन्दन !
कोयल की मीठी , कुहू कुहू !
बादल का यह गंभीर गर्जन ,
वर्षा की ये रिमझिम रिमझिम !
हर मौसम की रागिनी अलग,
सृजनाने वाला कौन ?
मेघ को देख घने वन में मयूर नचवाने वाला कौन ?

अमावस की काली रातें 
ह्रदय में भय उपजाती हैं !
चांदनी की शीतल रातें, 
प्रेमियों को क्यों भाती हैं !
देख कर उगता पूरा चाँद , 
कल्पना शक्ति बढाता कौन ?
चाँद को देख ह्रदय में कवि के,मीठे भाव जगाता कौन ?

कामिनी की मनहर मुस्कान
झुकी नज़रों के तिरछे वार !
बिखेरे नाज़ुक कटि पर केश
प्रेम अनुभूति , जगाये वेश  !
लक्ष्य पर पड़ती मीठी मार , 
रूप आसक्ति बढाता कौन ?
देखि रूपसि का योवन भार,प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ?

Thursday, November 6, 2008

अपनी माँ को धुँधली यादों में ढूँढता बच्चा !

आदरणीय जे सी फिलिप शास्त्री का अनुरोध माँ पर लिखने का पाकर, बहुत देर तक सोचता रह गया !
क्या लिखूं मैं, माँ के बारे में ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता !

अपने बचपन की यादों में, उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता रहा हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !

मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....जो कभी नही लिखना चाहता था !
-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में , अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँको मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे ले गए मेरी माँ को ....

बस यही यादें हैं माँ की ......

Monday, November 3, 2008

सूनी दीवाली -सतीश सक्सेना

"लंदन में मेरी दुर्घटनाग्रस्त बेटी को जीवन में पहली बार यह त्यौहार अकेले मनाना पड़ा। ऊपर से इस बार यकायक लंदन में दीपावली की रात २-२ फीट हिमपात हो गया। ऐसे में उसे याद आई तो केवल माँ और अपनी उस दिन की वे स्मृतियाँ जब उसने मुझे सुनाईं तो सिवाय फफक फफक कर रोने के कोई शब्द मेरे पास नहीं था।"

उपरोक्त शब्द डॉ कविता वाचक्नवी के हैं, जिनके जरिये उन्होंने बिना प्रमुखता, दिए अपने मन की वेदना दीपावली के बारे में बताते हुए प्रकट की थी ! और यह वेदना उस दिन की चर्चा में बहुत कम लोगों ने नोट की थी ! मुझे अहसास हुआ जब फुरसतिया ने इस पर ध्यान न जाने की क्षमायाचना करते हुए कमेंट्स में प्रमुखता दी ! एक माँ से हजारों मील दूर लन्दन में इलाज़ करा रही इस बच्ची के लिए मेरी शुभकामनायें !

आज के इस व्यस्त माहौल में हम लोगों में संवेदना का महत्व कम होता जा रहा है, बल्कि अगर यह कहा जाए कि खत्म हो गया है तो भी शायद अतिशयोक्ति नही होगी !


मुझे याद है नवम्बर २००५ की दीपावली जब मेरा बेटा पहली वार अपने घर से हजारों मील दूर कैलिफोर्निया में पार्टी फंक्शन्स में ना जाकर अकेले कमरे में बैठ कर दीवाली पूजा कर रहा था ! वह चित्र देख कर दीवाली का सारा आनंद एक उदास रात में बदल गया था जो आज तक भुलाये नही भूलता है !

इस निर्दयी विश्व में अपनों के प्रति यह संवेदना और प्यार की अनुभूति ही जीवन का आधार है

Saturday, October 18, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली (पांचवां भाग) - सतीश सक्सेना

लेकर निर्बल की हाय पुत्र !
होगा जग में उद्धार नहीं,
अपने दिल पर रख हाथ देख
आत्मा को लज्जित पाओगे
लज्जित मन से क्यों काम करो 
गंगा सा निर्मल मन लेकर,
निर्बल का ऋण लेकर मन पर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वैष्णव जन कहलाये वह ही
जो कष्ट दूसरों का समझे,
पीड़ा औरों की निज मन में
महसूस करे, आगे आकर ,
सारे तीर्थों का सुख मिलता, 
सेवा निर्बल की करने में ,
अपने सुख की कामना लिए, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अन्याय सहन करने वाला
अन्यायी से भी पापी है,
न्यायार्थ दंड भाई को दो
यह कर्म ज्ञान है गीता का
अन्यायी बनकर जीने से, 
कुल कीर्ति नष्ट हो जाती है
केशव की बातें बिसरा कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वह दिन दिखलाओ महाशक्ति
जिसमें कोई न, प्रपंच रहे !
धार्मिक पाखण्ड समाप्त करो
वास्तविक साधू सन्यासी हों
जाती बंधन को काट मूल से, 
मुक्ति दिलाओ नरकों से
अपराध बोध लेकर मन में क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो जो
नष्ट , वर्ण-संकट कर दे !
अपने अपने कर्मानुसार,
मानव समाज का काम करे
खेलें रंग और गुलाल सभी, 
हर कौम गले मिलकर होली
औरों के लिए घृणा लेकर ! क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Wednesday, October 15, 2008

मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा !


