Tuesday, September 24, 2013

आधी रात को,जलसा होगा,दावत भूत पिशाचों की -सतीश सक्सेना

हमको बेपर्दा करने, कुछ लोग  द्वार पर  आये हैं !
जोश में अपने ही दरवाजे,खुले छोड़ कर आये हैं !

जाने कितने पुण्य किये थे , सुबह सवेरे उठते ही,
लगता जैसे  राह भूल के , नारायण घर आये हैं !

पता हमें भी , जाने वाले , वापस कभी  न आयेंगे !
हँसी ख़ुशी के भी मौके पर,आंसू क्यों भर आये हैं !

देर रात को,जलसा होगा,दावत भूत पिशाचों की !
बड़े दिनों के बाद आज,इस जंगल में,नर आये हैं !

आज रात को झूमझूम के ,माँ की महिमा गायेंगे !
रात्रि जागरण, चन्दा लेने,घर में ऋषिवर आये हैं !

Thursday, September 19, 2013

श्वेत दुशाला,सुंदर पगड़ी,पर होते बलिहारी लोग -सतीश सक्सेना

निपट जाहिलों को भरमाते
अज्ञानी  को मूर्ख बनाते !
पैसे दे दे कर लोगों से ,
अपनी तारीफें , करवाते !

घरों में बैठे, सीधे साधे ,
सम्मोहित हो जाते लोग !
श्वेत दुशाला, सुंदर पगड़ी, पर होते बलिहारी लोग !


भोली जनता इज्ज़त देती 
वेश देख , बनवासी को !
घर में लाकर उन्हें सुलाए
भोजन दे , सन्यासी  को !
अलख निरंजन गायें, डोलें,

मुफ्त की खाएं डाकू लोग !
पाखंडी को, गुरू मान कर , पैर दबाएं मूरख लोग !

अनपढ़,अज्ञानी दुनियां में 
गुरु ढूँढने, घर से निकले !
वेद, पुराणों में लिखा है
गुरु ही तेरे , कष्ट मिटायें !
टीवी पर जयकार धूर्त की,

खुश हो जाते भोले लोग !
सौम्य समाज, प्रदूषित करके, पैसा खूब बनाते लोग !


पहले चोर, उचक्के, डाकू,
जंगल गुफा, ढूंढने जाते ! 
बाल बढाये,राख लगाए  
जैसे तैसे,शकल छिपाते !
असली संत ठगे से बैठे , 
नकली प्रवचन सुनते लोग !
गंदे चरणामृत को पीकर , जीवन सफल बनाएं लोग !

Tuesday, September 17, 2013

बाहर जाकर करो रोशनी ,लोग ढूंढते फिरते हैं -सतीश सक्सेना


बाबा,ज्ञानी,संत,साध्वी, कितने पावन दिखते हैं !
फिर भी देसी अख़बारों में इनके किस्से छपते हैं !

चूहों से घबरा के हमने,घर में ज़हरी पाल लिया !
तब से, कट्टर बैरी हमसे , कुछ हमदर्दी रखते हैं !

आब ऐ आफताब को लेकर,घर में काहे बैठे हो !
बाहर जाकर करो रोशनी , लोग ढूंढते फिरते हैं !


ताले, दीवारें, दरवाजे, क्या कुछ भी कर पायेंगे !
घर के रखवाले ही कैसे, बदले बदले लगते हैं !


धनुषवाण ले राम के फोटो,दीख रहे चौराहों पे      
तब से, सारे बस्ती वाले ,आशंकित से रहते हैं !

Sunday, September 15, 2013

नमःशिवाय उच्चारण करते, मैं भी धन्य,हो गयी होती - सतीश सक्सेना

एक खतरनाक सा सपना,जो आज रात देखा , ज्यों का त्यों लिपिबद्ध कर दिया  : यह रचना व्यंग्य नहीं है केवल हास्य है , अधिक समझदार लोग, अधिक अर्थ न तलाश करें... 

