Saturday, April 23, 2011

आओ, कुछ हम भी रंग बदलें - सतीश सक्सेना

                   अक्सर समाज में हम लोग दुहरे चेहरे के साथ जीते हैं ! पूरे जीवन, अपनी झूठी शानोशौकत से लदेफदे हम लोग , हर समय अपना काम येन केन प्रकारेण, निकालने में व्यस्त रहते हैं ! अपना काम निकालने के लिए , बेईमान जीवन के इन विभिन्न स्वरूपों को इस हलकी फुलकी  हास्य रचना के माध्यम से ढालने का प्रयत्न है, अगर इसे पढ़कर आप मुस्करा दिए तो इसका लिखना सार्थक हो जाएगा ! 


आओ हम भी कुछ नाम करें 
कुछ छपने लायक काम करें 
इक जैकपॉट लग जाये और 
बस जीवन भर आराम करें  
दुनिया न्योछावर हो हम पर, 
मोहक स्वरुप  के क्या कहने 
बगुला करले ख़ुदकुशी देख, जब जब हम अपना रंग बदलें 

हम चोरों और उचक्कों को 
उस्तादी के गुण सिखलाएं 
खुद परमब्रह्म भी  घबराएं 
जब हम  पूजा करने बैठें  ! 
भरपेट,आमरण अनशन कर, 
जब गाँधीवादी   बन  जाएँ !
सारा समाज भौचक्का हो,जब जब हम अपना रंग बदलें !

दयनीय भाव के साथ साथ 
हम हाथ जोड़, बेटी व्याहें
भरपूर गर्व के साथ साथ
हम पुत्र वधू  लेने  जाएँ  !
मंडप में क्रोधित रूप लिए , 
हम लगते विश्वविजेता से,
समधी बेचारे गश खाएं,जब जब हम अपना रंग बदलें !

माथे पर चन्दन तिलक लगा,
जब पीत वस्त्र धारण करते  !
शुक्राचार्यों की समझ  लिए ,
गुरु वशिष्ठ  जैसा  रूप  रखें !  
सन्यासी करते  त्राहि त्राहि, 
जब हम संतों  सा  वेश रखें  ! 
गिरगिट शर्मिंदा हो भागे ,जब जब हम अपना रंग बदलें  !

Friday, April 22, 2011

मानवता के लिए बलिदान दिवस -सतीश सक्सेना

गुड फ्राई डे, त्याग और वलिदान का दिन है ! आज के दिन विश्व, ईसु मसीह के कष्टों को याद करता है , मानव जाति के कल्याण के लिए, अपने हाथों पैरों में कील ठुकवाते, ये महात्मा, इस दुनिया को छोड़ गए थे ,इस आशा में कि शायद मानव जाति कभी सबक लेगी !

शायद अभी कुछ और समय लगेगा जब हम , अपने मत को न मानने वालों  से नफरत करना बंद कर पायेंगे ! 

शायद अभी और वक्त लगेगा जब हम दूसरों की श्रद्धा का उपहास बनाना  बंद कर पाने में समर्थ होंगे ! 

मैं अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ उनको नमन करता हूँ !

Tuesday, April 19, 2011

मेरे गीत कौन गायेगा - सतीश सक्सेना

इस चमक दमक की दुनियां में
रंगों की महफ़िल ,सजी हुई  !
मोहक  प्रतिमाएं  थिरक रहीं 
दामिनि जैसा  श्रृंगार  किये  !
इस समाज में इस महफ़िल में,
कौन भला मातम गायेगा ?  
मेहँदी रचित हाथ  लेकर , अब  मेरे गीत  कौन गायेगा   ?

सूरज की पहली किरन साथ
फागुन के रंग बरसते  हैं  !
संध्या होने से पहले   ही ,
स्वागत होता दीवाली का  !
नव मस्ती के  इस योवन में , 
रोदन क्यों कोई गायेगा   ?
हाला, मधुबाला साथ  लिए, अब मेरे गीत कौन गायेगा ? 

हर मन में चाहत , रंगों की ,  
महसूस व्यथा को कौन करे ?
गर्वित हों  अपने योवन से
अहसास  पराया कौन करे ?  
रणभेरी बजते अवसर पर , 
वेदना कौन अब  गायेगा  ?
उन्माद भरे इस मौसम में, अब मेरे गीत कौन गायेगा ?

कोई गोता खाए, बालों में  
कोई डूबा गहरे प्यालों में 
कोई मयखाने में जा बैठा 
कोई सोता गहरे ख्वाबों में
जलते घर माँ को छोड़ चले, 
बापस क्यों  कोई आएगा ?
निष्ठुर लोगों  की नगरी में , अब मेरे गीत कौन गायेगा ?

