Wednesday, December 1, 2010

हमारी देसी आदतें - सतीश सक्सेना

खुशदीप सहगल के द्वारा अपनाए जा रहे देसी ट्रेफिक नियमों की लिस्ट देख , हमारा भी, देसियों के द्वारा अपनाए जा रहे कुछ और नियम, बताने का दिल कर गया ! सो हमारे कुछ देसी रूल देखिये !
  • विश्वस्तरीय मेट्रो की सफाई देख कर बड़ा गुस्सा आता है ....उस पर लिख रखा है कि थूकने पर जुरमाना ! स्टील के थूकदान में थूकना अच्छा नहीं लगता ! मुँह में भरी पीक, निगाह बचा कर कोने में पिचकारी मानने में कितना आनंद है, यह जानने के लिए पान खाना सीखिए ! 
  • ट्रेफिक लाइट पर खड़े खड़े, गाड़ी से फालतू कागज़, रबर मैट को सड़क पर झाड़ना, खाली फ़ूड रैपर , पानी की बोतल आदि सड़क पर फेंकने में कोई बुराई नहीं है  ! समय बचता है !
  • ग्रीन लाइट पर भी , पैदल चलने वालों को , तेज निकलती गाड़ियों को, हाथ से रुकने का इशारा देते हुए,निकलने का मज़ा ही कुछ और है ! पैदल चलने वालों का चालान नहीं होता अतः निश्चिन्त रहें ! 
  • आपात स्थिति में, रास्ते से हटने के लिए सायरन बजाती एम्बुलेंस , के आगे अपनी गाडी को रखें और चलते जाएँ ! रास्ता साफ़  मिलता है  ! एम्बुलेंस में, जीवन से जद्दोजहद करते व्यक्ति से, कौन हमारा कोई रिश्ता है ? 
  • जगत माता के नाम पर, जागरण के लिए पैसे उगाहने के लिए कोई मना नहीं कर पायेगा ! फिर उस रात पूरे मोहल्ले के बच्चों को पढने मत दीजिये ! वृद्ध और बीमारों को नींद आये न आये , क्या फर्क पड़ता है  ?
  • शाम को पार्क में बैठ परिवार के साथ पिकनिक मनाइये और खाली बियर केन,चिप्स पैकेट प्लास्टिक थैली और बोतल वहीँ डाल दीजिये ताकि सनद रहे कि हम यहाँ बैठे थे  !

61 comments:

  1. व्यंग्य के माध्यम से हमें हमारे सत्य से परिचित कराती पोस्ट!:)

    ReplyDelete
  2. satish ji yeha sab aadate hame by birth mile huye hai phir kaise koi ise najarandaj kar sakta hai bhala..........vakai bahut khub..........

    ReplyDelete
  3. उपर की फोटो में कौन कौन हैं, यह पहेली भी तोपूछ लीजिए।

    जबलपुर की बलशाली आयोजनी से अवश्‍य मिलिएगा

    ReplyDelete
  4. क्या करें जनाब हम लोगों को भी जानवरों की तरह
    दिन भर मुंह चलाने की आदत हो गयी है , जब देखो कुछ न कुछ मुंह में भरे हुए हैं पान , गुटखा , खैनी के रूप में अब मुंह में रहगा तो भई बाहर भी चितकारी के रूप में निकलेगा
    dabirnews.blogspot.com

    ReplyDelete
  5. बहुत सही कहा .....

    ReplyDelete
  6. लो जी कर लो बात ....अब तो खेर नहीं ...वाह सतीश जी वाह ..क्या निगाह पाई है ...शुक्रिया

    ReplyDelete
  7. हा हा हा...
    मस्त...एक से बढ़कर एक उपाय..

    ReplyDelete
  8. हमारी देसी आदतों का संस्करण प्रस्तुत करने के लिए ..... हार्दिक शुभकामनायें

    ReplyDelete
  9. बहुत सटीक दिया...

    ReplyDelete
  10. सर जी! हम पोस्ट के अंत में, व्यंग वाला डिस्क्लेमर ढूढ़ रहे हैं? नहीं मिल रहा?

