Tuesday, June 4, 2013

हिजड़ों के इस देश में प्यारे ... -सतीश सक्सेना

" आपके इस आक्रोश के आगे सिर झुका है मेरा । यह पीडा और आक्रोश हवा के साथ उडना चाहिये हवा जो प्राणवायु बन कर रक्त के कण-कण में मिलती है । हर जुबां से निकलने चाहिये ये शब्द । हर आँख से बहना चाहिये यह पीडा " 

पिछले लेख पर लिखे गिरिजा कुलश्रेष्ठ  , के इस कमेन्ट ने, इस मार्मिक घटना पर लिखने को दुबारा विवश किया  है , आभार उनका कि  उन्होंने इसमें छिपी वेदना महसूस की !
काश यह कष्ट औरों को भी हुआ होता !!




मैंने ब्लोगिंग की शुरुआत कभी इसलिए नहीं की थी कि  मुझे अथवा मेरी लेखनी की तारीफ़ की जाए मेरा  उद्देश्य मेरे विचारों को क्रमबद्ध करना मात्र था जिससे मुझे अपने लेखन के प्रति संतुष्टि रहे कि  मैंने अपने विचार लेखबद्ध कर दिए हैं और यह समाज के लिए , यदि मेरे बाद भी पढ़ना चाहे तो उपलब्द्ध रहे !

मगर पिछले लेख में, मैंने किये गए कमेंट्स का पुनरावलोकन किया तो पाया कि  बेहद आवश्यक और दर्दनाक , इस लेख को भी बहुत कम लोगों ने ध्यान से पढ़ा, अधिकतर कमेन्ट बिना पढ़े ही दिए गए हैं !
बेहद अफ़सोस हुआ ...

एक बहादुर देशभक्त शेर को, देश में ही , बुरी तरह मारा गया और लोगों की यह प्रतिक्रिया है ........ और भी अफ़सोस की बात यह है कि महेंद्र कर्मा की कष्टदायी मृत्यु के बाद , कम्युनिस्टों की यह प्रतिक्रिया थी कि  एक नेता की मृत्यु  पर इतनी चिल्ल पों क्यों हो रही है   ( पिछली पोस्ट पर सुज्ञ जी का कमेन्ट देखें  )!

क्योंकि  उन्हें पता था कि आज यह देश हिजड़ों और चोरों का देश है एक शेर के मरने पर, इस देश के निवासी, चिल्ल पों से अधिक कुछ नहीं कर पायेंगे !

और देश के नमक हरामों ने ज़श्न मनाया था इस बहादुर इंसान के दम तोड़ने पर ! उसकी लाश पर सैकड़ों वार करने के बाद, उसपर नाच कर, ख़ुशी ज़ाहिर की गयी थी  और शहीद की लाश के साथ, यह सब उसके अपने देश में हुआ  !

इस दर्दनाक म्रत्यु के बाद, कुछ ने उन्हें कांग्रेसी नेता कहा तो किसी की नज़र में वे पुराने कम्युनिस्ट नेता मात्र ही थे ...

मुझे लगता है कि हमारा चरित्र ही घ्रणित हो चुका है , शायद हम इस योग्य ही नहीं हैं  कि  हम अपने बीच जीवित बचे, शानदार लोगों की पहचान कर सकें ...

मैं इस घटना से पहले  महेंद्र कर्मा का नाम भी नहीं जानता था , जिस दिन यह खबर आई तो मुझे लगा कि  उग्रवादियों के द्वारा, एक राजनैतिक नेता की ह्त्या ,कर दी गयी है , मगर जब महेंद्र सिंह करमा की पृष्ठभूमि और उस दिन की घटना दुबारा पढ़ी तो लगा कि  सुभाष चन्द्र बोस की दुबारा ह्त्या कर दी गयी और देश में किसी को शर्म नहीं आई  !

