Saturday, February 14, 2009

ढाई आखर प्रेम का ..

चिटठा चर्चा पर आज मुझे तरुण का लेख , ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय पढ़ कर पाश्चात्य प्यार के इस अवसर पर सुदामा और केशव का प्यार याद आ गया और मुंह से निकल पड़ीं नरोत्तमदास रचित कुछ पंक्तियाँ !

पत्नी के द्वारा बार बार कहने पर महागरीब सुदामा, भेंट के लिए, पड़ोस से मांगे कुछ मुट्ठी चावल की पोटली लेकर, अपने बालसखा द्वारकाधीश से मिलने पंहुचे तो द्वारपाल के ये शब्द ....

"सीस पगा न झगा तन पै प्रभु जाने को आहि बसै केहि गामा
धोती फटी सी लटी दुपटी औ पायं उपानह को नहि सामा,
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को नाम , बतावत आपनो नाम सुदामा ,

सुदामा पांडे का नाम सुनते ही, कन्हैया सारे राजकाज छोड़, हाथ जोड़ भाग पड़े अपने उस बालसखा से मिलने दरवाजे पर ! द्वार पर अपने मित्र की दुर्दशा देख करूणानिधि रो पड़े ...

"ऐसे बेहाल बिवाइन से पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ,
हाय महादुख पाय सखा तुम आए इतै ना कितै दिन खोये
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिके करुणा निधि रोये
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल से पग धोये !"

कांख में दबी पोटली को छिपाने का प्रयास करते देख , मुस्कराते केशव ने सुदामा से कहा जैसे बचपन में गुरुमाता के दिए चने तुम अकेले खा जाते थे वैसे ही भाभी के भेजे ये मीठे चावल भी तुम छिपा रहे हो, चोरी की तुम्हारी आदत अभी भी नही गयी , कहकर द्वारकानाथ, वे चावल लेकर खाने लगे ! प्यार का यह स्वरुप वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं !इतने में ही प्रभु ने जो देना था अपने मित्र को दे चुके थे .....

खाली हाथ दरवाजे से विदा लेकर दुखी मन, कुढ़ते हुए सुदामा जब अपने गाँव पहुंचे तो अपने महल नुमा घर और पत्नी को पहचान भी नही पाए ......
प्यार का यह स्वरुप आज कहीं सुनने को भी नही मिलता .....शायद आज यह शब्द ही बेमानी है जिसकी किसी को आवश्यकता ही नही ...

Wednesday, December 24, 2008

नए वर्ष पर प्यार सहित, ये मेरे गीत तुम्हे अर्पण हैं !

बरसों पूर्व (1997) लिखा यह गीत बिना किसी बदलाव के प्रस्तुत कर रहा हूँ !

मन के सोये तार जगाती
याद तुम्हारी ऐसे आयी ,
ऐसी लगन लगी है मन में
गीत झरें बरसातों जैसे !
पहले भी थे गीत यही पर
गाने वाला मिला ना कोई
जबसे तुमने हाथ सम्हाला 
इन गीतों की हुई सगाई
जीवन भर की सकल कमाई,
इन कागज़ के टुकडों में है
नए वर्ष पर प्यार सहित , ये मेरे गीत तुम्हें अर्पण है !

प्रश्न तुम्हारा याद मुझे है ,
क्या मैं दे सकता हूँ तुमको
मेरे पास बचा ही क्या है ?
जो दे मैं उऋण हो जाऊं
रहा अकेला जीवन भर मैं,
इस जग की सुनसान डगर पर
अगर सहारा तुम ना देते ,
बह जाता अथाह सागर में
बुरे दिनों की साथी, तुमको
और भेंट मैं क्या दे सकता !
मेरे आंसू से संचित , ये मेरे गीत  तुम्हें अर्पण हैं !

ऐसा कोई मिला ना जग में
जिसको मन का दर्द सुनाऊं
जग भर की वेदना लिए मैं
किसको गहरी टीस दिखाऊँ
जिसको अपना समझा था 
उसने ही धक्का दिया मुझे 
ऐसी चोट लगी है दिल पर
सारा जग बंजर लगता है !
और मानिनी क्या दे सकता,
तुमको इस बिखरे मन से मैं
विगत वर्ष की अन्तिम संध्या पर , ये गीत तुम्हें अर्पण है !

Tuesday, December 9, 2008

भारतीय संस्कार - सतीश सक्सेना

"भाषा और शब्‍दावली किसी व्‍यक्ति की संस्‍कारशीलता की परिचायक होती है । जोर से और फूहड भाषा में कही बात सच हो, यह कतई जरूरी नहीं ।आप अशिष्‍ट शब्‍दावली और भाषा वाली टिप्‍पणियां मत हटाइए । लोगों को मालूम हो जाने दीजिए कि कौन अपने दामाद को 'मेरी लडकी का घरवाला' और कौन 'हमारे जामाता' कह रहा है ।
जिन्‍हें भाषा के संस्‍कार नहीं मिले उनसे शालीनता, शिष्‍टता, सभ्‍यता की अपेक्षा कर आप उन पर अत्‍याचार कर रहे हैं ।वे आक्रोश के नहीं, दया के पात्र हैं । बीमार पर गुस्‍सा मत कीजिए ।"

श्री विष्णु वैरागी जी ने यह बेहतरीन प्रतिक्रिया दी है, रोशन के ब्लाग दिल एक पुराना सा म्यूज़ियम है पर लिखे एक लेख "टिप्पणियों में संयत भाषा का प्रयोग करें" पर !