Tuesday, April 12, 2011

तुम पथ भटक यहाँ क्यों आयीं ? -सतीश सक्सेना

अक्षत पुष्प, दीप, फल लेकर
तुम पथ भटक, यहाँ क्यों आयीं ?
लगता है , मंदिर के भ्रम में , 
रास्ता भूल, चली आई हो,
दिखने में तो ताजमहल से 
कितने  ही, मंदिर शरमायें  !
लेकिन बरसों से उजड़े, इस परिसर में वरदान नहीं है !

खड़ी , भव्य दीवारें मेरी 
कलश कंगूरे ध्वज और तोरण
घंट ध्वनि, मंत्रोच्चारण से 
लगता घर, मेरा मंदिर सा 
यह सब सच है मगर कामिनी,
पूजा यहाँ न अर्पण करना !
तुमको दुःख होगा कि यहाँ पर, मंदिर है पर मूर्ति नहीं है  !

बाहर से देवता सरीखा 
सौम्य लगूं आराध्य सरीखा 
तुम मुझसे वर लेने आयीं 
मैंने मांग लिया तुमको ही
अब भी जागो स्वप्न सुंदरी,
गीत यहाँ न समर्पित करना
इस सूने मंदिर में देवी  ! कविता है ,सौंदर्य   नहीं   है   !

मीरा जैसा प्यार लुटाती ,
घर बाहर की लाज छोड़कर
मधुर गीत आँचल में भरकर  
किस मोहन ,को ढूंढ रही हो 
पूजन लगन देखि मनमोहनि, 
मैं भी हूँ नत मस्तक तेरा , 
तेरी पूजा ग्रहण योग्य मंदिर तो है  ! आराध्य नहीं है  ! 

Friday, April 8, 2011

आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता है .... -सतीश सक्सेना

डॉ अमर कुमार का कहना है कि ...
"अब लीजिये, शरदपवार भये अमर कुमार : यहाँ कुछ यही बानगी है, आज मैंने स्वयं से अनुमति लेकर, अपने वेवकैम से अपना ही फोटो अपने हाथों खींचा है । जिसमें कुछ कलाकारी करने का असफल प्रयास भी शामिल है । अस्थायी रूप से मेरा थोबड़ा बिगड़ गया तो क्या, मैं गर्व से यह तो पूछ ही सकता हूं । सर जी, फोटो ठीक आयी है ?"

           अगर ब्लोगिंग में बहादुरी की मिसाल देखनी है , तो राय बरेली चलें डॉ अमर कुमार से मिलने  !  कानपूर मेडिकल कॉलेज से  एम् बी बी एस  डॉ अमर कुमार , देश में हिंदी विकास के लिए ,समर्पित गिने चुने योद्धाओं में से  एक हैं ! और ब्लोगिंग में अपनी बेवाक भाषा के लिए मशहूर हैं !  
                  अगर अचानक किसी मस्तमौला और हँसते हुए सर्वसम्पन्न इंसान को यह कहा जाए कि उसे कैंसर है तो शायद अच्छे भले पहलवानों  को पसीने छूट जायेंगे ! ऐश्वर्यशाली  जिन्दगी के एक खराब मोड़ पर, खुद  डॉ अमर कुमार को यह पता नहीं चला कि लोगों का इलाज़ करते करते  वे खुद कैंसर वार्ड में दाखिल हो चुके हैं !

              शानदार सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक अमर कुमार, कैंसर ओपरेशन के बाद का, अपने  बदले  चेहरे  का फोटो , अपने  नए लेख के साथ प्रदर्शित करते हुए लिखते हैं ,कि अमर कुमार भी, अब शरद पवार जैसे लग रहे हैं ! :-(

           कम से कम मेरे लिए यह पढना बेहद दर्दनाक  रहा ! शायद मैं,  हँसते हुए कह रहे, डॉ अमर कुमार की वेदना को महसूस कर पाया था ! इन शब्दों को पढ़ते हुए मेरा मस्तक इस कर्मयोगी के आगे अनायास ही झुक गया ! वन्दनीय है यह बहादुरी ! जीवन में दर्दनाक क्षणों को , हँसते हुए क्षणों की तरह ही जीना है ! यह समय भी कट जाएगा ! कल का किसी को कुछ नहीं पता ...... 

           यह पोस्ट लिख दी ताकि मेरे बच्चों को एक शिक्षा मिल सके कि बहादुरी के साथ शानदार जीवन कैसे जिया जाता है ! 
आ बता दें कि तुझे कैसे जिया जाता है .....
(यू ट्यूब  से साभार ) 


डॉ अमर कुमार का इस पोस्ट पर दिया गया कमेन्ट , मैं पोस्ट का हिस्सा बनाना चाहता हूँ , शायद यह प्रेरणास्पद शब्द ,हम सबको कुछ समझा सकें ..


