Tuesday, August 16, 2011

ये आंसू - सतीश सक्सेना

आजकल बहिन भाई का नैसर्गिक प्यार भी, दिखावे का बन कर रह गया है ! आजकल पुरुषों में संवेदनशीलता का लगभग अभाव सा हो गया है जिसमें अपनी बहन के प्रति ममत्व और करुणा कहीं नज़र नहीं आती ! 

अक्सर संवेदनशील बहिन मायके को याद करते, मुंह छिपा कर आंसूं पोंछते देखी जाती हैं ...! यह बेचारी किससे कहे और किसे दिखाए कि वह अपने भाई को कितना प्यार करती है ??

मा पलायनम पर डॉ मनोज मिश्र   ( डॉ अरविन्द मिश्र के छोटे भाई  हैं ) के हाल के लिखे लेख पर उक्त कमेन्ट देते समय मेरा अस्थिर सा हो गया सोंचा कि यह क्यों न आप सबसे चर्चा करूँ !

संवेदनशीलता और स्नेह की अवहेलना, समय के साथ हमें और समाज को बहुत महंगी पड़ेगी ! यह याद रहे कि जिस स्नेह  और अपनत्व का हम तिरस्कार कर रहे हैं वही एक दिन भूत बनकर हमारे सामने होगा,  कहीं ऐसा न हो घर में हमारा व्यवहार सावधानी से देख रहे , हमारे बच्चे, ब्याज समेत हमें लौटा दें और उस समय बहुत तकलीफ होगी ! 

हमारे जीवित रहते, माँ और बहिन की आँखों में आंसू नहीं छलकने  चाहिये  !

Friday, August 12, 2011

दिल तो बच्चा है जी ...-सतीश सक्सेना

मुझे याद है नवजवान दिनों में, ३५ -३७ साल के लोगों से बात करने का दिल भी नहीं करता था कि इन बुड्ढों से क्या बात करनी  ? ४० के दिनों में यही सोंच ५५ साला लोगों के लिए थी  और अब जब ५५ साल कब के गुजर गए जब भी पीछे देखता हूँ तो समझ नहीं आता कि समय इतनी जल्दी कैसे गुज़र सकता है ! सब कुछ कल का ही लगता है ! 
two sisters !

आज जब इस भरी पूरी उम्र में , अपने आपको देखता हूँ तो लगता है कि दिन तो अब शुरू हुए हैं ! कुछ भी तो नहीं बदला, न इच्छाएं कम हुईं और न हंसने और मस्त रहने की ललक , बल्कि जो अब तक नहीं कर सका उसे करने का मन करता है  ! जी करता है पंख लग जाएँ और दुनियां के उन सुदूर क्षेत्रों में जाकर लोगों से कहूं, जहाँ कोई न पंहुचा हो कि चलो .....उड़ते हैं ! 

मगर सुनता आया हूँ कि घर के मुखिया को ( बुड्ढों को ),ढंग से रहना चाहिए, इस उम्र में टीशर्ट नहीं चलेगी , बेड रूम से  बाहर निकलना, ढंग से चाहिए, निकर टीशर्ट बदलो और कुरता पायजामा पहन लो, लोग पता नहीं क्या सोंचेंगे  :-)

हमारी आदतें हैं कि टीशर्ट कारगो पहनकर आज एक महत्वपूर्ण मीटिंग में चले गये ! लोगों का विचार है कि जिम्मेवारी के काम शर्ट पैंट पहन कर ही हो सकते हैं ! बाकी के कपडे घर के लिए अथवा कम उम्र के लोगों के लिए हैं !     

Gaurav with kawasaki
बेटे की इच्छा है कि स्पोर्ट्स मोटर सायकिल खरीदने की , उनका कहना है आप मेरी कार ले लीजिये मुझे एक बाइक चाहिए  ! अब मेरी परमीशन की शर्त यह है बाप बेटा आधा आधा महीना रखेंगे , मुझे भी अपनी निकलती हुई तोंद की चिंता है ...कार में बैठकर तो घटने से रही ! मगर मेरी मांग देख मेरे बेटे ने फिलहाल अपनी इच्छा स्थगित करदी है !


Gaurav 
मेरा यह मानना है कि अगर हम छोटे बच्चों से हँसना और हँसाना सीख लें तो कुछ समय में ही परिवर्तन महसूस किया जा सकता है ! विद्वता का लबादा ओढ़े , चेहरे को गंभीर बनाकर बात करते हुए,लोगों को देख, मुझे हंसी आ जाती  है ! हम लोग सामान्य क्यों नहीं हो सकते ? हर आने वाले का स्वागत, बच्चों जैसी मुस्कान के साथ क्यों नहीं कर सकते !   


आजकल सुबह ६ बजे स्वीमिंग, करने पिछले दो महीने से जाना शुरू किया है और शाम को बेटी के साथ प्ले स्टेशन पर मूव लेकर  टेबल टेनिस और तीरंदाजी करता हूँ ! लगता है १० साल उम्र घट गयी है ....

Tuesday, August 9, 2011

बूढ़ा वट वृक्ष -सतीश सक्सेना

मित्रो,
मॉल  में घूमते हुए, आपका ध्यान, मैं  बाहर खड़े, सूखते वट वृक्ष और जीर्ण कुएं की ओर दिलाना चाहता हूँ जो इस विशाल एयर कंडीशंड बिल्डिंग बनने से पहले, आपके लिए छाया और पानी देने का एकमात्र स्थान था  ! याद करें, हमारे बचपन में, शीतल पानी और छाया केवल वहीँ मिलती थी  ! 
आजकल  वहां कोई नहीं जाता   !