मुझे याद आया कि हम अपने संस्कार किस कदर भूल गए हैं, मगर हिंदू धर्म की मूलभूत शिक्षाएं भूल कर भी, हम धर्मरक्षा की बातें खूब करते हैं, कौन है दोषी इस बीमारी का ? कौन है जिम्मेदार है हमारे बच्चों के मध्य परस्पर प्यार और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना समाप्त करने का ?

उन लोगों को दोष मुक्त किया जा सकता है, जिनको किसी ने कभी प्यार ही नही किया, मगर उनके लिए क्या कहें जिनके माता,पिता,भाई,बहिन और बड़े वुजुर्ग सबके होते हुए भी , उनकी भावनाओं से, प्यार और ममता को , यही पाश्चात्य सभ्यता, जिसमे वे पढ़े और बड़े हुए , निगल गयी !

इसी सभ्यता का अनुकरण करते हुए नयी पीढी शायद कभी पछतावा भी न करे क्योंकि उन्होंने इस प्यार की गरमी और अपनत्व को कभी महसूस ही नही किया ! उनके लिए प्यार और स्नेह, केवल हाय, हेल्लो और थैंक्स तक ही सीमित है, फिर दोषी केवल वे परिवार हैं, जिनमें यह संस्कार कभी दिए ही नही गए और इन परिवारों में आपस में स्नेह का वह मज़बूत बंधन कहीं दीखता ही नही !आज के आधुनिक समय में, ऐसे लोगों से शिष्टता और शालीनता की अपेक्षा करने वाले को ही मूर्ख कहना उचित होगा !

Tuesday, December 2, 2008

नफरत या प्यार ?

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे ! लेख के जवाब में प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं , उनमें से नफरत भरी कुछ प्रतिक्रियाओं ने जो मैंने प्रकाशित नही की, मुझे मजबूर किया यह जवाब देने को ! उक्त प्रतिक्रियाओं में से एक प्रतिक्रिया मेरे पुत्र की उम्र के एक नवजवान की है जिनकी लेखन शैली मुझे बहुत पसंद है ! सशक्त लेखनी का धनी, इस भारत पुत्र के प्रति मेरा यह कर्तव्य है कि मैं स्पष्टीकरण दूँ !
कृपया विश्वास करें कि लेखन के प्रति, मेरा किसी वर्ग विशेष के प्रति मोह या उसमें लोकप्रियता अर्जित करना बिल्कुल नही है ! आप प्रतिक्रियाएं अगर ध्यान से देखें तो इस देश के अल्पसंख्यक  बच्चों ने मेरी कभी तारीफ़ नहीं की जिससे मैं उत्साहित होकर यह लेख लिख रहा हूँ ! मगर यह लेख इस समय की पुकार हैं, और जो मैं समाज को समझाना (सर्व धर्म सद्भाव ) चाहता हूँ, उसी की सफलता में देश की नयी पीढी और आपकी अगली पीढी का स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित होगा !
  • उग्रवादियों के बारे में मेरी कोई सहानुभूति नही है, यह एक देश के प्रति, नफरत में अंधे पथभ्रष्ट नवयुवक हैं, जिन्होंने कुछ अच्छे वक्ता एवं तथाकथित धर्मगुरुओं का अँधा आदेश मानते हुए निर्दोष बच्चों, स्त्रियों वृद्धों के खिलाफ महज इसलिए हथियार उठा लिए क्योंकि उनके दिलोदिमाग में नफरत और सिर्फ़ नफरत भरी गयी है, और इन लड़कों की नासमझी यह कि इन्होने इसके पीछे छिपे वास्तविक उद्देश्य को जानने का प्रयत्न ही नही किया ! इनके तथाकथित आकाओं का प्रभामंडल व व्यक्तित्व इतना शक्तिशाली था कि इन युवकों में अपना स्वर्णिम भविष्य तथा अच्छा सोचने समझने की शक्ति आदि सब नष्ट हो गयी !
  • इन बहके हुए मार्गदर्शकों ने उनकी मौत हो जाने की दशा में उनके परिवार की सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए इन पढ़े लिखे मगर अपरिपक्व बुद्धि वाले नवजवानों को, नफरत की आग में जलने के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी शिक्षा और बुधिमत्ता का उपयोग, अपने अनुयाइयों में अपना नाम कमाने में किया !
  • अमेरिका और भारत जैसे उदार देशों पर हमला करते समय यह मुखिया ख़ुद आगे नही आए बल्कि आप जैसे नवजवानों को इस नफरत की आग में झोंक दिया !
  • चूंकि आप जैसे नवजवान ईमानदार और वचनवद्ध होते हैं , उनका उपयोग विध्वंसक होगा ही , यह पुरानी घटिया मानसिकता वाले , एवं इन नवजवानों के लिए श्रद्धेय लोग , यह बात भली भांति जानते हैं ! एक वर्ग विशेष के प्रति नफरत में जलते हुए , इन काइयां , धूर्त और चालक धर्मगुरुओं ने श्रद्धा का दुरूपयोग करते हुए इन जवान लड़कों को निर्मम हत्यारा बना दिया !
  • आपकी उम्र के लोगों से अपनी इच्छा पूर्ति करवा पाना बहुत मुश्किल कार्य नही होता है , सवाल सिर्फ़ एक बार सामने वाले के प्रभाव में आने का है ! कृपया सोचें कि आपकी पीठ पर किसी और का नाम तो नही लिखा है ?
  • अल्पसंख्यक  बच्चे इसी देश के नागरिक हैं , बहुमत होने के कारण हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन पर शक न करें और दूसरों के बहकावे में आकर आपस में न लड़ें !
  • नफरत का जहर हमें गुस्से के कारण चैन से जीने नही देगा और वही नफरत एक दिन हमारे घर में भी जरूर घर कर जायेगी ! आप किसी नफरत करने वाले व्यक्ति का चेहरा और एक निश्छल व्यक्ति का सौम्य चेहरा ध्यान से देखें और जरा सोचें क्या फर्क है !
  • क्या कोई कौम दूसरी कौम को ख़त्म कर पाई है अगर नही तो फिर आप लोग इस नफरत को फैला कर सिर्फ़ अपनी आदतें और भविष्य ख़राब कर रहे हो जिसका असर आपकी संतानों पर अवश्य पड़ेगा !अंत में मेरा अनुरोध है कि प्यार बाँटने का प्रयत्न करें, नफरत से सिर्फ़ तिरस्कार और बर्बादी बांटी जा सकती है और बदले में यही मिलेगी भी ! हो सके तो जो आपको उकसा कर, आपसे मदद ले रहा है उस चेहरे को पहचानने का प्रयत्न करें तो आप पायेंगे कि ऐसे चेहरे में ममता और प्यार का नामोनिशान नहीं मिलेगा !
  • मैं हमेशा इन अल्पसंख्यक  बच्चों के लिए लेख क्यों लिखता हूँ ?-मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा ! अवश्य पढ़ें ! क्योंकि मैं बहुमत से सम्बंधित हूँ और अल्पमत के लिए आवाज़ उठाना और उनको अपने समाज के दिल में जगह दिलाने का प्रयत्न करना ही मैं भारत माँ की सबसे बड़ी इच्छा मानता हूँ सो नफरत फैलाने वाले अपनी दूकान चलायें मैं प्यार बांटूंगा देखता हूँ कौन शक्तिशाली है ? नफरत या प्यार ?