    आप तो ऐसे न थे?

    ReplyDelete
  11. http://theuglyindian.com/intro3.html

    ise blog ko dekhiye aur promote kariyega........haa har tab jaroor dekhiyega.......
    Aabhar .

    ReplyDelete
  12. उपरोक्त टिप्पणी एक व्यंग था, अन्यथा न लिया जाये :)

    ReplyDelete
  13. aisi samjhaish ki yse koi jaroorat nahi thi....o isliye ki is tarah ke
    sadgun to hamare bhartiya sankriti ke jaiwik gun hain......

    aur bina disclm ke chatakh vyangya...
    aap to aise na the.....


    pranam.

    ReplyDelete
  14. सच तो ये ही कि हम नही सुधरने वाले
    आप चाहे कितनी ही पोस्ट लिखकर हम पर व्यंग करते रहेा

    अच्छा लगा पोस्ट पढ

    ReplyDelete
  15. ये भारतीय नागरिक के मूल अधिकार है ?

    ReplyDelete
  16. और वो ‘स्टाफ है’ को भूल गये।
    हर जगह काम आता है।

    ReplyDelete
  17. व्यंगात्मक शैली में जागरूक करने वाली पोस्ट ....आभार

    ReplyDelete
  18. हम नही सुधरने वाले
    .............सतीश जी

    ReplyDelete
  19. @अविनाश वाचस्पति ,
    लाल कमीज वाले अविनाश वाचस्पति थैले वाले हैं, जिन्होंने थैला दिखा कर इतने लोगों को बुला लिया और दिया कुछ नही :-(

    @ संवेदना के स्वर ,
    हा..हा..हा..हा...
    चलो हम पर अगर चैतन्य भरोसा कर लें तो औरों की परवाह नहीं :-)), आप इसे व्यंग्य ही समझें !
    अब इस कमेन्ट के बाद बोलने को कुछ नहीं बचा

    ReplyDelete
  20. अच्छी सीख दे रहे हैं. यही तो भारतीय की पहचान है. जगत माता के जागरण के नाम पर जो कुछ होता है उसे देख हर साल हमारे एक मित्र कहा करते हैं देखो गुंडा देवी बैठा दी गयी है.

    ReplyDelete

  21. @ संजय ,
    आज के सबसे अच्छा कमेन्टकार कलाकार संवेदना के स्वर ( चैतन्य ) रहे ....
    आप तो ऐसे न थे ...
    हम ब्लोगर हैं और हम नहीं बदलेंगे हमारे बारे में असलियत काफी बाद पता चलती है !

    ReplyDelete
  22. @ नीरज जाट,
    अरे यार वाकई भूल गया नीरज ! घुमक्कड़ी के रहते सबसे अधिक बसों में कंडक्टर को तुम्ही धमकाते हो !
    " स्टाफ हैं " :-)

    ReplyDelete
  23. व्यंग्य के माध्यम से जागरूक करती पोस्ट्।

    ReplyDelete
  24. सक्सेना जी, काहे सुबह सुबह दिल्ली वालों को मिर्च लगा रहे हैं.......

    बहुत बढिया व्यंग...

    ReplyDelete
  25. काहे को और नुस्‍खे सिखा रहे हो। ये तो सारे ही सभी को आते हैं। हा हा हाहा।

    ReplyDelete
  26. सतीषजी, आपके द्वारा दर्शाई सभी देशी आदतें हमारी भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग ही तो हैं, दूसरे प्रभावित लोगों को इनसे जो शूल चुभने जैसी पीडा होती है तो हुआ करे, आपने तो अपनी ओर से दूसरों को होने वाली चुभन का प्रतिनिधित्व करते केक्टस को भी साथ में दर्शा ही दिया है ।
    और हाँ उपर के पहेलीनुमा चित्र में आपने लाल शर्ट में अविनाशजी को तो बता दिया लेकिन श्रद्धेय गुरुजी श्री समीरजी भी तो यहीं दिख रहे हैं ।

    ReplyDelete
  27. सतीश जी व्यंग के लहजे में बहुत ही अर्थ पूर्ण बात कह गयें आप. मानना पड़ेगा आपकी इस दी गयी सीख को.