क्या कभी आपने  कमजोर होते, माता पिता के बारे में सोंचने  की  जहमत उठाई है कि इस उम्र में, बिना आपके, वे अपना सही इलाज़ कैसे कर पा रहे होंगे ! 

क्या आपने सोचा है कि  उनके  जैसे , कमजोर असहायों वृद्धों  को, अस्पताल, जिनका उद्देश्य मात्र पैसे कमाना है, तक पंहुचना, कितना तकलीफदेह और भयावह होता होगा  !

                              बीमार हालत में, दयनीय आँखों से, डाक्टर को ताकते , ये वही हैं, जिनकी गोद में आप सुरक्षित रहते हुए, विशाल वृक्ष बन चुके हो और ये लोग, उस ताकतवर वृक्ष से दूर ,निस्सहाय, गलती हुई जड़ मात्र , जिन्हें बचाने वाला कोई नहीं !
मात्र आपकी निकटता से, यह अपने आखिरी समय में, सुरक्षित महसूस करेंगे !
इस समय इन्हें आपकी आवश्यकता है ......

अंतिम समय में इन्हें सम्मान के साथ विदा करें  जो इनका हक़ है यकीन मानें, आपके पास बैठने मात्र से, यह शांति से अपनी ऑंखें बंद कर लेंगे !

                                 खैर ! अच्छे वैभवयुक्त जीवन के लिए, आपको हार्दिक शुभकामनाएं ! 

Friday, August 5, 2011

उन्मुक्त हंसी -सतीश सक्सेना

            सुबह सुबह टहलने जाते  समय , अक्सर पार्क में ठहाका लगते अधेड़ उम्र के लोग मिलते हैं , उनके साथ खड़े होकर, हास्यास्पद और बनावटी हंसी, हँसते देखने पर,  यकीन मानिए आपकी हंसी छूट जायेगी  कि क्या हँसी है यह भी  ??
             हँसते समय शारीरिक व्यायाम के साथ साथ, रक्त में ओक्सिजन का बेहतर संचार और मांसपेशियों में खिंचाव बेहतर तरीके से होता है ! हाँ जबरन हँसी के साथ , मानसिक संतुष्टि शायद ही कभी महसूस कर पायेंगे ! सामूहिक हंसी से, हंसने की आदत पड़ने में अवश्य सहायता मिलती है अतः जो लोग हंसना भूल चुके हों उन्हें इस प्रकार के लाफिंग क्लास अवश्य ज्वाइन करने चाहिए !  
            मुझे लगता है कि उन्मुक्त होकर हँसने के लिए सबसे पहले, एक निर्मल और चिंतामुक्त मन चाहिए ! अगर आपने  कभी बच्चों की हंसी, का दिल से आनंद लेना हो तो खिलखिलाते वक्त उनकी आँखों में झाँक कर देखें, उनमें आपके प्रति प्रगाढ़ विश्वास और प्यार भरा होगा  ! यही  है असली हंसी..... इस हंसी से आपका तनाव दूर भाग जाएगा और ब्लड प्रेशर कभी पास नहीं आएगा ! मनीषियों ने, इसी हँसी को सेहत के लिए आवश्यक बताया है ! 
खेद है, कि हम लोग  हँसी का अर्थ जाने बिना,हंसने का प्रयत्न करते हैं , आइये स्वाभविक रूप में हंसने के लिए बच्चों के साथ कुछ देर खेलते हैं ! 

Sunday, July 31, 2011

हिंदी ब्लोगिंग में स्नेह और प्यार -सतीश सक्सेना

डॉ टी एस दराल ने एक पोस्ट लिखी जिसमें चार ब्लागर साथियों  के द्वारा एक साथ बैठकर किये गए भोजन का जिक्र था , जिसमें आत्मीयता की एक गहरी झलक दिखती थी ! डॉ अरविन्द मिश्र के दिल्ली आगमन पर डॉ दराल साहब की तरफ से दिए गए, इस भोज पर वीरू भाई भी उपस्थित थे यकीनन चार ब्लागरों  का यह मिलन, नायाब ही था मगर इसने मुझे अन्य कई ब्लोगर भोजों की याद दिलाई और यकीन करें, किसी में भी गर्मजोशी की कमी नहीं पायी गयी !
दिल्ली में मुझे ब्लोगर मीटिंग का पहला मौका, अजय कुमार झा के जरिये मिला था जब उन्होंने एक खुला आमंत्रण देकर हम लोगों को एक जगह इकट्ठा करने का प्रयत्न किया था और लगभग  ४ घंटे चले इस  सम्मलेन  में ब्लागिंग की असीमित क्षमताओं पर अच्छा विमर्श किया गया !
इसमें शिरकत करने वालों में, इंग्लॅण्ड से डॉ कविता वाचक्नवी एवं जर्मनी से राज भाटिया ,  पंडित डी.के.शर्मा "वत्स" , खुशदीप सहगल , डॉ टी एस दराल आदि लोग मौजूद थे ! 