यहाँ अब तक उपस्थित सभी शुभाकाँक्षियों को मेरा विनम्र अभिवादन !
सँदेश साफ़ है.. जो अपरिहार्य है, उसे हँस कर स्वीकार करिये । बिसूरने से.. रोने चिल्लाने से आपकी सज़ा की मियाद कम न होगी.. उल्टे दर्द और बढ़ ही जायेगा । जब तक जीवित हो, बुरे से अच्छों के पक्ष में लड़ते रहो.. कल कोई तुम्हें याद भले ही न करे... पर तुम उन अच्छाईयों में ज़िन्दा रहोगे ।
गीतकार के शब्दों में... नाम गुम जायेगा... चेहरा यह बदल जायेगा.. मेरी आवाज़ ही पहचान है.. ग़र याद रहे ।

Tuesday, April 5, 2011

आज किसी की रक्षा करने, साईं तुझे मनाने आया -सतीश सक्सेना

                      वर्षों पहले जब इस महानगर में कदम रखा था तो एक सीधे साधे लड़के राकेश से, एक ही कार्यालय में कार्य करने के नाते मित्रता हुई, और उसने रहने के लिए घर की व्यवस्था कराई ! उसके बाद बहुत सी यादें, एक दूसरे की शादी में योगदान...... दुःख के समय में साथ....मुझे याद है राकेश के द्वारा साईं बाबा के मन्दिर में ले जाने की जिद, और मेरा न जाना.....मेरी भयानक बीमारी पर साईं बाबा का प्रसाद लाकर घर में खिलाना और यह विश्वास दिलाना की अब आप ठीक हो जाओगे ! उसकी बहुत जिद और इच्छा थी कि मैं एक दिन उसके साथ शिरडी अवश्य चलूँ, जो मैंने कभी पूरी नही की !
                      और एक दिन वही, बिना मां,बाप, भाई, बहिन वाला राकेश, गंगाराम हॉस्पिटल पर स्ट्रेचर पर, अर्धवेहोशी, आँखों में आंसू भरे मेरी तरफ़ बेबसी में देख रहा था, तब मेरे जैसा नास्तिक, पहली बार साईं दरबार में विनती करने के लिए भागा !वहीं यह विनती लिखी गयी, बावा को मनाने हेतु , पर शायद बहुत देर हो गई थी......... !

ना श्रद्धा थी , ना सम्मोहन
ना अनुयायी किसी धर्म का
कभी न ईश्वर का दर देखा
अपने सिर को नहीं झुकाया
फिर भी मेरे जैसा नास्तिक,
बाबा  ! तेरे द्वारे  आया !
मुझे नहीं मालुम क्यों, कैसे ? आज चढ़ावा देने आया !

पूजा करना मुझे न आए
मुख्य पुजारी मुझे टोकते
कितनी बार लगा है जैसे
जीवन बीता, खाते सोते,
अगर क्षमा अपराधों की हो
तो मैं भी, कुछ लेने आया
आज किसी की रक्षा करने का वर तुमसे लेने आया !

आज कष्ट में भक्त तेरा है
उसके लिए चरणरज लागूं
कष्टों की परवाह नहीं है ,
अपने लिए नहीं कुछ मांगू,
पर बाबा उसकी रक्षा कर
जिसने तेरा दर दिखलाया
आज ,किसी की जान बचाने, तेरी ज्योति जलाने आया !

कई बार सपनों में आकर
तुमने मुझको दुलराया है
बार - बार संदेश भेजकर
तुमने मुझको बुलवाया है
बाबा तुझसे कुछ भी पाने
मैं फल फूल कभी न लाया !
आज एक विश्वास बचाने , मैं शरणागत बनके  आया !

कितने कष्ट सहे जीवन में
तुमसे कभी न मिलने आया
कितनी बार जला अग्नि में
फिर भी मस्तक नही झुकाया
पहली बार किसी मंदिर में
मैं भी , श्रद्धा लेकर आया !
आज तेरी सामर्थ्य देखने , तेरे द्वार बिलखने आया !
आज किसी की रक्षा करने साईं तुझे मनाने आया !

Friday, April 1, 2011

वे काटें तो प्यार मुहब्बत हम बोलें तो अत्याचार -सतीश सक्सेना

बहुमुखी  प्रतिभा के धनी अनुराग शर्मा ने आज एक खस्ता शेर लिखा , जो सीधा दिल में, गहराई तक उतरता चला गया  ! हलके फुल्के हास्य व्यंग्य के लिए लिखी इस रचना का एक एक शेर, लगता है जीवन की सच्चाई बयान  कर रहा है !