हाँ ,अगले दिन जगह जगह प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं कम्युनिस्टों की , जो आदिवासियों पर भारत सरकार के अत्याचार की कहानी बता रहीं थीं और इस दुर्दांत घटना को, आदिवासियों की एक हिंसक प्रतिक्रिया , जिसमें महेंद्र करमा जैसे जुझारू नेता के साथ छत्तीसगढ़ के कांग्रेस अध्यक्ष एवं विद्याचरण शुक्ल  जैसे राजनेताओं को मिटा देने की एक सफल हिंसक साज़िश की गयी थी !

एक और शर्मनाक तथ्य यह भी था कि  छतीस गढ़ से किसी पत्रकार शेर ने भी अपनी कलम नहीं उठाई कि  कहीं सत्ता पक्ष के आका नाराज़ न हो जाएँ कि  कांग्रेसियों के लिए लिखा जा रहा हैं,यहाँ पर देश के लिए जान देने वाले इस बहादुर की पहचान, कांग्रेसी नेता की ही मानी गयी थी ! 

पूरे छत्तीस गढ़ में एक ही शेर था, जिसे यह पता था कि  वह सशस्त्र नक्सल वाद से, उनके गढ़ में,  अकेला  बिना किसी सहारे के, लड़ रहा है और देर सवेर इस कमज़ोर, अशिक्षित,  नासमझों के  देश में उसका मारा जाना तय है ! 

जब नक्सलवादी घेर के लोगों को मार रहे थे तब महेंद्र कर्मा ने  खड़े होकर अपील थी कि  निर्दोषों को न मारा जाय तुम लोग जिसे ढूंढ रहे हो वह मैं हूँ और नक्सल वादियों ने उसके हाथ बाँध कर उस 70 से अधिक बार चाकुओं से धीरे धीरे गोदा ताकि उन्हें अधिक दर्द हो ...

लेखन जगत की प्रति क्रियाएं हमारे देश की मनोदशा व्यक्त करने को काफी हैं जो कम से कम मेरी नज़र में बेहद शर्मनाक हैं !

थू है हमारी मानसिकता पर ... 

   

Saturday, May 25, 2013

क्यों मैं तुमसे प्यार करूँ -सतीश सक्सेना

गहरे घाव दिए, श्रद्धा ने , क्यों  सत्ता स्वीकार करूँ !
कौन सहारा दिया तुम्ही ने ,जो मैं तुमसे प्यार करूँ !

माँ  समझातीं, पिता डांटते, अन्तर्यामी प्रभू  बताते ,    
कहते, सब कुछ,तब होता है,जब तेरा सत्कार करूँ ?  

कहते,तुम दौड़े आते हो,अपमानित द्रोपदी, देखकर
अब तो तुलसी हर घर रोये क्यों मैं तुमसे प्यार करूँ !

आज मानवों के कार्यों पर,शर्मसार,राक्षसी कौम भी !
पतित मानवों का हिस्सा हो क्यों अच्छा व्यवहार करूँ !

आज राक्षसी,अपने बच्चे, छिपा रही,मानवी नज़र से 
मानव कितना गिरा विश्व में,मैं ही क्यों उपकार करूँ !

Friday, May 17, 2013

अपने परिवार की महिलाओं के लिए कृपया इसे पूरा पढ़े - सतीश सक्सेना

                वे ही पूरे परिवार खुशियों के रंग भरती हैं ,सारे जीवन सुबह से शाम तक बिना थके पूरे परिवार की चिंता , भोजन , वस्त्र , घर का रख रखाव, आदि में बिना अपनी थकान याद किये व्यस्त रहती हैं ! उनकी अधिकतर बीमारियों के बारे में हमें पता ही नहीं चलता ! और शायद हम याद न रखने के भी दोषी हैं !