ब्लागर मीटिंग्स के नाम के साथ  अविनाश वाचस्पति का नाम  अवश्य जुड़ता है, सब लोगों को जोड़ने का उनका उत्साह, नवोदितों के लिए ,हिंदी ब्लागिंग की शक्ति  को ,नए शिखर पर  पंहुचाने के  लिए बहुत हिम्मत देगा  !
आज भी नए लोगों से, मिलने की इच्छा होते हुए भीं, हर जगह पहल की कमी महसूस होती है ! इस प्रकार के सम्मलेन और मुलाकातें, निस्संदेह एक नवीन वातावरण के निर्माण में मदद देगी ! फलस्वरूप न केवल आपसी स्नेह बढेगा बल्कि आप अपनी शक्ति को भी बढ़ते हुए महसूस करेंगे !  मेरे अपने द्वारा, ब्लॉग जगत में रूचि बढ़ने का एक अच्छा कारण यह मुलाकातें रहीं जहाँ मैं प्रत्यक्ष रूप से, अपने पसंद के लेखकों को आमने सामने सुन सका  ! जिन लोगों  से मैं मिल चूका हूँ ,पहली मुलाकात में ही समीर लाल , रचना , अविनाश वाचस्पति ,रविन्द्र प्रभातखुशदीप सहगल , डॉ दराल ,ताऊ रामपुरिया, योगेन्द्र मौदगिल, सलिल वर्मा, अनूप शुक्ल, बी एस पाबला ,राज भाटिया, शाहनवाज़, निर्मला कपिला,ललित शर्मा ,रतन सिंह शेखावत,  अमरेन्द्र त्रिपाठी, दिनेश राय द्विवेदी,सुनीता शानू  स्मार्ट इंडियन ,राजीव तनेजा ,शहरोज़, दीपक बाबा, एवं डॉ अरविन्द मिश्र ने, अपनी  शख्शियत की , एक गहरी छाप छोड़ी !
 हिंदी लेखन क्षेत्र में , ब्लोगिंग की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता ! गूगल के द्वारा दिए गए प्लेटफार्म के जरिये हिंदी भाषा में जो काम, अब तक हो चुका है ,कुछ वर्ष पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ! जिन लोगों ने, सार्वजनिक मंच पर , अपनी अभिव्यक्ति लाने के बारे में कभी सोंचा भी नहीं होगा, वे अब ब्लोगिंग के जरिये अपने विचार न केवल धड़ल्ले से व्यक्त कर रहे हैं बल्कि खासे सफल भी हैं !
इसमें कोई संदेह नहीं कि जहाँ हम लोग, इस शानदार प्लेटफार्म के जरिये ,एकता के सूत्र में बंधने में कामयाबी मिलने की आशा कर रहे हैं वहीँ यहाँ कुछ लोग अपने कट्टर राजनीतिक, धार्मिक विचारों को भी स्वर देने का प्रयत्न कर रहे हैं ! अपरिमित सीमायें होने से, ब्लॉग जगत लगभग हर क्षेत्र में  ही अपना सफल योगदान कर रहा है !
ब्लाग जगत में, एक से एक विद्वान् कार्यरत हैं , जिन्हें पढना ही सौभाग्य माना जाता है, मगर अक्सर वे भिन्न विचार धाराओं से जुड़े रहने के कारण एक साथ नहीं बैठ पाते ! विभिन्न राजनैतिक पार्टियों , समाजों और धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले मनीषी, अगर एक स्थान पर जुड़ सकें तो विद्वानों का कुम्भ होने का सपना पूरा हो सकता है ! 


पिछले कुछ दिनों से यह देखा जा रहा है कि ब्लोगिंग में पहले से कार्यरत लोगों की दिलचस्पी कुछ कम हुई है !  इस सम्बन्ध में खुशदीप सहगल का एक लेख आया था जिसमें इस प्रवृत्ति की और चिंता प्रकट की गयी थी ! मुझे लगता है देर सबेर यह संक्रमण काल भी गुजर जाएगा यदि हम लोग लेखन गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखें  !
हजारों तरह के लोग , यहाँ अपनी अपनी समझ के अनुसार लिख रहे हैं  , स्वाभाविक है कि जिस  क्वालिटी की मानसिकता होगी, लेख में उसी समझ की झलक नज़र आएगी  ! पाठकों की वाह -वाह करती टिप्पणियों की बेपनाह शक्ति, यहाँ मूर्ख को विद्वान् और विद्वान् को नासमझ बनाने में समर्थ है ! अतः पाठकों को टिप्पणी अस्त्र का प्रयोग सोंच समझ कर  करना होगा !जहाँ एक  ओर  नए ब्लोगर को मिली टिप्पणी, उसमें नवजीवन संचार कर, बेहतर लेखन की प्रेरणा देती हैं वही टिप्पणी, किसी स्वच्छ चादर में लिपटे धूर्त को, रावण बनाने में समर्थ है ! प्रोत्साहन का दुरुपयोग और सदुपयोग यहाँ बखूबी महसूस होता है !     
आवश्यकता है केवल एक सकारात्मक सोंच और उत्साह की जिसके प्रभाव से नकारात्मक   शक्तियों का ह्रास हो और बेहतर लोग समाज और देश के शुभ निर्माण में लगें !
आप सबको विनम्र शुभकामनायें !

Monday, July 25, 2011

गर्व ,शक्ति शाली होने का - सतीश सक्सेना

"हमारा मीडिया ऐसा कुछ क्यूं नही दिखाता कि देश के लोगों का मनोबल बढे । " 
पिछली पोस्ट पर आशा जोगलेकर   के यह कमेन्ट पढ़कर मन में आया कि क्यों न अपने देश के बारे में कुछ लिखा जाए जिसे मीडिया ने नज़रन्दाज़ किया हुआ है !

