Friday, December 9, 2022

हम पाखंडी -सतीश सक्सेना

यह सच है कि हम भारतीय पाखंड अधिक करते हैं, प्रौढ़ावस्था के कपड़े अलग, जवानों के अलग और बुढ़ापे में रंगहीन कपड़े और मोटा चश्मा, दाढ़ी के साथ ! विधवा है तब रंगीन कपड़े , चूड़ी पायल कंगन आदि सब त्याज्य अन्यथा सब लोग क्या कहेंगे !

अगर लेखक हैं और आम लोगों में मशहूर होना है तो सबसे पहले नाम बदलिए , बेहतरीन सांस्कृतिक नाम रखिए, दाढ़ी बढ़ा लीजिए बड़े बाल कंधे तक बनाइए, खादी कुर्ता पजामा, चेहरे पर गंभीरता , और कुछ चेले लेकर चलना शुरू करें फिर देखिए जलवा !

सबसे बढ़िया धंधा करना हो तो बाबा बन जाइए, सतीश सक्सेना जैसे बकवास नाम की जगह सत्यानंद सरस्वती अधिक प्रभावशाली रहेगा, दाढ़ी और सर के बाल बढ़ाकर नारंगी रंग की धोती पहनिए, पैरों में खड़ाऊँ हों तो क्या कहने, राह चलते लोगों में पैर छूने की होड़ लग जाएगी , आशीर्वाद दो और धन बरसने लगेगा !

और अगर 69-70 की उम्र में आकर, टी शर्ट, शॉर्ट पहन लिया तब लोगों से यह सुनने को तैयार रहिए, चढ़ी जवानी बुड्ढे नू ! मन को मारना सीख ले, इस उम्र में यह रंग, सब लोग क्या कहेंगे !

अभी हमें मानसिक तौर पर विकसित होने में, कम से कम 100 साल लगेंगे !

Monday, November 28, 2022

मिलावटी संसार और हम लोग -सतीश सक्सेना

मुझे अपने बचपन की याद है जब त्योहारों और शादी विवाह के दिनों में , बाजार में दूध और दही सुबह के दस बजे तक ही ख़तम हो जाता था , खोया और पनीर तो मिलता ही नहीं था ! मगर आजकल पूरे देश में शहर हो या गांव कस्बा , इन चीजों की भरमार है , दूध को छोड़ , हर फ़ूड प्रोडक्ट की कमी बाजार में अक्सर सुनाई पड़ती है और उसका रेट बढ़ जाता है मगर हमारे देश में लगता है दूध दही की नदियां बहती हैं , जिस कारण इसकी कोई कमी नहीं , आप किसी भी समय पड़ोस की दुकान से जितना चाहे दूध दही खोया या पनीर खरीद सकते हैं , सप्लाई कभी कम नहीं होती मानो हर घर में कामधेनु आ गयी है ! 

रविवार को सेक्टर 47 में लगी फॉर्मर मार्किट में एक डेरी वाली महिला (Hetha Organics) से गाय का घी (2000 /kg ) और दूध (150 /kg) के रेट पर बात कर रहा था , तो उनका कहना था कि हमारे फॉर्म हाउस में 1000 गाय हैं उनमें से एक समय में मात्र 200 ही दूध देती हैं मगर इन सबको हमें पूरे वर्ष खिलाना और रखरखाव पर खर्चा करना पड़ता है ! आप एक दिन फॉर्म हाउस पर आकर देखें कि एक किलो शुद्ध घी हमें कितने का पड़ता है ? और यह भी कि हमें नहीं मालुम कि बाजार में शुद्ध घी 500 रूपये किलो कैसे मिल जाता है ?

भारत सस्ता चाहने वालों का मार्किट है यहाँ कोई अखबार उठाकर देखें तो दस पर्सेंट से लेकर 50 पर्सेंट तक घटे हुए रेट के विज्ञापनों की भरमार है , शायद ही कोई दुकान ऐसी मिलेगी जो यह कहती हो कि रेट में कोई रिबेट नहीं मिलेगी अगर कोई यह लिखे भी तो शायद ही उसकी कोई बिक्री होगी ,हम मजबूर करते हैं हम व्यापारी को चोरी करने को , हमें सस्ता चाहिए सो हर व्यापारी भी चालाकी सीख गया तीन गुना कीमत लिखकर 50 प्रतिशत घटे रेट पर सेल , और ग्राहकों की भीड़ आएगी दूकान पर इस तरह से एक चालाक पर दूसरा चालाक हावी होता है ! हमारे यहाँ हर व्यक्ति अपनी अपनी औकात में भरपूर चालाक है !

कल HP वाईफाई लेज़र प्रिंटर ठीक कराने को मैंने एक मैकेनिक घर पर बुलाया , जिसने प्रिंटर खोलकर बताया कि आपका पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड खराब है इसे बदलना होगा , यह थोड़ा  महंगा है , मैंने मुस्कराकर कहा शाब्बाश मगर मेरा कोई कार्ड खराब नहीं है ध्यान से सुनो मेरा प्रिंटर अगर एक स्क्रू कसने पर ठीक हो जाए या कोई पार्ट बदलने के बाद ,तुम्हे फिक्स 2000/- दूंगा , शर्त यह भी है कि कार्ड नहीं बदला जाएगा क्योंकि उसमें कोई खराबी आ ही नहीं आ सकती ! और वह चुपचाप बिना जवाब दिए काम करता रहा , थोड़ी देर में ही वह बिना कोई पार्ट बदले ठीक हो गया , मैंने उसे 2000/- रूपये दिए तो वह बोला क्या करें साहब आप जैसे लोग नहीं मिलते हमें , एक घंटे काम करके हमें कोई 100 रूपये से अधिक खुश होकर नहीं देगा जब तक उस काम को बढ़ा चढ़ा कर न बताया जाए जिसमें एक पार्ट बदलना शामिल हो , 100 रुपया तो आने जाने में पेट्रोल का खर्चा है मेरा, इसके अतिरिक्त काम में लगाया समय, जानकारी और मेहनत को कोई नहीं गिनता !

हम सब चतुर हो गए हैं आजकल , हर आदमी दूसरे से या तो दिखावा करता है या झूठ बोलकर उसका फायदा उठाता है यहाँ तक कि परिवार में बच्चों की छोड़िये माता पिता अपने बच्चों से सफाई से झूठ बोलते दिखते हैं कि हर बात बच्चों को बताने की जरूरत नहीं , धन और पैसे तो कोई बताता ही नहीं , पिता बेटा तक से छिपाता है और उम्मीद प्यार की  करता है ! अपने खुद के परिवार में खुले दिल से खुलकर बात न कर पाने वाले लोग , दूसरों के लिए गालियाँ देते , ताल ठोकते लोग,  बढ़े हुए रक्तचाप लिए परिवार में लड़ते लोग, सोचते हैं कि रोज सुबह आधा घंटा बिना मन को स्वस्थ बनाये, वाक करने से उन्हें बीमारियां नहीं होंगी , हास्यास्पद है ! 

हमें गहराई से बिना किसी को गुरु बनाये खुद सोचना पड़ेगा कि खाना पीना और दौड़ना क्यों आवश्यक है, कितना आवश्यक है , आँखें खुल जाएंगी आपकी , खुद कहेंगे कि हमने कभी गौर ही नहीं किया था इस बात पर ! खुद को बदलें तो शारीरिक मानसिक बदलाव अवश्य आएगा, बिना दवा रोगमुक्त होकर आप दुबारा बच्चों की तरह हंसना सीख जाएंगे  ! पहचानिये खुद को , झूठ को पहचानना सीखें और खुद को उससे बचाएं ! मन स्वस्थ होते ही सब कुछ खूबसूरत नजर आने लगेगा ! 