डॉ गीता (कैंसर कंसल्टेंट ) के शब्दों में ..
She lights up everyone's lives. She is an enigma,a pillar of strength- she is the sunshine, the rainbow, the gentle breeze,the earth, all enduring, selfless and patient.She gives endlessly.Let us care for her, nurture her and keep her healthy because our existence is inextricably linked to her.She means the world to us, so let us paint her canvas in pink and ensure she is aware of her own self and submits herself to a check even if she is ostensibly well.'
Sent from BlackBerry® on Airtel

                 ब्रैस्ट कैंसर पर जागरूकता हेतु यह कविता कल फेस बुक पर पोस्ट की थी जिसमें महिलाओं से अपना ध्यान रखने के लिए अपील थी चूंकि हम ब्लागर साथियों में पढने की आदत बेहद कम होती है और सरसरी नज़र से देख कमेन्ट करते हैं फिर भी पहली बार मैंने उसे शेयर करने की अपील की थी तथा उनके नाम भी टैग किये थे जिससे वे इसे कुछ अधिक महत्व दें !

मगर सुबह वही हाल ..
लाइक की भरमार थी वहां मगर या तो शेयर करना आवश्यक नहीं लगा उन्हें ... :(
अथवा अपील ही नहीं पढ़ी :(
महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर बेहद घातक  हो सकता है अगर वे वक्त पर लापरवाही न दिखाएँ , अफ़सोस है कि अक्सर वे इसको छुपाती हैं और नतीज़ा परिवार के लिए बहुत खराब होता है !
फेस बुक पर जाकर इसे शेयर करने के लिए दुबारा अपील कर रहा हूँ , आशा है इस पुनीत कार्य में सब का उत्साह मिलेगा !
http://satish-saxena.blogspot.in/2012/10/blog-post.html
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200296055257322&set=a.10200263590885733.1073741827.1031990443&type=1&theater


Monday, May 6, 2013

काश ! काम आ जाएँ किसी के, इच्छा है दीवानों की .. -सतीश सक्सेना

ख़ामोशी का दर्द न जानों, हम फक्कड़ मस्तानों की 
कहाँ से लाओगे उजला मन आदत पड़ी बहानों की !
गंगटोक 30 मार्च 13 

हँसते हँसते सब दे डाला,अब इक जान ही बाकी है !
काश काम आ जाएँ किसी के,इच्छा है,दीवानों की !

प्यार बाँटते, दगा न करते , भीख न मांगे दुनिया से !
ज्वालामुखी मुहाने  जन्में , क्या  चिंता  अंगारों की  !

अभिशापित जीवन पाया है, क्या हमको दे पाओगे !
जाओ, जाकर, बाहर घूमो ,रौनक लगी बाजारों की  !

बंजारे  को  ख्वाब दिखाते , महलों और मेहराबों के !
बरगद तले, बसेरा काफी, मदद न लें इन प्यारों की !

Friday, May 3, 2013

कुछ लिखने का मन नहीं करता -सतीश सक्सेना

मेरा लिखने को मन नहीं करता जब ...

  • कोई अपना,अपने मन की बात चाहते हुए भी न कह पाए.. 
  • किसी विधवा माँ का खाली बटुआ,बच्चों को नज़र नहीं आये ...
  • विवाह के बाद विदा होने के बाद, भाई को बरसों, अपनी बहन की याद नहीं  आये .....
  • जब बेटे बहू को, बाहर डिनर पर जाते समय ,दरवाजा बंद करने आती, माँ के आंसू नज़र नहीं आयें  .. 
  • बेहद नजदीकी रिश्तों में भी धन को महत्व दिया जाए.. 
  • दूसरों का नुकसान करके भी,अपना फायदा देखा जाये .....
  • धनवान,अपने बच्चों से भी धन पाने की आशा करे...
  • सम्मान लालचियों का भी सम्मान किया जाए ..
  • साधुओं को भुला दिया जाये... 

