Thursday, September 18, 2008

हमारे संस्कृति सारथी -राज भाटिया !



राज भाटिया जो प्रचार से दूर, पराये देश में रहते हुए भी भारतीय संस्कृति नन्हे-मुन्हे बच्चों को सिखाने के प्रयत्न में लगे हुए हैं ! नन्हे मुन्नों को अपने पास बैठा कर यह भारतीय कल्चर की कहानिया सुनाते हैं, इनकी इस वेब साईट पर जायेंगे तो किसी भी हिंदू का सर श्रद्धा से झुक जाएगा ! महसूस हो जाएगा की हम एक पावन स्थान पर आ गए हैं और वहाँ दिखाई पड़ेंगे बच्चों से घिरे हुए मधुर आचरण की कहानिया सुनाते राज !
और आश्रम भी ऐसा जहाँ गुरुवर नानक, माँ शारदा, ख़ुद केशव विराजमान हैं, वहां एक योगी राज भाटिया अपनी सुगन्धित धूनी रमाये बैठे नज़र आयेंगे !

ब्लाग जगत पर जिन लोगों को अब तक मैं जान पाया उनमे राज भाई ! विदेश में बसे ऋषि प्रतीत होते हैं, ! भारतीय कल्चर को बढ़ाने का ऐसा प्रयत्न और लगाव अब तक मैं और कहीं नही देख पाया ! अचानक पहली बार कोई व्यक्ति इस ब्लॉग पर आएगा तो लगेगा कि जैसे यह स्थान किसी धार्मिक हिंदू का है, मगर कुछ देर में इस संत के विचार जान कर आप समझ जायेंगे कि यह जगह एक विशाल दिल वाले इंसान की है जो मानवता से प्यार करता है , अपने देश से प्यार करता है अपनी संस्कृति से प्यार करने के साथ साथ, हर मज़हब की भी उतनी ही इज्ज़त करता है जितनी हिंदू धर्म की !

"अनवर भाई अगर गलती से किसी का मन भी दुखा दु तो मुझे सारी रात नीद नही आती, जब तक उस से माफ़ी ना मांग लु,ओर गलत को गलत कहने मे कभी भी परहेज नही किया..."

उपरोक्त शब्द राज ने वेब साईट चाट पर अनवर से कह रहे हैं, जबकि आज फैशन बन चुका है अपने बड़प्पन को सिद्ध करने का, अपने ज्ञान ( ज्ञान भाई माफ़ करें ;-) .. उनसे नही कह रहा ) के प्रचार करने का, कोई मौका हमारे कुछ प्रतिष्ठित ब्लागर हाथ से नही जाने देते ! अपनी विद्वता प्रचार का यह नशा, उनके कुछ स्वयं ज्ञानी चेले चेलियों ने उनकी पीठ थपथपा कर और दुगुना कर दिया ! ऐसे ढोल नगाड़े बजते माहौल में कौन हिम्मत करे प्रश्न करने की ?? हर किसी को अपनी इज्ज़त की चिंता रहती है कि सरे बाज़ार मेरी धोती ना खोल दी जाए ....

मैं कल ब्लॉग जगत में, एक साल पुरानी कुछ पोस्ट पढ़ कर कुछ ब्लाग नायकों को समझने की कोशिश कर रहा था जानकर स्तब्ध रह गया कि किस तरह लोग अपनी धुन में दूसरे पक्ष को समझने का प्रयत्न ही नही करते ! और मजेदार बात यह कि हर पक्ष का ग्रुप उनके पक्षः में दोनों हाथों से तलवारें चला रहा है !
चंद "बेस्ट सैलर" किताबें पढ़ कर, उनके उद्धरण देते विद्वान्, यहाँ ब्लाग जगत में विदुर और केशव को सिखाते देखे जा सकते हैं !
इस माहौल में राज भाई के यह शब्द वन्दनीय हैं !

शहरोज भाई के लिखे "पंडित पुरोहितों के बिना उर्स मुकम्मिल नहीं होता" पर दिए गए उनके कमेंट्स
"कट्टरवाद की बीमारी सबसे खतरनाक बीमारी है, दुसरा आग लगाने ओर भडकाने वालो से भी हमे बचना चाहिये, वेसे जब मेरा दोस्त(पकिस्तान से) इस दुनिया से गया तो मेने उस की रुह को जन्नत मे जगह मिले के लिये नमाज भी अदा की ओर इस से मेरे धर्म को तो कोई हानि नही हुयी, बल्कि मुझे आत्मिक शान्ति मिली.
आप ने बहुत ही सुन्दर लिखा हे काश सारे भारत वाषी आप के ख्याल के हो जाये तो हमारे भारत मे ही नही पुरी दुनिया मे कितनी शान्ति हो।"
धार्मिक जनून के इस माहौल में अगर एक हिंदू, किसी मस्जिद में जाकर मत्था टेकता है, तो हिंदू धर्म की इज्ज़त बढ़ाने में इससे बड़ा योगदान और कुछ नही हो सकता, मेरा यह विश्वास है कि किसी हिंदू को मत्था टेकते देख कर मस्जिद में उपस्थित हर मुस्लिम भाई को एक सुखद आश्चर्य और सुकून की भावना ही नहीं पैदा होगी बल्कि तुंरत उसके दिल में उस व्यक्ति विशेष के प्रति आदर सम्मान देने की भावना भी पैदा होगी !

Monday, September 15, 2008

भारतीय महिला जागरण लेखन और ब्लाग प्रतिक्रियाएं -सतीश सक्सेना


हिन्दी ब्लाग जगत में महिलाओं से जुडी हुई समस्यायें पढ़ते समय हमेशा मैंने एक चुभन सी महसूस की जैसे कुछ छुट गया हो या कि इन लेखों में पुरुषों के प्रति कुछ अधिक कड़वाहट है जो कि सच प्रतीत नहीं होती ! पारिवारिक समस्याओं में, घर टूटने की अवस्थाओं में दोषी जितना पुरूष है, स्त्री का आचरण उससे कम दोषी नही है ! इस आपसी कलह में जहाँ पुरूष, पत्नी के प्रति लापरवाही का दोषी माना जाएगा वहीं स्त्री दोषी है, अपने ही परिवार में, अपेक्षाओं को पूरा न होने के कारण, घुट घुट कर रहने के लिए ! इस विषय पर मेरा विचार है कि कुछ लेखक या लेखिकाएं दुराग्रह से ग्रसित होकर होकर लिखते है ! ऐसे लेख और विचार, समाज के साथ कभी न्याय नहीं कर पाते बल्कि उसको पथभ्रष्ट करने में एक भूमिका ही निभाते हैं ! हमारा भारतीय समाज और संस्कार आज भी विश्व में अमूल्य हैं ! अतिथि देवो भवः एवं हमारी स्नेह भावना आज भी विश्व के सामने बेमिसाल हैं ! प्यार और ममता की यही विशेषता, भारतीय स्त्री को विश्व की अन्य महिलाओं से बहुत आगे ले जाती है !