क्या आप जानते हैं कि .....

-संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा देश सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता का प्रथम एवं सम्मानित दावेदार है इसकी स्थायी  सदस्यता  के साथ ही हम आधिकारिक तौर पर विश्व शक्ति मान लिए जायेंगे जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी भी प्रस्ताव पर, वीटो करने की शक्ति होगी  !

-ग्लोबल फायर पॉवर में हमारा देश  अमेरिका, रूस और चाइना के बाद चौथे नंबर पर आता है ! न्यूक्लियर कमांड अथोरिटी के साथ हमारा देश विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों में गिनती किया जाता है !

-कुल विदेशी मुद्रा एवं गोल्ड रिज़र्व में हम विश्व में, चाइना ,जापान , रूस , सउदी अरब , ताइवान और ब्राज़ील के बाद सातवे नंबर पर ( ३१६,८०१ मिलियन $ )खड़े हैं ! आश्चर्य है कि अमेरिका (१४०,६०७ मिलियन $) फ़्रांस और इंग्लॅण्ड जैसी विश्व शक्तियों के पास हमसे कम धन है ! :-)

-न्यूक्लियर पॉवर देशों को सबसे अधिक समस्या यूरेनियम सप्लाई की रहती है अभी हाल में आंध्र प्रदेश में  यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार पाया गया है ! यह अब तक विश्व में पाए गए भंडारों में सबसे बड़ा है ! जानकारी के लिए यह बताना आवश्यक होगा कि इस मूल्यवान और दुर्लभ धातु का उपयोग विद्युत् उत्पादन तथा न्यूक्लियर बम बनाने में किया जाता है  ! 


- विश्व में यूरेनियम की कमी और इसपर कंट्रोल के कारण , न्यूक्लियर पॉवर का बेहतर विकल्प थोरियम को माना जाता है और यह यूरेनियम के मुकाबले अधिक सुरक्षित है ! यह गर्व का विषय है कि विश्व में थोरियम के सबसे बड़े भण्डार भारत में पाए जाते हैं और थोरियम से बिजली पैदा करने का पहला रिएक्टर भी भारत में है ! इन भंडारों के होते हुए हमारे देश में, न केवल आने वाले समय में न्यूक्लियर फ्यूल की समस्या ख़त्म होगी बल्कि समय के साथ विश्व को मदद के लिए, हमारी आवश्यकता पड़ सकती है ! 


-भारत न्यूक्लियर हथियार रखने वाले ८ देशों में से एक राष्ट्र है जिन्होंने न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा रखने की पुष्टि कर दी है ! हमारे पास इन हथियारों के लिए एक मज़बूत डेलिवरी सिस्टम  है जो कि जमीन  पर  अग्नि और पृथ्वी मिसाइल से , हवा  से मार करने के लिए दसाल्ट  मिराज  २००० H, सुखोई एस यू -30 MKI तथा पानी में  न्यूक्लियर सबमैरीन  एवं आई एन एस विक्रमादित्य एंटी एयर क्राफ्ट कैरियर  के जरिये , विश्व  के किसी भी कोने में, मार करने की क्षमता रखता है ! यह वे सुविधाएँ हैं जिन्हें विश्व का कोई भी राष्ट्र ,अपनी सेना में शामिल होने पर गर्व कर सकता है !
शक्तिशाली भारत का एक नागरिक होने पर मुझे गर्व है !

Friday, July 22, 2011

अंतर्राष्ट्रीय सागर में शक्तिशाली भारतीय कदम -सतीश सक्सेना

सोमालियाई समुद्री डाकू ( गूगल से साभार )
"आई एन एस गोदावरी ने एक ग्रीक शिप को हाइजैक होने से बचाया ..." 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया  में  यह खबर पढ़ कर  मन को बड़ी तसल्ली हुई ! एक आम भारतीय के मन में आ सकता है कि यह विशाल भारतीय वार शिप, अदन की खाड़ी में, बदनाम सोमालियाई समुद्री डाकुओं के बीच में, क्या कर रहा है ? शायद बहुत कम लोगों को पता  होगा कि २००८ से ही भारतीय नौ सेना के कद्दावर वारशिप , समुद्री डाकुओं के खिलाफ वहां तैनात हैं ! केवल आई एन एस गोदावरी ने ही  लगभग दो माह में विभिन्न देशों के २१९ जहाजों  को इस खाड़ी से निकलने में अपना सुरक्षा कवर दिया है !

अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग के लिए सोमालिया से लगा हुआ समुद्री भाग इन पाइरेट्स के कारण एक भयावह रूट बनता जा रहा है, हालाँकि अन्तराष्ट्रीय समाज में विलेन जैसे लगते यह पाइरेट्स, वहा के लोकल हीरो भी माने जाते हैं, जो उनके हिसाब से, सोमालिया समुद्री सीमा में गन्दगी फैलाकर, मछली उद्योग को बर्बाद कर रहे इन विदेशी जहाज़ों को, सजा देने का काम कर रहे हैं  !