बरसों  बीते , साथ तुम्हारे ,
खर्राटों में , जगते, जगते !
मोटी तोंद , पसीना टपके ,
भाग्य कोसते, पंखा झलते
पता नहीं ,फूटी किस्मत पर, 
प्रभु तेरी कुछ, दया न होती !
कितनों के पति बहे बाढ़ में, मैं भी तो, खुशकिस्मत होती !

सासू  लेकर, चारधाम  की 

यात्रा तुमको, याद न आई  !
कितने लोग तर गए जाकर
क्यों भोले की, याद न आई !  
काश उत्तराखंड की साजन,
तुमको टिकट मिल गयी होती !
नमःशिवाय उच्चारण करते, मैं भी धन्य, हो गयी होती  !

जिस दिन सूनामी आई थी 
तब तुम बाहर नहीं गए थे 
कितने लोग मरे थे बाहर 
तुम खर्राटों  में, सोये थे  !  
काश सुनामी में ,यह बॉडी, 
लहर में गोते, लेती होती  !
शोक संदेशा आस लगाए, मैं भी खूब, बिलखती  होती !

कब तक करवा चौथ रखूंगी 

सज धज कर, गौरी पूजूँगी ,
सास के पैर, पति की पूजा 
कब तक मैं, इनको झेलूंगी 
कब से जलती, आग ह्रदय में ,
कभी तो छाती ठंडी होती !
सनम जल गए होते उस दिन, काश दिए में, बाती होती !

अब तो जाओ, जान छोड़कर

कब तक भार उठाये, धरती 
फंड, पेंशन, एफडी, लॉकर ,
बाद में लेकर मैं क्या करती 
अगर मर गए, होते अब तक,
साजन रोज आरती होती !
कसम नाथ की, मैं जीवन भर, तुम्हे याद कर रोती होती !

( कृपया इसमें गंभीरता न खोजें न अन्यथा अर्थ लगायें , यह व्यंग्य नहीं है विशुद्ध हास्य है इसे उसी स्वरुप में पढ़ें !  जिन्हें हंसना नहीं आता, वे क्षमा करें  )

Saturday, September 14, 2013

वह कौन सी फिरदौस थी,जिसने हमें चाहा नहीं ! -सतीश सक्सेना

कुछ घर सरीखे हैं यहाँ, जिनमें कोई चूल्हा नहीं, 
इंसान ही कहते इन्हें , रोने को भी कन्धा नहीं ! 

देखा जिसे भी प्यार से, इकरार ही हमको मिला !
वह कौन सी फिरदौस थी, जिसने हमें चाहा नहीं !
  

हमने जीवन में कभी, कुछ भी, कहीं माँगा नहीं !
वह कौन साझी दार था, जिसने हमें समझा नहीं !

कुछ दिन गुज़ारे थे यहीं , नरभक्षियों के गाँव में

शायद ही कोई था बचा जिसने हमें खाया नहीं !

इक दरिंदे ने आंत खींची थी, तड़पते ख्वाब की 
ये कौन सा इंसान था, जिसने ज़िबह देखा नहीं !

Thursday, September 12, 2013

आसानी से क्यों होते हैं, मौत के चरचे दुनियां में -सतीश सक्सेना

ऐसा करें कि हाथ पकड़ना सीखें बच्चे दुनिया में ! 
रामू चाचा ,रहमत काका, दोनों सच्चे दुनिया में !

क्यों भड़काते हैं बच्चों को, इनको तो जी लेने दें  !
आसानी से क्यों होते हैं, मौत के चर्चे दुनिया में !

मंदिर मस्जिद की दीवारों को,साधारण रहने दें  !  
अंत समय में,क्यों करते हो,ऐसे खर्चे दुनिया में !

चोर डाकुओं के गिरोह से , गांव सुरक्षित रहने दें 
सुना है,बन्दर बाँट रहे हैं,जीत के पर्चे ,दुनिया में !

ज़हरी बातें, नहीं सिखाएं, इन्हें प्यार से जीने दें  !
हमें पता है,स्वर्ग के दावे,कितने कच्चे दुनिया में !

Monday, September 9, 2013

नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे ! - सतीश सक्सेना !