      

Friday, November 25, 2022

आइये मेरी नन्नू से मिलिए - सतीश सक्सेना

यह साढ़े तीन साल की छोटी सी लड़की नन्नू है , म्यूनिक जर्मनी में पैदा हुई भारतीय लड़की ,दो वर्ष से ही अपने पापा से हिन्दी में बात करती है क्योंकि उन्हें जर्मन और इंगलिश नहीं आती , मां से इंग्लिश में अपनी बात समझाती है क्योंकि उन्हें जर्मन और हिन्दी नहीं आती , और पूरे दिन स्कूल में जर्मन बच्चों और टीचर से जर्मन भाषा में बोलतीं है क्योंकि उन्हें हिन्दी और इंग्लिश नहीं आती !
मीरा सक्सेना ( नन्नू) ने तीन भाषाओं में बात करने की अपनी समस्या, पिछले महीने जब मैं जर्मनी में था, बतायी कि Baba, mamma knows only English , papa knows only hindi , Eadita (her German care taker) knows only German but Meera knows all languages!! )


इसके पैदा होते ही इसके माँ बाप ने अपनी अपनी भाषाएँ फिक्स कर ली थीं , तब से अब तक मीरा के सामने गौरव हमेशा हिन्दी में , उसकी माँ हमेशा इंगलिश में ही बात करते आये हैं , अन्य भाषा सुनते समय वे दोनों अपनी बेटी के सामने अनजान बने रहते सो नन्नू उनकी भाषाओं में ही बोलती रही और आज उसकी तीनों भाषाओं पर ज़बरदस्त पकड़ है , जर्मन तो धाराप्रवाह है ही जबकि उसके माँ बाप को वह काम चलाऊ ही आती है !
यह पोती है मेरी, अपने बाबा की जान , इसके साथ रहता हूँ तो लगता है सबसे बड़ा सुख यही है !
प्रणाम आप सबको

Tuesday, November 22, 2022

ख़याल तुमने किया है कभी इन अंगों का ? -सतीश सक्सेना

 कल मैंने पहली बार गौर किया कि मैंने अपनी आँखों का व्यायाम पूरे जीवन नहीं किया और न उनको शक्तिशाली बनाने की चेष्टा की, फिर भी ये आँखें, उपेक्षित होकर भी सात दशकों से अपना साथ दे रही हैं ! सो आज सहज मानवीय बुद्धि से उनका व्यायाम किया और आगे भी करता रहूँगा , यदाकदा चश्मे का उपयोग त्याग रहा हूँ, सो यह पोस्ट बिना चश्मे लिख रहा हूँ !

- शरीर के अन्य अंग जिनका उपयोग कम किया उनमें घुटने शामिल हैं, कल से पाँच मंज़िल से कम ऊँचाई में लिफ़्ट का उपयोग नहीं करना !
ग़र जकड़ जाएँ जोड़ देह के , रोना कैसा
ख़याल तुमने कौन सा रखा इन अंगों का ?

Wednesday, November 16, 2022

साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा अढसठ साल का -सतीश सक्सेना

धीमे धीमे लम्बा दौड़ना सीखिए, बिन प्रयास फेफड़ों का व्यायाम , आपके गाढ़े होते रक्त में, भरपूर शुद्ध आक्सीजन पम्प कर, जमा थक्के घोल, उसे शुद्ध कर, उसका संचार आपके ढीले शरीर में कर आपको स्फूर्ति देगा और आपका डायबिटीज ग़ायब हो जाएगा !आपकी ढीली मांसपेशियाँ इस तथाकथित बुढ़ापे में आपको जवानी का अहसास कराएँगी, इसका भरोसा रखें , बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, पेट की गैस, ख़राब हाज़मा, और कमजोरी कब ग़ायब हो गयी पता भी नहीं चलेगा , साथ ही बॉडी कोर में अवस्थित अंगों में दौड़ते समय महसूस कम्पन, उनके स्वास्थ्य में सुधार कर, अतिरिक्त एनर्जी पाने के लिए आपके शरीर में जमा अनावश्यक फ़ैट को खा जाएँगे और आपका शरीर सुडौल दिखेगा इसका यक़ीन रखें और इस पर विचार करें ! मगर दौड़ना सीखना दुनियाँ के सबसे मुश्किल कार्यों में से एक है इसके लिए आवश्यक है कि

- मन प्रफुल्लित रहें , उदास और बेमन आप कभी नहीं दौड़ सकेंगे ! अवसाद और स्ट्रेस दूर करना सीखना हो तो दौड़ना सीखें !
-पूरे दिन में कम से कम १२ गिलास पानी एवं रात का डिनर हल्का और सोने से तीन घंटे पहले करना होगा !
-दौड़ने का समय सुबह ६ बजे के आसपास और खुली जगह में जहां आक्सीजन हो, दौड़ने का अभ्यास करना होगा !
-स्वास्थ्य के लिए दौड़ने में गति का महत्व नहीं, मस्ती से बिना हाँफे दौड़ना अगर नहीं आए तो दौड़ना आपके लिए बेहद ख़तरनाक साबित होगा !
- अंत में अगर आप पसीना नहीं बहा सकते तब दिन में एक बार ही भोजन पर अपना हक़ मानिए ! तीन बार भोजन पर केवल श्रमिक का ही हक़ होता है आप जैसे आलसी और आराम पसंद का नहीं ! सो अगर इसका आनंद लेना है तो सुबह दो घंटे दौड़िए और जम के भोजन खाइए अन्यथा बीमारियाँ झेलने को तैयार रहें ! मुझे देखें ...

मैराथन आसान ,भरोसा हो क़दमों की ताल का
साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा अढसठ साल का !

करत करत अभ्यास, पहाड़ों को रौंदा इस पाँव ने
हार न माने किसी उम्र में, साहस मानवकाल का !

इसी हौसले से जीता है, सिंधु और आकाश भी
सारी धरती लोहा माने , इंसानी इकबाल का !

गिरते क़दमों की हर आहट,साफ़ संदेशा देती है !
हिम्मत,मेहनत,धैर्य,ज़खीरा इंसानों की चाल का !

बहे पसीना कसे बदन से, मस्ती मेहनत की आयी !
रुक ना जाना, उठता गिरता रहे कदम भूचाल सा !

Monday, November 14, 2022

बढ़ी उम्र में , कुछ समझना तो होगा, तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा -सतीश

विकसित समाज में हमने श्रम करना गरीबों का काम मान लिया और जुटाई गयीं सुख सुविधाओं  का उपयोग अपने आराम के 
लिए 
करते समय यह भूल गए कि शरीर लम्बे समय तक किसी भी अभ्यास को आसानी से स्वीकार कर लेता है , और कुछ समय बाद उस आदत से बाहर निकलना उसके लिए असम्भव सा लगने लगता है ! अपने काम खुद न करने का अभ्यास हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा शक्ति को बर्बाद करने में सक्षम है !

जब कोई एक्सरसाइज़, योगासन, जिम और स्ट्रेचिंग की बात करता है तब मुझे लगता है कि वह यह करने की कोशिश तो कर रहा है मगर शारीरिक श्रम करने जैसे मानवीय शक्ति के मूल आधार को ही भूल गया है जिसके सामने यह सब मात्र औपचारिकता है ! मेडिकल व्यवसाय का प्रचार इंसान पर इस कदर हॉवी हो चुका है अपने अपने छोटे से बच्चे को चश्मा लगवाते समय वह यह नहीं सोच पाता कि चश्मे का अविष्कार कब हुआ और उससे पहले हजारों वर्षों से हमारे बच्चे और बूढ़े कैसे देखते होंगे ? घुटने का ऑपरेशन करवाना तो हास्यास्पद ही है जो सिर्फ घुटनों का उपयोग न करने के कारण हुआ है ! बिना उपयोग, शरीर का हर अंग मानवीय मूर्खता पर, धीरे धीरे कराहते हुए बर्बाद होता जाता है और हम उसकी कराह और दर्द को बिना समझे मेडिकल व्यवसायियों की और भाग कर, अपने शरीर को सुधारने की कोशिश में और तेजी से नष्ट करते है !