शादी व्यवस्था के फेल होने में एक महत्वपूर्ण कारण, अपनी पुत्रियों को प्यार और पारस्परिक समझ की सही शिक्षा न देना ही है ! मैं यहाँ पर बहू और पुत्री में कोई भेद नही कर रहा ये सिर्फ़ नारी के दो रूप हैं! माता पिता या सास ससुर हम लोग हैं ! मेरा यह भी मानना है कि पुत्र (दामाद) और पुत्री (बहू ) दोनों ही एक दूसरे को सम्मान दें ! परन्तु पुत्री उम्र में छोटी होने के कारण, पहले सम्मान देने की जिम्मेदारी उठाये ! तो कोई घर अपूर्ण नही हो सकता है ! समय है पति पत्नी के संबंधों में, तल्खी कम कराने का प्रयत्न करने का,  न कि जिस आग में हम झुलसे हैं उसमें अपनी बेटियों और बेटों को भी झोंकने का प्रयत्न करें ! हमें अनुभव है तो इस अनुभव का लाभ अपनी बच्चियों को दें जिससे वे नए घर में जाकर एक नए जीवन का संचार करें जिससे दोनों घरों के रिश्ते और मज़बूत बन सकें और सुख दुःख में साथ खड़े होकर एक दूसरे को ताकत दें !

विवाह के बाद पुत्री अपने घर से विदाई लेकर जब नए घर जाती है तो शायद ही कोई निकृष्ट परिवार ऐसा होगा जहाँ

उसका खुशियों भरे वातावरण में स्वागत न किया जाए ! उस वक्त पुत्री के इस नए घर में, हर व्यक्ति अपने बेहतरीन
रूप को, उसके सामने प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है और प्यार जैसे न्योछावर किया जाता है ! इस खुशनुमा माहौल में, नववधू के मन में किसी प्रकार की शंका न होकर सिर्फ़ अपने नए घर में रमने की तमन्ना हो तो मेरा यह विश्वास है कि कोई ताकत इस माहौल में कटुता नही घोल सकती ! जरूरत है कि इस समय मेरी बेटी अपनी शंकाएँ हटा कर नए उत्साह से अपना घर बसाना शुरू करे !
आजकल कुछ लेख इस प्रकार लिखे जा रहे हैं जिससे प्रतीत होता है कि पुरूष नारी को निरीह और कमज़ोर मान कर अत्याचार करता है, मैं अपने परिवेश में एक भी ऐसे परिवार को नही जानता जिसमे नारी को परेशान करने की हिम्मत भी पुरूष कर सके, इसका अर्थ यह बिल्कुल नही कि नारियों को सताया नही जाता ! परन्तु इतनी अधिक घटनाएँ घटीं हो कि हम नव वधुओं को डरा ही दें, यह अतिशयोक्ति लगती है ! मेरा यह विचार है कि अगर अत्याचारों और विचारों के शोषण की बात करें तो यह ५० - ५० प्रतिशत है ! चूँकि यह विषय हमारे बच्चों से सम्बंधित है अतः बहुत नाज़ुक है, तीक्ष्ण सोच और पूर्वाग्रह ग्रस्त लेखनी अनर्थ कर सकती है अतः इस प्रकार के लेखों पर कमेंट्स बिना भली भांति विचारे नहीं देने चाहिए , मगर आदरणीय लेखिकाओं के इन लेखों पर, हमारे प्रबुद्ध साथियों ने, खुले दिल से, बिना गौर किए, मुक्तभाव कमेंट्स देने में कोई कोताही नही की ! ऐसे लेख जिसमें महिला को शोषित एवं पुरूष को शोषक घोषित किया जाए, हमारे बच्चों के मन में गहरा नकारात्मक प्रभाव डालेंगे मगर फिर भी हम (ब्लागर ) अभिभूत हैं, और खुले मन से तारीफ़ ........ वाह! वाह! और जोरदार तालियाँ........ ......मुझे भय है कि यह तालियाँ हमारी बच्चियों का अधिक नुक्सान करेंगी अतः तारीफ़, विषय देख कर की जाए तो अच्छा होगा !

मेरे मत से हर पुरूष पर उंगली नही उठाई जा सकती और न हर नारी को दोषी कहा जा सकता है ! "नारी को दासता से मुक्ति" "पुरूष के शोषण के खिलाफ आवाज़" जैसे जुमले केवल राजनीति के मंच की शोभा बढ़ाने के लिए ही उचित हैं, इस प्रकार के नारे, घर व्यवस्था में शायद ही कभी आधार पा पायें ? शायद कुछ दिन के लिए नारी को  तथाकथित  "दासत्व " का अहसास होता हो मगर समय के साथ यही नारी घर में एकक्षत्र साम्राज्य की मालकिन भी बनती है और उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ! मैं ऐसे कई परिवारों को जानता हूँ जहाँ पुरुषों का महत्व है ही नही शायद वे "दासत्व" का जीवन निर्वाह कर रहे हैं और वेहद खुश भी हैं !

लेखन अमर है और कुलेखन आने वाली पीढी को एक नयी राह पर ले जाएगा, और भूतकाल में ऐसा हो चुका है जिसमें अधकचरे लेखकों ने अच्छे भले इतिहास के आधारभूत तथ्यों की मिटटी पलीद कर के रख दी और बाद में इसी लेखन को इतिहास और ऐसे लेखको को महानायक स्वीकार कर लिया गया ! अफ़सोस इस बात का है कि कुछ महिलाएं ख़ुद नही सोच पातीं कि वे क्या कह रहीं हैं, और इससे, समय के साथ, सबसे अधिक नुक्सान उन्ही का होने जा रहा है ! अपने शानदार प्रभामंडल और इन तालियों की गडगडाहट में उन्हें आने वाले समय तथा पीढी का उन्हें शायद ध्यान ही नहीं रहता ! वे शायद भूल जाती हैं कि इस विकृत संरचना की सबसे बड़ी शिकार वे ख़ुद ही होंगी ! और भारतीय पुरूष उस समय भी सर पर हाथ रखकर किंकर्तव्यविमूढ़ होगा या शायद आवेश में नारियों की इस गलती पर, दुखी मन के साथ, तालियाँ ही बजाये !

एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप के समय कोई नही सोचता कि हम दूसरे पक्ष के साथ अन्याय कर रहे हैं और अनजाने में भारतीय समाज की मूलभूत संरचना को बिगाड़ रहे हैं !मैं व्यक्तिगत अनुभव से पूरे संयुक्त परिवार की अच्छाइयों की तरफ़ ध्यान दिलाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ! आज के समय में संयुक्त परिवार घटते जा रहे हैं मगर भाई-बहन-माता और पिता के प्यार की आवश्यकता तो सभी को है! जब कोई पुरूष पर उंगली उठाता है तो मुझे लगता है वह मेरे पिता को इंगित कर रहा है और यही बात स्त्री के विषय में हो तो मुझे मां दिखाई देती है ! क्या इन लेखिकाओं को यह महसूस नहीं होता कि जिनपर वे उंगली उठा रही हैं वे उनकी भावना से जुड़े, उनके खून से जुड़े अपने ही अभिन्न अंग हैं ! और भावना प्रधान वर्चस्व की मालकिन होने के कारण सबसे अधिक कीमत उन्हें ही देनी पड़ेगी, क्योंकि परिवार का अगला पुरूष उनका अपना बेटा होगा जिसको शिक्षा देने कि जिम्मेवारी उनकी अपनी ही है !

अंत में ताऊ रामपुरिया का एक वाक्य जो उनके नवीनतम लेख से उडाया गया है, "आशा है कि कृपया सकारात्मक रुप मे ग्रहण करेंगे !" ;-)  

Saturday, September 6, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम ! (पांचवां भाग)

कर्कश भाषा ह्रदय को चुभने वाली, कई वार बेहद गहरे घाव देने वाली होती है ! और अगर यही तीर जैसे शब्द अगर नारी के मुख से निकलें तो उसके स्वभावगत गुणों, स्नेहशीलता, ममता, कोमलता का स्वाभाविक अपमान होगा ! और यह बात ख़ास तौर पर, भारतीय परिवेश में, घर के बड़ों के सामने चाहे मायका हो.या ससुराल, जरूर याद रखना चाहिए ! अपने से बड़ों को दुःख देकर, सुख की इच्छा करना व्यर्थ और बेमानी है !

नारी की पहचान कराये
भाषा उसके मुखमंडल की
अशुभ सदा ही कहलाई है
सुन्दरता कर्कश नारी की !
ऋषि मुनियों की भाषा लेकर,

तपस्विनी सी तुम निखरोगी
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी,  तुम्हीं  रहोगी !


कटुता , मृदुता नामक बेटी
दो देवी हैं, इस जिह्वा पर !
कटुता जिस जिह्वा पर रहती
घर विनाश की हो तैयारी !
कष्टों को आमंत्रित करती, 

गृह पिशाचिनी सदा हँसेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी 
तुम्हीं रहोगी !

उस घर घोर अमंगल रहता
दुष्ट शक्तियां ! घेरे रहतीं !
जिस घर बोले जायें कटु वचन
कष्ट व्याधियां कम न होतीं !
मधुरभाषिणी बनो लाड़िली,

चहुँदिशि विजय तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , घर की रानी, तुम्हीं  रहोगी  !

घर में मंगल गान गूंजता,
यदि 
जिह्वा पर मृदुता होती
दो मीठे बोलों से बेटी  ,
घर भर में दीवाली होती !

उस घर खुशियाँ रास रचाएं 
कष्ट निवारक तुम्हीं लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

अधिक बोलने वाली नारी
कहीं नही सम्मानित होती
अन्यों को अपमानित करके
वह गर्वीली खुश होती है,
सारी नारी जाति कलंकित, 

इनकी उपमा नहीं मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ! घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

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Tuesday, September 2, 2008

हिन्दी ब्लाग और पुरूष मानसिकता !

यह लेख मेरे और एक महिला हिन्दी ब्लॉगर के मध्य हुए पत्राचार का हिस्सा है जो यहाँ प्रदर्शित करना आवश्यक समझता हूँ चूंकि सुझाव बेहद सटीक हैं अतः यहाँ देना मेरे विचार से उचित है , शायद समाज के कुछ कार्य आए ! सम्मानित महिला ब्लागर ने मेरे लिखे एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) पर एक आपत्ति प्रकट करते हुए कहा था, कि हर पिता पुत्री को ही शिक्षा क्यों देता है ?

----- Original Message -----
From: सतीश सक्सेना
To: रचना सिंह
Sent: Tuesday, September 02, 2008 10:32 AM
Subject :हिन्दी ब्लाग और पुरूष मानसिकता !
On 9/1/08, Rachna Singh wrote:

" its high time we educated our man folk satish "

पुरूष मानसिकता के बदलने के सवाल पर आप ठीक हैं रचना जी ! भारतीय समाज के पारंपरिक रूप में पुरूष का अस्तित्व विश्व समाज के समक्ष टिक नही पायेगा ! पुरूष मानसिकता, (जिसमें अहम्, पुरुषत्व,शक्ति तथा कमजोर को सुरक्षा देना जैसे तत्व प्रधान हैं,) से यह हटा पाना कि " यह मेरी है " बेहद मुश्किल कार्य है, शिक्षित और समझदार की मानसिकता बदल सकती है मगर अधिकतर भारतीय परिवार इस परिप्रेक्ष्य में शिक्षित हैं ही नहीं, न स्कूल से और न सामजिक परिवेश से !

"सतीश बहुत जरुरत है कि केवल बेटी को शालीनता की शिक्षा ना दी जाये"

अगर आप मेरे गीत में लिखी मेरी रचना " एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग ) " के सन्दर्भ में कह रही हैं तो यह कविता एक ऐसे पिता का चिंता वर्णित कर रही है जो पारंपरिक रूप से भारतीय समाज और उसी पुरूष समाज का प्रतिनिधित्व कर रहा है इसमे अपनी जान से भी प्यारी पुत्री को पारस्परिक समझ और सामंजस्य के बारे में समझाता है, कि बेटी २४-२५ वर्ष की कच्ची उम्र में नए लोगों के साथ रहकर उनका दिल कैसे जीत पायेगी !

"अगर हम सब बेटो को भी वही पाठ पढाये जो बेटी को तो भारतीयता को बदनाम करने बाले लोग लोग धीरे धीरे समझदार होंगे "

आप इस बात का समर्थन करेंगी कि विवाह के समय, वर पक्ष का, नयी वधू के प्रति जितना उत्साह होता है उतना ही वधू पक्ष अपनी पुत्री के प्रति चिंतित होता है ! अगर ऐसे में पुत्री शंकित मन से न जाकर , नए उत्साह से अपने नए परिवार को अंगीकार के, और दोनों घरों से शंका तथा चिंता का माहौल हटा कर नया उत्साह भरे तो काफ़ी कष्ट प्रद मौकों से छुटकारा मिल सकता है ! इस पूरी कविता में पुत्री को उसकी ताक़त का अहसास दिलाते हुए प्यार से अपने बड़ों का दिल जीतने की बात कही गयी है ! हाँ इसमे, एक और सच्चाई, जिसको बहुत कम नारी लेखिकाओं ने लिखा होगा, को भी स्थान दिया गया है, नवविवाहित पति की मनोदशा को समझना परिवार के सबसे बड़े सुख के अवसर पर, पति सबसे अधिक तनाव ग्रस्त रहता है और उसकी इस मनोदशा को नववधू और उसके अपने परिवार के लोग समझना भी नही चाहते ! पुरूष के इस पक्ष को नारी वादी आन्दोलन के प्रणेता बिल्कुल महत्व नही देते जहाँ नारी के कष्टों पर खूब हाय तौबा रहती है वहीं नवविवाहित लड़के के बारे में कोई सोचता तक नहीं !