"विनम्र  निवेदन हैं की हिन्दी ब्लोगिंग को साफ़ रखे । बहुत मेहनत की है बहुत से लोगो ने और आप के ये सब आलेख उन सब की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं । आप अल्पसंख्यक लोगों  के भक्त हैं सही हैं पर दुश चरित्र भक्त ना बने बस इश्वर से इतनी ही कामना हैं"

मुझे एक अनाम ने उपरोक्त सुझाव दिए गए हैं, इस प्रतिक्रिया में मुझे अल्पसंख्यक का  भक्त बताने के साथ साथ मेरे लेखों से दुखी होते हुए यह भी कहा कि मेरे लेख बहुतों की सालों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं !......यह विनती ऐसी थी कि मैं २-३ दिन तक सोचता रह गया कि लोगों ने किस कदर इस दुर्भावना को आपने दिल से लगा रखा है यहाँ तक कि व्यक्तिगत बना रखी है देश की यह ज्वलंत समस्या !

क्या इलाज़ है इसका :

-क्या कोई देशवासी आज फिर विभाजन की सोचने को भी तैयार है सिवाय हमारे दुश्मनों के ? क्या यह सम्भव है कि हम अपने इन छोटे भाइयों (या आप पड़ोसी कह लें), जो इसी देश की संतान हैं , को विवश कर पायें कि जो हम कहें वे वही मान लें !

- अगर हम बड़े भाई का फ़र्ज़ अदा करने का सोचें तो सबसे पहले अपने छोटे भाइयों के सर से, हर समय शक में जीने का भय उतारना पड़ेगा ! हमें उनकी परेशानियाँ , रिश्ते नाते, ध्यान में रखते हुए फैसले लेने होंगे ! दुनिया में कोई भी तीसमार खां कौम पैदा नही हो पाई जो किसी दूसरे समुदाय को ख़त्म कर दे ! ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं ! हाँ नफरत पाल कर रहते चले आए पड़ोसी समुदायों के बच्चे तक शैशव अवस्था से ही मरने मारने की बातें जरूर करने लगे ! और यह सब उन्ही के बुजुर्गों ने दिया !

-चंद उग्रवादियों और दहशतपसंदों की हरकतों का इल्जाम पूरी कौम के सर पर न डालने का फ़ैसला करना होगा ! और यह फ़ैसला करना होगा जनमानस को, इस सोच के साथ कि वे इस तरह का दूषित जहर फैला कर देश का सबसे बड़ा नुक्सान करने जा रहे हैं !

इतिहास गवाह है कि अधिकतर देशों का नुकसान दुश्मन के फौजों ने नही किया मगर आंतरिक फूट और ग्रहयुद्ध ने किया ! और सबसे अधिक मौतें बच्चों और कमजोरों की हूई ! ऐसे देशों की न केवल नस्लें तबाह हो गयीं बल्कि ३०-४० वर्षों के बाद भी वे अच्छे नेतृत्व तक के लिए मुहताज हो गए !

इस दुर्दशा को पहुंचाने वाले यही कमअक्ल लोग थे .....जो अपने आपको देशभक्त कहते हुए मुंह बजाते घूम रहे हैं, और जब इनकी बकवास सिरे चढ़ जायेगी, उस वक्त यह चूहे सबसे पहले अपने बिलों में घुस जायेंगे ! उस समय कमज़ोर पड़ते देश से इन्हे न अपना प्यार नज़र आएगा न धर्म !

आज आवश्यकता है कि हम इन नफरत फैलाते हुए, देश के दुश्मनों की पहचान करलें , ऐसे लोगों की किसी भी प्रकार की, तारीफ़ करना भी मेरी नज़र में सिर्फ़ अपराध है ! एक मूर्ख मगर घातक विचारधारा को किसी भी हालत में फैलने से रोकने के लिए, प्रयत्न करने से बड़ा पुण्य कार्य, मैं और नही मानता !

मगर दुःख है कि हमारे कुछ साथी अनजाने में ऐसे लोगों की पीठ थपथपाने में कोई कसर नही छोड़ते !
मैं अपने अल्पसंख्यक भाइयों से भी अपील करता हूँ, कि वे ग़लत बातों के खिलाफ खुलकर सामने आयें, 
उग्रवादियों और उनके मंसूबों का विरोध करें ! अन्य मजहब के खिलाफ लिखने या मज़ाक बनाने वालों का खुल कर विरोध करें ऐसा करके निस्संदेह अधिकतर लोगों का गुस्सा शांत होगा !

किसी भी धर्म की बखिया उधेड़ने का अधिकार किसी को नही है ! हजारों साल पहले अस्तित्व में आए धर्मों की व्याख्या आधुनिकता के नाम पर करने की इजाज़त किसी को नही होनी चाहिए ! मज़हब हमारी आस्था और श्रद्धा है, जो हमारे बुजुर्गों ने निर्देशित किया है, उस पर किसी और की व्याख्या, सिर्फ़ उसकी कमअक्ली है और कुछ नहीं !

