Saturday, December 19, 2009

घर से बहुत दूर, संघर्षरत एक लडकी के लिए एक ख़त !!


प्यारी प्यारी अप्पू !

आज सुबह सुबह जब तुमने नींद से उठाकर यह सुखद समाचार सुनाया तो वाकई आँखे नम हो गयी ! ख़ुशी इस लिए नहीं कि तूने एक टोयोटा करोला खरीद ली है बल्कि इसलिए कि काफी समय पहले, हम से दूर चली गयी, एक दुबली पतली लडकी इस लायक हो गयी है कि वह एक बड़ा फैसला ले सके ! शाबाश बच्चे मुझे तुमसे यह उम्मीद थी कि तुम एक दिन अपने सारे लक्ष्य अवश्य प्राप्त करोगी ! 
पता है इसका राज क्या है ......???

इस दुबले पतले कमजोर से शरीर और आधी अंधी ( अब नहीं :-) ) लडकी में गज़ब की हिम्मत है, लोगों द्वारा धक्का देने पर ,गिर पड़ने  पर खूब सुबक सुबक कर रोती है, और थोड़ी देर में आंसू पोंछ कर, फिर खड़ी होकर,
चल पड़ती है ....

एक बात याद रखना , यह निर्दयी दुनिया हंस कर कुछ नहीं देती , तुम्हे इसे बताना पड़ेगा कि तुम बहुत मजबूत हो , तुम्हे लोग हर कदम पर तंग करेंगे तुम्हारे दिल को दुखायेंगे ...और अगर तुम्हे कमजोर होते देखा तो विश्वास करो वे एक धक्का और देंगे ...कमज़ोर की कोई इज्ज़त नहीं बच्चे ...कभी मदद को हाथ नहीं फैलाना ... कोई नहीं देगा ! सिर्फ तुम्हारी आत्मिक शक्ति ही काम आयेगी !
ईश्वर की एक प्रार्थना भेज रहा हूँ , जब थक जाओ  या उदास हुआ करो  तो इसे सुना करो ....
एक और इच्छा है हमारी बिनू को, ऐसा एक लड़का पसंद करे, जो उसके सुन्दर दिल को पहचान सके ....उम्मीद है कि तुझे जानने बाला लड़का तुझे अवश्य बहुत शीघ्र मिलेगा ! मेरा दिल से आशीर्वाद है !

अच्युतम केशवम कृष्ण दामोदरंम
राम नारायणंम जानकी बल्लभम....

Friday, November 20, 2009

धन्य है वह देश जिसने इस परिवार को जन्म दिया !


तीसरा खम्बा पर ओकील साहब ने एक सामयिक और बहुत अच्छा लेख लिखा है जिसमें हाल में ऑस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों पर हमले के सन्दर्भ में तीन बीस वर्षीय आस्ट्रेलियाई दोषियों को लम्बी सजाएं सुनाई गयी हैं ! निस्संदेह हर भारतीय को सुन कर बहुत अच्छा लगा होगा कि परदेश में हमारे साथ की गयी क्रूरता के लिए, उसी देश के कोर्ट ने, अपने ही लोगों के खिलाफ, उदाहरण देने योग्य न्याय दिया !  


हमारे देश में २२ जनवरी १९९९ को ग्राहम स्टेंस (५८ )और उनके दो मासूम बच्चे फिलिप( ११ ) और टिमोथी (८ वर्षीय ) जो कि अपनी वैन में सो रहे थे कुछ लोगों ने जला कर जघन्यतम हत्या कर दी थी ! यह ऑस्ट्रेलियन परिवार उडीसा के जंगलों में  पिछले ३० सालों से रहकर  आदिवासी कुष्ठ रोगियों की सेवा कर रहा था ! पूरे परिवार की इस जघन्य हत्या के बावजूद इनकी विधवा ग्लैडिस स्टेंस ने इस अपराध के लिए दोषियों को माफ़ कर दिया , और शेष जीवन में अकेले ही यह कार्य करते रहने की अपनी दृढ इच्छा प्रकट की है  !  
.
"यद्यपि  अपने पति के साथ की कमी और अपने बच्चों को बड़े होते देखने की कमी उन्हें हमेशा खलेगी तब भी उन्हें हत्यारों से कोई शिकायत नहीं है  !


दोषियों के लिए उनका कहना है ..


"हमें माफ़ करना सीखना चाहिए , मुझे कोई कडवाहट नहीं है और अगर कडवाहट नहीं हो तो उम्मीद जगती है , सांत्वना  ईश्वर से मिलती ही है  ! विश्व के लोगों से मेरी प्रार्थना है कि आशा न छोड़ें  और इस देश ( भारत ) के लिए प्रार्थना करें  ! 


अशिक्षित,छुआछूत और धर्मांध  लोगों के बीच  सेवा कार्य करते हुए  ग्राहम स्टेंस की इस विधवा के लिए शुभकामनायें  और ईश्वर से प्रार्थना कि इनकी रक्षा  करें ! 


धन्य है वह देश जिसने इस परिवार को जन्म दिया  !

Friday, November 6, 2009

हमारे अपने ...