गुडिया की विदाई के बाद , पहली बार उसका बचपन याद आ गया , फलस्वरूप कुछ पंक्तिया उसके बचपन की याद करते हुए ...
 मेरी गुड़िया अपनी गुड़िया के साथ 

अपने सीने पर, चिपकाकर, इन्हें सुलाया करते थे ! 
इनकी चमकीली आँखों में, हम खो जाया करते थे !

कोई जीव  न भूखा जाये , गुडिया के दरवाजे से !
कुत्ते, बिल्ली, और कबूतर, इन्हें लुभाया करते थे !

गले में झूलें हाथ डालकर, मीठी पुच्ची याद रही !
इनकी मीठी मनुहारों में ,हम खो जाया करते थे !

दफ्तर से आने पर  छिपतीं ,पापा  आकर  ढूंढेंगे !
पूरे घर में इन्हें ढूंढ कर, हम थक जाया करते थे !

पायल,चूड़ी ,लहंगा, टीका,बिंदी, मेंहदी विदा हुईं !
नन्हें पाँव, महावर, लाली, खूब हंसाया करते थे !


Saturday, September 7, 2013

अफगानों की छाती पे , ये निशान रहेंगे -सतीश सक्सेना

एक और बहादुर भारतीय लड़की ने, तालिबानों की जिद पर, अपनी कुर्बानी दे दी ,बंगाली बऊ  सुष्मिता बनर्जी  के खून के छींटों की याद में, कविता के चंद फूल समर्पित हैं ...

कुछ लोग यहाँ हैं , जो तुम्हें याद रखेंगे ! 
वह आग जो जला गयी,सुलगाये रखेंगे !

कातिल मनाएं जश्न,भले अपनी जीत का 
अफगानों की छाती पे , ये निशान  रहेंगे !

बंगाली बऊ  का यह हश्र ,उनकी जमीं पर 
रिश्तों की बुनावट पे, हम आघात  कहेंगे !

दुनियां से काबुली का ,भरोसा चला गया  !
वह मिट गयी पर सुष्मिता को याद करेंगे !

बामियान,सुष्मिता के नाम,अमिट हो गए 
ये ज़ुल्म ऐ तालिबान , लोग याद  रखेंगे  !

जब भी निशान ऐ खून, तुम्हे याद आयेंगे  
अफगानियों को  चैन  से , सोने नहीं देंगे !

Wednesday, September 4, 2013

अदब क़ायदा और सिखादें,शेख मोहल्ले वालों को ! -सतीश सक्सेना

सज़ा मिले मानवता का,उपहास बनाने वालों को,
कुछ तो शिक्षा मिले काश,कानून बनाने वालों को !

अरसे बाद, पड़ोसी दोनों , साथ में रहना सीखे हैं !
अदबक़ायदा और सिखा दें शेख,मोहल्ले वालों को !

अगर यकीं होता, मौलाना मरते भरी जवानी में ,
हूरें और शराब मिलेगी, ज़न्नत जाने वालों को !

सोना चांदी गिरवी रखकर, झोपड़ बस्ती सोयी है ,
धन चिंता में नींद न आये, अक्सर पैसे वालों को ! 

मैली बस्ती से कुछ हटकर, नगरी अलग बसाई है    
कंगालों से खौफ रहा है ,उजले कपडे वालों को !

बहुत ज़ल्द ही ढोंग, मिटाने जागेंगे ,दुनिया वाले,
खुला रास्ता देना होगा , जंग में  जाने वालों को !



Tuesday, September 3, 2013

एक चिरैया को, फंदे में पकड़ न पाए, शाम हो गयी -सतीश सक्सेना

जीवन की, अंतिम सीढ़ी पर,कैसे अपनी हार हो गयी !  
कुछ तो भूल हुई जीवन में, पूजा अस्वीकार हो गयी !

तुम तो कहते थे कि सत्य को आंच,झूठ को पाँव नहीं,
बेईमानी मठ वालों की  बापू , सरे बाजार हो गयी !

तुम तो कहते थे कि सभी की,चाल समझ में आती है !
यहाँ तो बाजी से पहले ही,इक प्यादे से ,मार हो गयी !