क्या आपके पाठक कम हैं ? एक चेक लिस्ट -सतीश सक्सेना

                                 अपने ब्लाग पर आपका परिचय क्या संदेश दे रहा है ? कहीं ऐसा तो नही कि आप के परिचय से यह झलकता हो कि आप इस देश के सबसे बड़े विद्वान् हैं तो आप यह जान लें कि ब्लाग जगत पर लिखने वाले लोग एक से एक शानदारव्यक्तित्व वाले लोग हैं जो आपके ब्लाग को देख कर ही समझ जायेंगे कि वे एक  नासमझ , जो अपने आपको विद्वान् मानता है, को पढ़ रहे हैं ! यकीन मानिए दोबारा पढने के लिए वे आपके ब्लाग पर फिर कभी नहीं आयेंगे !

                              कहीं आप अपने लेखों में , जिसमें  क्लिष्ट शब्दों का उपयोग अधिक हुआ हो, का प्रयोग अधिक तो नही करते  ?

                              क्या आपके ऐसे मित्र हैं जिनसे अपने ब्लाग के बारे में बेवाक कमेंट्स ले सकें , कि आपके ब्लाग पर कमेंट्स कम क्यों आते हैं  ?

                              क्या आपके पास ईमानदार मित्र हैं जो आपकी आपके मुंह पर आलोचना कर सकें , या आपने सिर्फ़ तारीफ करने वाले मित्रों को ही अपना शुभचिंतक बनाया है , अगर ऐसा है तो आप विद्वान् होने के बावजूद बहुत शीघ्र अपने आपको अवसाद में पाएंगे !
                            आपके ब्लाग का रंग संयोजन आंखों को चुभता तो नही है ?

                            क्या आप मन में किसी विचारधारा ( पार्टी, जाति , नारी, पुरूष, इत्यादि ) के प्रति नफरत तो नही फैला रहे हैं ? अगर ऐसा है तो याद रखें गुस्सा और नफरत की ये चिंगारियां अगर आप बिखेर रहे हैं तो यह आपके परिवार को अवश्य प्रभावित करेंगी ! कृपया इतिहास का एक उदाहरण सोच कर देखे कि नफरत से क्या हासिल हुआ ! जो नकारात्मक सोंच आप उत्सर्जित कर रहे हैं उसका असर आपके परिवार पर क्या पड़ेगा ?  अधिकतर  यह नफरत भरे लेख ,व्यक्तिगत मामलों में, अपने अनुभव के कारण लिखे जाते हैं या विषद विषय पर अनुभवहीनता के कारण , कि आप उस विषय को अधिक जानते ही नहीं !

Tuesday, October 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम !(अंतिम भाग ) - सतीश सक्सेना

परनिंदा और कटु शब्दों का
बेटी त्याग हमेशा करना !
संयम रख अपनी वाणी पर  
घर में कभी अनर्थ न करना
अगर क्रोध में सौम्य रहीं तो,
बेटी साध्वी बनी रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

ऐसा कोई शब्द ना बोलो
दूजा मन आहत हो जाए
तेरी जिह्वा की लपटों से
अन्य ह्रदय घायल हो जाए
चारों धामों पर जाकर भी,
मन में शान्ति नही पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कभी न भूलो बेटी ! तुमने ,
जन्म लिया है मानव कुल में
कुछ विशेष वरदान हमारे ,
कुल को दिए विधाता ने ,
ज्ञान असीमित लेकर बेटी, 
तुम भविष्य निर्माण करोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

ज्ञान तुम्हारा सार्थक होगा
घर बाहर दोनों जगहों में
आशीषों के ढेर लगेंगे ,
जब परिवार तुम्हारे में !
परहित साधक बनो लाडली,
पूरी तभी साधना होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

वाद विवाद जन्म देता है ,
पति पत्नी के मध्य कलह को
गृह विनाश का बीज उखाड़े 
नही उखड़ता है, जमने पर !
ऋषि मुनियों के दिए मौन से
क्रोधित मन काबू पाओगी ! 
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

मौन अस्त्र से गौतम जीते
अंगुलिमाल झुक गया आगे
मितभाषी गांधी के आगे ,
झुका महा साम्राज्यवाद भी
हर विरोध शर्मिंदा होगा,
अगर मौन को तुम परखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

याद रहे द्रोपदी सरीखी !
वाचालता कभी न आए
उतना बोलो , जितना
आवश्यक मंतव्य बताने को
तेज बोलने वाली नारी ,
आदर कभी नही पायेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

इतना प्यारा जीवन साथी 
पुत्री धन्य हुईं तुम पाकर 
शायद तेरे निर्मल मन ने 
जीता ह्रदय विधाता का ,
निश्छल मन और गहन समर्पण,
बेटी जीत तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , राज कुमारी तुम्हीं  लगोगी  !

Saturday, October 11, 2008

लड़कियों की तकलीफ कौन समझना चाहता है ?

                     एक बेहद कड़वा सच जिसे कोई मानना नही चाहता ! शायद हमें अपनी निगाह में ख़ुद गिर जाने का डर, इसे याद न रखने को विवश करता है !

                      २३ -२४ साल की होते होते, माँ बाप सोचने लगते हैं कि १-२ साल में गुडिया के विवाह के बाद यह खर्चा तो कम हो ही जाएगा ! उस गुडिया के कमरे पर, कब्ज़ा करने की कईयों की इच्छा, ख़ुद माँ का यह कहना कि गुडिया के शादी के बाद, यह कमरा खाली हो जाएगा, इसमे बेटा रह लेगा, किताबों को बाँध के टांड पर रख दो और स्टडी टेबल अपने भाई के बेटे को देने पर, इस कमरे में जगह काफी निकल आयेगी !