                              हमारे अपने जो उँगलियों पर गिनने लायक ही होते हैं, कहते हैं कि अगर अपना दिल दुखाना हो तो उनके प्यार और अपनापन के बारे में जरा सोच कर देखें, थोडी देर में ही नींद उड़ जायेगी उनके प्यार और ममता में जो विरोधाभास दिखाई पड़ेंगे, उसके अहसास मात्र से आप सो नहीं पायेंगे !
                               मैं अक्सर अपनों से कहता रहा हूँ कि अपनों के प्यार पर कभी शक न करें और अगर अधिक प्यार से मन भर गया हो तो केवल कुछ क्षण अपने आत्मीय जनों की कमिया याद करके देखें यह नकारात्मक सोच के कुछ क्षण ही आपको अपनों से बरसों दूर ले जायेंगे !
                             संक्रमण काल से गुज़रते हुए लगता है कि अपनों के प्रति अधिक संवेदनशील होता जा रहा हूँ, पूरे जीवन अपने कष्टों के बारे में कभी सोचने ही नहीं बैठा , केवल इन अपनों के कष्टों की चिंता रही ! अपना अकेलापन याद न आये इसलिए सारे जहान के कष्टों को दूर करने के लिए अविराम अपने आपको व्यस्त रखा ! और अब जब अपने कार्यों या अकार्यों पर अपनों की उठी उंगली देखता हूँ तो एक टीस सी महसूस होती है, लगता है कि पूरे जीवन कुछ किया ही नहीं ! अपने किये गए कार्यों और निष्छल प्यार का स्पष्टीकरण देने की ,अपनों की अपेक्षा महसूस करने से ही, दुनिया के लिए बेहद मज़बूत  इस दिल की आँखों में आंसू आ जाते हैं !
                               अक्सर हमें दो तरह के प्यारों के बीच रहना पड़ता है , एक जो वाकई अपने हैं जो आपको बहुत प्यार करते हैं , जिनके कारण ही जीवन में मधुरता और रस बना रहता है , दूसरे वे जिनके साथ जीना हमारी नियति है , प्यार का दिखावा करते ऐसे प्यारे अक्सर देखे जाते हैं !
                               जब अपनी पूरी ईमानदारी से किये गए कार्यों की समीक्षा, दूषित,स्वार्थी और असम्वेदन शील "अपनों " के द्वारा करते हुए देखता हूँ तो मन एक अनचाही वित्रष्णा से भर जाता है ! मगर फिर अपने मन को समझाने लगता हूँ कि अगर  इनसे दूर होता हूँ तो इनका अपना कौन है ... क्या होगा इनका ? ईश्वर ने मुझे इनके जहर को सहने की शक्ति दी है और  साथ ही इन्हें सुरक्षा देने का दायित्व भी  ! अगर मैं  इनकी मदद नहीं करूंगा तो  इनका और कौन है  ? और अगर यह  मुझे  नहीं काटेंगे तो किसे काटेंगे ? बेहतर है कि यह जहर मैं ही सहन करुँ क्योंकि मुझे ईश्वर ने इसे सहने की शक्ति दी  है  ! ईश्वर ने इन्हें  मुझे दिया है  कि इनको हंसते हुए झेलो और इनको मैं  मिला हूँ  जिस पर  रत्ती भर विश्वास न होते हुए भी इन्हें मित्रता निभानी पड़ रही है !   

Wednesday, October 14, 2009

कहीं आपकी पीठ पर किसी और का नाम तो नहीं !!

                              कुछ समय पहले एक महिला ब्लागर ने किसी बात पर क्षुब्द्ध होकर कहा था कि मैंने हिंदी ब्लाग लिखना इसी लिए बंदकर दिया कि यहाँ पर लोग एक दूसरे पर बिना बात कीचड उछालते हैं ! उस समय अतिरंजित लगने वाली यह बात आज मुझे काफी प्रभावशाली लगती है ! आज लगता है ब्लाग रुपी चौपाल पर बैठ, हम सब ज्ञानी लोग यह मौका ढूँढ़ते रहते हैं कि कब नए अज्ञानी ( ज्ञानी )का मज़ाक उड़ाने का मौका मिले, और हम लगे हाथों उसकी हजामत बनाने में शामिल हों !
                 एक समय यह देख कर अजीब लगता था  कि चौपाल पर बैठे कुछ लोग मेरे सादर नमन (कमेंट्स ) का जवाब देना भी पसंद नहीं करते जबकि मेरा नमन उनकी  लेखन शैली के प्रति श्रद्धा मात्र और प्रणाम सिर्फ उनसे कुछ सीखने की इच्छा हेतु उनका ध्यान आकर्षित करने का एक साधन , मगर  दूर रहने का कारण सिर्फ  उनके ग्रुप धारणा का मेरी सोच  का विरोधी होना था !
               कुछ समय बाद समझ आया कि अधिकतर लोग  किसी न किसी ग्रुप के सदस्य मात्र हैं और ९० प्रतिशत भीड़ की पीठ पर किसी न किसी नेता या नेत्री (महान ब्लागर ) का नाम लिखा हुआ है , और यह महान ब्लागर , अपने ग्रुप सदस्यों  को, किसी का भी अपमान करने और नीचा दिखने के लिए,  शाबाशी देने के साथ साथ, पूरा उत्साह वर्धन करने के लिए विभिन्न आयोजन भी करते हैं ! सबसे अधिक दुखदायी तथ्य यह है,कि अच्छी लेखनी से  धनी कुछ योग्य लेख़क भी इनका नाम अपनी पीठ पर लिख कर न केवल गौरव समझते हैं बल्कि  इनके इशारे मात्र से किसी का भी अपमान करने के लिए तैयार रहते हैं !
कुछ समय पहले ब्लाग जगत पर मजाक में कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं , जो आज सच लगने लगी हैं ....


