Friday, June 17, 2016

सब लोग क्या कहेंगे - सतीश सक्सेना

कलमधारियों के बीच शायद मैं अकेला बुद्धिहीन, विवेकहीन हूँगा जिसने ६० वर्ष की बाद दौड़ना शुरू किया कई विद्वान मित्र सोंचते होंगे कैसे दिन आ गए हैं कि पहलवानी करने वाले लोग भी कलम उठाकर अपने आपको लेखक अथवा कवि समझते हैं बहरहाल मैं सोंचता हूँ कि एथलीट कोई भी बन सकता है बशर्ते उसमें कुछ नया करने का मन हो , मजबूत अच्छा शक्ति के आगे बढ़ती उम्र का कोई बंधन, उसे रोक नहीं पायेगा !
लोग कहेंगे कि आप खुश किस्मत हैं कि आपको इस उम्र में कोई बीमारी नहीं है अन्यथा इस उम्र में दौड़ के दिखाने में, नानी याद आ जाती ! मैं सोंचता हूँ , बीमारी तो कई थीं और हैं भी , मगर मैं उन पर कभी ध्यान ही नहीं देता , मेरा यह विश्वास है कि बीमारी ठीक करने का काम मेरे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति का है जिसे मैं दौड़कर और मजबूत बना रहा हूँ ! 
ध्यान देता हूँ तो सिर्फ दौड़ने पर ताकि बढ़ता भयावह बुढ़ापा दूर दूर तक नज़र भी न आये और मुझे हर रोज सुबह लगातार ५-१० किलोमीटर दौड़ता देख, डर के कहीं छिप जाए कि यह आदमी पागल है कौन इससे पंगा ले !
जब सुबह मोहल्ले में सब सो रहे होते हैं उस वक्त कुछ एक टहलने वालों के सामने से दौड़ता हुआ पसीने से लथपथ जब मैं अपने घर में घुसता हूँ तब बहता हुआ पसीना अमृत जैसा लगता है और लोग आश्चर्य चकित होते हैं कि कमाल है इस उम्र में यह दौड़ क्यों रहा है उस समय उनके इस हैरानी के अहसास से ही मेरी सारी थकान गायब हो जाती है और चेहरे पर मुस्कान आ जाती है !
मुझे याद है ५ वर्ष पहले मैंने कुकिंग गैस का सिलेंडर एक झटके से उठाया था और मेरे सीधे हाथ की सॉलिड मसल्स एक झटके से टूट कर  अपनी जगह से हटकर लटक गईं थी उस दिन लगा था कि लगता है वे दिन गए जब खलील खां फ़ाख्ते उड़ाया करते थे , मगर आज दौड़ने के साथ ही वह मसल्स फिर रिपेयर होकर न केवल पहले से अधिक ताकतवर बन गयी है बल्कि अब अपने आपको अधिक  शक्तिशाली महसूस करता हूँ !
कल २ बजे की तेज धूप में २ किलोमीटर सड़क पर पैदल चलकर जब टपकते पसीने के साथ मॉल में घुसा तब कार से उतरते लोगों को देख बड़ा सुकून महसूस हो रहा था कि मैं वह कर सकता हूँ जो इस गर्मीं में इनके बस की बात नहीं और मैं वही हूँ जो अपनी पूरी युवावस्था में बस में कभी इसी लिए नहीं चढ़ा था कि दिल्ली की बसों में चढ़ने के लिए उनके पीछे भागना पडेगा ! पूरे जीवन पैदल न  चलने वाला व्यक्ति प्रौढ़ावस्था या बुढ़ापे में, जो भी आप समझें , बिना रुके, लगातार 10 किलोमीटर दौड़ सकता है , इसका अहसास ही, पूरे दिन दिमाग को तरोताजा रखने के लिए काफी है !
-मुझे याद है रनर का सबसे मुश्किल पहला महीना जब मैं रनिंग की कोशिश कर रहा था , उन दिनों पैरों में तेज दर्द होता था लगता था अब नहीं दौड़ पाउँगा वह दर्द अब कहाँ गया इसका पता ही नहीं चला  .... 
-मुझे याद है कि 50 वर्ष की उम्र में, ह्रदय की धड़कन तेज होने पर, एक बार मैं पूरी रात हॉस्पिटल में ऑक्सीजन के सहारे रहा तब लोगों ने कहा था कि बाज आइये अब आपकी उम्र हो गई है मगर अब ६२ वर्ष में ,ह्रदय लगता है दुबारा जवान हो गया है 
-बढे ब्लड प्रेशर का कभी कोई इलाज नहीं किया न कराया आजकल जब चेक करता हूँ , परफेक्ट जवानी वाला  82 / 140 आता है !
-कॉन्स्टिपेशन लगता है कभी था ही नहीं  .... 
- उँगलियों तक खून का बहाव लाने के लिए पागलों की तरह तालियां बजाना कब का बंद कर चुका हूँ !
सो अपनी शानदार तोंद को , बढ़िया लम्बे कुर्ते से छिपाए मंच पर बैठे साहित्यकारों, कवियों , लेखिकाओं से निवेदन है कि इस लेख पर सरसरी नजर न डाल , ध्यान से पढ़ें और कल से जॉगिंग के लिए घर से निकलने का संकल्प लें, भले ही गुस्से में गालियाँ मेरे हिस्से में आएं मगर प्लीज़ सुबह सवेरे ट्रेक पर जाने में अधिक न सोचिये कि सब लोग क्या कहेंगे 
याद रखें हमारे देश में सबसे अधिक डायबिटीज़ तथा ह्रदय रोगी हैं तथा रनिंग इन सबका सबसे अच्छा और निरापद इलाज है , Running is the best cardio exercise ...
आप सबके स्वास्थ्य के लिए चिंतित .... 