सोमालिया में सिविल वार की समाप्ति पर, वहां की रेगुलर सेना और कास्ट गार्ड बेरोजगार हैं और वे प्राइवेट सेना बनाकर , समुद्र सीमा रक्षा के नाम पर , आते जाते जहाज़ों से बसूली करने  और बदनाम सोमालियाई समुद्री डाकू बनकर खासे विश्व में कुख्यात हो चुके हैं ! यह सच है कि सोमालियाई सागर में , विदेशी जहाजों द्वारा, वहां से निकलते हुए . जहरीला कचरा फेंकने के कारण , वहां के , मछली उद्योग को बहुत नुकसान पंहुचा है , जिससे वहां के बेरोजगार लोग ,समुद्री डाको के द्वारा अपना जीवनयापन शुरू कर एक नया कुख्यात उद्योग विकसित कर चुके है ! 

बहरहाल इन लोगों के भय के कारण वहा से निकलने वाले जहाज और नाविक त्रस्त हैं ! भारतीय नेवी के आई एन एस तबार एवं आई एन एस गोदावरी , अंतर्राष्ट्रीय सागर में, न केवल भारतीयों के जान माल की रक्षा कर रहे हैं बल्कि कई अन्य देशों के जहाज़ों पर आक्रमण करते, इन समुद्री डाकुओं के जहाज़ों को डुबा कर, इन पाइरेट्स की कमर तोड़ने में, महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर ,विश्व में ,अपने देश का गौरव बढ़ा रहे हैं !

हमारे देश का यह गौरवशाली कदम, अन्तराष्ट्रीय जगत में सम्मान के साथ याद किया जायेगा !  

Sunday, July 17, 2011

टूटे घोंसले -सतीश सक्सेना

शालीमार गार्डन एक्सटेंशन -II में बन रही एक चार मंजिल इमारत अचानक गिर गयी , काम में लगे, लगभग २० मजदूर बुरी तरह घायल और ३ की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी ! इस चार मंजिला भवन में, धन कमाने के लिए, १२ एच आई जी  और ३६ एम आई जी फ्लैट  बनाये जा रहे थे !

आजकल एन सी आर में, प्रापर्टी में पैसा लगाने का मतलब, सोने का पेंड लगाना है ! २५० गज का एक प्लाट  खरीदकर उसमें ४ मंजिल भवन बना , लगभग ढाई करोड़ में बेंच सकते हैं ! अक्सर ऐसी जगह पर, प्लाट एक करोड़ का मिल जाता है और बनाने की कीमत में काफी फर्क है ! ख़राब और घटिया मैटरियल लगाकर किया गया निर्माण, अच्छी क्वालिटी के निर्माण से लगभग आधा होता है !इस प्रकार क्वालिटी से समझौता कर करोड़ों रुपये कमाए जा सकते हैं !
भवन निर्माण की गुणवत्ता पर कंट्रोल और देखरेख के लिए कोई नियम एवं रेगुलेशन नहीं हैं !आम आदमी, पूरी तौर पर, पैसों के इन व्यापारिओं पर निर्भर होता है !
इन भवनों के निर्माण में, ख़राब क्वालिटी के लोकल बने सीमेंट के साथ साथ, बहुत कम मात्रा में स्टील का उपयोग किया जाता है ! अंडरग्राउंड बिजली की घटिया वाइरिंग तथा ख़राब पानी के पाइप , चार साल भी ठीक से नहीं चल पाते ! खराब वायरिंग के कारण, ऐसी किसी भी आपदा के समय, इनमें आग लगने का खतरा बहुत अधिक है , और आग से बचाने का कोई भी सुरक्षा उपाय यहाँ नहीं किया जाता !
देहली हरिद्वार रिज़ पर बसा यह एरिया, सिज्मिक ज़ोन ४ में पड़ता है यहाँ ५ से ८ तीव्रता वाले अर्थ क्वेक आने की सम्भावना रहती है अतः दिल्ली और आसपास का एरिया, हाई रिस्क एरिया में माना जाता है !किसी संभावित प्राकृतिक डिजास्टर के समय, इस प्रकार के भवनों के होते, आपातकाल स्थिति आते देर नहीं लगेगी और जनहानि की संभावना बहुत अधिक होगी ! इस समस्या से निपटने के लिए तुरंत एक भवन रेगुलेशन एक्ट बनाया जाना चाहिए जिसमें चोरों और बेईमानों से निपटने के लिए बेहद कड़े प्रावधान हों !
एन सी आर के ऐसे रिहाईशी इलाकों पर जाकर देखें तो हर तरफ जीर्ण शीर्ण मकानों का जंगल खड़ा दिखेगा जिनमें हँसते खेलते हुए निर्दोष ,असहाय परिवार दिखाई पड़ेंगे ! इस प्रकार बनाई गयी कालोनियां एवं भवन , ७ रेक्टर स्केल पर आये भूकम्प को कैसे सह पाएंगी , यह सोंचकर दहल जाता हूं मैं !

Monday, June 27, 2011

परिवार में विषबेल बोते हम लोग - सतीश सक्सेना

मानव कुल में रहते हम लोग, शायद अपने सांस्कृतिक पारिवारिक गुणों को भूलते जा रहे हैं ! पीढ़ियों से चलता आया परस्पर पारिवारिक स्नेह, आज न  केवल  दुर्लभ नज़र आता है , बल्कि  एक चालाकी और चतुरता का भाव अवश्य सब जगह नज़र आता है , जिसके चलते हम लोग एक दूसरे के प्यार पर शक करते हुए भी, साथ रहने को बाध्य होते हैं !