कुछ मनमौजी थे, छेड़ गए ! 
कुछ कलम छोड़ कर भाग गए
कुछ संत पुरूष भी पतित हुए
कुछ अपना भेष बदल बैठे , 
कुछ मार्ग प्रदर्शक, भाग लिए 
कुछ मुंह काले करवा आए, 
यह हिम्मत उन लोगों की है,जो दम सेवा का भरते हैं !!
कुछ ऋषी मुनी भी मुस्कानों के, आगे घुटने टेक गए !  
कुछ यहाँ शिखन्डी भी आए 
तलवार चलाते हाथों से, 
कुछ धन संचय में रमे हुए, 
वरदान शारदा से लेते !, 
कुछ पायल,कंगन,झूमर के
गुणगान सुनाते झूम रहे , 
मैं कहाँ आ गया, क्या करने,दिग्भ्रमित बहुत हो जाता हूँ ! 
अरमान लिए आए थे हम , अब अपनी राहें भूल चले !
                                कुछ यहाँ बगुला भगत भी  हैं ,जो  प्रत्यक्ष में  ईश पूजा में लगे रहते हैं मगर रात होते ही अन्य नामों से बनाये गए अपने ब्लाग पर जाकर लोगों को भरपूर गलियां देकर जहर उगलते हैं ! इनकी पहचान करना आसान नहीं है , समय के साथ ही उन्हें पहचाना जा सकता है ! मैं  जिन्हें सिद्ध पुरुष समझता था वे  अक्सर आवरण हटने पर मात्र गिद्ध पुरुष  पाए गए !
                                 मैं भी सोचता हूँ कि ऐसे लोगों को ढूँढने का प्रयत्न करुँ, जिनकी पीठ पर किसी का हाथ न हो, किसी का नाम न हों, उनका एक ग्रुप बनाया जाये , जो किसी की अवमानना न करें , चाहें कोई अच्छा लिखे या बुरा सबकी तारीफ करते हुए उसे प्रोत्साहित करे , समाज या धर्मं कोई हो हम सब उसको पढें और सराहें ! अपने धर्म के साथ साथ जैन, बौद्ध , ईसाइयत, सिख और इस्लाम  के बारे में श्रद्धा पूर्वक जानने की इच्छा रखें  और  उनको अपने से अधिक सम्मान दें  !
ऐसा  करते हुए मुझे अपने हिन्दू और हिन्दुस्तानी होने पर हमेशा गर्व होता है !

Saturday, October 3, 2009

ब्यूटीफुल रिनी की एक झलक !

सोचा था कि आज की पोस्ट कुछ अलग हट कर हो , अचानक ध्यान 2 वर्षीया रिनी की ओर चला गया, जो अपने आप में सारे घर का ध्यान आकर्षित किये रहती है , अपने बारे में उसका  कहना है कि "रिनी ब्यूटीफुल हैं" और सारा घर और उसे जानने वाले यह मानने पर मजबूर भी हैं कि रिनी ब्यूटीफुल हैं ! 
आशा है आप लोग भी इस मासूम सुन्दरता को पसंद करेंगे !

दो वर्षीया इस बच्ची को अपना ही  अंदाज़ है , और  साडी पहन कर चलने और बात करने का अंदाज़  देख कर  श्रष्टि रचयिता के प्रति अनायास ही  धन्यवाद देने का दिल करता है !  

इन्ही  का  एक अन्य फोटो मेरे डेस्क टॉप  पर लगा है , जिसकी  निष्छल मुस्कान देखकर सारे दिन की थकान गायब हो जाती है ! काश  हम बड़े लोग भी ऐसी मुस्कान लोगों को दे सकें  !

Tuesday, September 29, 2009

ब्लाग वाणी की वापसी का स्वागत है !

"स्वाँतः सुखाय लिखने का दम भरने वाले पसँद की परवाह ही क्यों करें ?"  यह शब्द डॉ अमर कुमार के हैं  बहुत सार गर्भित और अच्छे लगे ! 


                   सवाल यह है, हम किस लिए लिखते हैं  , अपने सम्मान को बढ़ाने के लिए ? तारीफ़ पाने के लिए ?अगर ऐसा है तो क्या हमारे सोचने से, या जगह  जगह जाकर,  सुर्खियों में बने रहने से   सम्मान मिल पायेगा  ? मुझे लगता  है इससे सिर्फ  लोगों को आपके अस्तित्व का पता लग सकता है , वास्तविक सम्मान  सिर्फ तब ही संभव है जब लोग  आपकी बात पर यकीन करें , जब लोगों को आपके लिखे के प्रति आदर  हो . और उसके लिए आपको शायद बरसों तक  चुपचाप अपना कार्य करना पड़े  !