Tuesday, April 2, 2013

रिक्शे वाले ... -सतीश सक्सेना

कुछ पंक्तियाँ, एक कमेन्ट के रूप में श्री गिरधारी खंकरियाल की " ये बेचारे -रिक्शे वाले " शीर्षक वाली रचना पर लिखी गयी हैं ! शीर्षक के शब्द उन्ही के हैं , आभार सहित ,  ...

कौन समझना, चाहे इनको
काम बहुत, क्या देखें इनको
वजन खींचते, बोझा ढोते
दर्द न जाने दुनिया वाले
ये बेचारे रिक्शे वाले !!

भूख न जाने क्या करवाये 
बहे पसीना नज़र न आये
पशुओं जैसा काम कराएं 
बातें करते, दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले

हड्डी हड्डी बता रही है  
नज़रें सामने, मन है घर में
बीमारी का खर्चा, उस पे 
कष्ट न समझें दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले

यह गरीब भी पुत्र किसी की 
दवा के पैसे जुटा रहा है,
अम्मा का दुःख बेटा जाने     
कैसे जानें दुनिया वाले, 
ये बेचारे रिक्शे वाले !

माँ की दवा, बहन की शादी
जाड़ा गर्मी हो या पानी
कुछ अनजानी चिंता इनकी 
समझ न पाएं दुनिया वाले 
ये बेचारे रिक्शे वाले !!

Saturday, March 16, 2013

आओ छींटें मारे, रंग के -सतीश सक्सेना


ताऊ रामपुरिया ने , होली के अवसर पर अपने कविसम्मेलन में आने का न्योता दिया ! ताऊ ने इस अवसर पर मुझे बढ़िया सिल्क के कपडे पहनाये थे , जो कि प्रोग्राम ख़त्म होने पर यह कह कर उतरवा लिए कि अगले कवि सम्मेलन में काम आयेंगे ! 
ताऊ जैसे गुरुघंटाल से और क्या उम्मीद करूं ......खैर 

होली के अवसर पर बुद्धिमान, मित्रों से अनुरोध है कि इस रचना में ,गंभीर अर्थ तलाशने के लिए बुद्धि प्रयोग न करें , केवल आनंद लें ! :)

आभार आपके आने का ! 

नमन करूं , 
गुरु घंटालों के  !
पाँव छुऊँ , 
भूतनियों  के !
ताऊ चालीसा को पढ़ते, 
खेलें  ब्लोगर  होली है !  
आओ छींटें मारे, रंग के,  बुरा न मानो होली है !

गुरु है, गुड से 

चेला शक्कर 
गुरु के अली 
पटाये जाकर  ! 
गुरु भाई से राज पूंछकर, 
गुरु की गैया,दुह ली है !
तीखे तीरंदाज़ ,सह्रदय , रंग मिज़ाज  त्रिवेदी हैं !


चेले बन कर 
नाम कमाते 
गुरुघंटाल पे ,
बुदधि लगाते 
बाते करते,हंसी हंसीं में,
शह और मात सीखली है !   
घोडा बनकर,इस प्यादे ने,गुरु की धोती खोली है !


कबसे लिखते  ,
आस लगाये !
इतना लिखा 
न कोई आये !
नज़र  न आये, कोई भौजी ,
किससे  खेलें  ? होली है  !
कुछ तो आहट दरवाजे पर,कहीं तो पायल छनकी है !


ब्लोगिंग करते 
सब चलता है !
कुछ भी लिखदो 
सब छपता है !
जिनको कहीं न सुनने वाले,
यहाँ पर बजतीं ताली हैं !
यहाँ पन्त जी और  मैथिली , अक्सर भरते पानी  हैं !

चार कोस पे 
पानी बदले ,
आठ कोस  
पर   बानी  !
देसी बानी पढ़ी, न समझी,
अर्थ  अनर्थ  पहेली है  ! 
किसके कपडे साफ़ बचे हैं,किसकी रंगत गोरी है ! 