                       यह वही बेटी थी, जो पापा की हर परेशानी की चिंता रखती और हर चीज समय से याद दिलाती थी, उसके पापा को कलर मैचिंग का कभी ध्यान नही रहता, इस पर हमेशा परेशान रहने वाली लडकी, सिर्फ़ २५ साल की कच्ची उम्र में, सबको इन परेशानियों से मुक्त कर गयी !

                        यह वही बहिन थी जो पूरे हक़ और प्यार के साथ, खिलखिला खिलखिला कर, अपने भाई के जन्मदिन की तैयारी पापा, माँ से लड़ लड़ कर, महीनों पहले से करती थी ! रात को ठीक १२ बजे पूरे घर की लाइटें जला कर हैप्पी बर्थडे की धुन बजाने वाली लडकी, एक दिन यह सारी उछल कूद छोड़कर, गंभीरता का दुपट्टा ओढाकर विदा कर दी गयी .....और साथ में एक शिक्षा भी कि अब बचपना नहीं, हर काम ढंग से करना ऐसा कुछ न करना जिसमे तुम्हारे घर बदनामी हो !

                         कौन सा घर है मेरा ... ?? नया घर जहाँ हर कोई नया है, जहाँ उसे कोई नही जानता या वह घर, जहाँ जन्म लिया और २५ साल बाद विदा कर दी गयी ! जिस घर से विदाई के बाद, वहां एक कील ठोकने का अधिकार भी उसे अपना नही लगता ! और जिस घर को मेरा घर.. मेरा घर.. कहते जबान नही थकती थी उस घर से अब कोई बुलावा भी नही आता ! क्या मेरी याद किसी को नही आती... ऐसा कैसे हो सकता है ? फिर मेरा कौन है ... उस बेटी के पास रह जाती हैं दर्द भरी यादें ... और अब वही बेटी, अपनी डबडबाई ऑंखें छिपाती हुई, सोचती रहे ...

किस घर को , अपना  समझूं   ?
मां किस दर को मंजिल मानूं ?
बचपन बीता जिस आँगन में 
उस घर को, अब क्या मानूं  ?
बड़े दिनों के बाद आज भैया की याद सताती है  ?
पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है  ?

                       शादी के पहले दूसरे साल तक बेटी के घर त्योहारों पर कुछ भेंट आदि लेकर जाने के बाद, उस बच्ची की ममता और तड़प को भूल कर, अपनी अपनी समस्याओं को सुलझाने में लग जाते हैं ! कोई याद नही रखता अपने घर से विदा की हुई बच्ची को ! धीरे धीरे इसी बेटी को अपने ही घर में, मेहमान का दर्जा देने का प्रयत्न किया जाता है, और ड्राइंग रूम में बिठाकर चाय पेश की जाती है !

तुम  सब ,  भले   भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ ?
तुम सब भूल गए भैय्या !

पर मैं , वे दिन कैसे भूलूँ  ?
मैं इकली और दूर बहुत, उस घर की यादें आती हैं !
पता नहीं क्यों आज मुझे , मां, तेरी यादें आती हैं  !

                     हम अपने देश की संस्कारों की बाते करते नही अघाते हैं पर शायद हम अपने घर के सबसे सुंदर और कमज़ोर धागे को टूटने से बचाने के लिए , उसकी सुरक्षा के लिए कोई उपाय नही करते ! आज आवश्यकता है कि बेटे से पहले बेटी के लिए वह सब दिया जाए जिसकी सबसे बड़ी हकदार बेटी है !

Friday, October 10, 2008

अँधेरी रात का सूरज - राकेश खंडेलवाल

पंकज जी का अनुरोध था कि मैं राकेश जी पर कुछ और लिखूं, हिन्दी की सेवा में लगे हुए एक सम्मानित विद्वान् का अनुरोध पाकर, इस मशहूर गीतकार की रचनाओं पर नज़र डालते हुए, गीतकार की कलम पर विषय अनायास ही मिल गया ! राकेश खंडेलवाल मशहूर हैं, भाषा को झंकार प्रदान करने वाले शब्दों का उपयोग करने के लिए ! उनकी गीतमाला में हर शब्द मोती की तरह पिरोया होता है

मगर आजकल के ये दरबारी कवि अपने आप को चमकाने के लिए क्या नहीं करते ! गंभीर विषयों, पर सभ्य सुसंस्कृत भाषा के धनी, इस कवि की तकलीफ इन शब्दों में देखिये ...

"मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैं
हर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं
हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ीं
और सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ी
पहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थे
बातें साफ़ किन्तु अब कहते , शर्म हया की पूँछ मरोड़ी

हमने सरगम सीखी है वैशाखनन्दनों के गायन से
बड़े गर्व से बात सभी को हम यह बतलाया करते हैं"

ख़ुद की भाषा से चमत्कृत ये आधुनिक कवि, और सामने भीड़ में बैठे अपने गुरु की रचनाओं पर तालियाँ बजाते उनके कुछ सर्वश्रेष्ठ शिष्य, अक्सर कविसम्मेलनों में समां बांधते हर जगह नज़र आ जायेंगे ! अच्छी टी आर पी बढ़ाने के सारे मन्त्र इन्हे पता होते हैं ! राकेश जी आगे कहते हैं ....

