Wednesday, February 27, 2013

एक चिड़िया ही तो थी,घायल हुई -सतीश सक्सेना

कभी कभी हम अपने ही जोश में चहचहाती एक मासूम सी चिड़िया, की गुस्ताखी पर गोली चला देते हैं ...उसका दिल हम छलनी कर देते हैं , बिना यह जाने हुए कि बिना भूल, उसका क्या हाल कर दिया  !

एक चिड़िया चहकती,घायल  हुई !
एक निश्छल सी हँसी, आहत हुई ! 

जीभ से निकलीं  हुईं , वे गोलियां ,

किस कदर पेवस्त वे,दिल में हुईं !

खेल में,  भेजी गयीं, वे  चिट्ठियाँ, 

क्या तुम्हें मालूम है ,घातक  हुईं !

घर के दरवाजे पर, गुमसुम भीड़ है , 
आज घर पर,बिन मेरे महफ़िल हुई ! 

तुम तो कहतीं थीं,  कि मैं ना रोउंगी !
आखिरी दिन तुम भी तो शामिल हुईं !

तुम तो घर को छोड़कर ही, चल दिए,
ऎसी हमसे क्या सनम , रंजिश हुई !

Friday, February 22, 2013

मैं अब खुश हूँ ... - सतीश सक्सेना

आश्रय देने यहाँ न आना, मैंने जीना सीख लिया !
धीरे धीरे  बिना सहारे , हमने रहना सीख लिया !


मैं अब खुश हूँ तेरी दुनियां,मुझको नहीं बुलाती है ! 
हँसी चुराकर तस्वीरों से, हमने हंसना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ हाथ पकड़ने वाला कोई पास नहीं 
धीरे धीरे घुटनों के बल, हमने चलना सीख लिया ! 

मैं अब खुश हूँ, तेरे  सिक्के, नहीं चले, बाजारों में !

भूखे रहकर धीरे धीरे, कमा के खाना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ, मुझे ठण्ड में,याद न तेरी आती है !

हाथ जले,पर जैसे तैसे आग जलाना सीख लिया ! 

Saturday, February 16, 2013

देख के इन कवियों की भाषा , आँख चुराएं मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कलम उठा अपने हाथों में 
ज्ञानमूर्ति , कहलाते हैं !
दुष्ट प्रकृति के स्वामी अपना 
नाम व्यास बतलाते हैं !
शारद को अपमानित करते ,
लिखते बड़े रसीले गीत !
देख के इन कवियों की भाषा ,आँख चुराएं मेरे गीत !

कौन धूप में,जल को लाकर
सूखे मन को तृप्त कराये ?
प्यासे को आचमन कराने 
गंगा , कौन ढूंढ के लाये ?
नंगे पैरों, गुरु दर्शन को ,
आये थे, मन में ले प्रीत !
सच्चा गुरु ही राह दिखाए , खूब जानते मेरे गीत !

धवलवस्त्र, मंत्रोच्चारण ,
से मुख पर भारी तेज दिखे 
टीवी से हर घर में आये
इन संतों से , दूर रहें !
रात्रि जागरण में बैठे हैं ,
लक्ष्मीपूजा करते गीत !
श्रद्धा के व्यापारी गाते , तन्मय हो जहरीले गीत !

कष्टनिवारक से लगते हैं, 
वस्त्र पहन, सन्यासी के !
राम नाम का ओढ़ दुशाला
बुरे करम, अधिवासी के !
मन में लालच ,नज़र में धोखा,
मुंह से बोलें , मीठे गीत !
श्रद्धा बेंचें,घर घर जाकर, रात में मस्त निशाचर गीत !


शिक्षण की दीक्षा देते हैं ,
गुरुशिष्टता मर्म, न जाने
शिष्यों से रिश्ता बदला है,
जीवन के सुख को पहचाने
आरुणि ठिठुर ठिठुर मर जाएँ,
आश्रम में धन लाएं खींच !
आज कहाँ से ढूँढें ऋषिवर, बड़े दुखी हैं, मेरे गीत !



Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 
घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए , सब गाएंगे  इसके गीत ! 

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !

Saturday, January 19, 2013

भाषा इन गूंगो की -सतीश सक्सेना

कुछ दिन पूर्व, घर के बाहर, ४ नन्हें दुधमुहों ने जन्म लिया, माँ द्वारा एक झुरमुट में सुरक्षित छिपाए जाने के बावजूद, ये नन्हे भाग भाग कर सड़क पर आ जाते थे  ! तेज जाती हुई कारों को सावधानी से चलाने के लिए कहतीं इनकी माँ द्वारा, कार के पीछे भौंकते हुए दौड़ने से, होते शोर से पडोसी परेशान थे  ! 
गुडिया के बुलाने पर, मैं बाहर गया तो एक को छोड़ सारे बच्चे, भाग कर माँ के पास छुप गए ! केवल एक था जो निडरता के साथ खड़ा रहा और बढे हुए हाथ की उंगलियाँ अपने नन्हे दांतों से काटने का प्रयत्न करने लगा ! कुछ बिस्कुट इन बच्चों और उस वात्सल्यमयी को देकर हम दोनों बाप बेटी घर आ गए !
अगले दिन सुबह ,घर के बाहर अजीब सन्नाटा देख बाहर गया तो दिल धक् से रह गया , वही निडर बच्चा, किसी तेज और असंवेदनशील कार  द्वारा सड़क पर कुचला पड़ा था .......
और उसकी माँ बिना भौंके, अपने ३ बच्चों के साथ उदास निगाहों से मुझसे पूंछ रही थी मेरे बच्चे का कसूर क्या था , क्यों मार दिया तुम लोगों ने  ??

Thursday, December 13, 2012

विदाई गुडिया की ... सतीश सक्सेना

२४ अगस्त ८५ को जन्मी गुडिया ने, २४ नवम्बर १२ को, अपने जीवन साथी के साथ, नया घर बसाने , अपना घर छोड़ कर, विदाई ली !
इन आंसुओं को क्या कहें, ख़ुशी के या अपनी लाडली के जाने के गम के !!!!

गुड़िया की विदाई पर, हमारे अमेरिकन मेहमान  विश्वयात्री एडम  ने, हमारे छलके आंसुओं से आहत होकर कहा था ....
"why sad ending of a such beautiful function ? "

मैं इस प्रश्न का जवाब उसे अभी तक नहीं दे पाया हूँ ......
आज  गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कमेंट्स, फिर आंसू छलका गया ...

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ 
आराम की ठंडी छांवो में 
काँटा भी न चुभने पाए तेरे
मेरी लाडली तेरे पांओं  में ...
  
जाओ बेटा , मुझे यकीन है कि तुम्हारा नया घोंसला, तुम्हें तुम्हारे पिता और भाई की याद नहीं आने देगा ....
और हम यही चाहते हैं !!!

Saturday, November 17, 2012

गुडिया की रंगोली -सतीश सक्सेना


यह खूबसूरत रंगोली मेरी बेटी हर वर्ष अपने घर के आंगन में बनाती रही है ! इस वर्ष से उसका अपना घर , मायके में बदल जाएगा अतः उसकी यह अंतिम रंगोली है जिसे उसने अपनी भाभी विधि के साथ बनाया है ! संयोग से विधि की, अपने घर में, यह पहली रंगोली है !

मेरी गुडिया ने, विवाह से पूर्व, इस घर के प्रति अपनी  जिम्मेवारियां, विधि को सौंपने की शुरुआत, इस रंगोली से कर दी, और विधि ने अपने घर में पहली रंगोली बनायी !
                                            चार्ज देने और लेने की परम्परा,  सुख से अधिक दुखदायी है ...मोह छोड़ा नही जाता , बेटी से बिछड़ना, बेहद कष्ट कारक है , मगर हकीकत स्वीकारनी होगी !

इस मौके पर, विश्वयात्री एडम परवेज़  ने भी जमकर, इन दोनों की मदद की ! एडम बेटी के विवाह में शामिल होने के लिए, आजकल हमारे मेहमान है ! विश्व भ्रमण पर निकला यह अमेरिकन ४६५ दिन से, अपने घर से बाहर है और हमारा देश, इस यात्रा में उसका ६५ वां देश है ! दिवाली के दिन इस रंगोली पर एडम ने लगभग ४ घंटे काम किया ! हिन्दुस्तानी कल्चर में यह विदेशी योगदान भुलाया नहीं जाएगा !

Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 

Saturday, October 6, 2012

माँ, तुम्हे अपना भी तो कुछ, ख़याल रखना चाहिए - सतीश सक्सेना

नीचे लिखा पत्र ,डॉ गीता कदायप्रथ ( कैंसर कंसल्टेंट ) का है, जिसमें उन्होंने ब्रेस्ट कैंसर के खतरे के लिए , महिलाओं को जागरूक करने हेतु , एक रचना का अनुरोध किया है  ! डॉ गीता, मैक्स हॉस्पिटल, साकेत , दिल्ली में, कैंसर सर्जन के रूप में कार्यरत हैं !   

Dear Mr Saxena,
It was really good talking to you and am glad you are also enthusiastic about writing a few lines for creating breast cancer awareness.
Dr Geeta Kadayaprath 9810169286

1. Breast cancer is on the rise, and actually can be defeated just by early detection / screening.2. Health consciousness in terms of lifestyle: tobacco, food, exercise.3. pink and breast cancer should remain the main theme, touching indirectly on lifestyle and screening. 
The central idea is to make women realise they are all important to their families and the society at large.They need to take care of themselves and put their health as a priority.We all need her, as a mother,a sister, a daughter, a wife etc.For her to be able to do justice to all these roles, she has to look after herself.She has to listen to her body, she has to be familiar with her body, because she knows her body best. She has to come forth herself if she finds a problem and not postpone it for another day.The urgency to ensure her fitness should not diminish ever.This mindset that no disease can touch her has to go and her vulnerability should make her more aware and forthcoming in reporting a problem at the earliest

She lights up everyone's lives. She is an enigma,a pillar of strength- she is the sunshine, the rainbow, the gentle breeze,the earth, all enduring, selfless and patient.She gives endlessly.Let us care for her, nurture her and keep her healthy because our existence is inextricably linked to her.She means the world to us, so let us paint her canvas in pink and ensure she is aware of her own self and submits herself to a check even if she is ostensibly well.'
Sent from BlackBerry® on Airtel

Dr Geeta kadayaprath
MS, FRCS Senior Consultant (Breast Surgeon)

यदि तुम्हीं अस्वस्थ हो
कैसे उठें, किलकारियाँ 
अगर तुम ,भूखी रहीं ,
कैसे जमेंगी , बाज़ियाँ ,
अगर तुम चाहो कि हम भी, 
छू सकें वह आसमां !
माँ  तुम्हें भी स्वयं का कुछ  ध्यान रखना चाहिए !

याद रख , तेरी हँसी ,
जीवंत रखती है, हमें !
तेरी सेहत में कमी ,
बेचैन करती है, हमें !
जाना तो इक दिन सभी को, 
मगर अपनों के लिए
माँ, तुम्हें  अपने बदन का , ध्यान रखना चाहिए !

कुछ बुरी बीमारियां 
खतरा है नारी के लिए
कैंसर सीने में जकड़े
उम्र , सारी के लिए
वक्त रहते जांच करवा कर, 
जियें, सब के लिए !
कुछ तो माँ अपने लिए ,अरमान रखना चाहिए !

तुमसे ही सुंदर लगे
संसार जीने के लिए
तुम नहीं, तो कौन है ?
हँसने, हंसाने के लिए
सिर्फ नारी  जगत में , 
जीती है गैरों के लिए !
माँ, हमें अपने लिए ,इक शक्ति रूपा चाहिए !

मायके में, आंख भर
आयी, तुझे ही याद कर
और मुँह में कौर न जा
पाए तुमको याद कर !
अगर मन में प्यार है ,
परिवार  अपने के लिए !
माँ, शारीरिक व्याधियों की, जांच होनी चाहिए !

नारी आँचल में पले हैं ,
गाँठ  घातक रोग के !
धीरे धीरे कसते जाते
रेशे , दारुण रोग के !
इनके संकेतों की हमको , 
परख होनी चाहिए !
माँ , बड़ों की बात हमको याद रखना चाहिए !

Sunday, September 9, 2012

आह ...-सतीश सक्सेना


बड़ों के  कंधे पर अर्थी, उठायी जाए बच्चों की !
तो बूढी जिंदगी में, और जीना  बोझ लगता है !
अगर बेटे को लथपथ,खून से, कोई पिता देखे  !
तो ईश्वर नाम पर,विश्वास करना,बोझ लगता है !