Monday, December 1, 2008

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे !

"इस्लाम को बदनाम करने वाले इन आतंकवादियों को भारत की सरजमीं पर नही दफनाया जाएगा !"

अखबारों में छपी ख़बर के अनुसार ,यह फ़ैसला है मुंबई की मुस्लिम संस्थाओं का, कि इन ९ हत्यारों की लाशों को, मैरिन लाइन बड़ा कब्रिस्तान में कोई जगह और इज्ज़त नहीं बख्शी जायेगी ! मुस्लिम काउन्सिल देश के बाकी संस्थाओं को भी यह मैसेज भेजने का प्रयत्न कर रही है!

इन उग्रवादियों ने सोचा होगा कि इस महान संगठित देश पर हमला करके वह हिन्दू मुस्लिम एकता में दरार डाल पाएंगे जिससे उन्हें शहीद का दर्जा मिलेगा ! शायद यह उन्होंने सपने में भी न सोचा होगा कि उनकी ऐसी दुर्दशा भी हो सकती है !

१५ अगस्त को प्रकाशित मेरे एक गीत ये समझ नहीं आता इनको में उन्हें कहा गया था .....

तुम मासूमों का खून बहा
ख़ुद को शहीद कहलाते हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो
जब मौत तुम्हारी आएगी, तब बात शहादत की छोडो
मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे
!


मुझे खुशी है कि इन मानवता के दुश्मनों का साथ देने कोई पास नही आया ! इस देश के बच्चों को आपस में लड़ाने की साजिश नाकाम हुई ! कुछ नासमझों की मानसिकता के बाद भी बहुमत हमारी एकता बनाये रखने में कामयाब होगा, ऐसा मेरा विश्वास है !


Thursday, November 20, 2008

स्वप्न में आयीं वामा सी, स्नेहमयी तुम कौन हो ? - सतीश सक्सेना

स्वप्न में आयीं वामा सी, 
स्नेहमयी तुम कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया, 
करुणमयी तुम कौन हो ?
बाल बिखेरे प्रेयसि जैसे, 
आँख में ममता माता जैसी
नेह भरा स्पर्श लिए तुम ,  
प्रकृति सुंदरी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

तपती धरती पर सावन की
बूँद गिरी हरियाली आयी
जैसे पतझड़ के मौसम में
अमराई भर आई हो !
ऐसे आईं तुम जीवन में
महक उठी दुनिया सारी
मैं निर्धन पहचान न पाऊँ ,
राजलक्ष्मी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

कितना समझाता हूँ मन को
पर असफल ही रहता हूँ
कैसा प्यार चाहता तुमसे
यह मुझको मालूम नहीं
कजरारी आँखों की भाषा
चातक के दिल की परिभाषा
निश्छल मन मैं जान न पाऊँ ,
राजनंदिनी कौन हो ?
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?

दो गुलाब की पंखुड़ियों से 
प्यासे ओठों  को छू जाना 
तपते चेहरे को आंचल
से ढांक मधुरिमा पहुँचाना 
ऐसा प्यार तुम्हारा पाकर, 
इतना क़र्ज़ तुम्हारा लेकर 
मैं याचक पहचान न पाऊँ , 
प्रणय सुंदरी  कौन  हो   ??
जिसकी गोद में सिर रख रोया करुणमयी तुम कौन हो ?   