कचरा लिख दो ,
कूड़ा लिख दो !
कुछ ना आये ,
कविता लिख दो
कवि बैठे हैं, माथा पकडे  ,
कविता  कैसी   होली  है !
एक पंक्ति में,दो शब्दों की, माला  लगती सोणी है !

कापी  कर  ले ,

जुगत  भिडाले !  
ब्लोगर बनकर  
नाम कमा  ले ,
मधुर गीत की बातें अब तो ,
बड़ी पुरानी हो ली हैं  !
ताऊ ने हाइकू लिखमारा,शिकी की गागर फोड़ी है !

अधर्म करते 

धर्म सिखाते  
बड़े रसीले,
शीर्षक लिखते  !
नज़र बचाके ,कैसे उसने,
दूध में गोली, घोली है !
नया मुखौटा लगा के देखो,पीठ में मारे गोली है !

ब्लू लेवल 

की बोतल आई ,
नई कार 
बीबी को भायी
बाबू जी का,टूटा चश्मा,
माँ  की  चप्पल आनी है  !
समय ने, बूढ़े आंसू  देखे , यही  तो प्यारे होली है !







Wednesday, February 27, 2013

एक चिड़िया ही तो थी,घायल हुई -सतीश सक्सेना

कभी कभी हम अपने ही जोश में चहचहाती एक मासूम सी चिड़िया, की गुस्ताखी पर गोली चला देते हैं ...उसका दिल हम छलनी कर देते हैं , बिना यह जाने हुए कि बिना भूल, उसका क्या हाल कर दिया  !

एक चिड़िया चहकती,घायल  हुई !
एक निश्छल सी हँसी, आहत हुई ! 

जीभ से निकलीं  हुईं , वे गोलियां ,

किस कदर पेवस्त वे,दिल में हुईं !

खेल में,  भेजी गयीं, वे  चिट्ठियाँ, 

क्या तुम्हें मालूम है ,घातक  हुईं !

घर के दरवाजे पर, गुमसुम भीड़ है , 
आज घर पर,बिन मेरे महफ़िल हुई ! 

तुम तो कहतीं थीं,  कि मैं ना रोउंगी !
आखिरी दिन तुम भी तो शामिल हुईं !

तुम तो घर को छोड़कर ही, चल दिए,
ऎसी हमसे क्या सनम , रंजिश हुई !

Friday, February 22, 2013

मैं अब खुश हूँ ... - सतीश सक्सेना

आश्रय देने यहाँ न आना, मैंने जीना सीख लिया !
धीरे धीरे  बिना सहारे , हमने रहना सीख लिया !


मैं अब खुश हूँ तेरी दुनियां,मुझको नहीं बुलाती है ! 
हँसी चुराकर तस्वीरों से, हमने हंसना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ हाथ पकड़ने वाला कोई पास नहीं 
धीरे धीरे घुटनों के बल, हमने चलना सीख लिया ! 

मैं अब खुश हूँ, तेरे  सिक्के, नहीं चले, बाजारों में !

भूखे रहकर धीरे धीरे, कमा के खाना सीख लिया !

मैं अब खुश हूँ, मुझे ठण्ड में,याद न तेरी आती है !

हाथ जले,पर जैसे तैसे आग जलाना सीख लिया ! 

Saturday, February 16, 2013

देख के इन कवियों की भाषा , आँख चुराएं मेरे गीत -सतीश सक्सेना

कलम उठा अपने हाथों में 
ज्ञानमूर्ति , कहलाते हैं !
दुष्ट प्रकृति के स्वामी अपना 
नाम व्यास बतलाते हैं !
शारद को अपमानित करते ,
लिखते बड़े रसीले गीत !
देख के इन कवियों की भाषा ,आँख चुराएं मेरे गीत !