तुम तो कहते थे ,जीवन में ,बड़े  बड़ों को ठीक किया !
एक  चिरैया को , फंदे में पकड़ न पाए, खार हो गयी !

तुम्हीं बताते थे  , सन्यासी,ऋषि, मुनि पावन होते हैं !
कैसी गोपनीय गुरु दीक्षा , आज सरे बाज़ार हो गयी !

Thursday, August 29, 2013

हमने हाथ लगाकर देखा,ठंडक है, अंगारों में -सतीश सक्सेना

आज रहा मन उखड़ा उखड़ा,महलों के गलियारों में !
जी करता है यहाँ से निकलें,रहें कहीं  अंधियारों में ! 

कभी कभी अपने भी जाने क्यों, बेगाने लगते हैं ?
जाने क्यों आनंद न आये,शीतल सुखद बहारों में ! 

वे भी दिन थे जब चलने पर,धरती कांपा करती थी,

मगर आज वो जान न दिखती,बस्ती के सरदारों में !

भ्रष्टाचार मिटाने आये, आग सभी ने  उगली थी !
हमने हाथ लगा के देखा , ठंडक थी अंगारों में !

दबी दबी सी वे चीखें, अब साफ़ सुनाई देतीं हैं !

लोकतंत्र से आशा कम,पर ताकत है चीत्कारों में !

Monday, August 26, 2013

कौन किसे सम्मानित करता,खूब जानते मेरे गीत -सतीश सक्सेना

अक्सर अपने ही कामों से 
हम अपनी पहचान कराते 
नस्लें अपने खानदान की 
आते जाते खुद कह जाते ! 
चेहरे पर मुस्कान, ह्रदय से 
गाली देते ,अक्सर मीत !
कौन किसे सम्मानित करता, खूब जानते मेरे गीत !

सरस्वती को ठोकर मारें 
ये कमज़ोर लेखनी वाले !
डमरू बजते भागे ,आयें   
पुरस्कार को लेने वाले  !
बेईमानी छिप न सकेगी,
आशय खूब समझते गीत !
हुल्लड़ , हंगामे पैदा कर ,नाम कमायें  ऐसे  गीत !

कलम फुसफुसी रखने वाले 
पुरस्कार की जुगत भिड़ाये
जहाँ आज बंट रहीं अशर्फी  
प्रतिभा नाक रगड़ती पाये  !
अभिलाषाएँ छिप न सकेंगी, 
कैसे  बनें  यशस्वी, गीत !
बेच प्रतिष्ठा, गौरव अपना , पुरस्कार हथियाते  गीत !

लार टपकती देख ज्ञान की 
कुछ राजे,  मुस्काते आये  !
मुट्ठी भर , ईनाम  फेंकते 
पंडित  गुणी , लूटने धाएं  ! 
देख दुर्दशा आचार्यों की , 
सर धुन रोते , मेरे गीत  ! 
दबी हुई, राजा बनने की इच्छा, खूब समझते गीत  !

चारण, भांड हमेशा रचते 
रहे , गीत   रजवाड़ों  के  !
वफादार लेखनी रही थी ,
राजों और सुल्तानों की !
रहे मसखरे, जीवन भर ये ,
खूब सुनाये  स्तुति  गीत !
हुए पुरस्कृत दरबारों से, फिर भी नज़र झुकाएँ गीत !

हिंदी  का  अपमान कराएं 
लेखक खुद को कहने वाले 
रीति रिवाज़ समझ न पायें 
लोक गीत को, रचने वाले 
कविता का उपहास उड़ायें,
करें प्रकाशित घटिया गीत !
गली गली के ज्ञानी लिखते, अपनी कविता, अपने गीत !

कविता, गद्य, छंद, ग़ज़लों पर ,
कब्ज़ा कर ,लहरायें  झंडा !
सुंदर शोभित नाम रख लिए 
ऐंठ के चलते , लेकर डंडा  !
भीड़ देख, इन आचार्यों  की, 
आतंकित  हैं , मेरे गीत  !
कहाँ गुरु को ढूंढें जाकर, कौन  सुधारे आकर, गीत !