अक्सर स्वार्थी हम लोग ,जब भी अपनों  का फायदा उठाते हैं तो अपनी योग्यता और अपनी ही पीठ थपथपाते रहते हैं कि हम इस योग्य है कि यह गधा मेरे लिए काम आ रहा है ! यह हमारी ही मुहब्बत है कि वह हमसे प्यार करता है ....

बेहद दर्द के साथ इन प्यारों का साथ छोड़ना ही बेहतर है ... दिल कहता है कि 

इंशा अब इन्हीं अजनबियों में चैन से सारी उम्र कटे
जिनके कारण बस्ती छोड़ी नाम न लो उन प्यारों का  

आज के समय में खोया पाने का आकलन करें तो लगता है  जीवन में आनंद ही नहीं है ! क्यों न बुरी संगति,  याद ही न रखें और बेहतर आशाओं के साथ, जीवन के ख़राब पडावों को भूलने की कोशिश करें  ! 


आज यह गाना कई बार सुना ...

Friday, March 25, 2011

हम क्या लिख रहे हैं - सतीश सक्सेना

        अगर किसी लेख़क के व्यवहार और व्यक्तित्व के बारे में जानना हो तो उनके  कुछ लेख ध्यान पूर्वक पढ़ लें  , उस व्यक्तित्व की  मानसिकता और व्यवहार आपको उसके लेखन में से साफ़ साफ़ दिखाई देगा !

        ब्लॉग जगत में एक से एक विद्वजन और सामाजिक विकास के प्रति समर्पित व्यक्तित्व कार्य रत हैं  जिनको पढ़कर अपने आप पर गर्व होता है कि हमने भी इन्हें पढ़ा है वहीँ दूसरी और हिंदी ब्लॉग जगत से वित्रष्णा पैदा करने की क्षमता रखने वालों की भी कमी नहीं है ! कई बार इन्हें पढ़कर लगता है कि यही पढना बाकी था  ?


        लोगों को प्रभावित करने के लिए, लिखे लेखों पर चढ़ा कवर, थोडा ध्यान से पढने पर ही उतरने लग जाता है  ! अपना चेहरा चमकाने की कोशिश में लगे ये लोग, खुशकिस्मत हैं  कि ब्लाग जगत में ध्यान से पढने की, लोगों को आदत ही नहीं है , अतः समाज और  सद्भावी माहौल को बर्वाद करने वाले, इन लोगों की पहचान, काफी समय बाद हो पाती है ! 

         इन  स्वयंभू लेखकों को शायद यह अंदाजा नहीं है कि लेखन के जरिये जो कुछ यहाँ बो रहे हैं यह अमर है ! लेखन और बोले शब्द समाप्त नहीं होते हैं बल्कि परिवार , समाज पर गहरा असर डालते हैं ! यह कभी न भूलें कि आप जो कुछ भी लिख रहे हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि आपके बच्चे , और परिवार के अन्य सदस्य देर सवेर उसे नहीं पढेंगे , उस समय आपको पढ़कर और जानकर वही इज्ज़त और सम्मान आपको देंगे जिसको आपका लेखन इंगित करता है !
  
             मेरा यह विश्वास है कि आने वाला समय बेहतर होगा , हमारी नयी पीढी यकीनन प्यार ,सद्भाव में हमसे अधिक अच्छी होगी अतः आज जो हम ब्लाग के जरिये दे रहे हैं, उसे एक बार दुबारा पढ़ के ही प्रकाशित करें ! कहीं ऐसा न हो कि आपको कुछ सालों के बाद पछताना पड़े कि यह मैंने क्या लिखा था  ?

Tuesday, March 22, 2011

आइये ठहाका लगाएं - सतीश सक्सेना

जनजीवन में हास्य की उपयोगिता, लगता है कम होती जा रही है  ! घर में खुशिया और मुस्कान बिखेरने के लिए, पूर्वजों  द्वारा व्यवस्थित उत्सव आते हैं और चले जाते हैं !  मगर हम लोग ,अपना बनाया गया  अहम्  प्रभामंडल, तोड़ने को तैयार नहीं !

कितने  वर्षों से , शीशे  के ,
सम्मुख आकर मुग्ध हुए हैं 
कितनी बार मस्त होकर के 
अपनी पीठ ,थपथपाई  है  ,
इस होली पर अहम् छोड़ कर, गुरु चरणों में शीश झुकालें !
प्यार और मस्ती  में  डूबें   , आओ  अहंकार   जला दें  !


अक्सर इस मानव जनित अहम् को तोड़ने में , बचपन का प्यार, स्नेह और ममता भी कमजोर पड़ने  लगती  है, कठोर ह्रदय को भी जीत लेने में समर्थ स्नेह और प्यार , इस मानव जनित, जटिल अहम् को कमजोर नहीं कर पाता  और जीत अक्सर अहम् की ही होती है !