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही, बढ़ी उम्र में पछताने का मौक़ा भी नहीं देती ! हमें अपनी गलतियां मनन करते हुए समझना होगा कि पार्क में भीड़ के संग हाथ उठाकर हो हो कर हंसने को कोशिश से , निर्मल और मस्त हँसी का लाभ कभी नहीं मिलेगा ! बेहतरीन स्वास्थ्य के कुछ मूल बिंदुओं पर संकेत कर रहा हूँ , मित्रों से निवेदन है हर बिंदु को मनन करते हुए ही उसे पढ़ने का प्रयत्न करें  !
  • कोई भी शारीरिक एक्सरसाइज़ निरर्थक है जब तक मन उसे स्वीकार न कर ले , चाहे वह हंसने की चेष्टा, वाक या जॉगिंग ही क्यों न हो ! अपने अपने कष्ट भुलाकर खुलकर हंसना सबसे पहले सीखें इसके फलस्वरूप आयी मस्ती से बाकी सब सीखना आसान हो जाएगा ! इस बिंदु को कई बार पढ़ना और समझना होगा स्वास्थ्य को सही रखने की प्रमुख 10 बातों में यह सबसे महत्वपूर्ण एवं मेडिकल उपचार सबसे अंतिम आवश्यकता होनी चाहिए  !
  • मानवीय जीवन के लिए आवश्यक हवा , पानी , धूप ,नींद भरपूर लेनी है एवं भोजन उतना ही लें जितनी दिन में मेहनत की हो , बिना पसीना बहाये दिन में तीन बार भोजन करना आपको शीघ्र शारीरिक क्षरण की ओर ले जाएगा ! बिना मेहनत के तीन बार भोजन लेना इस खूबसूरत मानवीय शरीर के प्रति अपराध है ऐसे लोगों को एक बार भोजन करना स्वस्थ शरीर के लिए पर्याप्त है ! कुछ भी अभक्ष्य न खाएं , दूध सिर्फ अपनी मां का पीना था उनका दूध सूखने के साथ ही दांत निकलने के प्राकृतिक अर्थ पर विचार गहराई से करें तो आप जानवरों के शरीर का चर्बी युक्त हानिकारक दूध का निस्संदेह त्याग करने पर मजबूर होंगे ! दूध और मांस भोजन का एक विकल्प मात्र है और यह विकल्प सोचकर ही उपयोग में लाएं ! 
  •  मानवीय आलस्य जनित आदतों पर गौर करें , फेफड़ों पर दया करें उनका साइज पर गौर करते हुए उन्हें उतना खोलना  सीखें जिसके लिए वे बने हैं आपको बिना गुरु के योग क्या है समझ आएगा और धीमे धीमे खराब हवा में साँस लेने के कारण, आपके गाढ़े होते खून के लिए शुद्ध हवा की जरूरत है , बंद फेफड़े खोलने का प्रयत्न करें !
  • पैरों को मानवीय शरीर का आधा हिस्सा मिला है सो दिन के आधे समय में इनका उपयोग करना होगा , इसमें धीमे धीमे दौड़ना शामिल करें मगर हांफते हुए दौड़ने से आप अपने कमजोर हृदय को खतरे में डालेंगे उम्र चाहे कोई भी क्यों न हो, इसे न भूलें ! हर 40 मिनट वाक को बिना हांफे धीमे धीमे दौड़ कर समाप्त करें , इस आदत से आप अगले दो महीने में बिना हांफे दौड़ना सीख जाएंगे  !
  • दौड़ा या जॉगिंग करना या तेज चलना आपके शरीर में अवस्थित अंगों में कम्पन उत्पन्न करेगा यह कम्पन आपके जीर्ण और आलसी अंगों को फुर्ती देगा एवं  सारी बीमारियों को दूर करने में समर्थ होगा , इसे न भूलें  !
  • बेहतरीन और पूरी नींद लेना हमारी मूलभूत आवश्यकता है , मन से क्रोध अपमान आदि को भुला कर सोने का प्रयत्न करें , मानवीय कष्ट आपको सोने नहीं देंगे , इन्हें भूलकर हंसना सीखना ही होगा तभी बेहतर नींद आएगी याद रखें कि भूतकाल की घटनाएं केवल भूत ही हैं , वे अगर याद हैं तब आपको उदासी की और ले जाने में समर्थ भी होंगी और उदासी के साथ आप हंस नहीं पाएंगे , हंसना भूल जाना ही मौत है ! जब भी कष्ट याद आये उसे थूकना सीख लें क्योंकि इसे साथ लेकर चलना आपका नुकसान एवं कष्ट देने वाले का फायदा करेगा !
  • अभक्ष्य न खाएं , पहचान जो चीज आप की जीभ स्वीकार न करें उसे त्यागिये जैसे तेल और चर्बी , क्या आप सरसों के कुछ दाने खा सकते हैं अगर नहीं तब लाखों सरसों के दानों से निकले तेल में तले हुए पकौड़े क्यों , स्वाद को मारना ही होगा !
  • एक दिन कस कर मुट्ठी बंद कर रुमाल से बाँध लीजिये और तीन दिन बाद खोलिये आपको महीने भर व्यायाम करना होगा तब जकड़े जोड़ खुल पाएंगे अब घुटने के दर्द की कल्पना करें जिन्हे आप चलाते ही नहीं , सीढ़ी चढ़ना और दौड़ना तो शायद सोच भी न पाएं , मनन करियेगा अपनी भूलों पर  !
  • आजकल शायद ही कोई इंसान होगा जो वाक न करता होगा मगर उनका थुलथुल शरीर देखिये जिसपर वाक का कोई असर नहीं होता , कभी वाक के ऊपर सोचने का समय निकालिये, उत्तर मिलेगा ! वाक अकेले करें , और उसका उद्देश्य पर विचार करते हुए करें कि आप यहाँ क्या करने आये हैं , गौर करें अपने विभिन्न अंगों पर, उँगलियों पर, पैरों पर , पिंडलियों पर और पेट के उन अंगों पर जो वाक करते समय भी हिल नहीं रहे , फिर आप वाक कर क्यों रहें हैं ? वाक करने का अर्थ 45 मिनट रोज शरीर के फेफड़े , किडनी , लिवर , पेन्क्रियास , हृदय और जोड़ों को व्यायाम कराना होता है न कि दोस्तों के साथ चलते हुए अपने दफ्तर में की हुई बहादुरी का बखान करना !   
मेरा परिचय जान लीजिये , सतीश सक्सेना उम्र ६८ वर्ष , रिटायर होने से पहले जीवन में कभी वाक या व्यायाम नहीं किया , रिटायर होते समय उम्र जनित बीमारियों , जिसमें बीपी और बढ़ा पेट शामिल था को देखते हुए अपने मित्रों से कहा था कि अगले दो साल नहीं जी पाऊंगा , एक फ्लोर चढ़ने पर हांफता था और रुकना पड़ता था ! मगर मन में जीने की इच्छा और बच्चों से और कर्तव्य से प्यार के फलस्वरूप अपने खुद के कायाकल्प का संकल्प लिया था आलस्य का हाल यह था कि सब्जी लेने के लिए भी गाडी चाहिए और कभी दिल्ली के बस में नहीं चढ़ सका कि उसमें भागना पड़ता था !

६१ वर्ष की उम्र से दौड़ना सीखना सिखाया अपने ढीले वाले थुलथुल शरीर को और दो वर्षों में ही 12 किलो वजन घटाने के कारण आये उत्साह में लम्बी दौड़ें दौड़ना शुरू की , अब तक 10000 km दौड़ चुका हूँ  और शरीर हर बीमारी से मुक्त है ! 2021 में 100 days of running विश्व प्रतियोगिता में शामिल हुआ जिसमें 100 दिन लगातार दौड़ते हुए कुल 1849 km की दूरी तय करते हुए पूरे विश्व में दौड़ते हुए 13068 जवानों के मध्य रैंक 88/13068 एवं अपने उम्र ग्रुप (65-69) में 1/58 रहा ! अपने बारे में बताने का उद्देश्य अपना प्रचार न होकर आपको यह बताना है कि मेरे जैसा सुख सुविधा युक्त जीवन जीने वाला आलसी उम्र दराज अगर यह सब कर खुद का काया कल्प कर सकता है तो आप क्यों नहीं ?

डॉक्टरों और ऑपरेशन थियेटर से बचने का एकमात्र विकल्प यही है जिसे मेडिकल व्यवसायी कभी नहीं बताएँगे वे आपके भगवान बना रहना चाहते हैं ताकि आपके शरीर से उन्हें धन लाभ होता रहे  !

सादर प्रणाम आपको शुभकामनाओं के साथ !