Monday, August 19, 2013

अब रक्षा बंधन के दिन पर, घर के दरवाजे बैठे हैं -सतीश सक्सेना

ऐसे ही एक भावुक क्षण , निम्न कविता की रचना हुई है जिसमें एक स्नेही भाई और पिता की वेदना  का वर्णन किया गया है .....
बेटी की विदाई के साथ ही , उसका घर, मायके में बदल जाता है , हर लड़की के लिए और उसके भाई के लिए, एक कमी सी घर में हर समय कसकती है कि कहाँ चला गया इस घर का सबसे सुंदर टुकड़ा ...फिर एक मुस्कान कि हमारी लाडो अपने घर में बहुत खुश है ...  

हम दोनों जन्मे इस घर में 
औ साथ खेल कर बड़े हुए
अपने इस घर के आंगन में  
घुटनों बल, चलकर खड़े हुए
तू विदा हुई शादी करके 
पर इतना याद इसे रखना 
घर में पहले अधिकार तेरा,
मैं रक्षक हूँ , तेरे घर का  !
अब रक्षा बंधन के दिन पर , घर के दरवाजे , बैठे  हैं !

पहले  तेरे जन्मोत्सव पर
त्यौहार मनाया जाता था !
रंगोली  और  गुब्बारों से !
घरद्वार सजाया जाता था !
होली औ दिवाली उत्सव 
में, पकवान बनाये थे हमने 
लेकिन तेरे घर से जाते ही 
सारी रौनक ही चली गयी 
राखी के प्रति , अनुराग लिए , उम्मीद लगाए बैठे हैं  ! 

पहले इस घर के आंगन में

संगीत , सुनाई पड़ता था  !
मुझको घर वापस आने पर ,
ये घर रोशन सा लगता था !
झंकार वायलिन की सुनकर
मेरे घर में उत्सव लगता था 
जब से तू जिज्जी विदा हुई 
झाँझर पायल भी रूठ गयीं  
आहट  पैरों  की, सुनने  को, हम  कान  लगाए  बैठे  हैं  !

पहले घर में , प्रवेश करते ,

एक मैना चहका करती थी !
चीं चीं करती, अपनी  बातें 
सब मुझे सुनाया करती थी !
तेरे जाते ही चिड़ियों सी 
चहकार न जाने कहां गयी !
जबसे तू विदा हुई घर से , 
हम लुटे हुए से , बैठे हैं  !
टकटकी लगाये रस्ते में, घर के  दरवाजे  बैठे हैं !

पहले घर के,  हर कोने  में ,

एक गुड़िया खेला करती थी
चूड़ी, पायल, कंगन, झुमका 
को संग खिलाया करती थी
पापा की लाई चीजों पर 
हर बात पे झगड़ा करती थी 
जबसे गुड्डे, संग विदा हुई , 
हम  ठगे हुए  से बैठे हैं  !
कौवे की बोली सुननें को, हम  कान  लगाये बैठे हैं !

पहले इस नंदन कानन में

एक राजकुमारी रहती थी
हम सब उसके आगे पीछे 
वो खूब लाडली होती थी  
तब राजमहल सा घर लगता
हर रोज दिवाली होती थी !
तेरे जाने के साथ साथ ,
चिड़ियों ने भी, आना छोड़ा !
चुग्गा पानी को लिए हुए , उम्मीद  लगाए बैठे    हैं !

Monday, August 12, 2013

अब कोई युद्ध संभव नहीं -सतीश सक्सेना

                   काफी समय से हमारा मीडिया, बॉर्डर पर हुई सैनिकों की शहादतों के बाद करो या मरो के अंदाज़ में चीखना चिल्लाना शुरू कर देता है ! ऐसा लगता है कि  देश का सम्मान खतरे में है, चाहे इन सैनिकों की शहादत का कारण, आतंक वाद ही क्यों न हो ! सामान्यतः विभिन्न देशों की सीमाओं पर, विभिन्न कारणों से, झडपें आम घटना  मानी जाती हैं, और इसे लोकल कमांडरों के लेवल पर निपटा लिया जाता है न कि मिडिया और विपक्ष की हाय तौबा के दबाव में, पूरे विश्व का ध्यान, अपनी मूर्खताओं पर केन्द्रित करा दें ! 