हम लोग अक्सर किसी अच्छे व्यक्ति का दिल  दुखा कर बाद में अपनी बात पर कायम करने के लिए क्या क्या नहीं करते , मगर सबके  मध्य  अपनी भूल का अहसास कैसे करें  ? वाकई समस्या है  ! स्वान्तः सुखायः लिखने का  दावा  करने वालों को अपने यश और तारीफ़ से क्या लेना , अगर अच्छा लिख रहे हो तो लोग आपसे बिना कुछ चाहे, आयेंगे  और आपको सम्मान देंगे , और लोग  वाकई में ज्ञानी हैं , समय के साथ सबको पता लग जायेगा  !


प्रार्थना  यही है कि अगर हम किसी की तारीफ न कर सकें  तो किसी के किये पर , बिना उसे समझे, अपने ज्ञान का  कचरा न फेंके ! 

Monday, September 21, 2009

ईद का मतलब -सतीश सक्सेना


आज पूरे देश में ईद मनाई जा रही है, रमदान के पवित्र माह में अल्लाह का नाम लेते हुए, और कोई भूल न हो इसकी दुआ मानते हुए, आज खुशियाँ मनाने और गले मिलने का दिन आता है ! यकीन करें आज के दिन का इंतज़ार पूरे साल उन्हें भी रहता है जो आपस में शिकवे शिकायत लेकर रंजिश पाले रहते हैं मगर मन में कहीं न कहीं यह इच्छा रहती है कि ईद के बहाने गले मिल कर यह रंजिशें ख़त्म कर लेंगे ! और अक्सर यह खुशफहमियां सच भी होती हैं, शायद पवित्र मौकों पर ईश्वर भी सहारा देते हैं !
मगर पुनर्मिलन की यह खुशियाँ पहल करने पर ही मिलती हैं, और एक शैतान हमें अपनों से मिलने को रोकता है और वो शैतान है हमारा अहम् या ईगो जो कहता है कि अपने खून के रिश्तों या दोस्तों के दरवाजे पर पहले हम क्यों जाएँ पहले वो क्यों न आयें हमारे दरवाजे पर ! और दोनों तरफ की यह सोच हमारे प्यारों को कभी गले मिल कर रोने नहीं देती ! खुल कर रोने का जी चाहता है मगर यह शैतान हमें रोने भी नहीं देता !   
इस खास माह पर यह हिदायत दी गयी है कि पुरानी गलतियों की ईश्वर से माफ़ी मांगते हुए अब हम आपस में अपनों के साथ मिलकर खुशियाँ मनाएंगे साथ साथ अपने घमंड को भूल कर अपने गिले शिकवे दूर करें ! आज के दिन दुआ करें कि टूटते परिवार आपस में गले मिलें, दिल से रंजिश मिटाकर वाकई अपने बचपन के दिनों में लौटने की कोशिश करें, पुराने प्यार और उन दिनों की खुशियों को याद करने की कोशिश करें, एक दूसरे की अच्छाइयों को याद करने और गुस्से में कहीं कड़वी बातों को भुलाने से आज का दिन वाकई पूरे जीवन को खुशियों से भर देगा !
काश लोग ईद ( खुशियों का त्यौहार ) का अर्थ समझ सकें, तो अपने बिछडों से मिलने की इच्छा से ही बहुत से मासूमों के चेहरे पर रौनक आ जायेगी !और ईश्वर की दी हुई हिदायतों का वास्तविक पालन होगा ! 
अंत में मेरा एक पसंदीदा शेर ( नामालूम शायर ) नज़र है ..
"बदगुमानी आपस में देर तक नहीं रखना  
रंजिशें मिटाने को एक सलाम काफी है !!"

Wednesday, August 12, 2009

एक कवि का दर्द !!

"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."....
.....
हे घाव देने वालों, तुम जीत गये. मेरी जिन्दगी की समझ, जो संस्कारों से मैने पाई थी और बदलते सामाजिक मूल्यों में अपनी मान्यता खो चुकी मेरी कल्पना की उड़ान हार गई. अब जो चाहो, मेरे साथ सलूक करो मैं प्रतिरोध नहीं करुँगा. मैं एक हारा हुआ योद्धा हूँ - खुद की करनी के चलते, इसमें किसी का कोई दोष नहीं "


"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."


बढ़ती उम्र के साथ शक्तिहीनता का अहसास, और इस वक्त अपनों का साथ न देना, किसी भी योद्धा की जीवनीशक्ति को धराशायी करने के लिए पर्याप्त है ! जिनके लिए, अपने सुख की विना परवाह किये, पूरे जीवन संघर्ष रत रहे वे सब अपने अगर जीवन के उत्तरार्ध में एक साथ इकट्ठे होकर, उँगलियाँ उठाना शुरू कर दें तभी ऐसे अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है !

पूरे जीवन सबको हंसने और हँसाने का मंत्र देने वाले,महारथी , कई बार अपने आपको खुद कितना असहाय और कष्टपूर्ण स्थिति में पाते हैं और ऐसे में उनका साथ देना वाला कोई नहीं होता !

इस दर्द में एक शायर का शेर याद आ रहा है ....

"यकीं ना आये तो इक बात पूछ कर देखो ,
जो हंस रहा है वो जख्मों से चूर निकलेगा !"

और बच्चन जी की यह पंक्तियाँ..

"जिसके पीछे पागल होकर
मैं दौरा अपने जीवन भर
जब मृगजल में परिवर्तित हो
मुझ पर मेरा अरमान हंसा , तब रोक न पाया मैं आंसू !
मेरे पूजन आराधन को
मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
जब मेरी कमजोरी कहकर
मेरा पूजित पाषाण हंसा , तब रोक न पाया मैं आंसू !"