    उपेन्द्र

    सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )

    ReplyDelete
  28. चलिये, बहुत कुछ और पता लग गया अपने बारे में।

    ReplyDelete
  29. व्यंग के माध्यम से जागरूक करती बातें
    आपात स्थिति में, रास्ते से हटने के लिए सायरन बजाती एम्बुलेंस , के आगे अपनी गाडी को रखें और चलते जाएँ ! रास्ता साफ़ मिलता है ! एम्बुलेंस में, जीवन से जद्दोजहद करते व्यक्ति से हमारा कोई रिश्ता नहीं
    यह तो बहुत दुःख देती है..

    ReplyDelete
  30. व्यंग्य शानदार है ...बाकी वैसे सब सही ही है ...व्यंग्य कहाँ है ..!

    ReplyDelete
  31. व्यंग्य व्यंग्य में राह सीधी दर्शा दी?

    सार्थक

    ReplyDelete
  32. मर्द बेचारे बीवीयों के डर से अपने ही घर में खुलकर यहाँ वहाँ थूक भी नहीं पाते , इसीलिए वे घर की सारी घुटन बाहर निकालते हैं ।

    @ अमित जी की नज़्र करता हूँ-
    रहता है जिसके दिल में प्यार सदा
    वह करता है जग पर उपकार सदा



    किरदार आला, ज़ुबाँ शीरीं है अमित तेरी
    होता है जग में, ऐसे बंदों का उद्धार सदा
    ............

    ReplyDelete
  33. वाह सतीश जी पहले एक प्रेमकवि अब एक व्यंग्यकार धीरे धीरे आपके अलग अलग रूपों से परिचित हो रहा हूँ, आपका नया पाठक हूँ न। अगली फुरसत में ही आपकी पुरानी पोस्टोँ को खँगालूंगा।

    सोमेश
    कभी हमारे शब्द साधना में भी आइए।

    ReplyDelete
  34. ये शिक्षा तो ताऊ की बपौती है आपने कैसे और किसकी आज्ञा से दी? आपका चालान काटा जायेगा.:)

    रामराम

    ReplyDelete
  35. सतीश जी ज्ञानवर्धक पोस्ट . ज्ञान बढ़ा की क्या क्या होता है दिल्ली मैं, अजी वही होता है जो मुंबई मैं भी होता है. फिर रोकेगा कौन ऐसी हरकतों से?

    ReplyDelete
  36. बढ़िया व्यंग्य है..पर दुखद सच भी....लोगों की ये सारी कारगुजारियां तो नज़र आती ही रहती हैं.

    ReplyDelete
  37. टिप्पणियां पढ़ कर दुःख हुआ..अधिकतर लोगों ने लिखा है हम नहीं सुधरेंगे...
    बहुत ऐसे भी हैं जो इसे व्यंग्य समझ रहे हैं, क्या ये विचारणीय विषय नहीं मात्र एक व्यंग्य है ????
    या फिर शायद मैं ही कुछ ज्यादा सेंटी हो गया हूँ....
    मेरा तो मानना है कि..
    हम बदलेंगे, देश बदलेगा...
    आपको क्या लगता है कि हम बिगड़े हुए हैं ????
    मुझे ऐसा नहीं लगता, क्यूंकि वही लोग जो यहाँ कचरा फैलाते हैं उन्ही को अगर विदेशों की साफ़ सुथरी गलियों में भेज दिया जाये तो वहां वे वैसा नहीं करते....
    मामला कुछ और है, क्या है पता नहीं...

    ReplyDelete
  38. अरे साहब आजाद देश में रहने का यही तो मजा है और देखो लोग क्या क्या बातें बना रहे हैं. लाहौल विला कुवत...