कौन धूप में,जल को लाकर
सूखे मन को तृप्त कराये ?
प्यासे को आचमन कराने 
गंगा , कौन ढूंढ के लाये ?
नंगे पैरों, गुरु दर्शन को ,
आये थे, मन में ले प्रीत !
सच्चा गुरु ही राह दिखाए , खूब जानते मेरे गीत !

धवलवस्त्र, मंत्रोच्चारण ,
से मुख पर भारी तेज दिखे 
टीवी से हर घर में आये
इन संतों से , दूर रहें !
रात्रि जागरण में बैठे हैं ,
लक्ष्मीपूजा करते गीत !
श्रद्धा के व्यापारी गाते , तन्मय हो जहरीले गीत !

कष्टनिवारक से लगते हैं, 
वस्त्र पहन, सन्यासी के !
राम नाम का ओढ़ दुशाला
बुरे करम, अधिवासी के !
मन में लालच ,नज़र में धोखा,
मुंह से बोलें , मीठे गीत !
श्रद्धा बेंचें,घर घर जाकर, रात में मस्त निशाचर गीत !


शिक्षण की दीक्षा देते हैं ,
गुरुशिष्टता मर्म, न जाने
शिष्यों से रिश्ता बदला है,
जीवन के सुख को पहचाने
आरुणि ठिठुर ठिठुर मर जाएँ,
आश्रम में धन लाएं खींच !
आज कहाँ से ढूँढें ऋषिवर, बड़े दुखी हैं, मेरे गीत !



Tuesday, February 5, 2013

पुत्री वन्दना - सतीश सक्सेना

क्यों तुम चिंतित से लगते 
हो, बेटी जीत दिलाएगी  !  
विदुषी पुत्री जिस घर जाए
खुशिया उस घर आएँगी !
कर्मठ बेटी के होने से , 
बड़े आत्मविश्वासी गीत !
इसके पीछे चलते चलते,जग सीखेगा,जीना मीत !

जब से बेटी गोद में आई 

घर में रौनक आयी  है  !
दोनों हाथों दान किया पर 
कमी , कभी न आई है !
लगता नारायणी गा रहीं,
अपने घर में आकर गीत !
उनके हाथ, बरसता वैभव, अक्षय  होते मेरे गीत  !

जबसे इसने चलना सीखा 
घर में रौनक आई थी  !
इसके आने की आहट से 
चेहरे, रंगत छायी थी  !
स्नेही मन जहाँ  रहेगी ,
खूब सहारा दें जगदीश !
अन्नपूर्णा दान करेगी , आशिष देते मेरे गीत !

रोज कबूतर करके आएं ,
अभिनंदन गुड़िया के घर का !
सारे घर को महका जाएँ ,
कुछ चन्दन उसकी यादों का !
चंचल,कल्याणी,मनभावन,
जहाँ रहे बजता संगीत !
यादें इसकी जब जब आएं, आह्लादित कर जाते गीत !

सुबह सबेरे उठते इसके  

चहक उठे,मेरा घर बार !
इसके जाने से ही घर में
सूना सा, लगता संसार !
जलतरंग सी जहाँ बजेगी,
मधुर सुधा बरसाए प्रीत !
बाबुल का सम्मान बढाए , सब गाएंगे  इसके गीत ! 

अच्युतम केशवम 
पूज्य नारायणम
ईश पुरुषोत्तमम
कृष्ण आवाहनम
सिद्धि विनायक स्थापित 

कर, विष्णुस्तवन गायें ईश !
सारे द्वार सुरक्षित घर के , निश्चित रहते मेरे गीत !

ॐ सर्व मंगल मांगल्ये 

शिवे, सर्वार्थ साधिके !
शरण्ये त्रयम्बके  गौरि
नारायणी नमोस्तु  ते !
दोनों कर श्रद्धा से जोड़े, 
पुत्रि वन्दना करते गीत !
गौरी गरिमामयी  रहेगी, आशीर्वाद  भेजते  गीत !