"आप की कविता पर भी मेने यही कहा था मै पुरूष जाति के ख़िलाफ़ नहीं लिखती
मै लिखती हूँ उस मानसिकता के ख़िलाफ़ जहाँ स्त्री को शालीन रह कर सब गंदगी सहने की शिक्षा दी जाती हैं "

आज के समय में, स्त्री को शक्तिशाली बनने की आवश्यकता, समय की पुकार है ! इसके अभाव में देश तो पिछ्डेगा ही, अगली पीढियां भी कुछ सीख नहीं पाएंगी ! भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति, कमोवेश पिछडी जनजातियों की भांति ही है, जो अपनी स्थिति को नियति मान कर खुश हैं ! स्त्री दशा में सूधार हेतु, बदनामी के भय से , शिक्षा देने बहुत कम महिलायें आगे आ पाती है समाज की गालियाँ, "बहुत तेज" होने, तथा गंदे आरोप जिससे वह समाज में खड़ी भी न हो पाये, थोपना आम बात है ! और यह सब, सबके समक्ष करते हुए लोग गर्वित होते हैं, तथा ब्लॉग जगत के मशहूर लोग या तो भाग खड़े होते है या इस पर मौन व्रत धारण कर मन ही मन प्रायश्चित्त करते है ! यह और कुछ नहीं सिर्फ़ हमारी कायरता है !

आप का कार्य सराहनीय है, इस हिम्मत के लिए मै आपका अभिनन्दन करता हूँ !

Monday, September 1, 2008

रमजान मुबारक !

सब  भाई बहनों को,

इस माहे मुबारक पर,

मुबारकबाद !

Saturday, August 23, 2008

भारत मां के यह मुस्लिम बच्चे ! (दूसरा भाग)

आज नवभारत टाईम्स के पहले पेज पर दो पर्दानशीं हिन्दुस्तानी लड़कियों की गोद में, बाल कृष्ण को, मोर मुकुट, पीले वस्त्र, लंबा तिलक धारण किए, देखा तो बरबस ही भक्त सूरदास के पद याद आ गए !

"अखियाँ हरि दर्शन की प्यासी ।देखो चाहत कमल नयन को, निस दिन रहत उदासी ॥केसर तिलक मोतिन की माला, वृंदावन के वासी ।"
उक्त चित्र इतना सुंदर था कि समझ नही आता कि तारीफ कैसे करूँ, भावः विह्वल एक चित्र कर सकता है ? कल्पना से परे कि बात लगती है ! अपनी इन मुस्लिम बहनों को प्रणाम, साथ ही नवभारत टाईम्स की जागरूकता को भी !
-लोगो से सुना था कि हमारे मुस्लिम दोस्त, बहुत कट्टर होते हैं, अपने धर्म के अलावा औरों को पसंद नही करते हैं ! उनको एक शानदार जवाब इन मुस्लिम लड़कियों ने जन्माष्टमी के त्योहार पर अपने बच्चों को कृष्ण रूप देकर दिया है ! क्या सुनी सुनाई मानसिकता थी मेरी, मैं आज अपनी उस सोच पर सचमुच शर्मिन्दा हूँ !

Saturday, August 16, 2008

ये समझ नहीं आता इनको -सतीश सक्सेना

स्वतंत्रता दिवस पर उग्रवादियों और तथाकथित जेहादियों को एक संदेश ! 

लूटें घर को, मारें मां को
पल पल में, हुंकारे भरते
गर्दन ऊंची, छाती चौडी,
है शर्म नाम की चीज नहीं,
जब बाल पकड़ यमराज इन्हें,

परदेश में लाकर मारेगा !
तब आँख, फटी रह जायेगी , कोई न बचाने  आयेगा  ! 


किसको धमकी तुम देते हो ,
लाखों मरने को हैं तैयार !
बच्चों का रक्त बहाने को
आओ लेकर सब हथियार!

मारो बम कितने मारोगे, 
इक दिन ऐसा भी आयेगा !
जब, मौत तुम्हारी आने पर , आंसू कोई न बहायेगा !

तुम मासूमों का खून बहा,
ख़ुद को इंसान बताते  हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो

जब मौत तुम्हारी आयेगी,
तब कोई न फूल चढ़ायेगा !
मय्यत में कंधा देने को , घर से भी न कोई आयेगा !


Monday, August 11, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम( चौथा भाग )


यहाँ एक दुखी पिता अपनी लाडली को विवाह की आवश्यकता बताने, समझाने का प्रयत्न कर रहा है ! भारतीय समाज की सबसे मजबूत गांठ, आज पाश्चात्य सभ्यता समर्थन के कारण खतरे में है ! नारी अपने बिभिन्न रूपों को भूल कर अपने एक ही रूप को याद करने का प्रयत्न कर, तथाकथित जद्दोजहद कर रही है ! एवं आधुनिकीकरण की तरफ़ भागता समाज, हमारी शानदार व्यवस्था भूल कर चमक दमक में खो रहा है ! ऐसे समय में ,यह कविता बहुतों के माथे पर बल डालेगी, मगर यह एक भारतीय पिता की भेंट है अपनी बेटी को !

बचपन यहाँ बिताकर अब तुम
अपने नए निवास चली हो !
आज पिता की गोद छोड़ कर
करने नव निर्माण चली हो !
केशव का उपदेश याद कर, 

कर्म भूमि में तुम उतरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

इतने दिन तुम रहीं पिता की
गोद , 
मातृ  का मान बढ़ाया ,
अब जातीं घर त्याग अकेली
एक नया संसार बसाया ,
जब भी याद पिता की आये ,

अपने पास खड़े पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी 
तुम्हीं रहोगी !

कोई नन्हा जीवन तेरा ,
खड़ा हुआ बाहें फैलाए !
इस आशा के साथ, उठाओगी
तुम , अपनी बांह पसारे !
ले नन्हा प्रतिरूप गोद में , 

ममतामयी तुम्हीं  दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं लगोगी !

सृष्टि नयी की रचना करने,
विधि है, इंतज़ार में तेरे !
सुन्दरता की नन्ही उपमा
खड़ी, तुम्हारी आस निहारे
तृप्ति मिलेगी रचना करके

मां की गरिमा तुम्हें मिलेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नर नारी के शुभ विवाह पर
गांठ विधाता स्वयं बांधते,
शायद देना श्रेय 
 तुम्हीं को
जग के रचनाकार चाहते !
जग की सबसे सुंदर रचना 

की निर्मात्री तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

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Sunday, July 20, 2008

अम्मा ! -सतीश सक्सेना

किस अतीत की याद आ रही 
कौन ध्यान में तुम खोई हो !
चारों धामों का सुख लेकर,
किस चिंता में पड़ी हुई हो !
ममतामयी कष्ट में पाकर, 
सारी खुशियां खो जाएंगी 
एक हँसी के बदले घर में , फिर से मस्ती छा जायेगी !