Saturday, September 1, 2012

भरी जवानी में , ये बातें , किस गुस्ताख ने छेड़ी हैं - सतीश सक्सेना

जब तक यादें जीवित दिल में ,श्र्द्धा और सबूरी की ! 
तब तक दिल में,बसी रहेगी, गंध उसी कस्तूरी  की !

जब तक, मेरे इंतज़ार में , नज़र लगीं, दरवाजे  पर !
तब तक वे,न जाने देंगीं, दिल से धमक जवानी की !

जब तक कोई कान लगाये, आहट सुनता क़दमों की !
तब तक यह मुस्कान रहेगी , कसमें पद्म भवानी की !

भरी जवानी में , ये  बाते, किस गुस्ताख ने छेड़ी हैं !
हाथ मिलाएं, हमसे आकर, हो पहचान गुमानी की !

जब तक ह्रदय मचलता उनके जूड़े ,कंगन,गजरे पर

लाखों जनम निछावर उन पर, है इच्छा कुर्बानी की !

Wednesday, August 29, 2012

कभी तकलीफ इतनी हो कि जीना बोझ लगता है -सतीश सक्सेना


किसी दोस्त की सहानुभूति ने फिर अनु की याद दिलवा  दी ......
कुछ कष्ट ऐसे हैं कि भुलाए नहीं जाते ...


हमेशा के लिए, घर से गयी, दुःस्वप्न  लगता है !
हमें उस रात से शिव पर,भरोसा बोझ लगता है !

बड़ों के  कंधे पर अर्थी, उठायी जाए बच्चों की !
पिता की जिंदगी में , और जीना  बोझ लगता है !

अभी शादी की,आशीषें भी, उसके काम ना आयीं !  
तो चरणों पर कहीं झुकना,बड़ा ही बोझ लगता है !

अभी मेंहदी भी हाथों से , न छुट पायी थी बच्चे की !   
हमें इन मांगलिक कार्यों का होना , बोझ लगता है !

अरे ! मासूम सी बच्ची को मारा,जिस तरह तुमने !   
हमें मंदिरों  का , सम्मान करना , बोझ लगता है !

वो नित संध्या समय, दीपक जलाती थी तेरे आगे  !
हमें ज़ालिम को, ईश्वर मानना, अब बोझ लगता है !

अगर पुत्री को, लथपथ खून से,  कोई पिता  देखे  !
तो ईश्वर नाम पर, विश्वास करना, बोझ लगता है !

जब अपनी शक्ति की, असहायता पर दया सी आये 
तो दर्पण सामने, आना भी, अक्सर बोझ लगता है ! 

Sunday, August 19, 2012

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख -सतीश सक्सेना

चल उठा कलम कुछ ऐसा लिख,
जिससे घर का सम्मान बढ़े ,
कुछ कागज काले कर ऐसे,
जिससे आपस में प्यार बढ़े

रहमत चाचा से गले मिलें,
होली और ईद साथ आकर !
तो रक्त पिपासु दरिंदों को,नरसिंह बहुत मिल जायेंगे !


विध्वंसक भीड़ सामने हो ,
कोई साथी नज़र नही आए !

हर तरफ धधकते शोलों में, 
शीतल जल नज़र नहीं आये !
कुछ नयी कहानी ऐसी लिख,
जिससे अंगारे ठन्डे  हों !
मानवता के मतवालों को, हमदर्द बहुत मिल जायेंगे !

कुछ तान नयी छेड़ो ऐसी
झंकार उठे, सारा मंज़र ,
कुछ ऐसी, परम्परा जन्में ,

हंस गले मिलें फेंकें खंज़र,
होली पर, मोहिद रंग खेलें, 

गौरव हों दुखी, मुहर्रम पर !
तब  धर्म युद्ध में कंधे को , सारथी बहुत  मिल जायेंगे !


वह दिन आएगा बहुत जल्द
नफरत के सौदागर ! सुनलें ,
जब माहे मुबारक के मौके,
जगमग होगा बुतखाना भी !

मुस्लिम बच्चे,  प्रसाद लेते , 
मन्दिर में ,  देखे जायेंगे !
और ईद मुबारक के मौके, हमराह बहुत मिल जाएंगे !

ये जहर उगलते लोग हमें 
आपस में, मरवा डालेंगे !
अपने घर की दीवारों में 
रंजिश का बिरवा बोयेंगे  !
चौकस रहना  शैतानों से , 

जो हम लोगों  के बीच रहें  !
तू आँख खोल पहचान इन्हें,जयचंद बहुत मिल जायेंगे !