पारिवारिक व्यवस्था में सबसे पहले बहू का स्थान आता है , यह नवोदित लड़की, आने वाले समय में इस घर की मालकिन होगी इस तथ्य को लोग कभी याद ही नहीं करना चाहते न कोई उसे यह अहसास दिलाता  है कि वह घर में प्रथम सदस्य का दर्ज़ा महसूस कर सके ! छोटे छोटे फैसले लेते समय भी, वह बच्ची अपनी सास अथवा पति के मुँह देखने को मजबूर रहती है और अक्सर परिवार के लोग इस बात पर खुश होते हैं कि बहू आज्ञाकारी मिली है ! शुरुआत के दिनों में, अपने ही घर में कोई निर्णय न ले सकने की, उस घुटन का अहसास, करने का कोई प्रयत्न नहीं करता ! समय के साथ ,अपने मन को अभिव्यक्त न कर पाने की तड़प, न चाहते हुए भी उस बच्ची को इस नए परिवार से दूरी बनाये रखने को, पर्याप्त आधार देने के लिए, काफी होती है  ! 

इस प्रकार एक अनचाहा  कड़वा बीज, घर के आँगन में कब लग गया, कोई नहीं जान पाता और हम लोग समय समय पर, अनजाने में, इसे खाद पानी और देते रहते हैं !

जहाँ तक माँ बाप का सवाल है वे अपनी ही असुरक्षा में घिरे रहते हैं ! अपनी ही औलाद से, अपनी जीवन भर की कमाई को, पढ़ाई लिखाई और बच्चों की परिवरिश पर खर्च हो चुकी, बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! उन्हें अक्सर यह लगता है कि बच्चों ने अगर बुढापे में मदद न की तो क्या होगा ? अतः अपनी शेष जमापूंजी आदि बच्चों की नज़र से दूर ही रखा जाए तभी अच्छा होगा ! उनकी यह समझ और झूठ , बच्चों को पता लगते अधिक देर नहीं लगती ! अपने ही बड़ों द्वारा, उन पर विश्वास न किये जाने पर, रिश्तों में ठहराव और एक बड़ी दरार आना स्वाभाविक हो जाता है ! 

अक्सर  अपनी असुरक्षा की भावना लिए, बड़ों की यह बेईमानी, उस परिवार में अपनों के प्रति शक के माहौल को पैदा करने में, बड़ी भूमिका निभाती है एवं अनजाने में एक भयंकर विष बीज और रोप दिया जाता है ! जहाँ ममता, स्नेह और सुनहरे भविष्य का मज़बूत आधार, परस्पर मिलकर तैयार किया जाना चाहिए वहीँ शक और शिकायतों का एक मजबूत आधार बन जाता है !   

मुझे याद आता है ,मेरे एक सीधे साधे साथी के रिटायरमेंट पार्टी पर, उनकी पत्नी तथा बच्चों ने मुझसे आखिरी चेक की रकम फुसफुसाते हुए जाननी चाही  और साथ ही यह भी कि उनके पति, को इस बारे में न बताया जाए , तो मैं  निशब्द रह गया !


पुत्री सबसे अधिक अपने परिवार से जुडी होती है ! कुछ समय बाद अपने घर से दूर हो जाने का भय उसे अपने परिवार के प्रति और भी भावुक बना देता है ! अनजाने में सबसे अधिक अन्याय इसी के साथ किया जाता है, अपने घर में भी और नए घर में भी ! अफ़सोस है कि उसकी माँ भी उसे यह अहसास दिलाने में आगे रहती है कि यह घर उसके भाई का है जबकि अधिकतर लड़कियां अपने भाई के लिए कुछ भी देने के लिए तैयार रहती हैं ! अगर भावनात्मक तौर पर ही भाई और माँ उसे स्नेह का विश्वास दिला दें तो शायद ही कोई लड़की अपने आपको अकेला महसूस करे  !


हर भाई को अपनी बहिन से स्नेह चाहिए मगर हर बार हम भूल जाते हैं कि परिवार वृक्ष  की यह सबसे सुन्दर टहनी ही सबसे कमजोर होती है और वह जीवन भर अपने पिता और भाई से प्यार की आशा लगाए रहती है ! और हम ...??
आइये, पूंछे अपने दिल से   !


( यह लेख दैनिक जागरण में दैनिक जागरण में ७ जुलाई २०११ को छपा है )

Monday, June 20, 2011

काश ऐसे लोग न मिलते .....

भौतिक सुविधाओं के हम किस कदर गुलाम हैं कि शायद कभी सोंचते ही नहीं कि अभी कितनी साँसे और बाकी है  ?? बस याद रहता है कि मरते मरते भी कुछ सुविधाएँ और लूट लें  और यह साधन जुटाने के लिए जितना गिरना पड़े .....गिरने को तैयार रहते हैं ! 
...एक पल भी नहीं सोंचते हैं कि कोई है  जो हमें देख रहा है  !
...एक पल भी नहीं सोंचते कि उसके दरवार में माफ़ी नहीं 
...सजा यहीं मिलेगी  !!
काश ऐसे लोग न मिलते .....

Monday, June 6, 2011

लेखन अमर होता है - सतीश सक्सेना

                    ब्लॉग लेखन एक ऐसी क्रांति है, जिसकी कुछ वर्षों पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ! इस प्लेटफार्म के  आने से कितने ही प्रतिभाशाली लेखक, समाज में अपनी सफल उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हुए हैं ! हिंदी जगत को, जो आसान रास्ता गूगल ने, अपने बलबूते पर, आसानी से उपलब्ध करा दिया शायद यह  काम किसी भी व्यवस्था के लिए एक बेहद कठिन और दुष्कर रास्ता साबित होता ! कम से कम मैं गूगल  का आभारी हूँ कि इसके जरिये न केवल अपनी अभिव्यक्तियों को साकार कर सका अपितु बहुत सारे बेहतरीन लोगों के सामने, अपने आपको पेश कर सकने में भी कामयाब हुआ !