  

Friday, October 7, 2022

मानवीय रोग और निराकरण प्रयास -सतीश सक्सेना

मानव व्यक्तित्व की कमियों में , रोजमर्रा की समस्याओं से जूझते हुए उन पर खुद विचार न करना, शामिल है !अधिकतर लोग विचारवान हैं ही नहीं, वे वह हर काम करते हैं जो उनके आसपास सब लोग कर रहे होते हैं , जो दुनिया करे सो करो के कारण उन्हें बिना मानसिक श्रम किये फल व सम्मान जिसकी उन्हें बहुत भूख होती है , मिलता रहता है , मेरे अधिकतर मित्र गण विद्वान है मगर इस वर्ग के साथ दिक्कत यह है कि इनके पास समय ही नहीं कि वे बीमारियों के बारे में एकाग्रचित्त होकर सोच सकें ! उनके पास एक ही चारा बचता है कि वे इस समस्या के विशेषज्ञ के पास जाकर खुद को उसके हवाले कर दें और दवा खाना शुरू कर दें ऐसे लोगों के पास 60 तक पहुंचते पहुँचते कम से कम दो तीन दवाएँ आ जाती हैं जिनका सेवन नियमित तौर पर उन्हें करना होता है ! बिना दवा जीवन उनकी समझ से बाहर की बात है !

शरीर की शक्ति अपरिमित है यह हम सब जानते हैं मगर इस पर मनन कभी नहीं किया , कभी सोचा ही नहीं होगा कि बच्चा माँ के शरीर से निकला उसका एक अंग है , जिसके पैदा होते ही उसके शरीर के ऊतकों अवयवों ने उसके सीने में ,उसके रक्त और चर्बी को खींच कर सफ़ेद दूध बनाना शुरू कर दिया जिससे माँ को असहाय अवस्था में कहीं भटकना न पड़े और इस दूध में वह सब था जो उसके रक्त में पाया जाता था ! मानव शरीर का सारा प्रबंध मस्तिष्क देखता है , अगर कोई कोशिका बेतरतीब बढ़ने लगती है तो शरीर उस कोशिका को अपने ऊतकों / मांसपेशियों से जकड़ कर उसे गाँठ के रूप में बाँध देती है ताकि उनका अनावश्यक विकास न हो जिसे हम कैंसर कहते हैं , गाँवो कस्बों में लाखों लोग, मिल जाएंगे जिनके शरीर में यह गांठें बरसों से हैं मगर शहर में एलोपैथिक लोग उसका तुरंत ऑपरेशन कर उसे हटा देते हैं और उसकी दुआएँ मुफ्त में लेते हैं  ! मुझे याद है ५० वर्ष पहले ऑपरेशन थियेटर दो चार ही होते थे और सर्जन को कोई जानता तक नहीं था मगर आज बिना ओ टी हॉस्पिटल की कल्पना मुश्किल है  ! यह उस असहाय और मूर्ख रोगी से उसके पूरे जीवन की जमा पूँजी खींचने का सबसे बेहतरीन तरीका है

अगर कोई डॉक्टर आपका मित्र हो तो आप जानते होंगे कि उसके घर में एलोपथिक दवाएँ ढूंढने पर भी नहीं होंगी क्योंकि वह अपने परिवार में इन खतरनाक दवाओं का उपयोग ही नहीं करते , वे सिर्फ सामान्य दवाओं का प्रयोग करते हैं चाहें उसमें समय कितना ही लगे , मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे डॉक्टर मेरे हितैषी हैं जब भी मुझे मेडिकल व्यवसाय की याद आती है मैं उनसे बात कर खुद को हल्का ( रोग भय से ) महसूस करता हूँ  ! 

रोगी को रोग के बारे में बताना और इस तरह बताना कि वह सब ज्ञान भूलकर सिर्फ यह सोचे कि हे डॉक्टर देवता किसी तरह इस बार बचा दे , सर्व शक्तिमान मेडिकल व्यवसाय का एक बड़ा सहारा है , सारा विश्व इसके आगे घुटने टेकने को विवश है , प्रधानमन्त्री , राष्ट्रपति या कोई अरबपति सब इस मृत्यु भय के आगे नाचने लगते हैं जबकि उन्हें इस बात का ज्ञान है कि मैं सामान्य उम्र को पार कर चुका हूँ और मृत्यु आने वाले कुछ वर्षों में होनी ही है , फिर भी आखिरी वक्त ऑपरेशन थिएटर जाने को लालायित रहते हैं कि शायद डॉक्टरों का प्रयत्न उन्हें बचा ले जबकि खुद कोई विश्व प्रसिद्ध डॉक्टर भी 90 साल न जी सका ! हम यह विचार करना ही नहीं चाहते कि बढ़ी उम्र में शारीरिक क्षरण एक सामान्य प्रक्रिया है , मेरा विश्वास है कि अढ़सठ वर्ष की आयु में मेरा शरीर का अढ़सठ प्रतिशत क्षरण हो चुका है और मेरी बची उम्र सत्तर या 85 के हिसाब से दो साल से लेकर 17 साल और है , कल भी मर सकता हूँ  ! मेरा प्रयास शारीरिक क्षरण रोकने पर न होकर सिर्फ अनावश्यक रोगों के शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को नियंत्रण करना मात्र रहता है और इसमें मैं सफल हूँ , देखिये मेरा आज का फोटो ! 

राजकुमार सिद्धार्थ जैसे संवेदनशील लोग जिन्हें मानव कष्टों का कोई ज्ञान नहीं था , एक मृत शरीर पर रोते, बिलखते परिवार जनों को देख इतने विचलित हुए कि घर छोड़कर जंगल में अकेले निकल पड़े , और घने जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठकर खुद से प्रश्न करने शुरू किये ,  सैकड़ों नौकरों सहायकों के बिना पहली बार अकेले खाना कैसे खाया होगा , क्या खाया होगा क्या पिया होगा ?इस पर एकाग्रचित्त होकर आज पूरे दिन विचार करें आपकी आँखें और बुद्धि खुल जाएगी ऐसा मुझे विश्वास है  ! असहाय सिद्धार्थ के पास कोई सहायक न था और न किसी को उनका स्थान पता था , वीरान जगह पर उन्होंने सबसे पहले सांस लेते लेते, सांसों की गति पर नियंत्रण करना सीखा क्योंकि उन्हें पता चला गया कि बिना भोजन वे महीनों , बिना पानी कुछ दिनों और बिना साँस मिनटों ही ज़िंदा रहा पाएंगे  ! बीमार अवस्था में आहिस्ता आहिस्ता गहरी सांस लेना है और स्वस्थ शरीर में धौंकनी की तरह साँस लेने से, पेट की तमाम बीमारियों से मुक्ति मिली होगी ! विश्व के तमाम योगियों ने यह विधा अपने आप सीखी और वे कामयाब हुए उन्हें सिर्फ यह समझ आ गया कि शरीर में उपस्थित आंतरिक सुरक्षा शक्ति , असामयिक मृत्यु से रक्षा करने में समर्थ है  !

क्षरण होते शरीर को रोग मुक्त करने हेतु मेडिकल व्यवसाय की शरण में जाना एक आत्मघाती कदम होता है , एलोपैथिक दवाओं का दुष्प्रभाव आपके शरीर को और जल्दी संसार से मुक्ति दिलाने में समर्थ है , उनका उपयोग बढ़ी अवस्था में कम से कम करना चाहिए और केवल उसी डॉक्टर के पास जाना चाहिए जिसपर आपको अपने से अधिक भरोसा हो सिर्फ तभी आप सुरक्षित हैं  !

Friday, September 16, 2022

उनसे कहिये, चलने का अन्दाज़ बदल लें !

सुनी सुनाई खबरों पर , एतबार न कर लें !
झूठी खबरों के, सस्ते अखबार बदल लें !

चलते, अहंकार की चाल , नज़र आती है !
उनसे कहिये, चलने का अन्दाज़ बदल लें !

बचपन से जो सीखा , सारा सच न होता
दादी नानी के कल्पित विश्वास बदल लें !

गोश्त न खाते फिर भी, चर्बी चढ़ती जाती,
शाकाहारी होकर भी 
दुखी न हों पर , जानवरों का दूध छोड़ दें  !

जो भी खाएं , ध्यान से देखें ,सोचें पहले 
बचपन से बैठे मन के, विश्वास बदल लें !