Wednesday, June 15, 2016

तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं -सतीश सक्सेना

हम भी यूँ तो गिरेंगे, जमीं पर नहीं !

जीते जी तो झुकेंगे, कहीं पर नहीं !
हर गली से, गुज़रते हैं , हँसते हुए
वे मेहरबां सभी पर, हमीं पर नहीं !

हंसने का भी समय, हो मुक़र्रर यहाँ 
खूब खुल के हंसें पर गमीं पर नहीं ! 

वैसे हंसकर कहूँ , यदि बुरा न लगे 
तुम निछावर हुये हो, हमीं पर नहीं ! 

पर भरोसा सा है, आओगे एक दिन 
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं !

रनिंग की जद्दोजहद पर यह लेख लड़कियों, महिलाओं के लिए भी है - सतीश सक्सेना

Running ka Bachpan- "Appreciate a novice that's the only advice"

Appreciation and encouragement do wonders for a kid (and to a novice runner) taking baby steps--> balancing/ falling/ trying --> and the baby walks --> finally runs :) A novice runner tries, gets breathless, overcomes inhibitions, manages pain and finally a star runner is born...!
It doesn't really matter where you are, what you are or who you are; What really matter is your Will to succeed and belief "I think I can..."


कोच रविन्दर की यह संक्षिप्त पोस्ट मेरी नज़र में शायद उनकी सबसे बेहतरीन पोस्ट है जो एक अनाड़ी मगर मजबूत इरादे वाले रनर के हौसले व मनोदशा बताने के लिए पर्याप्त है ! 
मुझे दुःख है कि अधिकतर शानदार रनर, जिन्होंने इस स्टेज पर पंहुचने के लिए ढेरों पसीना बहाया है अपना अनुभव शेयर नहीं करते हैं या यूं कहें कि उन्हें लिखने में झिझक होती है , काश वे यह सोंचते कि अगर वे अपना अनुभव लिख दें तो कितने नवोदित रनर उस दर्द तकलीफ से बच जाते जो वे अनाड़ीपन में झेल चुके हैं ! 
बड़े बूढ़े कहते हैं एथलीट या पहलवानों में बुद्धि नहीं होती अगर यह सच मान लें तो शायद यही कारण होंगे कि ज्यादातर रनर उसी श्रेणी के हैं जो पूरे जीवन ठोकरें खा खा कर, घायल मसल्स लेकर भी, लंगड़ाते हुए खुद शानदार रनर बन चुके हैं ,मगर वही अनुभव दूसरों को बांटने की समझ या दिल नहीं है ! यह शब्द कड़वे जरूर लगेंगे मगर सच्चाई यही है कि इस क्षेत्र में रनिंग के बारे में बहुत कम लिखा गया है !मैं सोंचता हूँ कि यह जिम्मेदारी अथाह कष्ट उठाकर प्रथम श्रेणी में दौड़ते उन्ही रनर की है जो अपने से जूनियर मगर तमीज की रनिंग सीखने की जद्दोजहद में लगे एक कमजोर रनर  के लिए कुछ देना नहीं चाहते !
फिर सोंचता हूँ कि बिना मदद के सीखना , शायद अधिक अच्छा है कि उड़ना सीखने के लिए बच्चे को कई बार ऊंचाई से गिरना पड़ता है , और अंततः वह अनन्त आकाश की गहराइयों में एक दिन शान से उड़ रहा होता है ! 