"हम दरबारी हैं तिकड़म से सारा काम कराते अपना
मौके पड़ते ही हर इक के आगे शीश झुकाते अपना
कुत्तों से सीखा है हमने पीछे फ़िरना पूँछ हिलाते
और गधे को भी हम अक्सर बाप बना लेते हैं अपना

भाषा की बैसाखी लेकर चलते हैं हम सीना ताने
जिस थाली में खाते हैं हम, छेद उसी में ही करते हैं !
जी हम भी कविता करते हैं"

राकेश जी की उपरोक्त व्यथा पर राजीव रंजन प्रसाद के कमेंट्स थे ....

आदरणीय राकेश जी,आपका ने हास्य लिखने का तो केवल बहाना किया है, इन शब्दों के पीछे की गहरी पीडा समझी जा सकती है। सचमुच तिलमिलाहट होती है कविता और साहित्य का सत्यानाश करने वाले विदूषकों से...

आजकल अधिकतर जगहों पर नगाडे बजाते यह लेखक दिख जाते हैं, घटिया लेखन के यह रचनाकार कोई न कोई मुखौटा ओढ़कर काम करते हैं, कोई अपने ज्ञान का ढिंढोरा पीटता है तो अन्य दूसरों पर सतत आक्रमण कर अपने आपको को विजयी घोषित किए बैठा है !मेरे अपने कुछ मित्र भी इन लोगों में से हैं जिनमे प्रतिभा की कोई कमी नही, मगर उनकी कमियां समझाने की हिम्मत कौन करे ?? और कौन सरे आम अपनी धोती खुलवाने की हिम्मत करे ?? ;-)

और अंत में नवयुग के कवियों को, भाषा और कविताओं की मिट्टी पलीद करते देख, अधिकतर शांत रहने वाले, क्रोधित संवेदनशील राकेश खंडेलवाल......

सड़े हुए अंडे की चाहत
गले टमाटर की अकुलाहट
फ़टे हुए जूते चप्पल की माला के असली अधिकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

तूने जो लिख दी कविता वह नहीं समझ में बिलकुल आई"
खुद का लिखा खुदा ही समझे" की परंपरा के अनुयायी
तूने पढ़ी हुई हर कविता पर अपना अधिकार जताया
रश्क हुआ गर्दभराजों को, जब तूने आवाज़ उठाई

सूखे तालाबों के मेंढ़क
कीट ग्रसित ओ पीले ढेंढ़स
चला रहा है तू मंचों पर फ़ूहड़ बातों की पिचकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

पढ़ा सुना हर एक चुटकुला, तेरी ही बन गया बपौती
समझदार श्रोताओं की खातिर तू सबसे बड़ी चुनौती
तू अंगद का पांव, न छोड़े माईक धक्के खा खा कर भी
चार चुटकुलों को गंगा कह, तूने अपनी भरी कथौती

कीचड़ के कुंडों के भैंसे
करूँ तेरी तारीफ़ें कैसे
हर संयोजन के आयोजक पर है तेरी चढ़ी उधारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

क्या शायर, क्या गीतकार, सब तेरे आगे पानी भरते
तू रहता जब सन्मुख, कुछ भी बोल न पाते,वे चुप रहते
हूटप्रूफ़ तू, असर न तुझ पर होता कोई कुछ भी बोले
आलोचक आ तेरे आगे शीश झुकाते डरते डरते

ओ चिरकिन के अमर भतीजे
पहले, दूजे, चौथे, तीजे
तुझको सुनते पीट रही है सर अपना भाषा बेचारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी !
और ऐसे में राकेश खंडेलवाल जैसे रचनाकार का सब्र भी टूट जाता है जब भाषा और संवेदनाओं का मजाक सारे आम उडाया जाए !

डॉ अमर ज्योति के शब्दों में "शब्दों के जादूगर राकेश जी शब्दों को कठपुतलियों की तरह नचा कर जहां एक ओर दैनिक जीवन की विसँगतियों का चित्रण करते हैं वहीं दूसरी ओर जीवन की गहरी दार्शनिक व्याख्या भी करते हैं।"

और अंत में मैं एक शानदार गीतकार, प्रेरणादायी, कविश्रेष्ठ राकेश खंडेलवाल की "अँधेरी रात का सूरज" का स्वागत करता हूँ ! साथ ही पंकज सुबीर का भी धन्यवाद जिनके कारण यह रचना हिन्दी जगत को मिल सकी !

