Monday, March 23, 2015

मानव का दूँ मैं परिचय क्या - सतीश सक्सेना

लोग पूंछते परिचय मेरा,मानव का दूँ मैं परिचय क्या ?
कलम अर्चना करते आये  दीवानों का, परिचय क्या ?


कितना सुख है कमजोरों की, रक्षा में कुछ लोगों को 
मुरझाये अंकुर सहलाती बदली का दूँ, परिचय क्या ?

प्यार,नेह, करुणा और ममता, घर से जाने कहाँ गए !
धर्मध्वजाओं को लहराते विष का दूँ,मैं परिचय क्या ?

जिस समाज में जन्म लिया था रहने लायक बचा नहीं
मानव मांस चबाने वाले, मानव का दूँ ,परिचय क्या ? 

जहाँ लड़कियां घर से बाहर निकलें सहमीं, सहमीं सी !
धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का,परिचय क्या ?

20 comments:

  1. जहाँ लड़कियां घर से बाहर निकलें सहमीं, सहमीं सी !
    धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का परिचय क्या ..
    शायद पूरी मनुष्य जाती अपना परिचय नहीं दे पाए ... सारा समाज परिचय न दे पाए ... गहरी अनुभूति जनम लेती है हर शेर पढने के बाद ...

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  2. Sarthakta liye sashakt rachma....

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  3. जहाँ लड़कियां घर से बाहर निकलें सहमीं, सहमीं सी !
    धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का परिचय क्या ?
    बहुत सुंदर और सटीक पंक्तियाँ.

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  4. मानव मांस चबाने वालों का इससे बढ़िया परिचय और क्या हो सकता है ?

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  5. हर पंक्‍ित दिल को छूती है, जज्‍बातों से लबालब है आपकी रचना।

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  6. Satish ji, this is a true poet's introduction, natural like Valmiki.

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  7. आप जिस गति से ऐसी कवितायेँ रचते जाते हैं , बड़ा विस्मय होता है . यह कोई साधारण बात नहीं है . नमन आपको .

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    1. ओह , आपका स्वागत है निस्संदेह आपके द्वारा कहे गए शब्द मेरे लिए शक्ति देंगे , आदर सहित !

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  8. बहुत सुन्दर। व्यथा भी है और व्यंग्य भी।
    कोटि कोटि नमन कि आज हम आज़ाद हैं

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  9. हमेशा की तरह सुन्दर - प्रस्तुति । बधाई ।

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  10. ह्रदय से बहता नैचुरल प्रवाह, हमेशा की तरह सुन्दर रचना !

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  11. बहुत खूब.... चार लाईनों में सब कुछ कह डाला ...

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  12. हमेशा की तरह सार्थकता,सटीक चोट, शब्दों की सहज़ता ---आपके गीत ही आपके परिचय हैं हर परिप्रेक्ष्य में।

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  13. धूल भरे माहौल में जन्में काव्यपुरुष का परिचय क्या .... waah!

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  14. धर्मध्वजा जब अमृत की जगह विष बांटे तो उसका विरोध होना ही चाहिए..समाज को आईना दिखाती सशक्त रचना..

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  15. अन्याय और अत्याचार पर जिसका हृदय रो उठे ,उस अंतःकरण से उठते स्वर स्वयं अपना परिचय हैं !

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  16. Apki rachnaon ka Kendra kafi naya hota hai, humesha naye vishyon ko hi aap choote hain... V nice! :]

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- सतीश सक्सेना

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