    ReplyDelete
  39. कुछ साल पहले जब हम जॉब में थे... ऑफिस के बाहर लगी फुलवारी में गुटखा खाने वाले लोग थूकते रहते थे... जीएम बहुत परेशान थे...हज़ार नोटिस नोटिस लगाए, मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ...हमने सलाह दी कि गुलाबों के पास कुछ तुलसी के गमले रखवा दें...ऐसा किया भी गया...लेकिन अफ़सोस लोगों ने तुलसी के साथ भी वही सब किया...

    हमारे अब्बू बहुत नियम पर चलने वाले हैं... नियमों का ख़ुद तो पालन करते हैं, बल्कि दूसरों से भी कराते हैं...

    हमारी किसी भी आदत से दूसरों को परेशानी नहीं होनी चाहिए...

    ReplyDelete
  40. हर चीज़ के लिए हम सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते... अपने आसपास हर जगह सफाई रखना हमारी भी ज़िम्मेदारी में शामिल है... हर इंसान इस बात को समझ ले तो बहुत सी समस्याएं ख़ुद ही हल हो जाएं...

    ReplyDelete
  41. हमें अपने गरेबान में झाँकने को विवश कर दिया भाई आपने !

    ReplyDelete
  42. सूक्षम तस्वीर शानदार है । बाकि तो सब सच्चाई है ।

    ReplyDelete
  43. ब्लॉग या वेबसाइट से कमाओ हजारो रुपये...

    To know more about it click on following link...

    http://planet4orkut.blogspot.com/2010/08/blog-post_9159.html

    ReplyDelete
  44. @ डॉ अनवर जमाल ,
    अमित शर्मा के बारे में आपके ख़याल पसंद आये ...वह इस योग्य हैं !
    @ ताऊ रामपुरिया ,
    ताऊ तुमसे ही तो पूछा था ...उस समय क्या नींद में था ??

    @ फिरदौस खान ,
    अफ़सोसहै, किसी को थूकते देख, राह चलते लोग टोकने की हिम्मत भी नहीं करते ! बुरी बात का विरोध न होने से आने वाली पीढ़ी पर बहुत खराब असर पड़ेगा ! बुराई का विरोध अवश्य होना चाहिए अथवा समाज के अस्तित्व की आवश्यकता ही क्या है !

    ReplyDelete
  45. ब्लॉग या वेबसाइट से कमाओ हजारो रुपये...

    To know more about it click on following link...

    http://planet4orkut.blogspot.com/2010/08/blog-post_9159.html

    ReplyDelete
  46. हमारे सिविक सेन्स पर करारा कटाक्ष ......

    ReplyDelete
  47. ये सभी नुस्खे तो एक आम हिन्दुस्तानी जन्म से सीखकर आता है :)

    ReplyDelete
  48. .
    .
    .
    जैसे रूल आपने बताये वैसे ही करेंगे सर जी...

    आजादी है किसके लिये ?



    ...

    ReplyDelete
  49. सुंदर, प्रेरक पोस्ट।

    ReplyDelete
  50. सतीश भाई,
    अब मुआ खंभा सामने आ जाए तो कमबख्त टांग तो उठेगी ही...अब इसमें टांग बेचारी का क्या कसूर..खंभा ही सारे फसाद की जड़ है...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  51. सुन्दर सीख !

    ReplyDelete
  52. सुपर व्यंग्य; बेहतरीन प्रस्तुति ,बधाई !

    ReplyDelete
  53. ट्रैफिक रूल्स पर करार व्यंग अच्छा लगा,सतीश जी.

    ReplyDelete
  54. देसी पुराण पर खुशदीप और आप मिल कर एक पुस्तक छपवा लीजिये। खूब बिकेगी। बधाई।

    ReplyDelete

  55. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

    ReplyDelete
  56. वाह... बढ़िया व्यंग हैं...
    वो पंक्तियाँ याद आ गईं...
    एक उल्लू ही काफी है बर्बाद गुलिस्तान करने को... हर दाल पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए गुलिस्तान क्या होगा...
    पर सतीश जी... जो लोग ये व्यंग पढ़कर भी न सुधरें???
    हाँ, ढीठ बनने का अपना अलग मज़ा है... उसमें भी कोई टैक्स नहीं लगता...

    ReplyDelete

एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

Related Posts Plugin for Blogger,