Tuesday, October 7, 2008

शब्द चित्रकार राकेश खंडेलवाल -सतीश सक्सेना



पंकज सुबीर की वेब साईट सुबीर संवाद सेवा को देखते हुए एक उनकी अपील देखी जिसमे पूरे सप्ताह राकेश खंडेलवाल की ही चर्चा करने की इच्छा प्रकट की गयी थी ! साधारणतया ऐसी इच्छा, आज के युग में, जहाँ प्रकाशक- लेखक के मध्य तल्खियत की कहानिया रोज ही सुनी जायें, अचंभित करने वाली ही लगती है ! मुझे इसी वेबसाइट से पता चला कि राकेश खंडेलवाल के गीतों का संकलन (अँधेरी रात का सूरज) प्रकाशित करने की इच्छा ख़ुद पंकज सुबीर की ही है, और यह संकलन ख़ुद पंकज जी ने ही किया है ! पंकज सुबीर ख़ुद कवियों को गीत और ग़ज़लें सिखाने वाली कक्षाओं का संचालन करते हैं और यह, मेरी जानकारी अनुसार देश में इस प्रकार का पहला प्रयोग है ! निस्संदेह पंकज देश में लेखन को बढावा देने हेतु, एक प्रसंशनीय योगदान दे रहें हैं ! इस वेब साईट को पढ़ते पढ़ते यह इच्छा बलवती होती चली गयी कि राकेश खंडेलवाल जैसी सशक्त लेखनी के ऊपर मैं भी, अपने टूटे फूटे शब्दों में कुछ लिखने का प्रयत्न करुँ ! 

अमेरिका में निवास कर रहे राकेश, अपने देश से दूर रह कर अपनी संस्कृति के राजदूत हैं , उनके हर गीत से हमारे देश की विनम्रता, विविधिता और सौम्यता नज़र आती है ! अपने पाठकों से आशीर्वाद लेते राकेश की विनम्र अभिव्यक्ति की एक झलक देखिये ....

"एक आशीष जो शारदा ने दिया,
वह भरे जा रहा शब्द से आंजुरि
आपके पांव पर वह चढ़ाता हूँ मैं,
होके करबद्ध करता नमन आपको
आपके शब्द देते रहें प्रेरणा,
कामना पुष्प सी मुस्कुराने लगी !
आपके स्नेह से जो सजी है मेरी,
भेंट करता वही अंजुमन आपको"

आत्ममंथन के कारण,उपजे नैराश्य भाव के साथ साथ ईमानदारी, इस मासूम गीतकार के ईमानदार दिल की एक तस्वीर पेश करता है......

"जीवन के हर समीकरण का कोई सूत्र अधूरा निकला
इसीलिए तो कभी किसी से सामंजस्य नहीं हो पाया"

पहली बार इस महान गीतकार की रचनाएं पढ़कर मेरी पहली प्रतिक्रिया (७ जून ०८ ) इस प्रकार थी ॥"आपकी शैली तथा आपकी ईमानदारी बहुत पसंद आई ! निस्संदेह आप एक शानदार इंसान भी होंगे ! और आपके गीत , वाकई मज़ा आ गया आपके गीतों को पढ़कर ! संकलित करने के योग्य हैं , आशा है आज की बनावटी दुनिया को आप यह निश्छल, सोम्य गीतसृजन लगातार देते रहेंगे !"

इसका जवाब राकेश जी ने इस गीत से दिया ....

"आपकी यों ही शुभकामनायें मिलें लेखनी शब्द तब ही चितेरा करे
मेरी मावस सी एकाकियत में सदा आपका नेह आकर सवेरा करे..."

राकेश खंडेलवाल ने मेरी पोस्ट " अम्मा ! " पर माँ स्तुति में टिप्पणी देकर मेरी उक्त रचना का सौन्दर्य कई गुना बढ़ा दिया !

"कोश के शब्द सारे विफ़ल हो गये, भावनाओं को अभिव्यक्तियां दे सकें
शब्द तुमसे मिले, भावना कंठ सब इक तुम्हारी कॄपा से मिला है हमें
ज़िन्दगी की प्रणेता दिशादायिनी, पूर्ण अस्तित्व का तुम ही आधार हो
इतनी क्षमता महज हमको मिल न सकी, अर्चना जो तुम्हारी सफ़ल कर सकें"

मेरी एक अन्य रचना पर "वे नफरत बांटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं "......राकेश जी की गीतमयी प्रतिक्रिया देख मैं भौचक्का रह गया, लगा कि इन खुबसूरत पंक्तियों के बिना वह गीत ही अपूर्ण था जिसे राकेश जी ने आकर पूरा किया ! मेरी प्रतिक्रिया इस तरह थी "॥

अरे वाह, राकेश जी !
मैं बड़ा खुशकिस्मत हूँ कि आप इस गरीबखाने में आए ! सच बताऊँ ! आपके आते ही गीतों के स्वर में झंकार आ जाती हैं ! आपने न केवल इस गीत के मर्म को पढ़ लिया बल्कि सम्पूर्णता भी दी,....."

"जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे वे
कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं !
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !"

राकेश खंडेलवाल जैसा शब्द सामर्थ्य से धनी गीतकार विरले ही जन्मते हैं, अपनी अभिव्यक्तियों को शब्दों के मोतियों से सजाने व श्रृंगार करने की जो विधा राकेश जी के पास है, अन्यंत्र नही दिखाई देती ! और राकेश जी के व्यक्तित्व की सबसे बेहतरीन खासियत है उनका विनम्र स्वभाव, लगता ही नही कि यही व्यक्ति,काव्यपुरुष राकेश खंडेलवाल हैं !हम उम्मीद करते हैं कि राकेश बरसों तक हिन्दी भाषा को सशक्त आधार प्रदान करते रहेंगे !