मगर गहन अवसाद में डूबे हुए इस निर्मल ह्रदय कवि को, मैं अपनी लिखित इन पंक्तियों के द्वारा, इस गहरी नींद से जगाना अवश्य चाहूँगा...

दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

समझ प्यार की नही जिन्हें है
समझ नही मानवता की
जिनकी अपनी ही इच्छाएँ
तृप्त नही हो पाती हैं ,
दुनिया चाहे कुछ भी सोचे कभी न हाथ पसारूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

चिडियों का भी छोटा मन है
फिर भी वह कुछ देती हैं
चीं चीं करती दाना चुंगती
मन को हर्षित करती हैं
राजहंस का जीवन पाकर क्या भिक्षुक से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

विस्तृत ह्रदय मिला इश्वर से
सारी दुनिया ही घर लगती
प्यार नेह करुना और ममता
मुझको दिए विधाता ने
यह विशाल धनराशि प्राण अब क्या में तुमसे मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

जिसको कहीं न आश्रय मिलता
मेरे दिल में रहने आये
हर निर्बल की रक्षा करने
का वर मिला विधाता से
दुनिया भर में प्यार लुटाऊं क्या निर्धन से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

गर्व सदा ही खंडित करता
रहा कल्पनाशक्ति कवि की
जंजीरों से ह्रदय और मन
बंधा रहे गर्वीलों का ,
मैं हूँ फक्कड़ मस्त कवि, क्या गर्वीलों से मांगूंगा !
दर्द दिया है तुमने मुझको दवा न तुमसे मांगूंगा !

Tuesday, August 11, 2009

समीर लाल का दर्द !


"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."

समीर लाल के यह शब्द और यह लेख पढ़ कर ऐसा महसूस हुआ कि इस शानदार संवेदनशील व्यक्तित्व को कोई गहरा आघात लगा है, और वह भी किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे यह अपना मानते रहे हैं !

कुछ लोग संवेदनशीलता का मज़ाक ही नहीं उडाते बल्कि उन्हें कमज़ोर,मूर्ख और नपुंसक जैसे शब्द कहते हुए, यह सबूत देते नज़र आयेंगे कि आप सर्वथा अयोग्य हैं और इन लोगों को कोई सरोकार नहीं कि समीर के दिल में उस व्यक्ति के प्रति भी कोई दुर्भावना नहीं है बल्कि वे हर समय विनम्रता के साथ, सेवा भाव लिए, हाथ जोड़े तत्पर हैं !

इस दुनिया में निस्वार्थ किसी अन्य की मदद करने का अर्थ, अपने प्यार, स्नेह और सेवा भाव पर शक का प्रश्नचिंह लगवाना है और ब्लाग जगत में तो ऐसे उदाहरण हर जगह नज़र आयेंगे !

मगर भौतिकता वादी जगत के रहने वाले सामान्य नागरिकों को , जिन्हें बात बात में "बदले में" , "हमें क्या फायदा.."कोई क्या समझेगा " "मेरा है " जैसे तकिया कलाम, बचपन से पारिवारिक विरासत के स्वरुप में मिले है, क्या यह संवेदनशीलता को समझ पाएंगे ? क्या कुछ लोग इस योग्य भी हैं कि वे इस दर्द को महसूस भी कर सकें !

भावुक और सच्चे इंसान प्यार के लायक ही होते हैं ! ऐसे लोगों को अगर सहयोग या सम्मान देना नहीं सीख पाए हैं, तो कम से इनका अपमान नहीं करना चाहिए .... आज के निष्ठुर समय में ऐसे लोग वास्तव में दुर्लभ हैं !

ऐसे प्यारों के साथ सम्मान और इज्ज़त का ही व्यवहार होना चाहिए जिसके यह सर्वथा योग्य है !

Tuesday, August 4, 2009

आधुनिक पीढी से !

क्या आपको कभी कभी ऐसा लगता है ?
-कि अपने व्यस्त समय के कारण, कुछ बहुत आवश्यक चेहरों को भूलता जा रहा हूँ ! एक समय, जिन चेहरों के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, आज वे धुधले पड़ते जा रहे हैं !!
-आजकल बीमार माँ की अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उँगलियों से खाया खाना, कभी तृप्ति का पर्याय लगता था !!
-इन दिनों असहाय और कमज़ोर पिता की भी, अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उंगली पकड़ कर, मैं अपने आपको, दुनिया का सबसे शक्तिशाली बच्चा समझता था !!
-दुनिया में सबसे अधिक मुझे प्यार करने वाली बहिन या भाई, को जानबूझ भुलाने का प्रयत्न करना !!

बहुत आसान होता है अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाना...... बस अपनी सोच को थोडा सा परिवर्तित करना है, और हमें सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है ! !
-सोचिये कि आपके माता-पिता आर्थिक तौर पर सर्व समर्थ हैं और वे मेरे बिना भी अपनी समस्याएं सुलझा सकने में समर्थ हैं !!
-सोचिये कि माँ को कोई बीमारी नहीं हैं क्योंकि वे आज भी अपना सारा काम बखूबी अंजाम देती हैं !!
-सोचिये कि बहन भी मुझे अब पहले जैसा प्यार नहीं करती !!
और यकीन रखें माँ बाप की यह मजबूरी है कि वे बच्चों के सामने अपने आपको स्वस्थ और हंसमुख दिखाने का प्रयत्न करते रहें, और पड़ोसियों और मित्रों के सामने हमेशा की तरह आपकी तारीफ करते रहें !!