सारे जीवन , हमें हंसाया, 
सारे घर को स्वर्ग बनाया,
कितने कष्ट उठाकर तुमने
हम सबको मजबूत बनाया
तुमको अब कष्टों में पाकर,
खुशियाँ कैसे हंस पाएंगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, फिर से रौनक आ जायेगी !

कष्ट कोई न तुमको आए
हम सब तेरे साथ खड़े हैं,
क्यों उदास है चेहरा तेरा,
इन कष्टों में साथ खड़े हैं !
ऐसे दुःख में अम्मा मुंह में, 
कैसे रोटी चल पाएगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, घर में दीवाली आयेगी !

सबका, भाग्य बनाने वाली,
सबको राह दिखाने वाली
क्यों सुस्ती चेहरे पर आयी
सबको हँसी सिखाने वाली 
तुमको इस दुविधा में पाकर ,
घर में मायूसी छायेगी !
तेरी एक हँसी के बदले,सबकी दुनियां खिल जायेगी !

भारत मां के ये मुस्लिम बच्चे ! (प्रथम भाग)


"...............हिंदी लेखन-पत्रकारिता में जान खपा रहे मुस्लिम साथियों की दर्द-ए-दास्तान बहुत तवील है भाई ।फिर कभी. कहीं नागवार गुजरी हों तो क्षमा करेंगे."
आपका अनुज
शहरोज

उपरोक्त लाइने एक मर्म स्पर्शी ख़त का हिस्सा है ,जो शहरोज ने मुझे लिखा हैं ! शहरोज एक हिन्दी विद्वान्, जिससे मेरा परिचय सिर्फ़ चंद खतों तक सीमित है, जिसने मेरी रचनाओं को छपवाने के लिए, अपनी सहायता का वायदा किया, उस दिन मुझे यह बिल्कुल आभास नहीं था की जो अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए ख़ुद परेशान है, वह अपनी परेशानी भूल कर मेरी मदद को आगे आ रहा है ! प्रकाशकों और सरकारी तंत्र का चक्कर लगाते हुए भी शहरोज, हम जैसे अनजान लोगों की मदद में तत्पर नजर आते हैं !
"शब्द सृजन" को लिखे गए मेरे एक लाइन के पत्र ( ६ जुलाई ०८ ) "मेरे निम्न लिंक्स पर क्लिक कर, अगर छपने योग्य हों तो कृपया सूचित करें ! मैं अपना मूल्यांकन करने मैं असमर्थ हूँ " का शहरोज़ ने इस प्रकार जवाब दिया,
"रचनाकार होने और प्रकाशनों में काम करने के दोरान मिले अनुभव से ये जाना कि पुस्तक प्रकाशन और खरीद बिक्री , फिर लेखकों की रोयल्टी में कितनी बेईमानी शैतानी होती है .ऐसा नहीं है कि कथित मुख्य धारा के नामवर लेखक इन से अनजान हों .चकित करने वाला और शोक की सूचना ये है कि कई जगहों पर ये नामी-गरामी साहित्यकार प्रकाशकों की मदद करते ही दिखलाई देते हैं .यदि आपका कोई आका नहीं है तो पुस्तक प्रकाशन के लिए शायद ही कोई प्रकाशक मिले"इन सारी विषम परिस्थितियों के मद्देनज़र हम कुछ नवजवान मित्रों ने प्रकाशन योजना की शुरुआत की है .-हमारा उद्देश्य लाभ अर्जन न होकर साहित्य -सेवा कहूँ तो अत्युक्ति नहीं .-ये एक समान धर्मा युवा रचनाकारों का अपना मंच है "

पिछले १२ दिनों में लिखे, शहरोज़ का हर ख़त सहेजने योग्य है, दूसरों की मदद में तत्पर, हिन्दी भाषा की सेवा में लगा, भारत का यह सपूत, नौजवानों में एक आदर्श कायम करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है !

अपने देश के समाज की मुख्य धारा में आने के लिए जद्दोजहद करते हुए, अपने इन मुस्लिम बच्चों को देख, मेरी मां का दिल आज रो रहा होगा ! कहीं नही लगता कि यह वही देश है जिसकी सहिष्णुता की हम दुहाई देते कही नहीं थकते,

अभी बहुत काम बाकी है....... बरसों पहले, जब देश में जबानी एकता की दुहाई दी जा रही थी, कोई सोच भी नही पाता होगा कि उर्दू जैसी खूबसूरत भाषा के आँगन में पले और बड़े हुए, हमारे ये बच्चे एक दिन हिन्दी भाषा के उत्थान के लिए, हिन्दी भाषियों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर आगे चलेंगे ! और आज ये चल ही नही रहें हैं, हिन्दी के महा विद्वानों में से एक हैं, मगर चंद हिन्दी भाषी, इन्हे रास्ता चलते, गिराने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते ! संकीर्ण मन यह विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि यह भी इस क्षेत्र के जानकर हो सकते हैं और हमसे बेहतर भी हो सकते हैं !

हिन्दी सिर्फ़ हिन्दुओं की भाषा नहीं, बल्कि सारे देश की जबान है, अगर हमारे मुस्लिम भाइयों ने, अपनी मादरी जबान, उर्दू पर, इसे तरजीह देकर इसे खुशी के साथ अपनाया है तो इसका कारण ,देश के लिए उनका अपनापन और सब कुछ करने के अरमान है ! विपरीत परिस्थितियों में हिन्दी का अध्ययन, कर हिन्दी के विद्वानों में शामिल होने की कोशिश..... यह कोई मामूली बात नहीं ! जहाँ हमें आज आगे बढ़ कर, अपने इन छोटे भाइयों का शुक्रिया अदा करना चाहिए था वहीं उल्टा हम उन पर छींटा कशी कर रहे हैं !चंद बरस पहले जहाँ कभी हिन्दी का एक भी मुस्लिम लेखक नज़र नहीं आता था वहीं आज नासिर शर्मा, असद जैदी, असग़र वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह, शहंशाह आलम, अनवर सुहैल , मजीद और शहरोज़ जैसे लोग चर्चा में हैं ! तकलीफ तो इन्हें उर्दू जबान के नुमाइंदों से मिलनी चाहिए थी पर मिल रही है उनसे, जिन्होंने इन्हे गले लगाना चाहिए ! हमें गर्व होना चाहियें अपने देश के इन मुस्लिम हिन्दी विद्वानों पर, जो सही मायनों में इस देश कि संस्कृति का एक हिस्सा बनकर, इसे हर तरह आगे बढ़ाने में मदद कर रहें हैं !