Monday, October 6, 2008

हिन्दी ब्लाग लेखन इन दिनों -सतीश सक्सेना

              ब्लॉग लेखन शुरू करते समय मन में बड़ा उत्साह था कि मैं यहाँ अच्छे लेखन से जुड़ कर अपने ज्ञान में कुछ योगदान कर पाऊंगा, और उन महा नायकों से रूबरू होने का मौका भी मिलेगा जिनको अखबारों में पढ़ कर धन्य मानता रहा ! मगर मुझे लगता है कि अनपढ़ आदमी के ज्ञान की तरह मेरे ज्ञान की सीमा भी कुएं के मेढक जितनी ही थी ! आज जब इस मैदान ( ब्लागर जगत ) में आया तो लगता है कि मैं लेखकों के मध्य नही, पहलवानों के मध्य कार्य कर रहा हूँ !

             हिन्दी ब्लाग की प्रमुख कमजोरी, उपयुक्त और प्रभावशाली लेखन की कमी के अलावा, ख़राब माहौल है शायद इसी कारण महिला और साहित्यिक लेखन की वेहद कमी है ! यहाँ हर लेखन पर प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, अच्छे लेखन पर अपरिपक्व कमेंट्स, समाज की कमियों वाले लेखों पर, बुद्धि से लगभग पैदल लोगों के गाली गलौज युक्त कमेंट्स, बेहद एक्टिव महिला ब्लागरों के साथ, व्यक्तिगत तौर पर अश्लील कमेंट्स, किसी भी अच्छे लेखक के मन में वित्रश्ना भरने के लिए काफी हैं !

               अधिकतर लोग अपने नीरस लेखन से दुखी होकर किसी भी चर्चित ब्लाग पर जाकर भद्दी व घटिया टिप्पणी ,यहाँ तक कि गालियाँ भी देते हैं,जिससे उनकी प्रतिक्रिया चर्चा का विषय बन सके और उनको लोग जान जाए,अधिकतर ऐसे लोग महिला और संवेदनशील लेखकों को मानसिक चोट पहुंचाने में सफल भी रहते हैं,और उनका उद्देश्य जाने बिना,लोग प्रतिक्रियाओं के माध्यम से,अनचाहे ही,उन्हें कामयाब हीरो बना देते हैं! ऐसे लोगों के नाम और उनके ब्लाग को एक ब्लैक बोर्ड पर प्रर्दशित कर लोगों को आगाह किया जा सकता है !

               प्रोत्साहन में बड़ी शक्ति होती है,बहुत शक्तिशाली कलम भी शुरू में लड़खडाने लगती है, प्रोत्साहन के कमी और बदकिस्मती से अगर शुरुआत में ही इन्हे कुछ लोग हूट करदें तो बड़े बड़े ईमानदार और शक्तिशाली वैचारिक प्रतिभा के धनी लोग भी चुटकियों में दम तोड़ देंगे,और इस निष्ठुर ब्लॉग जगत में कोई उसकी कब्र पर दो फूल अर्पित करने आयेगा इसमे मुझे संदेह है !

               जहाँ एक तरफ़ अच्छे एवं उचित लेखों के लिए पाठकों की प्रतिक्रियाएं वातावरण में एक सौहार्दपूर्ण मिठास घोलने का कार्य करेंगी ! वहीं नाज़ुक विषयों पर अनजाने तथा बिना सोचे समझे की गयी प्रतिक्रियाएं समाज का सत्यानाश कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं !

               और इसी प्रकार तात्कालिक जोश में,एक सामान्य उत्साही ब्लागर की ग़लत तारीफ मिलने पर,विद्वान मगर पथभ्रष्ट,और अति उत्साहित लेखनी,समाज का वह विनाश करेगी जिसकी कोई कल्पना भी न कर सके! आज आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर,प्रतिक्रिया देते समय,निष्पक्षता व ईमानदारी का ध्यान रखें !

Saturday, October 4, 2008

कंधमाल -सतीश सक्सेना


ग्राहम स्टेंस और दो मासूम बच्चे ...

और अब यह बेचारी नन.....

शर्म से और लिख नही पा रहा ......


Monday, September 29, 2008

लिख सतीश तू बिना सहारे ! गाने वाले मिल जायेंगे -सतीश सक्सेना

रमजान के मुबारक महीने पर, इस देश की एक बच्ची रख्शंदा Pretty woman ने, बेहद दर्द के साथ एक ऐसी पोस्ट, आई है ईद, लेकर उदासियाँ कितनी... लिखी ! जिसने दिल को झकझोर सा दिया ! हमारे विशाल ह्रदय वाले देश में, पूरी कौम को बदनाम करने की कोशिश बुरी तरह नाकामयाब होगी, इसमे हमें बताना होगा कि हम दोनों एक दूसरे धर्मों का तहे दिल से सम्मान करते हैं ! धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करने वालों को एक प्यार का संदेश पढाना होगा !

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख,
जिससे घर का सम्मान बढ़े ,
कुछ कागज काले कर ऐसे,
जिससे आपस में प्यार बढ़े
रहमत चाचा से गले मिलें , 

होली और ईद साथ आकर !
तो रक्त पिपासु दरिंदों को,नरसिंह बहुत मिल जायेंगे !