Saturday, August 1, 2009

डॉ अमर ज्योति के जन्मदिन पर !

आज सुबह सुबह, डॉ. अमर ज्योति के जन्मदिन के अवसर पर, माँ शारदा पुत्र - राकेश खंडेलवाल की चार पंक्तियाँ पढ़कर अनायास मेरे जैसे लापरवाह व्यक्ति को भी, अमर ज्योति की कुछ रचनाओं की याद आगई !

अपना कष्ट भूल कर ( लम्बे समय से डॉ अमरज्योति एक सड़क दुर्घटना के कारण लगभग बिस्तर पर ही हैं ) कमज़ोर, गरीबों के बारे में हमारी आँखे खोलने का प्रयत्न करते अमर वास्तव में माँ शारदा के सच्चे सुपुत्र हैं ! अंधे बहरे समाज के लिए उन्होंने वह सब लिखा जो हमारी आँखे खोलने को पर्याप्त होता.... अमर ज्योति लेखकों से कहते हैं ...

राजा लिख और रानी लिख,
फिर से वही कहानी लिख ,
बैठ किनारे लहरें गिन,
दरिया को तूफानी लिख

गोली बारी में रस घोल
रिमझिम बरसा पानी लिख
रामराज के गीत सुना
हिटलर की कुर्बानी लिख

राजा को नंगा मत बोल
परजा ही बौरानी लिख
फिरदौसी के रस्ते चल ,
मत कबीर की बानी लिख

उपरोक्त कविता में आज के लेखकों पर तीखा व्यंग्य है , उनकी अधिकतर कवितायें कमजोरों और जीवन को ढोते हुए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है ! उनकी हर ग़ज़ल, दर्द में तडपती हुई जिंदगियों की, हकीक़त दिखाती नज़र आती है !

एक गरीब विधवा रज्जो की अम्मा का शब्दचित्रण देखिये आपको एक जवान बेटी की विधवा गरीब माँ के जीवन का यह चित्र बहुतों के लिए शायद कल्पना ही होगा मगर अगर आप बुंदेलखंड के किसी सुदूर ग्राम में जाएँ तो यह आम समस्या है !

राम के मंदिर पर लिखते हुए अमर को अपने देश में कप प्लेट धोते लव कुश याद आ रहे हैं ! इनका पूछना है कि "रख सकेंगे क्या अंगूठे को बचा कर एकलव्य;रामजी के राज में शंबूक जी पायेंगे क्या!"

एक और बानगी देखिये- कि कुछ लोगों को शायर और कवियों के लिए पसंदीदा मौसम सावन और बदली छाये माहौल से दहशत होती है, बदली के छाने से .....यह भी जीवन है ! कितने लोग इनके बारे में सोचते हैं

डॉ अमर ज्योति random rumblings की रचना को एक बार पढ़ कर मन नही भरता ! हर रचना एक वास्तविक चित्रण करती है एक सच्चाई का जिसको हम आम जीवन में नज़रन्दाज़ करते हैं ! विनम्रता की हालत यह है, अपने परिचय में एक पूरी लाइन भी नही लिखी ! जनाब इंग्लिश साहित्य में Ph.D. हैं, और सेवा हिन्दी की कर रहे हैं ! डॉ अमर ज्योति जैसे स्वच्छ लेखक हिन्दी जगत की आंख में गुलाब जल के समान हैं जो बेहद शीतलता देते हैं !

जन्मदिन पर मेरी शुभकामनयें और ईश्वर से प्रार्थना है ,वे इस लम्बी बीमारी से शीघ्र ठीक होकर सानन्द जीवन व्यतीत करें !

Wednesday, July 29, 2009

एक पुत्री की तलाश -सतीश सक्सेना

अपने घर के लिए भावी मालकिन और स्वयं के लिए पुत्री का विकल्प खोजते हुए जहाँ बहुत अच्छे अच्छे लोगों से भेंट और बातचीत हुई वहीं कई स्थानों पर कष्टदायक अनुभव भी कम नहीं थे ! अधिकतर लोगों ने "बढ़िया शादी" का वायदा , "हमारे यहाँ कोई कमी नहीं है " आपकी कोई इच्छा हो तो खुल के कहें हमें कोई समस्या नहीं है " आदि वाक्य सामान्यतयः प्रयुक्त किये और मैं हर बार अपना स्पष्टीकरण देने पर मजबूर होता फिर भी संदेह भरी आँखें बता देतीं कि उन्हें इसपर विश्वास नहीं हो पा रहा है !

किसी की मदद करने के बदले धन की चाह और अपना काम कराने के लिए धन का लालच देने का प्रयत्न करना दोनों ही मानव अवगुण सदियों से चले आ रहे हैं, मगर धन से जीवन भर के लिए प्यार और भावी पीढियों के लिए सम्मानित भविष्य खरीदना संभव है ? ऐसा विश्वास रखने वालों के लिए क्या कहा जाये ! रिश्ते खरीदने का यह प्रयत्न हमारे समाज को बर्बाद करने के लिए काफी होगा, ऐसा मेरा मानना है !

