Thursday, January 19, 2023

बतलायें, तपोवन कहां लिखूं -सतीश सक्सेना

साधारण जनमानस में गुरु बेहद आवश्यक हैं, लोग अक्सर पूछते दिखते है, यह किसने कहा ? यह कहाँ लिखा है ? किसी सम्मानित से दिखने वाले व्यक्ति में उन्हें गुरु दिखने लगता है, और उनके व्यवहार में विनम्रता तुरंत नज़र आने लगती है !

गुरुओं ने इसे अंगीकार कर लिया, गुरु सत्संग में पहुँचने पर सबसे पहले शिष्य को बिना बोले, सिर्फ़ सुनना अनिवार्य शर्त है , बोलना ही मना है, और पूछना अशिष्टता ! सो गुरु लोग सबसे पहले बेहतरीन सांस्कृतिक सा नाम पहले धारण करते हैं, दाढ़ी आवश्यक है और अगर आचार्य रवींद्र नाथ जैसी हो तो क्या कहने ! बिना कुर्ता , क्लीनशेव व्यक्तित्व को शिष्य कभी गुरु नहीं बनायेंगे ! सो जो साथी ज्ञान देने में माहिर हैं उन्हें चाहिये एक बढ़िया सा नाम, और सौम्य वेशभूषा, कुछ दिन मजमा लगाने के बाद, लच्छे दार लुभावनी भाषा, बढ़ती शिष्य मंडली देखकर अपने आप आ जाएगी !

राजकुमार सिद्धार्थ ने किसी को गुरु नहीं बनाया, उनमें बिना किसी जानवर के भय के बालसुलभ निडरता बचपन से ही थी, वे ख़ुद से ही प्रश्न करते ख़ुद में ही उत्तर की तलाश करते और उन्हें हर बार शरीर और अनुभव सिखाता रहा ! जानवर एक शांत चित्त व्यक्ति अपने पास पाकर खुश थे, उन्हें इस व्यक्ति से कभी ख़तरा महसूस नहीं हुआ सो उन्होंने सिद्धार्थ पर भी कभी आक्रमण नहीं किया बल्कि वे उनसे प्यार करते थे , शायद यही से अहिंसा का जन्म हुआ

उन्होंने महसूस किया कि इंसान को जीवित रहने के लिए शुद्ध हवा में साँस लेना सबसे आवश्यक है , उन्हें दिन में चार पाँच बार प्यास लगती और भूख सिर्फ़ एक बार, खाने में जो फल, मूल, पत्ता, जीभ को कड़वा लगता उसे थूकना पड़ता था उन्होंने उसे हमेशा त्याज्य माना और जो मीठा लगा उसे खाने योग्य !

बिना गुरु ही वे एकाग्रचित्त हो साँसों पर अधिकार कर पेट में कंपन पैदा करना सीख गए जिससे उनका शरीर स्वस्थ रहे , वे ही सर्वोच्च योगी थे जिनका कोई गुरु नहीं था ! सो मेरा ख़ुद का विश्वास है कि हम सब अपने अंदर निहित, आंतरिक गुरु को तलाश करें, जो कि शरीर को पूरे जीवन बेहद शक्ति देने में समर्थ है न कि धन की तलाश में जुटे आडंबरी गुरुओं की तलाश में समय व्यर्थ कर ख़ुद को मूर्ख साबित करें !

प्रणाम आप सबको

Thursday, January 12, 2023

टीशर्ट राहुल गांधी की -सतीश सक्सेना

देखिए जब 69 वर्ष के सतीश सक्सेना टी शर्ट में 7 डिग्री में दौड़ रहे हैं तब राहुल तो नौजवान हैं , मार्शल आर्ट Akido में ब्लैक बेल्ट होल्डर हैं , ऐसे शानदार एथलीट का ठंड में टी शर्ट पहनना भी, ढीले ढाले लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाता है !
 