                 लेखन अमर होता है ! एक बार लिखे गए शब्द, सुदूर क्षेत्रों में भी आज आसानी से पढ़े जाने के लिए उपलब्द्ध हैं और कालांतर में, स्मृतियों में जीवित रहते हुए पीढ़ियों यात्रा करने में सक्षम हैं !पाठक समूह रूचि, बुद्धि  और परम्परा अनुसार अपने अपने अर्थ लगाकार इन्हें अपनी स्मृतियों में सहेजे रहते हैं !

                       किसी भी लेखक को ,अपने श्रद्धालु पाठक से अपार सम्मान पाना, कोई चौंकाने वाली  बात नहीं है और हमारे परिवेश में, जहाँ अक्षरों को विद्या मानते हुए पूजा जाता है वहां लेखक को मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार करना कोई असाधारण बात नहीं है ! अधिकतर साधारण मगर बेईमान लेखक अपने पाठकों की श्रद्धा की बदौलत , आसमान  को शिक्षा देते देखे जाते हैं ! अफ़सोस है कि प्रभावित श्रद्धालु , अपनी निश्छल श्रद्धा के कारण, अपने परिवार तक को हमेशा के लिए , इन चालाक शिकारियों का शिष्य बना देता है ! इस समय देश में ऐसे गुरुओं की कोई कमी नहीं है !
     
                  देश और समाज के प्रति प्रतिबद्धता को याद रखते हुए लिखे गए ईमानदार लेखन का लोग सम्मान करते हैं, यदि इस प्रकार के लेखन में व्यक्तिगत राजनैतिक प्रतिबद्धता को अलग रखा जाये , तो लेखक के  विचार, पाठकों के ह्रदय को छू लेने में, अक्सर कामयाब होते हैं !

                   समाज के लिए अहितकर एवं खराब लिखते समय हमें याद रखना चाहिए कि हमारे यह लेख, एक दिन हमारे बच्चे और परिवार जन भी पढेंगे  और तात्कालिक जोश में लिखे गए, कुछ लेख ही, हमारे व्यक्तित्व  का विस्तृत परिचय देने के लिए काफी होते हैं  !

आइये इसी परिप्रेक्ष्य में पंकज उधास की एक ग़ज़ल सुने , विडियो यू टयूब  से  साभार !
तुझे देखकर सब मुझे जान लेंगे .... 

अनुरोध  : आपके आने का आभार ...आगे से, मेरे गीत पर कमेन्ट न करने का अनुरोध है , आशा है मान रखेंगे  !   

Saturday, June 4, 2011

वे आँखें - सतीश सक्सेना

यह दर्द उठा क्यों दिल से है 
यह याद कहाँ की आई है  !
लगता है कोई चुपके से 
दस्तक दे रहा चेतना की 
वे भूले दिन बिसरी यादें ,
क्यों मुझे चुभें शूलों जैसी ! 
लगता कोई अपराध मुझे, है याद दिलाये करमों की !

रजनीगंधा सी सुन्दरता 
फूलों की गंध  उठे  ऐसे 
उन भूली बिसरी यादों से 
ये गीत सजे अरमानों के 
मैं कभी सोचता  क्यों मुझको,
संतोष,  नहीं है जीवन में  !
यह क्यों उठती अतृप्त भूख, सूनापन सा इस जीवन में !

लगता है, जैसे इंगित कर 
है ,मुझको याद करे कोई !
लगता ,कोई हर समय मेरी 
भूलों पर , रोता है   जैसे  !
वे कोई भरी भरी आँखें , 
यादों से जुड़ी हुई ऐसे  !
दिल में कैसा भी दर्द उठे, सम्मुख जीवित होती आँखें !  


Wednesday, May 25, 2011

अगर हम न होंगे तो फिर कौन होगा -सतीश सक्सेना

गुडिया के साथ 
         पिछले सप्ताह मेरे एक मित्र वी के गुप्ता का फोन आया कि उनके किसी मित्र का एस्कोर्ट हॉस्पिटल में ऑपरेशन है और उन्हें खून चाहिए चूंकि आप नियमित खूनदाता हैं, आपसे खून मिलने की उम्मीद है ! मुझे पिछला खून दिए ३ माह हो चुके थे,अतः  मैंने उन्हें तुरंत पंहुचने का आश्वासन दिया और साथ में अनुरोध किया कि वे खुद भी खून दें ! जब मैंने हॉस्पिटल पंहुचकर,झिझकते और अपनी उम्र,बीमारियाँ बताते लोगों के बीच,हँसते हुए खून देने में पहल की तो विनोद गुप्ता एवं अन्य साथी भी तैयार हो गए !उनको बहुत सारी  भ्रांतियां थीं और झिझक टूटने के साथ, वे अपने आपको हल्का भी महसूस कर रहे थे !