Tuesday, November 11, 2008

प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ? -सतीश सक्सेना

शीतल मनभावन पवन बहे
बादल चहुँ ओर उमड़ते हैं !
जिस ओर उठाऊँ दृष्टि वहीं
हरियाली चादर फैली है !
मन में उठता है प्रश्न, 
पवन लहराने वाला कौन ?
बादलों के सीने को चीर बूँद बरसाने वाला कौन?

कलकल छलछल जलधार
बहे,ऊँचे शैलों की चोटी से 
आकाश चूमते  वृक्ष लदे   
स्वादिष्ट फलों औ फूलों से
हर बार, रंगों की चादर से , 
ढक जाने वाला कौन ?
धरा को बार बार रंगीन बना कर जाने वाला कौन ?

चिडियों का यह कलरव वृन्दन !
कोयल की मीठी , कुहू कुहू !
बादल का यह गंभीर गर्जन ,
वर्षा की ये रिमझिम रिमझिम !
हर मौसम की रागिनी अलग,
सृजनाने वाला कौन ?
मेघ को देख घने वन में मयूर नचवाने वाला कौन ?

अमावस की काली रातें 
ह्रदय में भय उपजाती हैं !
चांदनी की शीतल रातें, 
प्रेमियों को क्यों भाती हैं !
देख कर उगता पूरा चाँद , 
कल्पना शक्ति बढाता कौन ?
चाँद को देख ह्रदय में कवि के,मीठे भाव जगाता कौन ?

कामिनी की मनहर मुस्कान
झुकी नज़रों के तिरछे वार !
बिखेरे नाज़ुक कटि पर केश
प्रेम अनुभूति , जगाये वेश  !
लक्ष्य पर पड़ती मीठी मार , 
रूप आसक्ति बढाता कौन ?
देखि रूपसि का योवन भार,प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ?

Thursday, November 6, 2008

अपनी माँ को धुँधली यादों में ढूँढता बच्चा !

आदरणीय जे सी फिलिप शास्त्री का अनुरोध माँ पर लिखने का पाकर, बहुत देर तक सोचता रह गया !
क्या लिखूं मैं, माँ के बारे में ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता !

अपने बचपन की यादों में, उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता रहा हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !

मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....जो कभी नही लिखना चाहता था !
-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में , अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँको मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे ले गए मेरी माँ को ....

बस यही यादें हैं माँ की ......

Monday, November 3, 2008

सूनी दीवाली -सतीश सक्सेना

"लंदन में मेरी दुर्घटनाग्रस्त बेटी को जीवन में पहली बार यह त्यौहार अकेले मनाना पड़ा। ऊपर से इस बार यकायक लंदन में दीपावली की रात २-२ फीट हिमपात हो गया। ऐसे में उसे याद आई तो केवल माँ और अपनी उस दिन की वे स्मृतियाँ जब उसने मुझे सुनाईं तो सिवाय फफक फफक कर रोने के कोई शब्द मेरे पास नहीं था।"

उपरोक्त शब्द डॉ कविता वाचक्नवी के हैं, जिनके जरिये उन्होंने बिना प्रमुखता, दिए अपने मन की वेदना दीपावली के बारे में बताते हुए प्रकट की थी ! और यह वेदना उस दिन की चर्चा में बहुत कम लोगों ने नोट की थी ! मुझे अहसास हुआ जब फुरसतिया ने इस पर ध्यान न जाने की क्षमायाचना करते हुए कमेंट्स में प्रमुखता दी ! एक माँ से हजारों मील दूर लन्दन में इलाज़ करा रही इस बच्ची के लिए मेरी शुभकामनायें !

आज के इस व्यस्त माहौल में हम लोगों में संवेदना का महत्व कम होता जा रहा है, बल्कि अगर यह कहा जाए कि खत्म हो गया है तो भी शायद अतिशयोक्ति नही होगी !


मुझे याद है नवम्बर २००५ की दीपावली जब मेरा बेटा पहली वार अपने घर से हजारों मील दूर कैलिफोर्निया में पार्टी फंक्शन्स में ना जाकर अकेले कमरे में बैठ कर दीवाली पूजा कर रहा था ! वह चित्र देख कर दीवाली का सारा आनंद एक उदास रात में बदल गया था जो आज तक भुलाये नही भूलता है !

इस निर्दयी विश्व में अपनों के प्रति यह संवेदना और प्यार की अनुभूति ही जीवन का आधार है

Saturday, October 18, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली (पांचवां भाग) - सतीश सक्सेना

लेकर निर्बल की हाय पुत्र !
होगा जग में उद्धार नहीं,
अपने दिल पर रख हाथ देख
आत्मा को लज्जित पाओगे
लज्जित मन से क्यों काम करो 
गंगा सा निर्मल मन लेकर,
निर्बल का ऋण लेकर मन पर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वैष्णव जन कहलाये वह ही
जो कष्ट दूसरों का समझे,
पीड़ा औरों की निज मन में
महसूस करे, आगे आकर ,
सारे तीर्थों का सुख मिलता, 
सेवा निर्बल की करने में ,
अपने सुख की कामना लिए, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