ऐसे  ख़राब माहौल में , अपने कालरों को ऊंचा उठाये ब्लोग्स के मध्य, कुछ लोग हास्य बिखेरने का प्रयत्न कर रहे हैं , यह स्वागत योग्य है ..काश लोग हँसना सीखें तो कितने घरों में, मासूमों के चेहरों  पर रौनक  आ जाएगी !

ब्लॉग जगत में इस हास्य रौनक की शुरुआत  वंदना अवस्थी दुबे  ने  "अपनी बेवकूफियां बताइये " के आवाहन के साथ किया था  जो बहुत  कामयाब रहा  ! लोगों ने ऐसी ऐसी बेवकूफ़ियाँ बतायीं कि पाठकों को यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसी भी बेवकूफी की जा सकती है ! मजेदारी यह कि वंदना ने खुद अपनी कोई बेवकूफी नहीं  बताई .... 

वैसे  आम तौर पर लड़कियां कोई बेवकूफी करती भी नहीं  ... ;-) 

धूमधाम और नगाड़ों के मध्य, ब्लॉग जगत के सबसे बड़े चालबाज   ताऊ रामपुरिया ने,  शरीफ और सीधे साधे  चच्चा पिटलिए  को  पिटवाने के लिए ब्लॉग जगत के मशहूर पहलवानों  कनाडा से  समीर लाल जी, पिट्सबर्ग वाले अनुराग शर्मा , हैदराबाद से विजय कुमार सप्पति  एवं  बड़ी मूंछ वाले ललित शर्मा  को बुलवाकर , जर्मनी वाले राज भाटिया  के नेतृत्व  में पिटवाने का प्लान बनाया गया  ! बेचारे चच्चा इन भयंकर  और ताकतवर लोगों के सामने क्या बच पाते,  सो पिटे और बुरी तरह, निर्दयता से पिटे,  और जर्मनी वाली  रजिया भौजी गुलाबी चुन्नी में  मुस्कराती रही  :-)    

इस बार  ब्लॉग जगत के वकील साहब भाई द्विवेदी जी भी पीछे नहीं रहे ...ताऊ रामपुरिया के बारे में उनके विचार पढ़ कर हंसी छुट गयी ! एक बानगी देखिये....
"मारे कवि महोदय पिट-लिए उर्फ श्रीमान सतीश सक्सेना जी ही एक मात्र सीधे-सादे प्राणी निकले जो उधर ताऊ के गरही कवि सम्मेलन में सब के लट्ठ खा कर, वहाँ से किसी तरह जान बचा कर भागे थे। जल्दी में उन की अक्ल की पोटली ताऊ के घर ही छूट गई थी या फिर रास्ते में छोड़ आए थे। (रास्ते में छूटी होगी तो भी ताऊ के किसी बंदे ने ताऊ के पास पहुँचा दी होगी, इसी तरह दूसरों की अक्ल की पोटलियाँ समेट कर आज कल ताऊ अक्ल का जागीरदार बना बैठा है ...."   

परस्पर शिकायते और वैमनस्य  पालते हम लोग अगर इन प्रयासों के फलस्वरूप , भवें चढाने की जगह, मुस्करा सकें तो देखने में साधारण लगता यह कार्य, अपना महत्व बताने में कामयाब हो जायेगा !    

Wednesday, March 16, 2011

इस होली पर क्यों न साथियो,आओ रंग गुलाल लगा लें ? -सतीश सक्सेना

इस उत्सव में ,रंगों में डूब कर, वसंत का स्वागत करते हैं हम लोग ! पूरा परिवार ही रंगों में सराबोर होकर कुछ समय के लिए जैसे मस्ती में डूब जाता है  ! इस ख़ूबसूरत मौसम में  लगभग हर इंसान की,गैरों से भी गले मिलने की इच्छा पैदा हो जाती है ! एक बार अपने अन्दर झांक कर देखने से ,एक आवाज आती है ...


अपने घर में ही आँखों पर 
कैसी पट्टी , बाँध रखी है  ! 
इन  लोगों ने जाने कब से ,
मन में रंजिश पाल रखी है !
इस होली पर क्यों न सुलगते,
दिल के ये अंगार बुझा दें !
मुट्ठी भर कुछ रंग,फागुन में, अपने घर में भी, बिखरा दें 

मानव जीवन पाकर कैसे , 
बुद्धि गयी है,बिलकुल मारी ! 
खनक चूड़ियों की सुनते ही 
शंख ध्वनि से, लगन हटायी !
अपनों की वाणी सुनने की,
क्यों न आज से चाह जगा लें !
इस होली पर माँ पापा की ,चरण धूल को शीश लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई
ईर्ष्या  ने ,फैलाये  बाजू ,
रोते  गाते,हम लोगों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियों,
आओ रंग गुलाल लगा लें ?
भूलें उन कडवी बातों को, आओ  अब  घर द्वार सजा लें !!