         घर पर पंहुचा तो अन्य परिजन कहने लगे अब इस उम्र(५६ वर्ष +) में खून नहीं देना चाहिए ! मेरा एक प्रश्न था कि तुममें से, किसी ने स्वेच्छा से खून देने की हिम्मत की है अगर नहीं, तो यही स्थिति बाहर, पास पड़ोस में सबकी है ! अगर एक आदमी मदद करने में पहल करे तो और लोग भी घर से निकल पड़ते हैं ! मदद देने वाले बहुत हैं, कमी यहाँ सिर्फ पहल करने वाले की है ! 

          एक दिन हमें भी किसी की जरूरत पड़ सकती है और किसी को मदद के लिए आगे आना पड़ेगा सो यहाँ मैंने पहल करने की कोशिश की थी और सफल रहा ! आज जो घबराए हुए लोग हॉस्पिटल में मेरे साथ थे, वे मेरे द्वारा, हँसते हुए रक्त देने ,को आसानी से भुला नहीं पायेंगे और यही मेरा ध्येय था, जो  पूरा हुआ ! 

         आखिरी दिन से पहले, अगर हम किसी जरूरतमंद के काम आ सकें तो मानव जीवन सफल लगता है अन्यथा विश्व में और जीव भी रहते हैं !लोग हमारा नाम अवश्य याद रखेंगे बशर्ते किसी के काम आते समय, दिखावा और तारीफ की चाह  नहीं होनी चाहिए !

         हमारे मरने की खबर सुनकर, अगर कुछ लोग रो पड़ें तो जीवन सार्थक होगया, समझ लें  !

Wednesday, May 18, 2011

सारी रात जागती होगी ? - सतीश सक्सेना

आज बरसों बाद अपनी जननी को, जिसका चेहरा भी मुझे याद नहीं, खूब याद किया ...और बिलकुल अकेले में याद किया, जहाँ हम माँ बेटा दो ही थे, बंद कमरे में ....
भगवान् से कहा कि मुझ से सब कुछ ले ले... पर माँ का चेहरा केवल एक बार दिखा भर दे...बस एक बार उन्हें प्यार करने का दिल करता है, केवल एक बार ...कैसी होती है माँ ...?? मुझे बदकिस्मत को मां का चेहरा भी नहीं मालूम , कैसी थीं वे ?

कई बार, रातों में, उठकर
दूध गरम कर लाती होगी 
मुझे खिलाने की चिंता में 
खुद भूखी रह जाती होगी
मेरी  तकलीफों  में अम्मा !  
सारी रात जागती होगी   !
बरसों मन्नत मांग गरीबों को, भोजन करवाती होंगी !

सुबह सबेरे बड़े जतन से
वे मुझको नहलाती होंगी
नज़र न लग जाए, बेटे को
काला तिलक, लगाती होंगी
चूड़ी ,कंगन और सहेली,
उनको कहाँ लुभाती होंगी ?
बड़ी बड़ी आँखों की पलके, मुझको ही सहलाती होंगी !

सबसे  सुंदर चेहरे वाली ,
घर में रौनक लाती होगी 
बरसों बाद, गोद में पाकर 
बेटे को, इठलाती होंगी ! 
दूध मलीदा खिला के मुझको,
स्वयं तृप्त हो जाती होंगी !
अन्नपूर्णा , नज़रें भर भर, रोज  न्योछावर होतीं होंगी  !

रात रात भर सो गीले में ,
मुझको गले लगाती होगी
अपनी अंतिम बीमारी में ,
मुझको लेकर चिंतित होंगी  
बेटा कैसे जी पायेगा ,
वे निश्चित ही, रोई होंगी !
सबको प्यार बांटने वाली, अपना कष्ट छिपाती होंगी !

अपनी बीमारी में, चिंता 
सिर्फ लाडले ,की ही होगी !
गहन कष्ट में भी, वे ऑंखें ,
मेरे कारण व्याकुल होंगी !
अपने अंत समय में अम्मा ,
मुझको गले लगाये होंगी !
मेरे नन्हें हाथ पकड़ कर, फफक फफक कर रोई होंगी !

Monday, May 16, 2011

साँसे हैं कितनी पास, हमें खुद पता नहीं - सतीश सक्सेना


क्यों लोग द्वेष पालते 
हैं , गैर के लिए  !
साँसे हैं, कितनी पास  
हमें खुद , पता नहीं ?
जीवन में कई मोड़ , 
बड़े खतरनाक है !
रास्ता कहाँ जायेगा, किसी को  पता नहीं !

आँखों में बाँध पट्टियां 
गाड़ी चला रहे   !
टकरायेंगे , कहाँ पर ?
हमें खुद पता  नहीं !
जब तक जियेंगे, 

हम भी, जलाये रहें दिया !
कब आसमान रो पड़े , हमको पता नहीं   !

चोटों को भुलाकर तेरे  
हम , साथ चल दिए  !
इस बार क्या करोगे ?
तुम्हें भी , पता नहीं   !
इक जिंदगी काफी नहीं , 
जो  आग  बुझ सके  !
सौ बार जनम लेंगे  ?  यह  हमको,  पता  नहीं  !

ताकत अभी बाकी है
इस बांके शरीर में  !
कितने ही घाव लग 
चुके,हमको पता नहीं !
मासूमियत पर लोग 

तरस खा रहे , यहाँ
कैसे चला था  तीर ? तुम्हे ही पता नहीं !

लोगों का क्या है रस्म 
निभाकर निकल पड़े !
मौत आएगी मिलन
को,हमें ही पता नहीं !
कब जायेंगे घर छोड़ कर, 
सोंचा नहीं सनम ,
मरने का समय तय है, पर हमको पता नहीं !

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