एक अनुभव साझा करता हूँ , मुझे दूसरों के मुकाबले पसीना कई गुना अधिक आता है, मगर मेरा ध्यान पसीने के जरिये बहते शारीरिक शक्ति के लिए बेहद आवश्यक साल्ट पर कभी नहीं गया , २१ मई को , 44 डिग्री तापमान में starry night
अजय कुमार 
marathon मुझे बेहद भारी पड़ा जब मैं पहले 10 किलोमीटर में ही लगभग दो-तीन लीटर पसीना बहा चुका था, हेडबैंड से टपकता नमकीन पसीना आँखों में जा रहा था और इस पसीने के जरिये बहते शरीर के बहुमूल्य साल्ट तेजी से शारीरिक शक्ति घटा रहे थे , शुरुआत से ही से मैंने अपनी गति धीमी रखी थी और जब 12 किलोमीटर के बाद मैंने अपनी गति बढ़ाना चाहा तब पैरों में क्रैंप आने शुरू हो गए ! मैं अपनी सीमित शारीरिक शक्ति को बचाते हुए गति धीमे कर जैसे तैसे दौड़ता रहा , काफ मसल्स में होते तीखे दर्द के बावजूद दृढ निश्चय था कि दौड़ हर हाल में पूरी करनी है , अंततः मेडल लेते हुए पसीने में बहते साल्ट की कमी की वैल्यू समझ आ चुकी थी ! 21 km रनिंग के बाद मुझे कम से कम 4-7 दिन का आराम करना चाहिए था जो
संतोष कुमार 
लगातार सौ दिन दौड़ने में शामिल होने के कारण  मैं नहीं कर सका और अगले दिन से ही दौड़ना शुरू कर दिया और 21 तारीख की हाफ मैराथन के बाद २२ तारीख से लेकर ४ जून तक मैं 53 किलोमीटर और दौड़ चुका था जिनमें पांच दिन मैं 5 किलोमीटर से 8 किलोमीटर तक दौड़ा था , बिना रेस्ट और एक्स्ट्रा साल्ट के लिए दौड़ने के पहले किलोमीटर में जांघों व् कमर में अजीब सी दुखन महसूस कर रहा था , listen to your body के तहत मुझे लगा कि मैं अति कर रहा हूँ अंततः मुझे अपनी लगातार रनिंग बंद करनी पड़ी , शायद इस दर्द का कारण मीठे का पूर्ण त्याग एवं बेहद पसीने के कारण बहते पोटेशियम सोडियम की कमी रही होगी ! 
अब पिछले ९ दिन से लगातार रेस्ट कर रहा हूँ , कल पहली बार काफी दिन बाद साइक्लिंग और पुशअप किये जो दर्द के दौरान, करना असम्भव हो गए थे ! 
यह आवश्यक है कि नए रनर के लिए हिम्मत दिलाते रहें उसके लिए तालियां बजाते रहें यही काफी होगा वह लड़खड़ाते हुए, गिरते हुए अपने पैरों से अपने आपको बैलेंस करके, दौड़ने की कोशिश तो कर रहा है, विश्वास रखिये आखिर कार एक दिन वह दौड़ेगा .... 
एक नौसिखिया रनर अपनी उम्र भूलकर, झिझक छोड़कर, भारी बदन लेकर भी, अपना दर्द और तकलीफें भुलाकर अगर दौड़ने निकला है तो विश्वास रखें कि वह एक दिन स्टार रनर बनेगा और शान से दौड़ेगा 
इससे कोई लेना देना नहीं कि आप क्या करते हैं, कहाँ रहते हैं ,और कौन हैं ? रनिंग के लिए आवश्यक सिर्फ आपकी इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास है कि अगर वे कर रहे हैं तो मैं भी कर सकता हूँ !
अंत में मैं दो डायबिटिक रनर जिन्होंने अपनी डायबिटीज़ बिना दवा कंट्रोल कर ली उनके चित्र दे रहा हूँ , अजय कुमार एवं संतोष कुमार ने , न केवल बीमारी पर विजय पाई है बल्कि रनिंग में शानदार ऊंचाइयां भी हासिल की हैं ! 
हैप्पी रनिंग !!!