Sunday, September 11, 2022

मेडिकल व्यापारियों से सावधान रहें -सतीश सक्सेना

इंसान अपने जीवन भर मृत्यु के बारे में कभी कोई विचार नहीं करता , बस खतरनाक बीमारी से लड़ते समय ही उसकी याद आती है और साथ ही मृत्यु भय भी, जो स्थिति की गंभीरता को कई गुना बढ़ा देता है ! इसके न होने की अवस्था में बीमारियों को मानव की आंतरिक रक्षा शक्ति रोग पर कुछ समय में काबू पा लेती है , मगर अगर मरीज को जान जाने के खतरे की संभावना बता दी जाए तो मानसिक तनाव के कारण कुछ समय में ही, सामान्य बीमारी भी कई गुना खतरनाक हो जाती है ! अफ़सोस यह है कि इस भय को मेडिकल व्यवसाय में अधिक से अधिक धन कमाने के लिए, अच्छी तरह भुनाया जाता है !

अधिक उम्र के अधेड़ , जो खूब धन सम्पन्न और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं , पूरे जीवन अपने सुख पर खर्च न करके , बुढ़ापे में इलाज के लिए पैसा जोड़ते रहते हैं जबकि उन्हें यह मालूम है कि इलाज से उम्र नहीं बढ़ सकेगी उसके बावजूद  65 वर्ष होते होते कम से कम एक ऑपरेशन, यह डरे हुए लोग करा चुके होते हैं  ! आज से तीस चालीस वर्ष पहले बहुत कम हॉस्पिटल में ऑपरेशन की सुविधा होती थी मगर आजकल चूँकि मेडिकल व्यापार में मोटी कमाई सिर्फ ऑपरेशन थियेटर के जरिये ही संभव है सो डॉक्टर के पास आए दर्द से कराहते हर इंसान में ऑपरेशन की सम्भावना तलाश की जाती है !बिना ऑपरेशन, बच्चे पैदा होना तो असंभव ही माना जाने लगा है , सामान्य प्रसव की बात शायद ही कोई सुनता होगा , मगर इस सब के बाद भी किसी को इस दुर्व्यवस्था पर सोचने का समय ही नहीं और हो भी तो वे खुद को उस समय असहाय महसूस करते हैं जब ईश्वरीय स्वरूप डॉक्टर, तुरंत ऑपरेशन करने में सहमति देने में समय बरबाद करना, बेहद खतरनाक घोषित कर देता हैं !

मैं मित्रों से कुछ सामान्य प्रश्नों पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ कि वे बताएं मानव शरीर कब से है और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कब से आया , साथ ही यह भी कि इस चिकित्सा विज्ञान में बिना शरीर को नुकसान किये कौन कौन से रोगों को ठीक पाने में सफलता हासिल की ? आज भी दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में करोड़ों लोग हैं या नहीं जिन्हें एलोपैथी के बारे में कुछ भी पता ही नहीं और उनका शरीर बिना इलाज के रोगमुक्त मुक्त होता है या नहीं 

मुझे दांतों से खून आने की समस्या लगभग पचास वर्षों से हैं , पूरे जीवन डेंटिस्ट को नहीं दिखाया, पूरे जीवन में टूथपेस्ट और ब्रश का उपयोग महीने में दो तीन बार ही करता हूँ और मुझे दांतो में दर्द की कोई समस्या नहीं एक भी दांत न टूटा और न हिला , दर्द हुए और ठीक भी हुए ! आँखों में पहला चश्मा आज से 30-35 वर्ष पहले लगवाया था मगर उपयोग न के बराबर किया , बिना चश्में के उपयोग  -1.25 से बढ़ते हुए आजकल -2.5  के लगभग पावर है मगर 68 वर्ष की उम्र में सिर्फ बारीक अक्षर पढ़ते समय ही हलके पावर का चश्मा उपयोग करता हूँ , पूरे दिन में शायद आधा घंटा चश्मा लगाता हूँगा ! बेहद तकलीफ होती है जब मासूमों की आँखों पर चढ़ा चश्मा देखता हूँ  ! चश्में, पेस्ट, क्रीम, एंटीबायोटिक्स आदि अधिकतर सुझाव और साधन अंततः हमारे शरीर को बरबाद करने की भूमिका तैयार करते ही हैं, इनके ज्ञान से प्रभावित हम इनकी चालाकियों को जबतक समझ पाते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है !धन कमाने की इच्छा व्यापारी मानव को कितना नीचे गिराएगी इसकी कोई हद मुक़र्रर नहीं !

अभी सुप्रीम कोर्ट में एक रिट विचार के लिए है जिसमें यह कहा गया है कि जेनेरिक दवा पैरासिटामोल को किसी और नाम से लोकप्रिय बनाने के लिए मेडिकल व्यापारियों ने डॉक्टर्स के मध्य 1000 करोड़ से अधिक रुपया लुटाया है , और वह दवा इन दिनों सबसे अधिक बिकी भी है जबकि यही दवा बाजार में बहुत सस्ते दामों पर उपलब्ध है , ये व्यापारी धन लालच देकर रोगी को जो चाहे दवा खिला सकते हैं !  

अपने आपको मृत्यु भय से हर वक्त मुक्त रखकर, विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रखने का प्रयत्न करता हूँ जिससे कि इस खूबसूरत जीवन का हर पल एन्जॉय कर सकूँ, रोज सुबह उठते समय , अगला दिन बोनस में पाता हूँ , अच्छा लगता है कि एक दिन और मिला और फैसला करता हूँ कि आज का दिन कल से बढ़िया कैसे किया जाए ! 

विगत दिनों के बारे में सोचता हूँ तो खराब लगता है कि निष्क्रियता के कारण, कैसे कैसे मित्र अचानक विदा ले गए संसार से , जो बेहतरीन दिन बिता रहे थे एवं बहुत शक्तिशाली थे , उन्होंने सब कुछ किया था खुद को मजबूत रखने में, अगर नहीं किया तो सिर्फ अपने शरीर से मित्रता नहीं की और जिसे समझना सबसे आवश्यक था उसी को समझने में समय नहीं दे पाए और निस्संदेह यह लापरवाही उनके शरीर के अंगों ने माफ़ नहीं की और उन्हें इस खूबसूरत जीवन से असमय ही जाना पड़ा !

प्रणाम आप सबको इस अनुरोध के साथ कि अपने व्यस्त समय से, थोड़ा समय खुद के शरीर को समझने में  दें ! 


Wednesday, September 7, 2022

प्रौढ़ावस्था में सावधान -सतीश सक्सेना

अति सर्वत्र वर्जयेत का पालन करते हुए , अपने ६७ वे वर्ष में, अधिक मेहनत न कर, सामान्य वाक पर ही अधिक ध्यान देने के कारण भोजन को भी काफी कम किया है ! मेहनत नहीं तो भोजन नहीं, सूत्र का पालन करते हुए, इन दिनों सिर्फ एक बार खाना खाया , सुबह की ग्रीन चाय, और हलके फलाहार के बाद दिन में लगभग 3 बजे खाना एवं शाम 6 बजे मुट्ठी भर चना या म्युज़िली चाय के साथ लिया सो वजन नहीं बढ़ सका इससे मेरी हाई इंटेंसिटी एक्सरसाइज करने की आवश्यकता नहीं रही और शरीर को सेल्फ मरम्मत करने के लिए, भरपूर आराम भी मिला ! यह बदलाव मेरे शरीर की टूटफूट की तत्काल मरम्मत करने के लिए आवश्यक था जो पिछले वर्ष लगातार 100 दिन में 1850 km दौड़ने/तेज वाक के दौरान हुई थी !

