उस दिन ऐसा लगा था कि अब हम कैसे जी पाएंगे, मगर दुनिया किसी के जाने के बाद कभी नही रूकती और हम आज भी सब जी रहें हैं ! शायद यही जीवन की कठोर रीति है !
एक कष्टदायक गीत जो रोते रोते लिखा गया !
ज्यों ज्यों कटता समय तुम्हारी याद सताती रे !
इस बगिया के पेड़ तड़पते, याद तुम्हारी में !
कहाँ हो माली आ जाओ
बेबी, गुड्डी,नीलू ,उषा
सब , कुम्हलायीं हैं !
तड़प कर तुम्हे बुलाती हैं
चले न मुख मे कौर, तुम्हारी याद सताती है
जितने पेड़ लगाये तुमने,
झूम रहे थे सब मस्ती में
इस हरियल बगिया में
किसने आग लगाई रे !
सबसे ऊँचा पेड़ गिरा ! सन्नाटा छाया रे !
इस बगिया में जान तुम्हारी
फिर क्यों रूठे इस उपवन से
किस पौधे से भूल हुई ?
कुछ तो बतलाओ रे !
सारे प्यासे खड़े ! कहीं से माली आओ रे !
तुमने सबसे प्यार किया था
तन मन धन सब दान दिया था
बदला चाहा नहीं किसी से !
फिर क्यों रूठे इस आँगन से
सबसे प्यारी अनू सिसकती ! याद तुम्हारी में !
हर आँगन से तुम्हे प्यार था
भूले बिसरे रिश्ते जोड़े !
कई घरों में खुशिया बांटी
अपने दुःख का ध्यान नहीं था
कल्पवृक्ष अवतार ! यहाँ दावानल आयी रे !
ज्यों ज्यों कटता समय तुम्हारी याद सताती रे !





















यह विवाद बेहद खेद जनक है निस्संदेह इससे आप दोनों की, हिंदी समाज की वाकई बेईज्ज़ती हुई है …
सवाल आप दोनों का कम और चर्चाकारों का अधिक है, मुझे लगता है कि कहीं न कहीं आप लोगों के प्रसंशकों ने दो अलग खेमें बना डाले हैं, और उन खेमों में आप लोगों की रोज आरती हो रही है ! कैसे लोग हैं यह सब, जिन्होंने अपनी पीठ पर दो मनुष्यों का नाम लिख लिया और अब अखाड़े में दो दो हाथ करने को तैयार बैठे हैं ! शायद अंगरेजी भाषा के ब्लागर इसीलिये हमें हेय समझते हैं !
दुखित मन से
आपका"