Monday, June 6, 2016

रूद्र अब की बाढ़ में इस देश का कूड़ा गहें - सतीश सक्सेना

रूद्र अब की बाढ़ में इस देश का कूड़ा गहें !  
धवल खद्दर वस्त्र पहने,कुछ मदारी तो बहें !

हे प्रभु भूकम्प का कुछ हो असर मेरे देश में !
नफरतों की,रंजिशों की,कुछ दिवारें तो ढहें !

धूर्त  गुरु, मक्कार चेले , हैं इसी उम्मीद में !
धुर गंवारों की गली में भाग्य इनके भी जगें !

मान्यवर की बेहयाई,है शिखर पर आजकल  
मन वचन कर्मों से डाकू,शक्ल से साधू लगें !

धर्म रक्षक भी परेशां, ताकत ए साईं की देख
कैसे इस दमदार शिरडी को भी,गेरू से रंगें ! 

Sunday, June 5, 2016

कैसी व्यथा लिखा कर लाई अपनी मांग भराई में - सतीश सक्सेना

अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों  एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके हैं यह आपको पता ही नहीं चलता !
बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं !
भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते  पाये जाते हैं ! 
अक्सर इसकी  शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है !
आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी  याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा !
घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते  !
अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए !
दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें  .....
आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी !

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! 
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !



कैसी व्यथा लिखा के लाई अपनी मांग भराई में -सतीश सक्सेना

अक्सर हम लोग सोंचते हैं कि हम जो कुछ बेईमानी अथवा गलती कर रहे हैं वह दूसरों को नहीं मालूम पड़ेगी, जीवन की भयंकर भूल साबित होती है आपके आसपास उपस्थित लोगों  एवं बच्चों तक को, आपकी वह चालाकी मालुम पड़ जाती है और आप उनकी नज़रों से कब के गिर चुके हैं यह आपको पता ही नहीं चलता !
बेहतर है कि परिवार में रहते हुए जान बूझकर बेईमानी न करें यह आवश्यक है कि परिवार के लोगों का महत्व आप समय रहते समझ भी लें अन्यथा आपके कमजोर समय में यह लोग बेमन ही साथ देंगे और उस समय आप कहेंगे कि हमने इतना किया फिर भी आज हमारी जरूरत में यह लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं !
भारतीय समाज में बेईमानी और चालाकी के चलते, बुढ़ापे में लोग कष्ट में जी रहे हैं , और इसकी दोषी जितनी नयी पीढ़ी है पुरानी उससे कम नहीं, अफ़सोस होता है कि उन्हें यह नहीं मालूम कि उन्होंने गलती कहाँ की है अपनी बेवकूफियों , चालाकी और सत्ता के नशे में किस किस का कितना अपमान किया है वह भूलकर मुखिया लोग, खराब समय पर अपनी किस्मत को कोसते  पाये जाते हैं ! 
अक्सर इसकी  शुरुआत घर में बहू के आते ही होती है , किसी अन्य घर की लाड़ली बेटी को हम घर लाते ही वे शिकंजे लगाने शुरू करते हैं जो कि अपनी बेटी पर लगते नागवार महसूस होते हैं , बेटी की ससुराल में अपना अपमान होना जहां हमें जहर लगता है वहीँ बहू के घर वालों की दिल से इज़्ज़त न करना और उनसे भरपूर सम्मान की अपेक्षा करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं और ऐसा करते समय हम ये भूल जाते हैं कि इस दोमुंहे चरित्र को न केवल बहू ध्यान से देख रही है बल्कि आपका बेटा भी समझ रहा होता है !
आजकल की लड़कियां समर्थ हैं अगर किसी घर की पढ़ी लिखी नौकरपेशा बहू आपके घर आई है तो लाने से पहले उसका और उसके घर वालों का सम्मान करना अवश्य सीख लें अन्यथा यह याद रखें कि आपका बनाया घर और धन समय बीतने के साथ कानूनन आपकी उसी बहू का होगा जिसके घर वालों को आपने जी भर के गालियां दी हैं , यह भी  याद रखें कि कोई भी लड़की,चाहे आपकी हो या किसी और की, अपने पिता या मायके का अपमान कभी नहीं भुला सकती , आपके बुढ़ापे में बुरे दिनों में यह लड़की आपका कितना ख्याल रखेगी यह आपके द्वारा दिए गए स्नेह अथवा दर्द पर ही निर्भर करेगा !
घर के मुखिया सास अथवा ससुर द्वारा किये गए गलत व्यवहार पर उंगली उठाने वाला उस परिवार में कोई होता ही नहीं बल्कि उसके सही साबित होने की मुहर, घर वालों द्वारा तुरंत लग जाती है , गलत बात का विरोध न करने की सज़ा, इन परिवारों को ताउम्र भुगतनी पड़ती है ! आज पूर्वजों की शिक्षा "निंदक नियरे राखिये " मात्र मुहावरा बन कर रह गया है , हम सारी उम्र भूल कर ही नहीं सकते , इस ग़लतफ़हमी में शान से जीते रहने के शिकार हम लोग, जीवन में अपनी भूलों पर कभी नहीं पछताते  !
अपने द्वारा किये गए गलत व्यवहार को सुधारना बहुत मुश्किल नहीं सिर्फ खुले मन से क्षमा मांग लेना काफी होता है इससे भूल वश अथवा जानबूझकर की गईं गलतियों से आई कड़वाहट भी आसानी से समाप्त हो सकती है बशर्ते दिल बड़ा होना चाहिए !
दर्द और अपमान जितना हमें लगता है वह दूसरों को भी उतना ही महसूस होता है, इसे हमेशा याद रखें  .....
आपके सुंदर घर में आग कभी नहीं लगेगी !

ऐंठ छोड़िये, बातें करिये, जीने और जिलाने की ! 
अंतिम वक्त भुलाये बैठे,बातें सबक सिखाने की !
http://satish-saxena.blogspot.in/2014/10/blog-post_28.html

Wednesday, May 25, 2016

गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए - सतीश सक्सेना

आज बेहद सीलन वाले मौसम में, पसीने से तर बतर, ओखला बर्ड सेंक्चुरी में दौड़ते हुए 49.09 मिनट में 6.8 Km की दूरी तय की !

कम से कम 2 Km रोज दौड़ते हुए,लगातार 100 दिन दौड़ने का व्रत 30 अप्रैल से लिया है , आज 26 मई तक रोज दौड़ते हुए 132.85 Km की दूरी तय कर चुका हूँ , पिछले 8 माह से 134 बार रनिंग करते हुए आजतक 1035.60 Km दौड़ चुका हूँ और यह सब बिना किसी ट्रेनिंग और अपने 62 वर्षीय शरीर के साथ कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतते हुए किया है !

1000 km की दौड़ पार करते हुए, अब मुझे लगता है कि अनावश्यक सावधानी और तेज दौड़ने पर कुछ हो जाने का भय,मानवीय शक्ति को बेवजह डर में फंसाए रखता है नतीजा अथाह मानवीय शक्ति,मन के चंगुल में फंसकर अपने बैरियर कभी नहीं तोड़ पाती और इंसान पूरे जीवन,अपने मन का दास बनने को मजबूर रहता है 
अतः मन पर निर्दयता पूर्वक चोट करनी ही होगी !

अतः कल से 10 km एक स्पीड पर दौड़ने का प्रयत्न रहेगा और पहला टारगेट 10 km दूरी को 70 मिनट में आराम से दौड़ते हुए पूरा करने का मन है जो कि अब तक का मेरा पर्सनल बेस्ट है !
इस इलाके में यह मेरा पहला रन था और अगर मौसम में आद्रता कम होती तो इस खूबसूरत माहौल में यमुना के साथ साथ, दौड़ने का आनंद कुछ और ही होता ! दौड़ने में दुखी मन को भी राहत मिलती है ....