अन्याय सहन करने वाला
अन्यायी से भी पापी है,
न्यायार्थ दंड भाई को दो
यह कर्म ज्ञान है गीता का
अन्यायी बनकर जीने से, 
कुल कीर्ति नष्ट हो जाती है
केशव की बातें बिसरा कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

वह दिन दिखलाओ महाशक्ति
जिसमें कोई न, प्रपंच रहे !
धार्मिक पाखण्ड समाप्त करो
वास्तविक साधू सन्यासी हों
जाती बंधन को काट मूल से, 
मुक्ति दिलाओ नरकों से
अपराध बोध लेकर मन में क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो जो
नष्ट , वर्ण-संकट कर दे !
अपने अपने कर्मानुसार,
मानव समाज का काम करे
खेलें रंग और गुलाल सभी, 
हर कौम गले मिलकर होली
औरों के लिए घृणा लेकर ! क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Wednesday, October 15, 2008

मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा !


"विनम्र  निवेदन हैं की हिन्दी ब्लोगिंग को साफ़ रखे । बहुत मेहनत की है बहुत से लोगो ने और आप के ये सब आलेख उन सब की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं । आप अल्पसंख्यक लोगों  के भक्त हैं सही हैं पर दुश चरित्र भक्त ना बने बस इश्वर से इतनी ही कामना हैं"

मुझे एक अनाम ने उपरोक्त सुझाव दिए गए हैं, इस प्रतिक्रिया में मुझे अल्पसंख्यक का  भक्त बताने के साथ साथ मेरे लेखों से दुखी होते हुए यह भी कहा कि मेरे लेख बहुतों की सालों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं !......यह विनती ऐसी थी कि मैं २-३ दिन तक सोचता रह गया कि लोगों ने किस कदर इस दुर्भावना को आपने दिल से लगा रखा है यहाँ तक कि व्यक्तिगत बना रखी है देश की यह ज्वलंत समस्या !

क्या इलाज़ है इसका :

-क्या कोई देशवासी आज फिर विभाजन की सोचने को भी तैयार है सिवाय हमारे दुश्मनों के ? क्या यह सम्भव है कि हम अपने इन छोटे भाइयों (या आप पड़ोसी कह लें), जो इसी देश की संतान हैं , को विवश कर पायें कि जो हम कहें वे वही मान लें !

- अगर हम बड़े भाई का फ़र्ज़ अदा करने का सोचें तो सबसे पहले अपने छोटे भाइयों के सर से, हर समय शक में जीने का भय उतारना पड़ेगा ! हमें उनकी परेशानियाँ , रिश्ते नाते, ध्यान में रखते हुए फैसले लेने होंगे ! दुनिया में कोई भी तीसमार खां कौम पैदा नही हो पाई जो किसी दूसरे समुदाय को ख़त्म कर दे ! ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं ! हाँ नफरत पाल कर रहते चले आए पड़ोसी समुदायों के बच्चे तक शैशव अवस्था से ही मरने मारने की बातें जरूर करने लगे ! और यह सब उन्ही के बुजुर्गों ने दिया !

-चंद उग्रवादियों और दहशतपसंदों की हरकतों का इल्जाम पूरी कौम के सर पर न डालने का फ़ैसला करना होगा ! और यह फ़ैसला करना होगा जनमानस को, इस सोच के साथ कि वे इस तरह का दूषित जहर फैला कर देश का सबसे बड़ा नुक्सान करने जा रहे हैं !

इतिहास गवाह है कि अधिकतर देशों का नुकसान दुश्मन के फौजों ने नही किया मगर आंतरिक फूट और ग्रहयुद्ध ने किया ! और सबसे अधिक मौतें बच्चों और कमजोरों की हूई ! ऐसे देशों की न केवल नस्लें तबाह हो गयीं बल्कि ३०-४० वर्षों के बाद भी वे अच्छे नेतृत्व तक के लिए मुहताज हो गए !

इस दुर्दशा को पहुंचाने वाले यही कमअक्ल लोग थे .....जो अपने आपको देशभक्त कहते हुए मुंह बजाते घूम रहे हैं, और जब इनकी बकवास सिरे चढ़ जायेगी, उस वक्त यह चूहे सबसे पहले अपने बिलों में घुस जायेंगे ! उस समय कमज़ोर पड़ते देश से इन्हे न अपना प्यार नज़र आएगा न धर्म !

आज आवश्यकता है कि हम इन नफरत फैलाते हुए, देश के दुश्मनों की पहचान करलें , ऐसे लोगों की किसी भी प्रकार की, तारीफ़ करना भी मेरी नज़र में सिर्फ़ अपराध है ! एक मूर्ख मगर घातक विचारधारा को किसी भी हालत में फैलने से रोकने के लिए, प्रयत्न करने से बड़ा पुण्य कार्य, मैं और नही मानता !

मगर दुःख है कि हमारे कुछ साथी अनजाने में ऐसे लोगों की पीठ थपथपाने में कोई कसर नही छोड़ते !
मैं अपने अल्पसंख्यक भाइयों से भी अपील करता हूँ, कि वे ग़लत बातों के खिलाफ खुलकर सामने आयें, 
उग्रवादियों और उनके मंसूबों का विरोध करें ! अन्य मजहब के खिलाफ लिखने या मज़ाक बनाने वालों का खुल कर विरोध करें ऐसा करके निस्संदेह अधिकतर लोगों का गुस्सा शांत होगा !