मैं अपने देश के विशाल ह्रदय को अच्छी तरह से जानता हूँ , और अपने मुस्लिम भाइयों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मेरे जैसे हजारो दोस्त, और सच्चे भारतीय हैं जो इस शुरूआती दर्द में आपके साथ देंगे , भले ही वह परोक्ष रूप में सामने नहीं दिखाई पड़ रहे ! मेरा यह भी विश्वास है कि एक दिन हिन्दी जगत से वह आदर - सम्मान आपको जरूर मिलेगा जिसके आप हक़दार हैं !
मेरा यह मानना है , लेखक तथा कवि , चाहे वह किसी भाषा के क्यों न हों , संकीर्ण स्वाभाव के हो ही नहीं सकते ! संकीर्ण स्वभाव का अगर कोई लेखक है तो वह सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए, बना हुआ लेखक है उसे आम पाठक , उन्मुक्त ह्रदय से कभी गले नहीं लगायेगा ! ऐसे व्यक्तियों को लेखक नहीं कहा जाता ! वे सिर्फ़ अपने ज्ञान का दुरुपयोग करने आए है और ढोल बजाकर चले जायेंगे ! कवि ह्रदय, समाज में अपना स्थान सम्मान के साथ पाते हैं और शान के साथ पाते हैं !

जहाँ ह्रदय में धारा बहती
प्रेम भरे अरमानों की,
प्यार हिलोरे लेता रहता,
वहीं रचा जाता है गीत

नहीं द्वेष पाखंड दिखावा
नही किसी से मन में बैर
जहाँ नही धन का आड्म्बर,
वहीं रचा जाता है गीत !

सरल भाव से सबको देखे
करे सदा सबका सम्मान
निश्छल मन और दृढ विश्वास,
वहीं रचा जाता है ,गीत !

प्रिये गीत की रचना करने
पहला कवि जहाँ बैठा था
निश्चय ही वसुधा के मन में,
फूट पड़ा होगा संगीत !

कविता नहीं प्रेरणा जिसकी
गीत नहीं भाषा है दिल की
आशा और रुझान जहाँ पर
प्रिये उसे कहते हैं गीत !

Friday, July 18, 2008

मत पढिये इन ब्लाग्स को !

                           मैंने कुछ समय पहले, कहीं पढ़ कर, ब्लाग के बारे, सोचना, शुरू किया था,! मेरा मानना था कि अपने विचार व्यक्त करने का यह अच्छा साधन है, और इसके ज़रिये शायद समाज सेवा करने का अपना शौक पूरा कर पाउँगा ! जिन मशहूर ब्लाग्स के बारे में अखबारों में पढा था कि वे बहुत अच्छा कार्य कर रहें हैं, उन्हें रोज पढ़ना शुरू किया, मगर जल्दी ही समझ में आ गया कि कहीं कोई बड़ी गड़बड़ है, और लगभग २ महीने बाद, अब तो यह समझ ही नही आता कि किस ब्लाग को अच्छा कहूं और किस को बुरा, जिसको अच्छा कहता हूँ वही कुछ दिन में अपनी असलियत पर आ जाता है !
                       हर ब्लाग पर अपने अपने ग्रुप बने हुए हैं, जो हमले से बचने और दूसरे से मुकाबला करते हैं , और यह सभी स्वनामधन्य साहित्यकार और मशहूर पत्रकार हैं जिनसे सब कोई डरते हैं, यह वो हैं जो दावा करते हैं कि देश को कभी सोने नहीं देंगे ! आज एक बहुत मशहूर ब्लाग ( जिसको मैं बहुत पसंद करता हूँ/ था शायद नाम के कारण ) के द्बारा, बताई गयी एक ब्लाग पर गया तो लगा कि किसी पॉर्न ब्लाग पर आ गया, अपने विश्वास को बहुत गालियाँ दी और बाहर आ गया, साथ ही एक तकलीफ भी कि पढ़े लिखे व्यक्ति जिम्मेवार क्यों नहीं हैं ? क्या उनका कोई परिवार नही है या कभी होगा भी नही, इंटरनॅशनल नेटवर्क पर हम भारतीय क्या दे रहे हैं ? हर एक ब्लाग बेहतर प्रदर्शन करने के लिए नए हथकंडे आजमा रहा है, और जो ब्लाग लोकप्रिय हैं, वे भी एक दूसरे की टांग खींचने पर लगे हैं !
                       अजीब स्थिति में हूँ, कष्ट के साथ !मैं किसी कि आलोचना नहीं करना चाहता, क्योंकि सब कहीं न कहीं अच्छा कार्य भी कर रहे हैं ! मगर चाहता हूँ कि यह अपनी एनर्जी देश हित में लगाये, उस से ही भला होगा, अपनी विद्वता का उपयोग इस कम पढ़े लिखे देश में, हम जैसे कम पढ़े लोगों को, कुछ अच्छा देकर, सुखी बनायें !

Wednesday, July 16, 2008

असद जैदी और इरफान !

इस तकलीफ में कोई बोलता क्यों नही ?
कम से कम साहित्य तथा प्रकाशन क्षेत्र में कार्य करने बाले लोगों में, संकीर्ण विचारधारा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए ! मुझे आश्चर्य है कि जब प्रतिष्ठित विद्वान् भी असंयत भाषा का उपयोग करने लगते हैं ! यह कौन सी विद्वता है और हम क्या दे रहे हैं, अपने पढने वालों को ? अगर हम सब मिलकर अपनी रचनाओं में १० % स्थान भी अगर, सर्व धर्म सद्भाव पर लिखें , तो इस देश में हमारे मुस्लिम भाई कभी अपने आपको हमसे कटा हुआ महसूस नहीं करेंगे, और हमारी पढ़ी लिखी भावी पीढी शायद हमारी इन मूर्खताओं को माफ़ कर सके !
दोनों भाइयों ने इस मिटटी में जन्म लिया, और इस देश पर दोनों का बराबर हक है ! हमें असद जैदी और इरफान सरीखे भारत पुत्रो के अपमान पर शर्मिन्दा होना चाहिए !
कवि और लेखक स्वाभाविक तौर पर भावुक और ईमानदार होते हैं , विस्तृत ह्रदय लेकर ये लोग समाज में जब अपनी बात कहने जाते हैं तो वातावरण छंदमय हो उठता है , कबीर की बिरादरी के लोग हैं हमलोग, न किसी से मांगते हैं न अपनी बात मनवाने पर ही जोर देते हैं, नफरत और संकीर्ण विचार धारा से इनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नही हो सकता ! ऐसे लोगों पर जब प्रहार होता है तो कोई बचाने न आए यह बड़ी दर्दनाक स्थिति है ! न यह हिंदू हैं न मुसलमान , इन्हे सिर्फ़ कवि मानिये और इनके प्रति ग़लत शब्द वापस लें तो समाज उनका आभारी होगा ! एक कविता पर गौर करिए ....

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में
वे बुद्धि के ढेर
इन्द्रियां झकाझक उनकीं
सर्दी-खांसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते......