अगर आपको अपने शरीर की सीमाओं का ज्ञान नहीं और आपके अंग आपके मित्र नहीं तब यकीनन वे आपका संग नहीं देंगे और साठ के आसपास वे कभी भी आपका संग छोड़ देंगे , मेरे बहुत सारे मित्र शरीर की इस चीत्कार को अनसुना कर रिटायरमेंट के बाद भी पैसे कमाने के जतन में लगे रहते हैं , यह इस उम्र में बेहद खतरनाक भूल है जो सम्हलने का मौका भी नहीं देगी ! उन्हें चाहिए कि वे अपने थके मायूस और निराश शरीर से मित्रता करें टहलने के दौरान अपने विभिन्न अंगों से बातचीत करते हुए वाक करें , उन्हें शीघ्र पता चल जाएगा कि कौन सा अंग सही काम नहीं कर रहा , इस दौरान अपने शरीर को हिम्मत दिलाते हुए उसे चैतन्य करने का प्रयास करें और सलाह दें कि अगले बीस वर्षों तक जवानी बनाये रखनी है ताकि जीवन का आनंद ले सकें जो जवानी के दिनों कर्तव्य पूरे करने के कारण नहीं ले पाए ! उन्मुक्त मन और खुलकर हंसने के दौरान आप स्पष्ट देखेंगे कि आपका शरीर खिल रहा है !   

आज म्युनिक में काफी समय बाद 6 km आराम आराम दौड़ा हूँ , लगा कि शरीर जैसे खुल गया हो ! इस दौरान दौड़ते दौड़े एक रनर को अपने खींचने का अनुरोध किया जो उन्होंने बखूबी अंजाम दिया , पेश हैं आज के कुछ फोटोग्राफ्स ! 

Thursday, September 1, 2022

दिखावे की दुनियाँ में जीता एक कवि ह्रदय -सतीश सक्सेना

शब्दों पर पॉलिश लगाकर उपयोग में लाने का सुझाव हमारे बुजुर्ग देते रहे हैं , वे यह कभी नहीं बताते कि दिल से त्वरित निकले शब्द ही सच्चे माने जाते हैं , अगर किसी को देखकर आपके मन में स्नेह उमड़ता है तो उसे दबाया क्यों जाये ? अभिव्यक्ति वही जो मन से निकले और कवि वही जो निर्मल मन हो , मैं खुद ऐसे संसार में जीता हूँ जहाँ दिखावे को भरपूर आदर सम्मान दिया जाता है, अगर मन में सम्मान है तो दिखावे के नमस्कार की आवश्यकता क्यों वह तो नजरों से और कर्म से दिखेगा ही

अभी हाल में , मैंने एक महिला मित्र की आहत मन से लिखी पोस्ट पर , नैराश्य से बाहर आने का सुझाव दिया , मगर स्वभाव अनुसार  भावना में बहते हुए उन, हमउम्र महिला को माते शब्द से सम्बोधित कर दिया , और उन्होंने नाराजी जाहिर करते हुए उसी कमेंट को लाइक नहीं किया जिसे सबसे अधिक पसंद करना चाहिए , शायद उन्हें मेरे (६८ वर्षीय) द्वारा, माँ कहना नागवार गुजरा होगा, बहुत कष्ट होता है जब लोग स्नेह को समझने में नाकाम होते हैं !

माँ दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द है जो मैं किसी भी बच्ची को कह सकता हूँ जिसकी मुझे तारीफ़ करनी हो, वे नासमझ हैं जो माँ जैसे प्यारे  शब्द का शाब्दिक अर्थ निकालने की कोशिश करते हैं , ऐसे ही एक भावनात्मक समय में, मैंने पुत्री वंदना भी लिखी थी !


मैं जब भी किसी महिला से बात करता हूँ पहले उसमें माँ की तलाश अवश्य करता हूँ , और अधिकतर सफल भी रहता हूँ ! अनुलता नैयर जैसी छोटी लड़कियां , सुमन पाटिल जैसी हमउम्र अथवा पुष्पा तिवारी जैसी बड़ी , सुदेश आर्य को मैं अक्सर मां सम्बोधन देता हूँ और यह सम्बोधन उनके स्नेही स्वभाव के कारण ही होता है अन्यथा सुदेश मेरे लिए एक चंचल बच्ची से अधिक कुछ नहीं !
 
गरजें लहरें बेचैनी की
कहाँ किनारा पाएंगी !
धीरे धीरे ये आवाजें ,
सागर में खो जाएंगी !
क्षितिज नज़र न आये फिर
भी, हार न मानें मेरे गीत !
ज़ख़्मी दिल में छुपी वेदना, जाने किसे दिखाएँ गीत !


Tuesday, August 9, 2022

मानसिक अवरोध -सतीश सक्सेना

मैं बचपन से मांस नहीं खाता , मगर मैंने इसे कभी अभक्ष्य नहीं माना क्योंकि विकिपीडिया के अनुसार विश्व में 91 प्रतिशत लोग मांसभक्षी हैं , मेरे अपने देश में भी मांसभक्षियों का प्रतिशत 71 है मगर हम अक्सर मांस भक्षियों को अजीब तरह से देखते हैं जबकि विश्व में बहुमत उन्हीं का है , हम जानवरों के शरीर से निकला कच्चा दूध, उनके बच्चों से छीनकर आसानी से पी जाते हैं और उसे नॉनवेज नहीं मानते यही हमारी अविकसित मन की दशा है ! साइंटिफिक नजरिये से मिल्क एक नॉनवेज प्रोडक्ट है क्योंकि उसका मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर और डीएनए वही है जो सिर्फ जानवरों में पाया जाता है , अण्डों की तरह ही जानवरों के दूध में भी जानवरों की चर्बी बहुतायत में होती है , इसी लिए यह भी नॉनवेज ही माना जाएगा ! जिस शुद्ध घी को हम तथाकथित नॉन वेजिटेरियन, बिना परेशान हुए शौक से खाते हैं वह वास्तविक में जानवरों के शरीर की चर्बी है जिसे हम वेजिटेरियन समझ कर बचपन से खा रहे हैं हालांकि प्रकृति ने उसे जानवरों के बच्चों के लिए बनाया है !

इसी तरह से शराब के बारे में हम मानसिक अवरुद्धता और नासमझी के शिकार हैं , हालाँकि यह सच है कि शराब सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है , जबकि विश्व में अधिकांश विकसित देशों में वाइन, बियर, व्हिस्की हर शॉप पर चाय कॉफी के साथ आसानी से उपलब्ध है और उसका नियमित सेवन न अपराध है और न त्याज्य , हमारे यहाँ शायद ही कोई बचा होगा जिसने न पी हो बस फर्क इतना ही है कि हम सबने यह काम लोगों से और अपने परिवार से छिपा कर किया है , मगर सेवन सबने किया है , शायद इसी रोकटोक के कारण छिपकर और बेतहाशा पीने वालों की तादाद बढ़ी है ! मैंने जर्मनी , इटली , फ़्रांस ,स्पेन, स्विट्ज़रलैंड में एक भी व्यक्ति शराब पीकर लड़खड़ाते और बकवास करते नहीं देखा और जर्मनी में तो बियर गार्डन हैं जहाँ दस दस हजार लोग, एक साथ बैठकर बियर पीते हैं अधिकतर बियर गार्डन में बियर सर्विस , लड़कियों और महिलाओं के हाथ में होती है और किसी के साथ कोई बदसलूकी नहीं देखी जाती ! अति सर्वत्र वर्जयते सदियों से मान्य है , और अति वहीँ होती है जहाँ वर्जना अधिक हो मगर हम इसे सहजता से न देख सकते हैं और न समझ सकते हैं ! शराब की अति जहां जान लेने में समर्थ है वहीं सामान्य फ़ूड का हिस्सा मानने लेने पर इसका स्वस्थ उपयोग भी सम्भव है ! 

सेक्स अपराधों और शराब दुष्परिणामों के लिए हम विश्व में सबसे ऊपर के देशों में , माने जाते हैं , और उसका कारण केवल अज्ञानता है , जर्मनी में , मैं जिस किसी भी स्विमिंग पूल में तैरने जाता हूँ उनमें स्नान करने वाली, अंतरवस्त्रों में ही , खूबसूरत महिलायें अधिक होती हैं , मैंने एक भी पुरुष को उन्हें घूरते नहीं पाया जबकि हमारे देश में ऐसा होना एक अजूबा माना जाता और पुरुषों की वहां भरमार होती क्योंकि हमारे यहाँ, अपने घर में ही बिकिनी पहने हुए खुद की पत्नी को ही असहज होकर टोका जाएगा कि बच्चे क्या सोचेंगे , ऎसी मानसिकता हमारी अशिक्षा और अपरिपक्वता ही दर्शाती है और यही अशिक्षा हमारी असहजता का कारण है !