Saturday, January 19, 2013

भाषा इन गूंगो की -सतीश सक्सेना

कुछ दिन पूर्व, घर के बाहर, ४ नन्हें दुधमुहों ने जन्म लिया, माँ द्वारा एक झुरमुट में सुरक्षित छिपाए जाने के बावजूद, ये नन्हे भाग भाग कर सड़क पर आ जाते थे  ! तेज जाती हुई कारों को सावधानी से चलाने के लिए कहतीं इनकी माँ द्वारा, कार के पीछे भौंकते हुए दौड़ने से, होते शोर से पडोसी परेशान थे  ! 
गुडिया के बुलाने पर, मैं बाहर गया तो एक को छोड़ सारे बच्चे, भाग कर माँ के पास छुप गए ! केवल एक था जो निडरता के साथ खड़ा रहा और बढे हुए हाथ की उंगलियाँ अपने नन्हे दांतों से काटने का प्रयत्न करने लगा ! कुछ बिस्कुट इन बच्चों और उस वात्सल्यमयी को देकर हम दोनों बाप बेटी घर आ गए !
अगले दिन सुबह ,घर के बाहर अजीब सन्नाटा देख बाहर गया तो दिल धक् से रह गया , वही निडर बच्चा, किसी तेज और असंवेदनशील कार  द्वारा सड़क पर कुचला पड़ा था .......
और उसकी माँ बिना भौंके, अपने ३ बच्चों के साथ उदास निगाहों से मुझसे पूंछ रही थी मेरे बच्चे का कसूर क्या था , क्यों मार दिया तुम लोगों ने  ??

Thursday, December 13, 2012

विदाई गुडिया की ... सतीश सक्सेना

२४ अगस्त ८५ को जन्मी गुडिया ने, २४ नवम्बर १२ को, अपने जीवन साथी के साथ, नया घर बसाने , अपना घर छोड़ कर, विदाई ली !
इन आंसुओं को क्या कहें, ख़ुशी के या अपनी लाडली के जाने के गम के !!!!

गुड़िया की विदाई पर, हमारे अमेरिकन मेहमान  विश्वयात्री एडम  ने, हमारे छलके आंसुओं से आहत होकर कहा था ....
"why sad ending of a such beautiful function ? "

मैं इस प्रश्न का जवाब उसे अभी तक नहीं दे पाया हूँ ......
आज  गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कमेंट्स, फिर आंसू छलका गया ...

बीतें तेरे जीवन की घड़ियाँ 
आराम की ठंडी छांवो में 
काँटा भी न चुभने पाए तेरे
मेरी लाडली तेरे पांओं  में ...
  
जाओ बेटा , मुझे यकीन है कि तुम्हारा नया घोंसला, तुम्हें तुम्हारे पिता और भाई की याद नहीं आने देगा ....
और हम यही चाहते हैं !!!

Saturday, November 17, 2012

गुडिया की रंगोली -सतीश सक्सेना


यह खूबसूरत रंगोली मेरी बेटी हर वर्ष अपने घर के आंगन में बनाती रही है ! इस वर्ष से उसका अपना घर , मायके में बदल जाएगा अतः उसकी यह अंतिम रंगोली है जिसे उसने अपनी भाभी विधि के साथ बनाया है ! संयोग से विधि की, अपने घर में, यह पहली रंगोली है !

मेरी गुडिया ने, विवाह से पूर्व, इस घर के प्रति अपनी  जिम्मेवारियां, विधि को सौंपने की शुरुआत, इस रंगोली से कर दी, और विधि ने अपने घर में पहली रंगोली बनायी !
                                            चार्ज देने और लेने की परम्परा,  सुख से अधिक दुखदायी है ...मोह छोड़ा नही जाता , बेटी से बिछड़ना, बेहद कष्ट कारक है , मगर हकीकत स्वीकारनी होगी !