Tuesday, July 7, 2009

मज़हब के आदेश !




दिल्ली राजनेताओं में से एक चौधरी मतीन अहमद जो कि विधान सभा सदस्य (सीलमपुर ) हैं, से मिलकर ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी राजनेता से बात कर रहा हूँ, बल्कि एक बेहद शांत, सुलझे, विद्वान् और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व से मिलने के बाद लगा कि काश सारे राजनेता ऐसे ही हों !


आतंकवाद और धर्म पर मतीन अहमद कहते हैं -

" इस मज़हब (इस्लाम) में आदेश दिया गया है कि कोई पिता बाहर अन्य बच्चों के साथ खेलते हुए बच्चे को बेटा कहकर आवाज़ न दे बल्कि उसका नाम लेकर बुलाये क्योंकि उन बच्चों में अगर कोई बिना बाप का बच्चा है तो उसका दिल न दुखे कि काश आज कोई मुझे भी बेटा कहने वाला होता !

कोई भी सच्चा मुसलमान किसी का दिल दुखाने का काम नहीं कर सकता सवाल सिर्फ नफरत फैलाने वालों की पहचान का है, फिर वे चाहे किसी कौम के हों ! "

Tuesday, June 30, 2009

सरकारी नौकरियों में बेटियों का आरक्षण !

केंद्रीय गृहमंत्री श्री चिदम्बरम का यवक्तव्य (टाईम्स ऑफ़ इंडिया दिनांक ३० जून से साभार) कि आने वाले लोकसभा सत्र में सरकार लड़कियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बिल लाएगी, हमारी बच्चियों के लिए एक उत्साह वर्धक खबर है ! इस अभूतपूर्व सरकारी कदम से हमारी मेहनती लड़कियों के लिए सरकारी क्षेत्र में अपने आपको स्थापित करने के लिए बेहतर मौका मिला है और मुझे उम्मीद है कि लड़कियां भविष्य में अपने आपको देश चलाने वालों की लाइन में पाएँगी, और वे देश में सरकारी तंत्र को मज़बूत बनाने में अपना बेहतर योगदान कर पाएंगी ! सरकार के इस कदम से, निस्संदेह भविष्य में, अशिक्षित माता पिता, घ्रणित कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप न करके, कन्या जन्म पर गौरवान्वित महसूस करेंगे ! अच्छे भविष्य के लिए बेटियों को शुभकामनायें !

Monday, June 29, 2009

हम लोग -सतीश सक्सेना

हम लोग, एक बड़े देश के निवासी "अनेकता में एकता " का नारा अक्सर सुनते आये हैं, और लगता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब लोग एक जुट हैं, मगर हाल में एक उत्तर पूर्वीय प्रान्त के मुख्यमंत्री का यह कथन कि मेरे देशवासी मुझे अक्सर नेपाली समझते हैं , और इस कारण अक्सर मुझे कहना पड़ता है कि मैं आपकी तरह भारतीय हूँ किसी अन्य देश का नहीं ! अपने ही देशवासियों के समक्ष एक देश भक्त का यह स्पष्टीकरण उन्हें खुद कितना कष्टदायक लगता होगा यह तो मैं नहीं जानता, मगर व्यक्तिगत तौर पर मुझे वेहद नागवार लगता है, एक आवेश सा आता है कि कितनी अज्ञानता है मेरे देश में, ऐसी धारणाओं के कारण हम अपनी समझ की, बाहर वालों से कितनी मजाक बनवाते हैं ?

हम लोग इस विशाल देश की सीमाओं तथा विविधिताओं से अनजान रहते हुए, खुद अपनी समझ पर इतराते हुए, बिहारी, पञ्जाबी, मद्रासी एवं पुरबियों की मज़ाक बनाते समय इसके दूरगामी परिणामों के बारे में नहीं सोचते !

कब विकसित होगी हम लोगों की समझ ??

Saturday, June 20, 2009

मांगलिक अवधारणा एवं ज्योतिष शास्त्र !

कुछ समय से अपने लिए पुत्रवधू की तलाश में हूँ, जो कि आने वाले समय में मेरी बेटी का रिक्त स्थान भर सके, इस जटिल मानसिक काम को करने में कुछ नए नए अनुभव हुए, कुछ सुखद तो कुछ कष्टदायक ! एक सादा तथा बेहद विनम्र पिता से बात हुई, उन्होंने अपनी पुत्री के स्वभाव के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन कर लगा कि शायद खोज पूरी हो गयी, शायद ऐसी ही बेटी की तलाश थी मुझे !

वास्तव में उस विदुषी मगर सामान्य वस्त्र पहने लडकी के फोटो ने मुझे काफी प्रभावित किया ! मगर रात में उस बच्ची के पिता का फ़ोन आया कि साहब आपका बेटा जन्मपत्री के हिसाब से मांगलिक है, यह तो आपने बताया ही नही ?

मुझे लगा जैसे एक अपराध बोध से घिर गया मैं ! लगा कि जैसे मैंने " मेरा पुत्र मांगलिक या आंशिक मांगलिक है" यह बात मुझे शादी की चर्चा में सबसे पहले बतानी चाहिए, चाहे मुझे इस मिथक धारणा पर विश्वास हो या न हो !मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ की मैं इस घटना का दोष उन्हें दूं अथवा अपने आपको को !