कितना दर्द दिया अपनों को 
जिनसे हमने चलना सीखा  !
कितनी चोट लगाई उनको 
जिनसे हमने,हँसना सीखा  !
स्नेहिल आँखों  के  आंसू , 
कभी नहीं जग को दिख पायें !
इस होली पर,घर में आकर,कुछ गुलाब के फूल चढ़ा लें !

जब से घर से दूर  गए हो ,
ढोल नगाड़े , बेसुर लगते !
बिन प्यारों के,मीठी गुझिया,
उड़ते रंग, सब फीके लगते !
मुट्ठी भर गुलाल फागुन में, 
फीके चेहरों को महका  दें !
सबके संग ठहाका लेकर,अपने घर को स्वर्ग  बना लें !

Friday, March 11, 2011

अरुणा शानबाग और हम लोग -सतीश सक्सेना

अरुणा शानबाग पर, गिरिजेश कुमार का यह लेख प्रसंशनीय है  ! शायद मेरे लेख की भी लोग तारीफ़ करेंगे मगर क्या हम लोग अरुणा के लिए कुछ भी ठोस कर पा रहे हैं ?? 

ऐसे मार्मिक मौकों पर, समाज ,पाठकों एवं तमाशबीनों की उपस्थिति  के बाद , इतिश्री हो जाती है ! इलेक्ट्रोनिक अथवा प्रिंट मीडिया की सफलता, लेख के सफल प्रदर्शन और प्रभाव पर निर्भर करती है और हम पाठक अक्सर तालियाँ बजा कर लेख का स्वागत करते हैं !

इसके बाद दर्शक गण, मदारी की तारीफ़ करते अपने घर जाते हैं और मदारी  किसी नए खेल और जमूरे के साथ  किसी और भीड़ भरी जगह की तलाश में !


क्या अरुणा को बचाने के प्रयास बंद कर देना चाहिए केवल इसीलिए कि उसका साथ  देने वाले परिवार जन न के बराबर है  ? क्या  और कुछ नहीं किया जा सकता  ? सम्मिलित शक्ति के साथ, अगर हम सब थोडा समय इस जीवंत समस्या  में लगायें तो शायद यह बदकिस्मत लड़की बच जाए !     

अरुणा का इलाज़ एलोपैथिक सिस्टम में संभव नहीं है  ....

मगर क्या आदिमकाल से मानव, पूरे विश्व में सिर्फ एलोपैथिक सिस्टम से इलाज़ करवाता आया है  ? 
क्या यह विज्ञानं व्यवस्था,  हमें एलोपैथिक सिस्टम के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर नहीं करती  ?? शक्तिशाली प्रचार तंत्र के होते , बंद  दिमाग लेकर चलते और जीते हम लोग, एलोपैथिक सिस्टम के आगे और कुछ सोंच ही नहीं पाते  ! 

एलोपैथी को छोड़ अगर हम वैकल्पिक चिकित्सा पर ध्यान  दें तो अरुणा को कोमा से बाहर लाया जा सकता है !  होमिओपैथी एवं विश्व की अन्य कई ऐसी विधियाँ हैं जो मृत प्राय लोगों को जिलाने की शक्ति रखती हैं ! 

अगर हो सके तो अरुणा के मित्र अथवा उसको मदद करते संगठन का पता लगा कर , उससे जुड़ने का प्रयत्न करें तो अभी भी कुछ हो सकता है !


मानव चाहे तो क्या नहीं कर सकता ......आवश्यकता सिर्फ सामूहिक ताकत का उपयोग करने का ही है , रास्ता निकल ही आएगा  !

Monday, March 7, 2011

गायब होती मान मनुहार -सतीश सक्सेना

पाश्चात्य प्रेम का अनुकरण बड़े उत्साह के साथ करते  हम लोग , आज अपने स्वाभाविक प्यार की शक्ति को, लगभग भूलते से जा रहे हैं ! अपने प्यारों को समझने और उसे अहसास करने के लिए समय ही नहीं मिलता ! 

अहंकार, जिसे अक्सर हम स्वाभिमान का नाम दे देते हैं, में डूबे हम लोग, अकसर अपनों से कड़वा बोलते, यह ध्यान नहीं कर पाते कि बरछी जैसे वाक्यों से, हम अपने प्यारों का दिल ही छलनी कर रहे हैं ! इस आहत दिल  को देख ,पास पड़ोस के परिजन भी, मलहम लगाने की जगह, अक्सर नमक छिडकते देखे जाते हैं ! और इन ईर्ष्यालु मित्रों की बदौलत, इस आग को और भड़कने का मौका मिलता है ! 