क्या पता भूल से दिल रुलाया कोई
गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए !

वायदे कुछ किये थे, किसी हाथ से
मरते दम तक निभाना,तो भी दौड़िए ! - सतीश सक्सेना

Tuesday, May 24, 2016

नो पोस्ट ...

कभी कभी लिखने का दिल ही नहीं करता  ..... 


Saturday, May 21, 2016

मन है भारी अगर, आइये दौड़िए - सतीश सक्सेना

लड़ना अवसाद से , आइये दौड़िये 
मन हो भारी अगर तो उठें, दौड़िये !

क्या पता,भूल से दिल दुखाया कोई 
गर ह्रदय पर वजन हो, तभी दौड़िए !

आने वाली नसल , आलसी न बने  
इनकी हिम्मत बढ़ाने को ही दौड़िए !

वायदे कुछ किये थे, किसी हाथ से 
अंत तक है निभाना , तो भी दौड़िये !  

शक्ति ,साहस, भरोसा, रहे अंत तक 
हाथ में जब समय हो, जभी दौड़िए !

Thursday, May 12, 2016

जिंदगी के गीत , गायेगा कहाँ - सतीश सक्सेना

निष्कपट जाए, तो जाएगा कहाँ ?
दर्द दिल का भी, बताएगा कहाँ ?

प्रीति उनकी भक्ति में बदले अगर,
शर्म से खुद को, बचाएगा कहाँ ?

प्यार के बदले भिखारी देगा क्या
उनको आने पर, बिठाएगा कहाँ ?

क़र्ज़ की आदत नहीं कंगाल को 
यार का ये ऋण,चुकाएगा कहाँ ?

अगर गीतों ने वफ़ा की जान ली
जिंदगी के गीत , गायेगा कहाँ ?

Monday, April 25, 2016

रिटायरमेंट के बाद रनिंग, जिसने जीवन ही बदल दिया - सतीश सक्सेना

वाह !!
मशहूर रनर तनवीर काज़मी का लगातार 100 दिन दौड़ने का न्योता मिला है ! नियमों के अनुसार 30 अप्रैल को पहले रन से , जो कम से कम 2 km का होगा, शुरू करके 7 अगस्त तक हर हालात में चाहे भयंकर वारिश हो अथवा बीमार हों,अथवा सफर में हों, बिना नागा दौड़ना होगा ! इसमें बंदिश 2 किलोमीटर की रहेगी, अगर आप बारिश या सफर में हैं तब छोटे छोटे टुकड़ों में ही सही पर दो किलोमीटर दूरी तय करना अनिवार्य होगी इसमें इनडोर अथवा ऑफिस में होने की स्थिति में ट्रेडमिल रनिंग भी शामिल है , जिसे आप अपने मोबाइल अथवा जी पी एस सिस्टम पर रिकॉर्ड कर सकते हैं !

मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जिसने कभी घर पर अथवा ऑफिस में शारीरिक मेहनत या एक्सरसाइज नहीं की, उसके लिए इस उम्र में अपने शरीर और शक्ति को फिट रखने के लिए अपने नाकारा पैरों से दौड़ना निस्संदेह हिम्मत वाला फैसला रहा है ! अब जैसे जैसे मैं झिझक छोड़कर इन इवेंट्स में हिस्सा ले रहा हूँ वैसे वैसे हर एक नए रन के साथ, अपरिमित मानवीय शक्ति  को महसूस करके, आत्मविश्वास से सराबोर हो रहा हूँ इन इवेंट्स में जब मैं अपने से अधिक कमजोर और उम्रदराज लोगों का रनिंग स्पीड और रिकॉर्ड देखता हूँ तब आँखे खुली रह जाती है और दिल करता है कि जब ये लोग कर सकते हैं तब मैं क्यों नहीं ?
और यह न समझना कि यह रनर, पहलवान टाइप लोग हैं, सुबह सुबह अँधेरे में यह दौड़ने वाले बेहतरीन रिकॉर्ड होल्डर प्रबुद्ध लोगों में से अधिकतर लोग अपने जीवन के उच्चतम शिखर पर हैं , इनमें विदेशी कंपनियों में कार्यरत उच्च पदस्थ अधिकारी , डॉक्टर, सी ई ओ, डायरेक्टर ,जी एम आदि जैसी बड़ी पोस्ट पर कार्यरत लोग शामिल हैं !
बहरहाल पिछले कुछ माह में ही सिर्फ रनिंग के बदौलत लटकी हुई थुलथुल तोंद 90 प्रतिशत गायब हो गयी है , 74 kg वजन पिछले ७ माह में घटकर 66 किलो रह गया है , बीपी आदि बीमारियां कहाँ गईं पता ही नहीं चला ! जिस पसीने से कभी चिढ थी, उसी पसीने से दौड़ने के बाद सुबह सुबह पूरे कपडे लथपथ हो जाते हैं , अब गीले कपड़ों को देख अपनी मेहनत और शक्ति पर प्यार आता है ! बुढ़ापे के लटके हुए मसल्स आश्चर्य जनक रूप मजबूत हो गए हैं और शीशे में खुद को बार बार देखने का मन करता है !
६० वर्ष से पहले, जो व्यक्ति कभी पूरे जीवन में 50 मीटर न दौड़ा हो वह पिछले 7 माह में  102 रनों के जरिये 885 km दौड़ चुका है और इन दिनों मेरा प्रति सप्ताह रनिंग एवरेज 32 km है ! यह आश्चर्यजनक है , मैं जीवन में कभी एथलीट नहीं रहा और मात्र 7 माह पहले मैं अपने इस कारनामे के बारे में सोंच भी नहीं सकता था !
सबसे आश्चर्यजनक बदलाव अपने मानसिक व्यवहार में आया है , गाडी ड्राइव करने का दिल ही नहीं करता , एक दिन 12 बजे धूप में 2 km दूर एक मॉल तक आराम आराम से दौड़ता पंहुच गया था और बहुत अच्छा लगा था ! इससे पहले मैं, जीवन में कभी सलाद अथवा फल नहीं खाता था अब मनपसंद शोरवे की सब्ज़ी, दम आलू ,परांठे, जलेबी रबड़ी अथवा लेट नाईट डिनर अच्छे ही नहीं लगते ! 
रन मशीन तनवीर काज़मी केडेन्स डिज़ाइन सिस्टम में कंसलटेंट हैं , उनका आवाहन ठुकराया नहीं जा सकता और यह बेहद चैलेंजिंग है , अब आज से पांच दिन के बाद लगातार सौ दिन तक रोज दौड़ना होगा , मुझे यकीन है सौ दिन बाद , आग में तपकर एक नया सतीश बाहर आयेगा ! 
इस आवाहन के लिए धन्यवाद तनवीर काज़मी !! 

(http://navsancharsamachar.com/100-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A5%9C%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B6/#respond)

Friday, April 22, 2016

! आनंद वन्दना ! - सतीश सक्सेना

आचार्य विवेक जी में मैं अक्सर संत विवेकानंद की छवि देखता हूँ , सोंचता हूँ अगर आज विवेकानंद होते तो शायद वे इन्हीं की तरह होते ! देश में संतों साधुओं की गरिमा का, धन कमाने आये साधु वस्त्रधारियों के द्वारा जितना निरादर हुआ है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ऐसे संक्रमण काल में विवेक जी जैसे सूफी संत का आविर्भाव एक सुखद सन्देश है !
विवेक जी के साथ रहने का, उनके साथ भ्रमण करने का मौका मुझे यवतमाल के ग्रामों की पदयात्रा में मिला था जब वे किसानों की आत्महत्या से बेहद दुखित थे , भारतीय मीडिया को पता भी नहीं चला कि एक युवा संत, गाँव गाँव कड़ी धूप में किसानों के दरवाजों पर जाकर, कैसे उनके आंसुओं को पोंछने का प्रयत्न कर रहा है !
शिव सूत्र उपासक विवेकजी की यह यात्रा चिंतामणि देवस्थान से शुरू होकर, सर्व धर्म समभाव के साथ ग्राम जागरण के लिए एक विशद आधार बन रही है  ! मेरे लिए यह बेहद आनंद दायक था कि उनकी इस यात्रा में और ग्राम सभाओं में हर धर्म और राजनीतिक पार्टियों के लोग हिस्सा लेते थे जो भ्रष्ट राजनीतिक परम्परा के बिलकुल विरुद्ध था !
कुछ दिन पहले उनका एक सन्देश मिला जिसमें एक वंदना की रचना का अनुरोध था जो आनंद ही आनंद के कार्यक्रमों में गाई जा सके जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया !
आज उन्होंने यह वंदना, सिंहस्थ कुम्भ के अवसर पर आनन्द ही आनन्द को समर्पित की है , जो मेरे लिए बेहद आत्मसंतोष का विषय है ! इस वंदना में गुरु, चिंतामणि ,सरस्वती , एवं माता पिता को समर्पित हर पद आपको अलग अभिव्यक्ति का आनंद देगा ऐसा मेरा विश्वास है !