                  बदकिस्मती से हमारे देश में ,मीडिया और राजनैतिक पार्टियों, इस प्रकार की घटनाये घटने पर इस प्रकार हो हल्ला मचाते हैं कि लगता है बस अब युद्ध शुरू करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है ! नक़ल मार के पास हुए, मीडिया के इन विद्वानों को शायद यह पता ही नहीं कि अगर अगला युद्ध हो गया तो वह पारंपरिक युद्ध नहीं होगा जैसा १९६२,१९६५ अथवा १९७१ में लड़ा गया था ! यह युद्ध न्यूक्लियर होगा एवं निर्णायक होगा जिसमें दोनों तरफ अकल्पनीय हार होगी सिर्फ हार, जिसकी कल्पना से ही मानवता सिहर जाए ! 
                सामान्य और पारंपरिक युद्ध में , हम पाकिस्तान से बहुत श्रेष्ठ हैं और यह बात पाकिस्तानियों को भी मालुम है कि अपने से, चार गुनी बड़ी सेना से, आमने सामने ,थल ,जल व वायु में नहीं जीत सकते और उनकी हार निश्चित है ! ऐतिहासिक तथ्य है कि पाकिस्तान वे ज़ख्म नहीं भुला सकता जो उसने १९७१ में खाएं हैं जहाँ  लगभग १ लाख पाकिस्तान फौजियों को हथियार डालने पर मजबूर होना पडा और पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए थे !

                   हम घास खायेंगे मगर एटम बम बनायेंगे , इस पालिसी को लेकर पाकिस्तान ने न केवल एटम बम हमारे देश के बराबर बना लिए हैं बल्कि उनके जटिल डिलीवर सिस्टम भी तैयार कर लिए हैं ! आज जहाँ भारत की एटॉमिक पालिसी "प्रथम अटैक नहीं " की है वहीँ पाकिस्तान अकेला देश है जिसने विश्व विरादरी के सम्मुख, ऐसी कोई कसम नहीं खायी है, अतः अगला युद्ध लड़ने और जीतने की कोशिश के लिए उनके पास एटॉमिक वार के अलावा और कोई विकल्प नहीं है !

                  तीन तीन बार हारने के बाद , भारत जैसे कट्टर दुश्मन से, युद्ध में जीतने का एक ही तरीका होगा की वह प्रथम अटैक की शुरुआत करे और वह शुरुआत होगी युद्ध में सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल जिसमे एटॉमिक वारहेड लगे होंगे ! आजतक दुनियां में यह एटॉमिक वारहेड से युक्त क्रूज़ मिसाइल कभी उपयोग में नहीं लायीं गयीं ! एक बार छूटने के बाद,यह केवल मौत का स्वरुप हैं और वह भी मॉस डिस्ट्रक्शन की मौत , इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं , वही जो हिरोशिमा ने झेला था, वह पूरा शहर भाप बन कर उड़ गया था और आज के वारहेड उससे सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली हैं ! इस समय विश्व समाचारों के हिसाब से एटॉमिक हथियारों की संख्या रूस  के पास ८५००,अमेरिका ७७००, भारत ९० और पाकिस्तान के पास १०० हैं !

                  आजतक विश्व में , दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों में कभी युद्ध नहीं हुआ उसका कारण सिर्फ यह है कि परिणाम स्वरुप सिर्फ महाविनाश नहीं होगा बल्कि दोनों और कोई नाम लेवा भी नहीं बचेगा !

दोनों देशों के पास मल्टी वार हेड एटॉमिक पॉवर युक्त आई सी बी एम् / आई आर बी एम्  मिसाइल हैं जो एक बार दागने के बाद रोकी नहीं जा सकतीं , आसमान में टार्गेट के ऊपर पंहुचने के बाद यह अपने आपको कई बमों में बदल कर अलग अलग शहरों पर गिरकर कहर बरपायेंगी !