सो टिप्पणी करने से पहले, पोस्ट को एक बार ध्यान से पढ़ने का अनुरोध है , आशा है विचार होगा !
प्रणाम आप सबको ! 

Friday, August 5, 2022

रनिंग, तत्काल आपकी जान लेने में समर्थ है -सतीश सक्सेना

अजीब अजीब मित्र हैं मेरे यहाँ, वे सिर्फ़ मेरे रनिंग फ़ोटो को देख कर कहते हैं कि मैं भी रनिंग करूँगा, न वे रनिंग के ख़तरों के बारे में जानते हैं और न जीवन में कभी रनिंग की ट्रेनिंग की, अगर मैं उन्हें समझाने की कोशिश करूँ तो भी पढ़ते ही नहीं केवल अपने जोश के बल पर रनिंग करने का विश्वास है उन्हें ! भारत में कम से कम पाँच रनर, हर वर्ष दौड़ते हुए अपनी जान दे देते हैं, वे या तो कम समय में अपने आपको रनिंग एक्स्पर्ट समझने लगते हैं और लगातार बेहतर करने के प्रयास में, दोस्तों से तालियाँ बजवाने में, जान चली जाती है जबकि वे बेहतरीन विद्वान थे, कुछ तो मशहूर डॉक्टर थे , फिर भी वे अपने शरीर की चीत्कार को नहीं सुन पाए और असमय चले गये वह भी उस रनिंग के कारण जो उनकी जान बचाने में सक्षम थी ! पिछली पोस्ट पर मैंने इन ख़तरों के बारे में विस्तार से लिखा है मगर यहाँ ध्यान से पढ़ता कौन है ?

खुद मैं पिछले एक वर्ष से न के बराबर दौड़ा हूँ , 2021 में २३०० किलोमीटर दौड़ने वाला मैं इस वर्ष अब तक केवल १७० किलोमीटर ही दौड़ा हूँ ! पिछले डेढ़ महीने से जर्मनी में हूँ और यहाँ के बढ़िया मौसम में भी, न के बराबर दौड़ा हूँ, अधिकतर वॉक या तैराकी में ही हिस्सा लिया जो कि लो इम्पैक्ट व्यायाम है क्योंकि मैं लगातार अपने शरीर से बात करता रहता हूँ , अगर शरीर अनमना है, या कोई समस्या है, तब नहीं दौड़ता, चाहे शरीर में कितनी ही फुर्ती क्यों न हो

हर किसी को यह पता रहना चाहिए कि रनिंग एक हाई इम्पैक्ट व्यायाम है , इसमें आपका हर गिरता कदम, आपके शरीर से तीन गुना वजन के इम्पैक्ट से टकराता है और ऐसा एक मिनट में २०० बार होता है, इतनी वेग से टकराने से आपके शरीर में भयंकर इम्पैक्ट पैदा होता है जो आपकी जान लेने में समर्थ है!

Thursday, August 4, 2022

माँ, तुम्हें भी स्वयं का, कुछ ध्यान रखना चाहिए -सतीश सक्सेना

डायबिटीज और हृदय के , विश्व में सबसे अधिक रोगी भारत में हैं , लगभग हर चौथा व्यक्ति इसका शिकार है , यह दोनों बीमारियां परोक्ष में पता ही नहीं चलती , मगर धीरे धीरे शरीर को जकड़ती जाती हैं , इनसे मुक्ति पाने का आसान दवा रहित तरीका खुद को फुर्तीला बनाये रखना है , शायद ही कोई बदकिस्मत रनर विश्व में होगा जिसे रनिंग के बावजूद यह बीमारी बची होगी ! लगभग रोज 10000 कदम वाक अथवा 7 km दौड़ना काफी होता है इनसे मुक्ति दिलाने में ! 

इन दिनों हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज बंद कर रखी है सो म्यूनिख में आकर स्विमिंग ज्वाइन कर लो है , घर के पास ही एक बड़ा स्विमिंग सेण्टर है , जहाँ तीन स्विंमिंग पूल है बड़ा इंडोर स्विमिंग पूल जिसमें सामान्य तापमान पर पानी रहता है और अधिकतर प्रोफेशनल महिला /पुरुष तैरते हैं , दूसरा ओपन स्काई, जिसमें गर्म पानी रहता है और तीसरा स्विमिंग पूल बच्चों के लिए हालाँकि मैं बहुत अच्छा तैराक नहीं हूँ सो बिना थके आराम आराम लगभग 60 मीटर तक तैर सकता हूँ  इससे मेरा आजकल का लो इम्पैक्ट एक्सरसाइज का उद्देश्य पूरा हो जाता है !

हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज , उसे कहते हैं जिसमें जॉइंट्स पर भारी इम्पैक्ट पड़ता है , टेनिस , रनिंग जैसे खेल इसमें आते हैं , रनिंग करते समय हर वक्त एक पैर हवा में रहता है , दूसरा पैर जब जमीन पर गिरता है तब वह रनर के वजन का तीन गुने इम्पैक्ट के साथ जमीन से टकराता है, इससे घुटने, लिगमेंट्स और शरीर पर अधिक स्ट्रेस पड़ता है , दौड़ते समय यह क्रिया बहुत तेजी से और लगातार होती है, 21 किलोमीटर दौड़ में एक रनर को लगभग 30000 बार जमीन पर इस भारी वेग से प्रहार करना पड़ता है , अगर घुटने कमजोर हों , तब घुटने बरबाद होने तय हैं !  इस प्रकार एक सामान्य रनर एक मिनट में लगभग 200 बार अपने शरीर का तीन गुना वजन से अपने घुटनों के जोड़ों पर प्रहार करता है , और इतनी ही बार, इसी वेग से , उसकी बॉडी कोर में अवस्थित किडनी लिवर हृदय पेन्क्रियास आदि झटके लेते हैं , मात्र कपड़ों की रगड़ से ही, लगातार ढाई घंटे दौड़ने से , शरीर से खून छलकना आम बात है ! अगर कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अचानक दौड़ने का सोचकर बच्चों की तरह दौड़ने का प्रयास करे तो उसके शरीर पर हुए खतरनाक प्रभाव का अंदाज़ा आप लगा सकते हैं ! जहाँ बोन डेन्सिटी, मजबूत करने के लिए इसे बेहतर माना जाता है वहीं ब्लड प्रेशर , मोटापे और कमजोर हड्डियों के इतिहास वाले लोगों को इसे न अपनाने की सलाह दी जाती है !

इसीलिए वृद्ध अवस्था में लोगों को रनिंग की जगह उनके लिए लो इम्पैक्ट एक्सरसाइज की ही सलाह दी जाती है , इसमें वॉकिंग, स्विमिंग , साइकिलिंग , रोइंग , योगा आदि आता है , इसका उपयोग एथलीट अधिकतर आंतरिक चोट रिकवरी के समय या बीच बीच में बॉडी को आराम देने के लिए करते हैं ! रनिंग करने से पहले हर किसी को लौ इम्पैक्ट एक्सरसाइज से ही शुरू करना चाहिए ! तथा दौड़ने के अभ्यास मध्य भी इसे जोड़कर रखना चाहिए तभी शरीर मुक्त मन से इसे अपना पाता है !

एक रनर को एक सप्ताह में एक दिन रेस्ट तथा एक दिन साइकिलिंग ( क्रॉस ट्रेनिंग ) अवश्य करनी चाहिए ! इससे वह आंतरिक तौर  पर घायल होने से बच जाता है , याद रहे जल्दबाजी करने से मसल्स इंजुरी होती है जिसकी रिकवरी में महीनों लगते हैं , इस मध्य दर्द झेलना पड़ता है सो अलग !