किसी भी धर्म की बखिया उधेड़ने का अधिकार किसी को नही है ! हजारों साल पहले अस्तित्व में आए धर्मों की व्याख्या आधुनिकता के नाम पर करने की इजाज़त किसी को नही होनी चाहिए ! मज़हब हमारी आस्था और श्रद्धा है, जो हमारे बुजुर्गों ने निर्देशित किया है, उस पर किसी और की व्याख्या, सिर्फ़ उसकी कमअक्ली है और कुछ नहीं !

क्या आपके पाठक कम हैं ? एक चेक लिस्ट -सतीश सक्सेना

                                 अपने ब्लाग पर आपका परिचय क्या संदेश दे रहा है ? कहीं ऐसा तो नही कि आप के परिचय से यह झलकता हो कि आप इस देश के सबसे बड़े विद्वान् हैं तो आप यह जान लें कि ब्लाग जगत पर लिखने वाले लोग एक से एक शानदारव्यक्तित्व वाले लोग हैं जो आपके ब्लाग को देख कर ही समझ जायेंगे कि वे एक  नासमझ , जो अपने आपको विद्वान् मानता है, को पढ़ रहे हैं ! यकीन मानिए दोबारा पढने के लिए वे आपके ब्लाग पर फिर कभी नहीं आयेंगे !

                              कहीं आप अपने लेखों में , जिसमें  क्लिष्ट शब्दों का उपयोग अधिक हुआ हो, का प्रयोग अधिक तो नही करते  ?

                              क्या आपके ऐसे मित्र हैं जिनसे अपने ब्लाग के बारे में बेवाक कमेंट्स ले सकें , कि आपके ब्लाग पर कमेंट्स कम क्यों आते हैं  ?

                              क्या आपके पास ईमानदार मित्र हैं जो आपकी आपके मुंह पर आलोचना कर सकें , या आपने सिर्फ़ तारीफ करने वाले मित्रों को ही अपना शुभचिंतक बनाया है , अगर ऐसा है तो आप विद्वान् होने के बावजूद बहुत शीघ्र अपने आपको अवसाद में पाएंगे !
                            आपके ब्लाग का रंग संयोजन आंखों को चुभता तो नही है ?

                            क्या आप मन में किसी विचारधारा ( पार्टी, जाति , नारी, पुरूष, इत्यादि ) के प्रति नफरत तो नही फैला रहे हैं ? अगर ऐसा है तो याद रखें गुस्सा और नफरत की ये चिंगारियां अगर आप बिखेर रहे हैं तो यह आपके परिवार को अवश्य प्रभावित करेंगी ! कृपया इतिहास का एक उदाहरण सोच कर देखे कि नफरत से क्या हासिल हुआ ! जो नकारात्मक सोंच आप उत्सर्जित कर रहे हैं उसका असर आपके परिवार पर क्या पड़ेगा ?  अधिकतर  यह नफरत भरे लेख ,व्यक्तिगत मामलों में, अपने अनुभव के कारण लिखे जाते हैं या विषद विषय पर अनुभवहीनता के कारण , कि आप उस विषय को अधिक जानते ही नहीं !

Tuesday, October 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री के नाम !(अंतिम भाग ) - सतीश सक्सेना

परनिंदा और कटु शब्दों का
बेटी त्याग हमेशा करना !
संयम रख अपनी वाणी पर  
घर में कभी अनर्थ न करना
अगर क्रोध में सौम्य रहीं तो,
बेटी साध्वी बनी रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

ऐसा कोई शब्द ना बोलो
दूजा मन आहत हो जाए
तेरी जिह्वा की लपटों से
अन्य ह्रदय घायल हो जाए
चारों धामों पर जाकर भी,
मन में शान्ति नही पाओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कभी न भूलो बेटी ! तुमने ,
जन्म लिया है मानव कुल में
कुछ विशेष वरदान हमारे ,
कुल को दिए विधाता ने ,
ज्ञान असीमित लेकर बेटी, 
तुम भविष्य निर्माण करोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी ,घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

ज्ञान तुम्हारा सार्थक होगा
घर बाहर दोनों जगहों में
आशीषों के ढेर लगेंगे ,
जब परिवार तुम्हारे में !
परहित साधक बनो लाडली,
पूरी तभी साधना होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

वाद विवाद जन्म देता है ,
पति पत्नी के मध्य कलह को
गृह विनाश का बीज उखाड़े 
नही उखड़ता है, जमने पर !
ऋषि मुनियों के दिए मौन से
क्रोधित मन काबू पाओगी ! 
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

मौन अस्त्र से गौतम जीते
अंगुलिमाल झुक गया आगे
मितभाषी गांधी के आगे ,
झुका महा साम्राज्यवाद भी
हर विरोध शर्मिंदा होगा,
अगर मौन को तुम परखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

याद रहे द्रोपदी सरीखी !
वाचालता कभी न आए
उतना बोलो , जितना
आवश्यक मंतव्य बताने को
तेज बोलने वाली नारी ,
आदर कभी नही पायेगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

इतना प्यारा जीवन साथी 
पुत्री धन्य हुईं तुम पाकर 
शायद तेरे निर्मल मन ने 
जीता ह्रदय विधाता का ,
निश्छल मन और गहन समर्पण,
बेटी जीत तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी , राज कुमारी तुम्हीं  लगोगी  !

Saturday, October 11, 2008

लड़कियों की तकलीफ कौन समझना चाहता है ?