विश्वास करिए, ठंड में एक टी शर्ट में बाहर निकलना असंभव नहीं है , बल्कि आप सबको एक एक लेयर कम करते हुए कम कपड़ों में बाहर रहने का अभ्यास करना चाहिए ! १०००० साल पहले लोग गुफाओं में बिना कपड़े ही रहते थे , परिवार सहित !

शरीर बहुत शक्तिशाली है इस पर भरोसा रखें यह किसी भी परिस्थिति में ज़िंदा रह सकता है , इसको शक्तिशाली बनाने के लिए ढेरों हवा , पानी और भूख लगने पर थोड़ा भोजन चाहिये बस !
 
इसकी आदत न बिगाड़िये , प्रमाण आप सबको

Sunday, January 8, 2023

आदतें बदलनी होगी -सतीश सक्सेना

हम सम्मानित लोग अक्सर अपने ऊपर कोई कठोर फैसला लागू ही नहीं होने देते क्योंकि हम खुद ही नियम बनाने वाले हैं और अक्सर यह नियम दूसरों पर लागू करवाते हैं ! वजन घटाने का फैसला आसान नहीं है क्योंकि बरसों से मेहनत न करने , और जम के बढ़िया भोजन की आदत छोड़ना, भीष्म प्रतिज्ञा जैसा है जो खुद पर लागू ही नहीं करना क्योंकि हम किसी के प्रति जवाब देह नहीं है !

कड़ाके की ठंड में कम कपड़े पहनने की आदत डालें, शुरुआत में एक लेयर कम कर दें , कुछ दिनों में ठंड लगनी बंद हो जाएगी !

Wednesday, January 4, 2023

अरे चीथड़ों कब जागोगे -सतीश सक्सेना

अरे चीथड़ों कब जागोगे , 
लूट मची है , पछताओगे !
खद्दर धारी बाजीगर हैं ,
और तुम बने जमूरे रहना !
सपने , रैली , भाषण मीठे
जीवन भर तुम पीते रहना
छोड़ देखना , स्वप्न सुनहरे 
भाग सके तो भाग सभी संग 
दुनिया फ़ायदा उठा रही है 
सीख लगाना डुबकी, तू भी
लूट सके तो लूट देश को , नहीं तो पीछे रह जाओगे  !
लूट मची है, पछताओगे !

शपथ उठाए संविधान की 
खद्दर पहने , नेता लूटें !
नियम और क़ानून दिखायें 
दफ़्तर वाले, बाबू लूटें !
हाथ में झंडा ले छुटभैया, 
धमकी देकर चौथ वसूले   
सब्जी वाला तक डंडी के  
बल पर, बहिन बनाके लूटे
उल्लू मत बन, बनो जुगाड़ू  
आँख उठा ले, राष्ट्रभक्त बन 
झूठ को सत्य बनाना सीखो , वरना बेटा क्या खाओगे !
देश लुट रहा पछताओगे !

आँखें खोलो नंगों तुम भी 
बहती गंगा में मुँह धो लो
फेंक मजीरा, तबला, ढोलक  
हर हर गंगे अलख जगा ले ! 
जय श्री राम बोल नेता को 
जीत दिलाकर शोर मचा ले 
हाथ में आएगा, घंटा ही ,
चाहे जितना ज़ोर लगा ले 
त्याग पसीना, बनो हरामी 
बुद्धि के बल नोट कमाओ 
फेंक रज़ाई फटी, लूट ले , वरना पीछे रह जाओगे  !
तुम वन्दे मातरम गाओगे  !

तुमको धांसू न्यूज़ सुनाकर  
प्रेस मीडिया नोट कमाये !'
तुमको भरमाने की खातिर 
चोर को साहूकार बताये  ! 
टेलिविज़न बनाए उल्लू ,
मीठे मीठे स्वप्न दिखाये !
जो घर को ही, चले लूटने  
उनके जयजयकार लगाए 
समय बचा है अब भी बकरे 
मूर्ख़ बनाना सीखो भोंदू  ,
वरना जीवन भर तुम लल्लू , क्या ओढ़ोगे क्या बिछाओगे  !
हाथ में बस घंटा पाओगे !