उपरोक्त कविता लिखी है विजय शंकर चतुर्वेदी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार ने और इसे प्रकाशित किया है " पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए " नाम के शीर्षक से "कबाड़खाना " में ! http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html

ताज्जुब है कि कोई पहाड़ नहीं टूटा , न तूफ़ान आया , कोई प्रतिक्रिया नही हुई , कहीं किसी को यह रचना अपमानित करने लायक नहीं लगी। और लोगों ने, सारी रचनाओं की, चाहे समझ में आईं या नहीं, तारीफ की, कि वाह क्या भाव हैं, और कारण ?

-कि अशोक पाण्डेय तथा चतुर्वेदी हमारे अपने हैं !
-लिखने से क्या होता है, हमारे धर्म में कट्टरता का कोई स्थान नहीं ! अतः कोई आहत नहीं हुआ ! इस कविता से सबको कला नज़र आई !

मजेदार बात यह है कि यह उपरोक्त कविता लोगों की प्रतिक्रिया जानने को ही लिखी गयी थी, कि आख़िर असद जैदी जैसे मशहूर साहित्यकार की लोगों ने यह छीछालेदर करने की कोशिश क्यों की ! और जवाब मिल भी गया !

एक ख़त मिला मुझे गुजरात से रजिया मिर्जा का उसे जस का तस् छाप रहो हूँ , बीच में से सिर्फ़ अपनी तारीफ़ के शब्दों को हटा दिया है ( मेरी तारीफ यहाँ छापना आवश्यक नही है ) जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ...

नमस्ते सतिश जी, आपका पत्र पढा। पढकर हैरान नहीं हुं क्यों कि मै ऐसे लोगों को साहित्यकार मानती ही नहिं हुं जो लोग धर्मो को, ईंसानों को बाटते चलें। मै तो ---------------------------------------------------------------------------------------------------आपकी पहेचान है। उन लोगों को मैं' साहित्यकार' नहिं परंतु एसे विवेचकओं की सुचिमें रखुंगी जो अपनी दाल-रोटी निकालने के लिये अपने आपको बाज़ार में बिकने वाली एक वस्तु बना देते है। मैं अस्पताल में काम करती हुं । मेरा फ़र्ज़ है कि मै सभी दीन-दुख़ियों का एक समान ईलाज़ करुं, पर यदि मैं अपने कर्तव्य को भूल जाऊं तो इसमें दोष किसका? शायद मेरे "संस्कार" का ! हॉ, सतिष जी अपने संस्कार भी कुछ मायने रखते है। हमको हमारे माता-पिता, समाज, धर्म, इमान ने यही संस्कार दीये है कि ईंसान को ईंसानों से जोडो, ना कि तोडो।सतिष जी आपकी बडी आभारी हुं जो आपने एसा प्रश्न उठाया। मैं एक अपनी कविता उन मेरे भाइ-बहनों को समर्पित करती हुं जो अपने 'साहित्य' का धर्म निभा  रहे है। सतीश आपसे आग्रह है मेरी इस कविता को अपने कमेन्ट में प्रसारित करें। आभार

दाता तेरे हज़ारों है नाम...
कोइ पुकारे तुज़े कहेकर रहिम,
और कोइ कहे तुज़े राम।...
दाता..........
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पहेरा,
तेरा 'राज़'बड़ा ही गहेरा,
तेरे ईशारे होता सवेरा,
तेरे ईशारे हिती शाम।...
दाता......
ऑंधी में तुं दीप जलाये,
पथ्थर से पानी तुं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तु बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।...
दाता.........
क़ुदरत के हर-सु में बसा तु,
पत्तों में पौन्धों में बसा तु,
नदीया और सागर में बसा तु,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तु,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।...
दाता..........
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सुरज और ये तारे,
पतज़ड हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देख़ुं मैं ले के तेरा नाम।.........
दाता........

ऐसी कवितायें कबीर दास जी लिखते थे , मैं रजिया जी का हार्दिक शुक्रगुजार हूँ , यह कविता प्यार का एक ऐसा संदेश देती है जो कहीं देखने को नहीं मिलता ! यह गीत गवाह है की कवि की कोई जाति व् सम्प्रदाय नहीं होता
वह तो निश्छलता का एक दरिया है जो जब तक जीवन है शीतलता ही देगा !रजिया मिर्जा की ही कुछ पंक्तियाँ और दे रहा हूँ !

"झे मालोज़र की ज़रुर क्या?
मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये !
जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले,
मुझे वो जहाँ की तलाश है।
जो अमन का हो, जो हो चैन का।
जहॉ राग_द्वेष,द्रुणा न हो।
पैगाम दे हमें प्यार का ।
वही कारवॉ की तलाश है।"

मुझे बेहद अफ़सोस है कि इस विषय पर बहुत कम लोग बोलने के लिए तैयार है , मैं मुस्लिम भाइयों की मजबूरी समझता हूँ, भुक्ति भोगी होने के कारण उनका न बोलना या कम बोलना जायज है परन्तु, सैकड़ों पढ़े लिखे उन हिंदू दोस्तों के बारे में आप क्या कहेंगे जो अपने मुस्लिम दोस्तों के घर आते जाते हैं और कलम हाथ में लेकर अपने को साहित्यकार भी कहते हैं !
आज कबाड़ खाना पर असद जैदी के बारे में तथाकथित कुछ हिंदू साहित्यकारों की बातें सुनी, शर्मिंदगी होती है ऐसी सोच पर ! मेरी अपील है उन खुले दिल के लोगों से , कि बाहर आयें और इमानदारी से लिखे जिससे कोई हमारे इस ख़ूबसूरत घर में गन्दगी न फ़ेंक सके !

Monday, July 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! ( तीसरा भाग )

सारा जीवन किया समर्पित परमारथ में नारी ही ने , विधि ने ऐसा धीरज लिखा केवल भाग्य तुम्हारे ही में !उठो चुनौती लेकर बेटी, शक्तिमयी सी तुम्ही दिखोगी !!

दृढ़ता हो, सावित्री जैसी ,
सहनशीलता हो सीता सी !
सरस्वती सी, महिमा मंडित

कार्य साधिनी अपने पति की !
अन्नपूर्णा बनो, सदा ही

घर की शोभा तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नारी के सुंदर चेहरे पर,
क्रोध कभी न आने पाये !
क्षमा, दया और ममता बेटी
सदा विजेता होते आये !
गुस्सा कभी पास न आये ,

रजनीगंधा सी  महकोगी  !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !


स्वागत मेहमानों का करने 
दरवाजे पर हंसती आये !  
घर के दरवाजे से पुत्री ,
याचक कभी न खाली जाए !
मान करोगी अगर मानिनी,
महिमामयी तुम्हीं  दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नर नारी में परम त्याग की 
शिक्षा देती, सारे जग को !
माता, पिता, सहोदर भाई
और छोड़ती है, निज घर को !
भूल पुराने घर को अपने
नयी रौशनी लानी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं रहोगी

सारा जीवन किया समर्पित
परमारथ में , नारी ही ने !
विधि ने ऐसा धीरज लिखा
केवल भाग्य, तुम्हारे ही में !
उठो चुनौती लेकर बेटी ,
शक्तिमयी सी तुम्हीं दिखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

Next http://satish-saxena.blogspot.in/2008/08/blog-post.html

Saturday, July 12, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ( दूसरा भाग )

पत्र के पहले भाग में, बेहद प्रतिष्ठित लेखिकाओं तथा लेखकों ने अपनी उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएं दी, मैं यह स्पष्ट करना कहता हूँ कि इस कविता में बेटी को नसीहत नहीं बल्कि एक बेहद प्यार करने वाले पिता की इच्छा है कि जितना प्यार तुम मुझे करती हो उतना ही प्यार अपने नए पिता, मां और बहिन को करना और इस प्यार की शुरुआत, वहां जा कर तुम्हे करनी है, बिना उनसे उम्मीद किए !

चूंकि यह ख़त पुत्री के लिए है, स्वाभाविक है कि मुझे उसकी भावी ससुराल से कोई उम्मीद नही करनी चाहिए ! समझाने का अधिकार मुझे केवल अपनी पुत्री को ही है ...

सदा अधूरा , पति रहता है
यदि तुम साथ नहीं दे पाओ !
अगर , पूर्ण नारीत्व चाहिए
पति की अभिलाषा बन जाओ !
बनो अर्ध नारीश्वर जैसी ,
हर साधना तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

पति-पत्नी हैं एक डाल पर
लगे फूल दो बगिया  में  !
जब तक खिलें  न साथ ,
अधूरे लगते हैं सुंदरता में !
एक खिले , दूजा मुरझाये ,
बिन बोले सब बात कहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कमजोरों का साथ दिया तो  
ईश्वर देगा, साथ तुम्हारा !
वृद्ध जनों का प्यार मिला ,
सारा जीवन सफल तुम्हारा 
आशीर्वाद बड़ों का लेकर ,
सबसे आगे तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कार्य करो संकल्प उठा कर
खुशियां घर में हंसती आये !
स्व-अभिमानी बनकर रहना
पर अभिमान न होने पाये !
दृढ़ विश्वास ह्रदय में लेकर, 
कार्य करोगी सफल रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कमजोरों के लिए सुपुत्री,
जिस घर के दरवाजे खुलते !
आदि शक्ति परमात्मा ऊपर,
जिस घर श्रद्धासुमन बिखरते !
कभी अँधेरा पास न आए 
सूर्य-किरण सी तुम निखरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !
next part http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_14.html

refer :

http://sumanpatil-bhrashtachar-ka-virus.blogspot.in/2014/01/blog-post_11.html

Friday, July 4, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग )

आधुनिकतावाद की ओर भागते भारतीय समाज में, पाश्चात्य सभ्यता की जो बुराइयाँ आईं, हम भारतीयों के लिए , बेहद तकलीफदेह रहीं ! और आग में घी डालने का कार्य किया, पैसा कमाने की होड़ में लगे इन टेलीविजन चैनलों ने, चटखारे लेकर, सास के बारे में एक्सपर्ट कमेंट्स देती तेजतर्रार बहू, लगभग हर चैनल पर नज़र आने लगी और फलस्वरूप तथाकथित, शिक्षित विवाहित भारतीय महिलाएं यह भूल गईं कि इस टीवी चैनल का आनंद, उनकी ही तरह उसकी भाभी भी ले रही है , और इस तरह भारतीय महिलाओं के लिए नए संस्कार हर घर में पनपने लगे ! नए "गुणों" को सीखतीं, हमारी विवाहित पुत्रियाँ यह भूलती जा रही हैं कि वह एक दिन इसी घर में सास एवं मां का दर्जा भी पाएँगी तथा वही संस्कार उनके आगे होंगे !

भले ही कोई पुरूष या महिला नकार दे, पर क्या यह सच नहीं है कि किसी घर ( मायका या ससुराल ) में, माँ को वो सम्मान नही मिलता जिसकी वो पूरी हकदार है ! और जननी का सम्मान गिराने का अपराध सिर्फ़ भावी जननी ( बेटी ) ने किया और असहाय पिता (सहयोगी पति ) कुछ न कर पाया !

हर स्थान पर पुत्री यह भूल गई कि सास भी एक पुत्री है और मेरी भी कहीं मां है, जिस बहू ने सास का मजाक उड़ाया उसे उस समय यह याद ही नही आया कि मेरी मां के साथ भी यह हो सकता है, और जब मां के साथ वही हुआ तो वो लड़की ( एक बहू) असहाय सी, अपनी भाभी का या तो मुंह देखती रही या उसको गाली दे दे कर अपना मन शांत किया !

नारी जागरण का अर्थ यह बिल्कुल नही कि हम अपने बड़ों की इज्जत करना भूल जायें, या बड़ों की निंदा करने और सुनाने में गर्व महसूस करें ! अपनी सास का सम्मान, अपनी मां की तरह करके, बच्चों में संस्कार की नींव डालने का कार्य शुरू करें ! सास और ससुर के निर्देश, अपने माता पिता के आदेश की तरह स्वीकार करने लगें तो हर घर एक चहकता, महकता स्वर्ग बन सकता है !

मैं, एक कविह्रदय, यह नहीं चाहता कि मेरी पुत्री यह दर्द सहे व महसूस करे ! और यही वेदना यह ख़त लिखने के लिए प्रेरणा बनी !

मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं ,
याद लाडली रखना इसको
यदि तुमको कुछ पाना हो

तो देना पहले सीखो पुत्री !
कर आदर सम्मान बड़ों का,
गरिमामयी तुम्हीं होओगी  !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

उतना ही कोमल मन सबका  
जितना बेटी, तेरा मन है !
उतनी ही आशाएँ  तुमसे ,
जितनी तुमने लगा रखी हैं !
परहित कारक बनो सुपुत्री , 
भागीरथी तुम्हीं  होओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

उनकी आशाओं को पूरा,
करने का है धर्म तुम्हारा
जितनी आशाओं को पूरा
करवाने का स्वप्न तुम्हारा
मंगलदायिनि  बनो लाडली,
स्वप्नपरी सी तुम्हीं लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

पत्निमिलन की आशा लेकर
उतना ही, उत्साह ह्रदय में  !
जितनी तुमको पिया मिलन
की अभिलाषा है गहरे मन में
प्यार किसी का कम न मानो, 
साध तुम्हारी पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

पति है जीवन भर का साथी

दुःख के साथ ख़ुशी का साथी ! 
तेरे होते, कभी अकेलापन 
महसूस  न  , करने  पाये ! 
सदा सहायक रहो पति की, 
हर अभिलाषा पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !
......क्रमश
http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_12.html
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