इससे बेहतर तो यह होता कि अपने दिल के ज़ख्म दिखाए ही न जाएँ , शायद समय के साथ भर जाते ! एक बार सुज्ञ जी ने यह शेर, मुझे भेजा था , आज भी भुला नहीं पाया हूँ ... 

क्यों दिखाते हो गहरे ज़ख्म,  अपने  सीने     के  ! 
लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं   !   

याद है, एक शब्द हमारी भाषा में बहुत प्रचलित था " मनुहार  " ! अक्सर हम इस शब्द का उपयोग अपने बड़ों को या उन्हें, जिन्हें देख हमारे चेहरे खिल जाते थे, को मनाने में उपयोग करते थे  ! मान सम्मान के साथ, जब भी मनुहार की जाती थी, उस समय  कठोर वज्र समान दिल को भी, पिघलते देर नहीं लगती थी  ! मगर आज कोई मान मनुहार नहीं करता , पहले से ही, हीन ग्रंथियों से जकड़ा कमजोर मन , मान मनुहार को, दासत्व का नाम देने में, बिलकुल नहीं हिचकता ! 

और जुड़ने की इच्छा लिए, हम लोग और दूर होते चले जाते हैं !

Wednesday, March 2, 2011

ब्लॉग सरदार ?? -सतीश सक्सेना

"यह मेरी पहली पोस्ट थी वर्ष 2005 में सितम्बर माह की 18 तारीख को, जिसे संशोधित कर रहा हूँ। ब्लॉग बनाया था 17 सितम्बर को, विश्वकर्मा जयन्ती वाले दिन। कुछ पता नहीं था, ब्लॉग क्या होता है, इसकी उपयोगिता क्या है, कैसे लिखा जाए। सीखते सीखते आगे बढ़ा। उस समय यूनीकोड से भी परिचय नहीं था, तो विभिन्न अक्षरों में लिखे का snapshot लेकर यहीं चित्र के रूप में चिपका कर खुश हो लेता था। लगभग डेढ़ वर्ष में ही खुमार उतर गया क्योंकि स्वभाववश: इतनी ज़ल्दी-ज़ल्दी पोस्ट प्रकाशित करता था कि गूगल बाबा ने परेशान होकर तीन बार मुझे स्पैमर मानते हुए चेतावनी दे डाली और खाता बंद करने की धमकी भी दे डाली। इस बीच यहीं कई प्रयोग भी किए।
'और भी गम है जमाने में ब्लॉगिंग के सिवा' का भाव लिए अपन खिसक लिए और इन्डियाटाइम्स से एक सर्वर किराए पर ले, अपने शहर की वेबसाईट ही बना डाली। ब्लॉगजगत से नाता तो नहीं छूटा था। गाहे बगाहे नजर पड़ती ही रहती थी, मन मचलता ही रहता था फिर लौटने के लिए। कुच्छेक और विषय आधारित ब्लॉग बनाए। लेकिन व्यक्तिगत ब्लॉग होना ही चाहिए, ऐसा मेरी बिटिया का कहना था।

इसलिए यहाँ से पूर्व प्रकाशित (अजीबोगरीब) 953 पोस्ट हटा कर पुन: प्रवेश कर रहा हूँ।"

एक मस्तमौला सरदार द्वारा, १८ सितम्बर २००५ में लिखी गयी उपरोक्त ब्लॉग पोस्ट से, लेखक की ईमानदारी और एक विस्तृत दिल का पता चलता है ! बदकिस्मती से इतनी खूबसूरत पोस्ट किसी ने नहीं पढ़ी मगर इस सरदार ने वर्षों पहले अकेले शुरू किया सफ़र ख़त्म नहीं किया  , बल्कि आज भी जारी है !

इतने वर्षों में ब्लॉग जगत में यह सबसे विवादित लोगों के रूप में मशहूर हो गए ! अभी कुछ दिन पहले इनके द्वारा  , मेरे ब्लॉग पर आकर  गुस्से में दी गयी वह टिप्पणी "......हमें क्या पागल समझ रखा है " टाइप मुझे बिलकुल पसंद नहीं आई और डिलीट  कर दी  और काफी दिन तक इस "पागल" सरदार से कोई संबंध न रखूंगा , तय कर इनका ब्लॉग पढना बंद कर दिया !

मगर ब्लॉग जगत बहुत छोटा है ...कुछ न कुछ सरदार की हरकतों ( पोस्ट ) पर निगाह पड़ती ही रहती थी ! कुछ दिनों में यह महसूस होने लगा यह अजीब पर्सनालिटी  में ऐसा कुछ अवश्य है जो मुझे खींचता है इन्हें पढने के लिए ! जो बेहतरीन गुण लगे वे थे मददगार, गर्व रहित, ईमानदारी और निश्छलता और शायद यही गुण ब्लॉग जगत में कम से कम मिलते हैं ,  और मुझे लगा कि यह सरदार कुछ अलग है, प्यारा है !