                     एक बेहद कड़वा सच जिसे कोई मानना नही चाहता ! शायद हमें अपनी निगाह में ख़ुद गिर जाने का डर, इसे याद न रखने को विवश करता है !

                      २३ -२४ साल की होते होते, माँ बाप सोचने लगते हैं कि १-२ साल में गुडिया के विवाह के बाद यह खर्चा तो कम हो ही जाएगा ! उस गुडिया के कमरे पर, कब्ज़ा करने की कईयों की इच्छा, ख़ुद माँ का यह कहना कि गुडिया के शादी के बाद, यह कमरा खाली हो जाएगा, इसमे बेटा रह लेगा, किताबों को बाँध के टांड पर रख दो और स्टडी टेबल अपने भाई के बेटे को देने पर, इस कमरे में जगह काफी निकल आयेगी !

                       यह वही बेटी थी, जो पापा की हर परेशानी की चिंता रखती और हर चीज समय से याद दिलाती थी, उसके पापा को कलर मैचिंग का कभी ध्यान नही रहता, इस पर हमेशा परेशान रहने वाली लडकी, सिर्फ़ २५ साल की कच्ची उम्र में, सबको इन परेशानियों से मुक्त कर गयी !

                        यह वही बहिन थी जो पूरे हक़ और प्यार के साथ, खिलखिला खिलखिला कर, अपने भाई के जन्मदिन की तैयारी पापा, माँ से लड़ लड़ कर, महीनों पहले से करती थी ! रात को ठीक १२ बजे पूरे घर की लाइटें जला कर हैप्पी बर्थडे की धुन बजाने वाली लडकी, एक दिन यह सारी उछल कूद छोड़कर, गंभीरता का दुपट्टा ओढाकर विदा कर दी गयी .....और साथ में एक शिक्षा भी कि अब बचपना नहीं, हर काम ढंग से करना ऐसा कुछ न करना जिसमे तुम्हारे घर बदनामी हो !

                         कौन सा घर है मेरा ... ?? नया घर जहाँ हर कोई नया है, जहाँ उसे कोई नही जानता या वह घर, जहाँ जन्म लिया और २५ साल बाद विदा कर दी गयी ! जिस घर से विदाई के बाद, वहां एक कील ठोकने का अधिकार भी उसे अपना नही लगता ! और जिस घर को मेरा घर.. मेरा घर.. कहते जबान नही थकती थी उस घर से अब कोई बुलावा भी नही आता ! क्या मेरी याद किसी को नही आती... ऐसा कैसे हो सकता है ? फिर मेरा कौन है ... उस बेटी के पास रह जाती हैं दर्द भरी यादें ... और अब वही बेटी, अपनी डबडबाई ऑंखें छिपाती हुई, सोचती रहे ...

किस घर को , अपना  समझूं   ?
मां किस दर को मंजिल मानूं ?
बचपन बीता जिस आँगन में 
उस घर को, अब क्या मानूं  ?
बड़े दिनों के बाद आज भैया की याद सताती है  ?
पता नहीं क्यों सावन में पापा की यादें आती है  ?

                       शादी के पहले दूसरे साल तक बेटी के घर त्योहारों पर कुछ भेंट आदि लेकर जाने के बाद, उस बच्ची की ममता और तड़प को भूल कर, अपनी अपनी समस्याओं को सुलझाने में लग जाते हैं ! कोई याद नही रखता अपने घर से विदा की हुई बच्ची को ! धीरे धीरे इसी बेटी को अपने ही घर में, मेहमान का दर्जा देने का प्रयत्न किया जाता है, और ड्राइंग रूम में बिठाकर चाय पेश की जाती है !

तुम  सब ,  भले   भुला दो ,
लेकिन मैं वह घर कैसे भूलूँ ?
तुम सब भूल गए भैय्या !

पर मैं , वे दिन कैसे भूलूँ  ?
मैं इकली और दूर बहुत, उस घर की यादें आती हैं !
पता नहीं क्यों आज मुझे , मां, तेरी यादें आती हैं  !

                     हम अपने देश की संस्कारों की बाते करते नही अघाते हैं पर शायद हम अपने घर के सबसे सुंदर और कमज़ोर धागे को टूटने से बचाने के लिए , उसकी सुरक्षा के लिए कोई उपाय नही करते ! आज आवश्यकता है कि बेटे से पहले बेटी के लिए वह सब दिया जाए जिसकी सबसे बड़ी हकदार बेटी है !

Friday, October 10, 2008

अँधेरी रात का सूरज - राकेश खंडेलवाल

पंकज जी का अनुरोध था कि मैं राकेश जी पर कुछ और लिखूं, हिन्दी की सेवा में लगे हुए एक सम्मानित विद्वान् का अनुरोध पाकर, इस मशहूर गीतकार की रचनाओं पर नज़र डालते हुए, गीतकार की कलम पर विषय अनायास ही मिल गया ! राकेश खंडेलवाल मशहूर हैं, भाषा को झंकार प्रदान करने वाले शब्दों का उपयोग करने के लिए ! उनकी गीतमाला में हर शब्द मोती की तरह पिरोया होता है

मगर आजकल के ये दरबारी कवि अपने आप को चमकाने के लिए क्या नहीं करते ! गंभीर विषयों, पर सभ्य सुसंस्कृत भाषा के धनी, इस कवि की तकलीफ इन शब्दों में देखिये ...

"मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैं
हर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं
हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ीं
और सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ी
पहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थे
बातें साफ़ किन्तु अब कहते , शर्म हया की पूँछ मरोड़ी

हमने सरगम सीखी है वैशाखनन्दनों के गायन से
बड़े गर्व से बात सभी को हम यह बतलाया करते हैं"

ख़ुद की भाषा से चमत्कृत ये आधुनिक कवि, और सामने भीड़ में बैठे अपने गुरु की रचनाओं पर तालियाँ बजाते उनके कुछ सर्वश्रेष्ठ शिष्य, अक्सर कविसम्मेलनों में समां बांधते हर जगह नज़र आ जायेंगे ! अच्छी टी आर पी बढ़ाने के सारे मन्त्र इन्हे पता होते हैं ! राकेश जी आगे कहते हैं ....

"हम दरबारी हैं तिकड़म से सारा काम कराते अपना
मौके पड़ते ही हर इक के आगे शीश झुकाते अपना
कुत्तों से सीखा है हमने पीछे फ़िरना पूँछ हिलाते
और गधे को भी हम अक्सर बाप बना लेते हैं अपना

भाषा की बैसाखी लेकर चलते हैं हम सीना ताने
जिस थाली में खाते हैं हम, छेद उसी में ही करते हैं !
जी हम भी कविता करते हैं"

राकेश जी की उपरोक्त व्यथा पर राजीव रंजन प्रसाद के कमेंट्स थे ....

आदरणीय राकेश जी,आपका ने हास्य लिखने का तो केवल बहाना किया है, इन शब्दों के पीछे की गहरी पीडा समझी जा सकती है। सचमुच तिलमिलाहट होती है कविता और साहित्य का सत्यानाश करने वाले विदूषकों से...

आजकल अधिकतर जगहों पर नगाडे बजाते यह लेखक दिख जाते हैं, घटिया लेखन के यह रचनाकार कोई न कोई मुखौटा ओढ़कर काम करते हैं, कोई अपने ज्ञान का ढिंढोरा पीटता है तो अन्य दूसरों पर सतत आक्रमण कर अपने आपको को विजयी घोषित किए बैठा है !मेरे अपने कुछ मित्र भी इन लोगों में से हैं जिनमे प्रतिभा की कोई कमी नही, मगर उनकी कमियां समझाने की हिम्मत कौन करे ?? और कौन सरे आम अपनी धोती खुलवाने की हिम्मत करे ?? ;-)

और अंत में नवयुग के कवियों को, भाषा और कविताओं की मिट्टी पलीद करते देख, अधिकतर शांत रहने वाले, क्रोधित संवेदनशील राकेश खंडेलवाल......

सड़े हुए अंडे की चाहत
गले टमाटर की अकुलाहट
फ़टे हुए जूते चप्पल की माला के असली अधिकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

तूने जो लिख दी कविता वह नहीं समझ में बिलकुल आई"
खुद का लिखा खुदा ही समझे" की परंपरा के अनुयायी
तूने पढ़ी हुई हर कविता पर अपना अधिकार जताया
रश्क हुआ गर्दभराजों को, जब तूने आवाज़ उठाई

सूखे तालाबों के मेंढ़क
कीट ग्रसित ओ पीले ढेंढ़स
चला रहा है तू मंचों पर फ़ूहड़ बातों की पिचकारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

पढ़ा सुना हर एक चुटकुला, तेरी ही बन गया बपौती
समझदार श्रोताओं की खातिर तू सबसे बड़ी चुनौती
तू अंगद का पांव, न छोड़े माईक धक्के खा खा कर भी
चार चुटकुलों को गंगा कह, तूने अपनी भरी कथौती

कीचड़ के कुंडों के भैंसे
करूँ तेरी तारीफ़ें कैसे
हर संयोजन के आयोजक पर है तेरी चढ़ी उधारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी

क्या शायर, क्या गीतकार, सब तेरे आगे पानी भरते
तू रहता जब सन्मुख, कुछ भी बोल न पाते,वे चुप रहते
हूटप्रूफ़ तू, असर न तुझ पर होता कोई कुछ भी बोले
आलोचक आ तेरे आगे शीश झुकाते डरते डरते

ओ चिरकिन के अमर भतीजे
पहले, दूजे, चौथे, तीजे
तुझको सुनते पीट रही है सर अपना भाषा बेचारी
हे नवयुग के कवि, तेरी ही कविता हो तुझ पर बलिहारी !
और ऐसे में राकेश खंडेलवाल जैसे रचनाकार का सब्र भी टूट जाता है जब भाषा और संवेदनाओं का मजाक सारे आम उडाया जाए !

डॉ अमर ज्योति के शब्दों में "शब्दों के जादूगर राकेश जी शब्दों को कठपुतलियों की तरह नचा कर जहां एक ओर दैनिक जीवन की विसँगतियों का चित्रण करते हैं वहीं दूसरी ओर जीवन की गहरी दार्शनिक व्याख्या भी करते हैं।"

और अंत में मैं एक शानदार गीतकार, प्रेरणादायी, कविश्रेष्ठ राकेश खंडेलवाल की "अँधेरी रात का सूरज" का स्वागत करता हूँ ! साथ ही पंकज सुबीर का भी धन्यवाद जिनके कारण यह रचना हिन्दी जगत को मिल सकी !
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