पल भर को ऐसा लगने लगा कि एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत और विश्व की आधुनिकतम टेक्नालोजी में एक्सपर्ट मेरा बेटा हिन्दू धर्म के एक बड़े वर्ग के हिसाब से हर किसी लड़की से विवाह करने योग्य नहीं है, अब उसका विवाह सिर्फ मांगलिक लडकी से ही होगा ! जो पुत्र अपने परिवार तथा मित्रों में अपने सद्गुणों से हमेशा सम्मान पता रहा है, जिसके स्वभाव एवं चरित्र पर आजतक किसी ने ऊँगली नहीं उठाई, ज्योतिष के लिहाज़ से वह क्रूर तथा झगडालू हो सकता है ! मेरे लिए यह तथाकथित धार्मिक तथ्य बेहद कष्टदायक लायक लगा !

जन्मकुण्डली के 1,4,7,8, एंव 12वें भाव में मंगल के होने से जातक/जातिका मांगलिक कहलाते हैं ! बड़ी संख्या में (१२ में से ५ स्थानों पर) मंगल देख वर और वधु को तुंरत मंगली घोषित कर देना कहाँ तक ठीक है ? अगर यह सच है तो लगभग हर तीसरा इन्सान मांगलिक होगा एवं वह तामसी गुणों से युक्त होगा, इस धारणा को अगर बल दिया जाये तो हिन्दू समाज में शादी विवाह सामान्यतः हो पाएंगे इसमें संदेह है !

Tuesday, March 10, 2009

मिलाद अन नबी मुबारक !

समस्त भाइयों को हज़रत मोहम्मद साहब 
का जन्म दिन मुबारक हो !

Saturday, March 7, 2009

नफ़रत या प्यार !

"संकीर्ण सोच" श्रीकांत पराशर के उन लेखों में से एक है जो मुझे बहुत पसंद है और बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है ! अफ़सोस है कि हर समाज का नुकसान करने वाले अधिकतर यही संकुचित सोच वाले "बुद्धिमान" व्यक्ति ही रहे हैं !यह सच है कि संकीर्ण विचारधारा को बदलना अगर असंभव नही तो बेहद मुश्किल कार्य अवश्य है

आज भी ऐसे लोगों की कमी नही है जो हर समय नफरत पालते हैं और नफरत में ही सोना पसंद करते हैं, इन लोगों को प्यार और स्नेह का आनंद ही मालुम नही ! अधिकतर ऐसे लोगों की प्रारिवारिक प्रष्ठभूमि में सहोदर भाई बहनों में भी प्यार की जगह एक दूसरे को नीचा दिखाना तथा पूरे जीवन एक दूसरे के साथ दिखावा करना ही रहा है !

घर में माता-पिता की भूमिका को नकारते समय, हमें यह याद क्यों नही रहता कि भविष्य में यही भूमिका हमारी भी होगी, और हमारी संतान हमें उतना ही महत्व देगी !

Saturday, February 14, 2009

ढाई आखर प्रेम का ..

चिटठा चर्चा पर आज मुझे तरुण का लेख , ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय पढ़ कर पाश्चात्य प्यार के इस अवसर पर सुदामा और केशव का प्यार याद आ गया और मुंह से निकल पड़ीं नरोत्तमदास रचित कुछ पंक्तियाँ !

पत्नी के द्वारा बार बार कहने पर महागरीब सुदामा, भेंट के लिए, पड़ोस से मांगे कुछ मुट्ठी चावल की पोटली लेकर, अपने बालसखा द्वारकाधीश से मिलने पंहुचे तो द्वारपाल के ये शब्द ....

"सीस पगा न झगा तन पै प्रभु जाने को आहि बसै केहि गामा
धोती फटी सी लटी दुपटी औ पायं उपानह को नहि सामा,
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को नाम , बतावत आपनो नाम सुदामा ,

सुदामा पांडे का नाम सुनते ही, कन्हैया सारे राजकाज छोड़, हाथ जोड़ भाग पड़े अपने उस बालसखा से मिलने दरवाजे पर ! द्वार पर अपने मित्र की दुर्दशा देख करूणानिधि रो पड़े ...

"ऐसे बेहाल बिवाइन से पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ,
हाय महादुख पाय सखा तुम आए इतै ना कितै दिन खोये
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिके करुणा निधि रोये
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल से पग धोये !"

कांख में दबी पोटली को छिपाने का प्रयास करते देख , मुस्कराते केशव ने सुदामा से कहा जैसे बचपन में गुरुमाता के दिए चने तुम अकेले खा जाते थे वैसे ही भाभी के भेजे ये मीठे चावल भी तुम छिपा रहे हो, चोरी की तुम्हारी आदत अभी भी नही गयी , कहकर द्वारकानाथ, वे चावल लेकर खाने लगे ! प्यार का यह स्वरुप वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं !इतने में ही प्रभु ने जो देना था अपने मित्र को दे चुके थे .....

खाली हाथ दरवाजे से विदा लेकर दुखी मन, कुढ़ते हुए सुदामा जब अपने गाँव पहुंचे तो अपने महल नुमा घर और पत्नी को पहचान भी नही पाए ......
प्यार का यह स्वरुप आज कहीं सुनने को भी नही मिलता .....शायद आज यह शब्द ही बेमानी है जिसकी किसी को आवश्यकता ही नही ...
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