Thursday, August 16, 2012

परिहास तुम्हारे चेहरे पर -सतीश सक्सेना

नीचता की पराकाष्ठा की बाते हम अक्सर सुनते हैं , मगर जब लोग इस सीमा को भी आसानी से लांघ जाते हैं तब शायद हमको क्रूरता और नीचता की नयी परिभाषाएं पता चल पाती हैं ! इतिहास गवाह है कि अक्सर बेहतरीन लोग, अपनों के द्वारा बड़ी निर्दयता से, बिना उफ़, क़त्ल किये गए ! यह सब आज भी चल रहा है बस समय , स्थान और परिस्थितियां ही बदली हैं ! अपने ही एक अभिन्न मित्र के प्रति नफ़रत, मानव मन की निष्ठुरता और क्रूर स्वभाव  की इस तस्वीर पर गौर फरमाएं 

कब दिन बीता कब रात गयी 
कब बिन बादल बरसात हुई  !  
कब बिना कराहे, दिल  रोया ,    
कब  सोये - सोये , घात  हुई ! 
जब घेर दुश्मनों ने मारा था, 
राज तिलक के  मौके पर  !
अपनी गर्दन कटते देखा , संतोष तुम्हारे  चेहरे  पर  !

जब समय लिखे इतिहास कभी 
जब  मुस्काए,  तलवार   कभी, 
जब शक होगा, निज  बाँहों पर ,
जब इंगित करती, आँख  कहीं,    
जब बिना कहे दुनिया जाने,
कृतियाँ, जीवित कैकेयी   की !
हम बिलख बिलख जब रोये थे, परिहास तुम्हारे चेहरे पर !

क्यों बेमन साथी संग चलें
ऐसे क्यों जग में हंसी उड़े !
यह कैसा संग दिया तुमने 
पीछे से धक्का दिया मुझे !
गहरी खाई में गिरते दम  , 
वह  दर्द भरा, क्रन्दन  मेरा  !  
विस्फारित आँखों से देखी , इक जीत तुम्हारे चेहरे पर !

क्यों नाम हमारा   आते  ही  ? 
मुस्कान, कुटिल हो जाती थी 
बच्चों सी निश्छल हंसी देख
मन में, कडवाहट आती थी  ?
अभिमन्यु  जैसा वीर गया,
यह व्यूह सजाया था किसने  ?
इतिहास तड़प उठता, देखे, जब चमक तुम्हारे चेहरे पर  !

जब गिरा जमीं पर थका हुआ 
वह धूल धूसरित,रण योद्धा !
तब  अर्धमूर्छित प्यासे  को,
तुम जहर, पिलाने आये  थे,
धुंधली  आँखों ने देखी थी,
तलवार तुम्हारे हाथों में  !
अंतिम साँसें  लेते  देखी , मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर !

Thursday, August 9, 2012

अनुप्रिया और उसके बच्चे से -सतीश सक्सेना

आज अनुप्रिया और उसके अजन्में बच्चे ध्रुव की तेरहवीं है , आज से इस बच्ची को भूलना शुरू करेंगे ....

हम आज से बच्चे तुझे बस दिल में रखेंगे 
तेरी याद कुछ ऐसी हैं , भुलाई नहीं  जाती !

जब भी कहीं जाएँगे , तुझे  ले के  जाएँगे   !
वह मृदुल सी मुस्कान, भुलाई नहीं  जाती !

दुनिया नहीं  जाती, किसी के साथ, है पता !
पर याद इस मासूम की, दिल से नहीं जातीं!

वादे तमाम कर चुके कि,  अब न  रोयेंगे !  
पर आँख है , आंसू से जुदा हो नहीं  पाती !

कोशिश करेंगे, अनुप्रिया, अब याद ना आये
छलके हुए आंसू की  नज़र, छुप नहीं पाती ! 

अब लात नहीं मारना, बच्चे उसे कभी ,
तुझको सम्भालते हुए, वह उठ नहीं पाती !

जैसे भी हो सके , उसे अब खुद सम्हालना !
अम्मा बगैर,  अन्नू  कहीं  जा  नहीं पाती !  

तू क्या खिलायेगा उसे, हमको  नहीं  पता !
तेरी माँ बहुत सीधी है, कभी कह नहीं पाती! 

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