इस मौके पर, विश्वयात्री एडम परवेज़  ने भी जमकर, इन दोनों की मदद की ! एडम बेटी के विवाह में शामिल होने के लिए, आजकल हमारे मेहमान है ! विश्व भ्रमण पर निकला यह अमेरिकन ४६५ दिन से, अपने घर से बाहर है और हमारा देश, इस यात्रा में उसका ६५ वां देश है ! दिवाली के दिन इस रंगोली पर एडम ने लगभग ४ घंटे काम किया ! हिन्दुस्तानी कल्चर में यह विदेशी योगदान भुलाया नहीं जाएगा !

Friday, November 2, 2012

मौसम, बधाइयों और दिखावे का -सतीश सक्सेना

दिवाली, जन्मदिन और वर्षगांठों पर तोहफों की सौगात, अधिकतर लोगों के चेहरों पर, रौनक लाने में कामयाब रहती है ! मगर इन चमकीले बंद डिब्बों में मुझे, स्नेह और प्यार की जगह सिर्फ मजबूरी में खर्च किये गए श्रम और पैसे , की कडवाहट नज़र आती है ! पूरे वर्ष आपस में स्नेह और प्यार से न मिल पाने की कमी, त्योहारों पर बेमन खर्च किये गए, इन डिब्बों से, पूरी करने की कोशिश की जाती है !

भारतीय समाज की यह घटिया, मगर ताकतवर रस्में, हमारे समाज के चेहरे  पर एक कोढ़ हैं जो बाहर से नज़र नहीं आता मगर अन्दर ही अन्दर प्यार और स्नेह को खा जाता है !

एक समय था जब त्योहारों पर, अपने प्यारों के घर, हाथ के बने पकवान भिजवाए जाते थे उनमें प्यार की सुगंध बसी थी ! आज उन्हीं भेंटों को लेने के लिए बाज़ार जाने पर 500 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के उपहार सजे रखे होते हैं और वे डिब्बे पूंछते हैं कि  बताइये कितने पैसे का प्यार चाहिए ?? जैसे सम्बन्ध वैसी गिफ्ट हाज़िर है ! बिस्कुट के डिब्बे से लेकर, पिस्ते की लौंज अथवा 600 रुपये (हूबहू बनारसी साडी)  से लेकर  लगभग 50000/= ( असली बनारसी ) हर रिश्ते के लिए  !
प्यार भेजने में आपकी मदद करने के लिए, प्यार के व्यापारी  हर समय तैयार हैं, आपकी मदद करने को !इन डिब्बों में अक्सर सब कुछ होता है , केवल नेह नहीं होता ! काश भेंट में भेजे गए, इन डिब्बों की जगह हाथ के बनाए गए ठन्डे परांठे होते तो कितना आनंद आता ... :)

इस वर्ष बेटे और बेटी के रिश्तों के ज़रिये, दो परिवार मिले हैं, मेरा प्रयास रहेगा कि इन दोनों घरों में दिखावे की भेंटे न भेजी जाएँ, न स्वीकार की जाए ! मेरा मानना है कि भेंट देने, लेने से, प्यार में कमी आती है , शिकवे शिकायते बढती हैं ! जीवन भर के यह रिश्ते अनमोल हैं, जब तक मन में प्यार की ललक न हो, पैसे खर्च कर इनका अपमान नहीं करना चाहिए !

इस पोस्ट का उद्देश्य उपहारों का विरोध  नहीं हैं , उपहार प्यार और स्नेह का प्रतीक हैं, जिनके ज़रिये, हम स्नेह और लगाव प्रदर्शित करते हैं , बशर्ते कि इन डिब्बों में विवशता और दिखावे की दुर्गन्ध न आये  !

आज सुदामा के चावल याद आ रहे हैं जिनके बदले में द्वारकाधीश ने, सर्वस्व देने का मन बना लिया था !वह प्यार अब क्यों नहीं दिखता  ?? 
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