पहचानिए कौन है ? 
अपनी पूर्व प्रकाशित अजीबोगरीब 953 पोस्ट हटाकर, दुबारा ब्लॉग जगत में प्रवेश करने वाला यह मिलनसार, बेवाक, मददगार मगर बेहद विवादित ब्लॉग सरदार......अजय कुमार झा  व हम सबके  परम मित्र, श्री बी एस पाबला हैं ! ! 
शुभकामनायें पाबला जी ! 
  

Wednesday, February 23, 2011

हताश अपेक्षाएं - सतीश सक्सेना

जिनको पूरे जीवन आपने भरपूर प्यार किया हो , जिनके हर कष्ट को, आपने अपने दिल पर महसूस किया हो, अगर वही प्यारा, आपको मार्मिक चोट पंहुचाने लगे, तब कोमल दिल कहीं गहराई तक घायल होता है ! अक्सर इस चोट से आहत दिल, आने वाले समय में किसी भी प्यार और स्नेह पर विश्वास नहीं कर पाता  ! 


अपने प्यारों से अपेक्षा करने को, अक्सर मानवीय कमजोरी बताया जाता है , प्यार के साथ अधिकार की भावना आ ही जाती है  जबकि आपके अधिकार को,  उचित सम्मान देने वाले नहीं मिलते  और यह आवश्यक तो बिलकुल नहीं कि आपका प्यारा भी आपको उतना हो प्यार करे जितना आप कर रहे हों ! हताशा यहीं से शुरू होती है  ...

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो  हुई
लेकिन तमाम उम्र का आराम मिल गया  ! 

आप सब लोगों का अक्सर एक ही सलाह होगी यहाँ ...अपेक्षा मत करिए !
मगर क्या संवेदनशील दिल को समझाना इतना आसान है ??

Monday, February 14, 2011

देख लूं ....उड़नतश्तरी द्वारा सस्नेह -सतीश सक्सेना

               सरल भाषा में ,समीर लाल द्वारा लिखी गयी इस सफल उपन्यासिका का ,पहला अध्याय पढ़कर ही, मन में एक सपना सा जग गया कि अपने ब्लॉग लेखों को एक किताब का रूप दिया जा सकता है !
                 शिवना प्रकाशन शायद देश में अकेला प्रकाशन संस्थान है जो बेहतरीन ब्लॉग लेखकों का परिचय, आम जनता को कराने में बड़ी भूमिका अदा कर रहा है ! शायद ब्लोगिंग को प्रोत्साहन देने में, पंकज सुबीर अपनी व्यक्तिगत शक्ति और धन का उपयोग कर, सबसे अधिक हिम्मत का काम कर रहे हैं ! वे वाकई सम्मान के अधिकारी हैं ! काश कुछ और पंकज सुबीर, देश को मिल जाएँ  :-)
                किताबी फार्म में समीर लाल को पढना बेहद सुखद रहा ! सामान्य भाषा में गर्व रहित उड़न तश्तरी  को पढ़ते हुए लगता है कि समीर लाल सामने बैठे बाते कर रहे हैं ! ईमानदारी से कहे सौम्य शब्द, आपको मंत्र मुग्धता की स्थिति का अहसास कराने में कामयाब रहेंगे !!
                मांट्रियाल सफ़र में, गाड़ी चलाते समय रास्ते के अनुभव, हमसे बाँटते हुए समीर लाल की शैली की एक बानगी देखें....
          
" सामने ट्रक को देखता हूँ ! सूअर लदे हैं ! एक छेद से मुंह निकाले ठंडी हवा की  मौज लेने की  फ़िराक में देखा ! उसे क्या पता कि गंतव्य पर पंहुचते ही मशीन उसे फाइनल नमस्ते कहने का इंतज़ार कर रही है ! उस पर गुलाबी निशान है और बहुतों की तरह ! शायद गुलाबी मतलब , पहला स्टॉप ! तो वहीँ कटेगा और फैक्ट्री में से दूसरी तरफ पैकेट में पैक निकलेगा, पीसेस में बिकने को  !
छेद से झांकता सूअर ....
वैसे ये तो हमें भी पता नहीं कि कौन सा निशान हम पर लगा है ......"  
                 इन पंक्तियों द्वारा, लेख़क अनजाने में ही अपने संवेदनशील दिल का परिचय  दे देता है ! एक दूसरे से जलते भुनते, हम लोगों की आखिरी शाम कहाँ हो जाये  यह कौन जानता है  ??
"उजाले अपनी यादों के , हमारे साथ रहने दो  ! 
न जाने किस घडी में जिंदगी की शाम हो जाए !" 

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