जन जागरण में व्यस्त इस संत को एक कवि का प्रणाम !!

है वंदना सबसे प्रथम,चरणों में गुरु अधिमान की
माथे चरणरज संत की,निष्पक्ष ज्ञान सुजान की !

निर्विघ्न कार्य समाप्त हों, रक्षक रहें चिंतामणि 
है नमन और चाहत तेरे शंकरसुवन वरदान की !

नमस्तुभ्यं  मां शारदे,  वरदान वाणी मधुर दे
शुभ्रा नियंत्रण में रहे , वाणी रहे सम्मान की !

आँचल तेरा,साया पिता का साथ जीवन भर रहे,
दिखते तुझे,मां शांत हो,ज्वाला मेरे अभिमान की !

हैं धर्म सब पावन यहाँ, आदर, समर्पण भावना
इसके साथ है सबको नमन,इच्छा प्रभु के मान की !

गुरुदेव का नेतृत्व हो ,माता पिता का ध्यान हो
जीवन समर्पित संत को, चिंता नहीं अरमान की !

Monday, April 11, 2016

सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये -सतीश सक्सेना

कल ही कुछ याद किया, रात सो नहीं पाये
औ तड़प के जो बुलाया भी , तो नहीं पाये !

तेरी रुखसत का भरोसा ही नहीं है मुझको 
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये !

कसम खुदा की सिर्फ खैरियत बता जाएँ ! 
खिले वसंत अहले दिल से,खो नहीं पाये !

जाने कब से थे मेरे साथ,जानता ही नहीं 
बिन कहे जान सकें अक्ल ,वो नहीं पाये !

तुझे हर बार मना ही किया था मिलने को
आज मन ढूंढता अहसास, जो नहीं पाये !

Friday, April 8, 2016

सितारे भूल गलती से मेरे आँगन में आ बरसे - सतीश सक्सेना

तुम्हारी ओर के बादल, मेरे आँगन में आ बरसे !
लगा जैसे चमन को भूल कंटक बन में आ बरसे !

फरिश्तों से हुई गलती, पता अम्बर का देने में ,
सितारे भूल गलती से, मेरे दामन में आ बरसे !

लगा सहला गयीं यादें, उन्हें हमसे बिछड़ने की
बिना आवाज आहिस्ता से सूनेपन में आ बरसे ! 

हमारा घर तो कोसों दूर था, जल के किनारे से,
अचानक फूट के झरने, मेरे जीवन में आ बरसे !

हमारा क्या अकेले हैं, कहीं सो जाएंगे थक के
तुम्ही पछताओगे ऐसे, कहाँ निर्जन में आ बरसे !

Monday, April 4, 2016

कुछ मिलावट लग रही है जहर में -सतीश सक्सेना

पहले जल्दी सी नहीं थी शहर में , 
बहुत कुछ था बुजुर्गों के सबर में !

कैसे इस दिल में अभी भी जान है ! 
कुछ मिलावट तो नहीं है जहर में !  

मना कर दो,हम चले ही जाएंगे !
कब तलक लटके रहेंगे अधर में !

तेरे जाने का यकीं दिल को नहीं 
बेईमानी ही लगी , इस खबर में !

होश में जाना दिलाने याद कुछ 
दम अभी बाकी बचा है, लहर में !
Related Posts Plugin for Blogger,