भारत और पाकिस्तान अपने जन्म से ही पारंपरिक दुश्मन हैं ,जिसे बदकिस्मती से आजतक समाप्त करने के कोई प्रयास नहीं किये गए ! दोनों देशों की मीडिया और राजनैतिक पार्टियाँ इस आग में नया इंधन डालती रहती हैं ताकि उनका गुज़ारा होता रहे !

मेहरवानी के लिए, मिडिया और टीवी न्यूज़ देखकर ताल न ठोंकें और न देश भक्ति के जोश में, अपने आपको सर्व शक्तिशाली समझ , दूसरों पर आक्रमण करने की धमकी दें , इससे देश की, विश्व समुदाय में सिर्फ मज़ाक उड़ती है और हमारा उथलापन ज़ाहिर होता है ! हमें विश्वास रखना चाहिए कि हमारा देश बेहद शक्तिशाली देशों में से एक है , और एटॉमिक पॉवर युक्त सेना के होते, किसी देश द्वारा हराया नहीं जा सकता !

( चित्र गूगल से साभार )

Tuesday, August 6, 2013

ये लड़कियां -सतीश सक्सेना


सावन में, हरियाली तीजों का त्यौहार,लड़कियों के लिए बहुत महत्व रखता है  ! हरियाली तीज अथवा कजली पर विवाहित लड़कियों को घर (जो विवाह बाद ही समाज द्वारा, मायके में बदल दिया जाता है ) बुलाने का रिवाज़ है , और बेटियों को भेंट आदि दी जाती हैं !
विवाह के बाद, पूरे जीवन ये स्नेही बेटियाँ अपने पिता और भाई की तरफ आशा भरी नज़र से देखती हैं कि सावन में, उसके घर से  पिता अथवा  भाई ,उसे अपने घर ले जाने ,उसकी ससुराल आएगा !

आज के माहौल में, अधिकतर घरों में लड़कियों को वह स्नेह नहीं मिल पाता, जिसकी वे हकदार होती हैं , इसके पीछे अक्सर ननद भाभी के मध्य उत्पन्न कडवाहट ही अधिक होती है ! दुखद है कि माँ बाप के कमज़ोर होते होते, यह तेजतर्रार लड़कियां, धीरे धीरे अपने घर (मायके)  से बिलकुल कट सी जाती हैं !

अक्सर लड़कियां,अपने आपको, अपने भाई का सबसे बड़ा हितचिन्तक समझती हैं , नतीजा अनजाने में , बहू के प्रति, माँ और बेटी की आपस में खुसुर पुसुर शुरू हो जाती है, यही कडवाहट की पहली वज़ह होती है ! कोई भी लड़की यह नहीं चाहती कि उसके परिवार में ननद की दखलंदाजी हो, नतीजा एक रस्साकशी की बुनियाद, पहले दिन से ही, उनके घर में रख जाती है , और भुक्त भोगी होता है पति, जो बेचारा यह तय ही नहीं कर पाता कि वह क्या करे !

लड़कियों को चाहिए कि शादी के बाद वे,अपनी भाभी को, भाई से अधिक सम्मान , दिल से दें, मायके में अनाधिकार हस्तक्षेप न करके, अपने नए घर की परवाह करें और उसे संवारने में अपना समय लगाएं न कि पूरे जीवन के लिए अपनी  भाभी के घर में लड़ाई की नींव रखें , ऐसा होने पर यकीन करें, भाभी इस कष्ट को कभी भुला न पायेगी !याद रखने की आवश्यकता है कि कोई लड़की अपने ऊपर हर समय नज़र रखा जाना पसंद नहीं करेगी ! 

                  यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नयी बहू, को अधिक देर तक उसके हको से वंचित नहीं किया जा सकता और समझदार माता पिता कभी भी , आने वाली बच्ची पर अपनी इच्छाएं नहीं लादते बल्कि अपनी बेटी से अधिक उसे पहले दिन से प्यार करते हैं ! 

                  और आज जब मैं किसी बहिन को, अपने ही घर के ड्राइंग रूम में, मेहमान की तरह बैठे देखता हूँ तब मुझे बेहद तकलीफ होती है  !

अगर यह विषय अच्छा लगा हो तो यह भी पढ़ें ...क्लिक  करें  

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