सो दोस्तों :
-रोज सुबह फेफड़ों में सांस भरिये निकालिये , शरीर को स्ट्रेच करके खुली हवा में वाक करने निकल जाइये , एक घंटे का एकाग्रचित्त वाक , जिसमें आप अपने अंगों से बातें करते चलेंगे , आपको एक नयी दुनिया में पहुंचा देगा !
-खाना कम से कम स्वादिष्ट और मात्रा में और भी कम , केवल उतना ग्रहण करें जितना आपका हक़ (पसीना बहाने का परिमाण ) है , अगर पूरे दिन मेहनत नहीं की और सिर्फ घर में लेते रहें हैं उस दिन भोजन न करें या नाम मात्र करें !
 - पानी खूब पीना होगा प्यास हो या न हो  
- जानवरों का दूध, केमिकल शुगर एवं समस्त तेल वर्जित हैं , कुछ समय बाद शीशे में खुद को पहचान नहीं पाओगे !
और हाँ दूसरों को गालियां देना , अपनी तकलीफों पर रोना बंद और जो खुशियां सहेजी हैं उन पर हँसना सीखना होगा !  
आज का फोटो देखिये इस सत्तर वर्षीय जवान का (कागजी उम्र 68)

Tuesday, August 2, 2022

खान पान, प्रौढ़ावस्था में -सतीश सक्सेना

पिछली पोस्ट में कई मित्रों का खान पान पर लिखने का आग्रह था , सो यह पोस्ट , बस पोस्ट पढ़ने से पहले दोस्तों से अनुरोध है कि लीक से हठ कर विचार करें तभी बात बनेगी शरीर बदलने के लिए हमें अपनी आदतें बदलनी होंगी , खाने में जो अच्छा लगता है , सारे जीवन खाया उसे त्याग दें जो नहीं खाया उसे खाना शुरू करें , रोटी दाल चावल के बग़ैर भी आधी दुनिया रहती है सो भोजन बदलें , मेहनतकश बनें और आप देखेंगे आपका शरीर भी बदल रहा है !  

अधिकतर मित्र लोग ५० का होते होते , इतने आलसी हो जाते हैं कि शरीर हिलते ही दर्द शुरू होने लगता है और वे सोचते हैं कि हमारी उमर हो गयी है , अब हर काम सावधानी से करना होगा , इस उमर के बाद अपने शरीर को चुस्त दुरुस्त रखने के लिए , वे महँगे खानपान की तरफ़ झुकते हैं , उन्हें लगता है कि ड्राई फ़्रूट्स , अंडे , प्रोटीन युक्त भोजन आदि अगले सालों में शरीर को पुष्ट रखेगा और वे ऐसा ही करते हैं, बताइए क्या खाना है ? जबकि शरीर को भोजन की सीमित आवश्यकता ही होती है , मेहनत करने पर जितनी ऊर्जा ख़त्म होती है उसकी भरपायी शरीर एकदम सामान्य भोजन से ही पूरी कर लेता है ! जानवरों के दूध या महँगे ड्राई फ़्रूट्स में ऐसा कुछ नहीं होता जो सामान्य खेत की सब्ज़ी और गेहूं जैसे सामान्य फ़ूड में नहीं होता !

कुछ अन्य लोग रनिंग की ओर ध्यान देते हैं और अति कर देते हैं , यह बेहद ख़तरनाक है , हर एक को अपनी शारीरिक क्षमताओं का पूरा ज्ञान होना चाहिए , बिना इसे समझे, शरीर को हाई इम्पैक्ट एक्सरसाइज़ में झोंक देना , आपके ह्रदय को बर्बाद करने में सक्षम है ! याद रखें कि दौड़ते समय बॉडी कोर में अवस्थित उन नाज़ुक अंगों जैसे किड्नी , लीवर , ह्रदय , फेफड़े , पेंक्रियास आदि में तेज कम्पन और झटके लगते हैं जो पिछले कई वर्षों से बेजान जैसे पड़े रहे हैं ,  नतीजा बढ़ा हुआ ब्लडप्रेशर , धौंकनी जैसे चलते फेफड़े , कांपता पाचन तंत्र आपको किसी भी ख़तरे में डाल सकता है ! यह सब करने के लिए आवश्यक है कि सुस्त शरीर को आहिस्ता आहिस्ता चलाना और फिर इन कम्पनों, झटकों को झेलना सिखाया जायँ , इसमें शरीर की दशा अनुसार महीनों अथवा वर्षों लग सकते हैं , सो पहली बात सुस्त शरीर को पहलवान बनाने में जल्दी न करें अन्यथा जान तक जा सकती है !

अब भोजन का मामला उठाते हैं , अधिकतर लोगों को यह विश्वास होता है शरीर को मजबूत रखने के लिए बढ़िया स्वास्थ्यवर्धक भोजन आवश्यक है ! मेरा विश्वास है कि यह बिलकुल आवश्यक नहीं , भोजन विशिष्ट हो या साधारण उसका असर एक ही जैसा होता है , काजू के आटे की बनी रोटियाँ , शुद्ध घी के पराँठे, फ़र्श सलाद खाएँ, ढेरों फल फ़्रूट खाएँ अथवा सामान्य रोटी , दाल और सब्ज़ी जो रिक्शावाला खाता है , असर एक हो होगा ! कोई व्यक्ति, अखाड़े में लड़ने वाला पहलवान, बढ़िया खाना खाकर नहीं बनता बल्कि पूरे दिन पसीना बहाकर मज़बूत शरीर का मालिक बनता है , और उसे भूख भी अधिक इसीलिए लगती है  ओ खाने पर अधिकार उसी व्यक्ति का अधिक होगा जो मेहनत भी अधिक करता हो , कुर्सी पर बैठे व्यक्तियों को दिन में एक बार का भोजन पर्याप्त होगा , बिना मेहनत तीन बार का भोजन करने वाले लोग सिर्फ़ अपने पूर्वजों की लकीर पीट रहे होते हैं जो बेहद मेहनती थे !

हमें अपने भोजन से अखाद्य को निकालना होगा , प्राकृतिक भोजन से बेहतर कुछ नहीं , तेल अधिकतर इंसानों के लिए नुकसान करता है सो उसका त्याग करना होगा , शुगर की जगह गुड़ का उपयोग बेहतर है ! सीमित भोजन आपके शरीर के तंत्र पर अधिक जोर नहीं डालेगा और उसका फायदा अधिक होगा जबकि लोगों की सोच उसके उलट है क्योंकि बचपन से मन में बैठ चुका है , ब्रेकफास्ट , ऑफिस लंच और घर आकर रात को बीबी के हाथ का बनाया डिनर , शरीर की हाय हाय सुनाई ही नहीं देती , पेट का शेप बदलने लगता है तब भी ध्यान नहीं , शरीर बेचारा थक कर उसे भी आखिर अंगीकार कर लेता है !

सो भोजन उतना ही करना चाहिए जितना श्रम किया है , बिना मेहनत भोजन सिर्फ शरीर को बर्बाद करेगा , अनुरोध है कि मेहनत करना सीखें और भोजन घटाना शुरू करें, भूख पर क़ाबू पाने के लिए खाने से आधा घंटे पहले पानी पीने की आदत डालें , पेट भरा लगेगा ! 
अंत में :
- खुद पर विश्वास रखें कि आपका शरीर बेहद ताकतवर है मानसिक तौर पर ताकतवर लोगों पर, उम्र का कोई ख़ास असर नहीं होता , कम उम्र में ही बूढ़े वे लोग होते हैं जो खुद को कमजोर मानने लगते हैं , आप यक़ीन करें ६८ वर्ष की उमर में मैं वह सब काम आसानी से करता हूँ जो कोई ३५ वर्ष का व्यक्ति कर सकता है , अपने शरीर पर अविश्वास आपको बहुत तेज़ी से कमजोर बनाएगा !
-कोई भी संकल्प बेहद कमजोर और क्षणिक होगा अगर आप ख़ुशमिज़ाज नहीं हैं , मस्तमौला रहना सीखें , कष्टों को भूलना आवश्यक है , ख़ुशियों को हर समय याद रखिए दुःख आपके पास आएँगे ही नहीं ! स्वाभाविक हंसी से स्फूर्ति और ताज़गी आपके शरीर को नौजवानों जैसी शक्ति देने में समर्थ है !
-मृत्युभय, अधिक उम्र में आपको संभावित इलाज के लिए , धन जोड़ने के लिए प्रेरित करेगा और आप धन का उपयोग अपनी ख़ुशियों के लिए नहीं कर पाएँगे जबकि यह बेहद आवश्यक है !
-दिखावा , झूठ, नफ़रत और क्रोध को नज़दीक न आने दें आपके चेहरे की रंगत ही बदल जाएगी ! 
 
मंगलकामनाएँ आप सबको ! 
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