अनजान शहर सुनसान डगर
कोई साथी नज़र नही आए
पर शक्ति एक दे रही साथ
हो विजय सदा सच्चाई की
कुछ नयी कहानी ऐसी लिख,

जिससे अंगारे ठन्डे हों !
मानवता के मतवाले को, हमदर्द बहुत मिल जायेंगे !

कुछ तान नयी छेड़ो ऐसी
झंकार उठे, सारा मंज़र,
कुछ ऐसी परम्परा जन्में ,
हम ईद मनाएँ खुश होकर
होली पर,मोहिद रंग खेलें,

गौरव हों दुखी,मुहर्रम पर !
इस धर्मयुद्ध में , संग देने , सारथी बहुत मिल जायेंगे !


वह दिन आएगा बहुत जल्द
नफरत के सौदागर ! सुनलें ,
जब माहे मुबारक के मौके,
जगमग होगा बुतखाना भी
मुस्लिम बच्चे , प्रसाद लेते , 

मन्दिर में , देखे जायेंगे !
मंदिर मस्ज़िद में फर्क नहीं,हमराह बहुत मिल जायेंगे !

ये जहर उगलते लोग तुम्हे
आपस में, लड़वा डालेंगे ,
ना हिन्दू हैं,ना मुसलमान
ये मानवता के दुश्मन हैं
चौकस रहना शैतानों से ,

जो हम दोनों के बीच रहें !
तू आँख खोल पहचान इन्हें,जयचंद बहुत दिख जायेंगे !


आतंकवाद के खिलाफ लड़ता हमारा देश, आपस में फूट डालने के प्रयास में लगे कुछ कम अक्ल लोग,और उन्हें हौसला देते उनके मूर्ख अनुयायी, जो अनजाने में जयचंदों के हाथ मजबूत कर रहे हैं ! देश के दुश्मनों द्बारा जगह जगह होते बम विस्फोट ! ऐसे शक और माहौल में ज़रूरत है अपने परिवार के ज़ख्मों पर मलहम लगाने की और उग्रवादियों के हौसले कमज़ोर करने की ! ऐसे में श्रद्धेय राकेश खंडेलवाल ने अपनी कलम से, इस गीत को एक और आशीर्वाद भेजा है !

यों सदा बादलों सा हमने,
अपना मन स्वच्छ रखा साथी 
ले गिरते पंख कबूतर के
दी हमने दीपक को बाती
पर सहनशक्ति को यदि तुमने 
कोई कमजोरी समझा तो
इस अंगनाई के गुलमोहर , अंगारों में ढल जायेंगे !

Saturday, September 20, 2008

वे नफरत बाँटें इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं - सतीश सक्सेना

साजिश है आग लगाने की
कोई रंजिश, हमें लड़ाने की
वह रंज लिए, बैठे दिल में
हम प्यार, बांटने निकले हैं!
चाहें कितना भी रंज रखो 
दिखते भी नहीं संवाद नहीं, 
फिर भी तुमसे आशाएं हैं !
जीवन में बड़ी अपेक्षा से , उम्मीद लगाए बैठे हैं !

वे शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए
हम समझ नही पाए, हमको
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से ,
बेदर्दों को तकलीफ  नहीं, 
केवल कठोर, क्षमताएं हैं !
हम चोटें लेकर भी दिल पर, अरमान लगाये बैठे हैं !

फिर जायेंगे, उनके दर पर,
हम हाथ जोड़ अपने पन से,
इक बालहृदय को क्यूँ ऐसे  
भेदा अपने , तीखेपन से  !
शब्दों में शक्ति प्रभावी है 
लेकिन कठोर प्रतिभाएं हैं !
हम घायल होकर भी सजनी कुछ आस जगाये बैठे हैं !

हम जी न सकेंगे दुनिया में
माँ जन्में  कोख तुम्हारी से !
जो कुछ भी ताकत आयी है 
पाये हैं, शक्ति तुम्हारी से !
गंगा ,गौरी, दुर्गा, लक्ष्मी , 
सब तेरी  ही आभाएँ  हैं ! 
हम अब भी आंसू भरे तुझे , टकटकी लगाए बैठे हैं !

जन्मे दोनों इस घर में हम
और साथ खेल कर बड़े हुए
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं, केवल रक्षक इस घर का
भाई बहनों  का प्यार सदा 
जीवन की  अभिलाषायें हैं !
अब रक्षा बंधन के दिन पर,  घर के दरवाजे बैठे हैं !

क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
रिश्ते, परिभाषित करती हो,
कहने सुनने से होगा क्या 
मन में पलतीं, आशाएं हैं ! 
हम पुरूष ह्रदय,सम्मान सहित,कुछ याद दिलाने बैठे हैं !

श्री राकेश खंडेलवाल (http://geetkalash.blogspot.com/ मेरे अधूरे गीत को इस प्रकार पूरा किया ...उनका आभारी हूँ कि वे मेरी वेदना को अपने शब्दों में व्यक्त करने में सफल रहे !
जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
तब तब ही उंगली उठी यहाँ
जो भाव शब्द के परे रहे
वे कभी किसी को दिखे कहाँ
यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
मन की उठती धारायें हैं,
ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !
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