#व्यंग्य 

Wednesday, December 28, 2022

आंतरिक शारीरिक रक्षा शक्ति -सतीश सक्सेना

 अगर मैं स्टोन एज की बात करूँ तो वह लगभग २५ लाख साल चला लगभग ६००० साल पहले समाप्त हुआ था , उस समय भी समय अनुसार मानवीय ज़रूरत का हर साधन उपलब्ध था , बस इलाज और बीमारियों के बारे में उन्हें यही पता था कि कुछ दिन कमजोरी रहती है तब आराम करना चाहिए और उन दिनों खाने का मन नही करता सो वो कम खाते और गुफा के एक कोने में आराम करते, कुछ दिनों में स्वतः ठीक हो जाते और फिर शिकार, भागना दौड़ना और परिवार संग खुश रहना , मस्त जीवन ...

आज से लगभग ५० वर्ष पहले भी दूर दूर तक हॉस्पिटल और डॉक्टर नहीं थे, गाँव क़स्बों के लोगों ने इनका नाम तक नहीं सुना था , लोग तब बिना मृत्यु भय और बीमारियों के जीते थे, वाइरस बैक्टिरिया तो बहुत दूर की चीज़ थे , बस भय और स्ट्रेस देने वाले टेलिविज़न और डर फैलाकर धन कमाने वाले मीडिया संसाधन नहीं थे !

मानवीय शरीर में लाखों कोशिकाएँ व्यस्त रहती हैं शरीर को सुचारु रूप से चलाने के लिए, इस प्रक्रिया के फल स्वरूप शरीर में हर समय उथलपुथल रहती है, तरह तरह के दर्द, और समस्याएँ होती हैं जो कुछ समय में अपने आप समाप्त भी हो जाती हैं ,भयभीत और समर्थ मन जो इन्हें सहन नहीं कर पाता , फ़ौरन डॉक्टर की शरण में जाकर दवा खाता है , बिना यह जाने कि इनका शरीर पर बुरा असर क्या होगा वहीं निडर या असमर्थ व्यक्ति चुपचाप घर में लेटकर स्वस्थ होने का इंतज़ार करता है और खुद को स्वस्थ बनाए रखने में सफल रहता है !

६१ वर्ष की उम्र में मैंने जाड़े आते ही कपड़े कम पहन कर दौड़ने का अभ्यास शुरू किया था , पहले तीन लेयर , फिर दो और अंत में स्लीव लेस वेस्ट पहन कर, दौड़ने का अभ्यास किया लगभग दो सीज़न बाद ही ६२ वर्षीय शरीर ने इसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार कर लिया और अब ६९ वर्ष की आयु में, ७ डिग्री कड़ाके की ठंड में , सिंगल स्लीव लेस वेस्ट और शॉर्ट में आराम से दौड़ता हूँ ! मानवीय शरीर की ताक़त बेमिसाल है सिर्फ़ बिना डरे उसकी आदत डालने की आवश्यकता है  !

पिछले सप्ताह खाना खाते हुए, एक मटर का दाना साँस की नली में फँस गया था लगभग दो घंटे तक लगातार खाँसता रहा, साँस आने में रुकावट थी, लग रहा था कि जान चली जाएगी, डॉक्टर T S Daral जैसे पुराने मित्र, और रनर डॉक्टर दोस्त Vishesh Malhotra न होते तो ओपरेशन के लिए हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ता ! पूरे सप्ताह साँस लेने में तकलीफ़ रही, अचानक एक दिन सुबह बहुत तेज गति से खांसी शुरू हुई लगा कि फेफड़े बाहर आ जाएँगे, और एक बड़ा सा गोल दाना मुँह से निकल कर बेसिन में गिरा, साथ ही लगातार हो रही खांसी व साँस में रुकावट ग़ायब हो गयी !

कम से कम एक डॉक्टर मित्र आपके परिवार में अवश्य होना चाहिए जो आपातकाल में सही सलाह देकर आपको अनावश्यक दवाओं से बचाने में आपकी मदद करे, उसके अलावा शारीरिक रक्षा शक्ति को कम न आंकिये, यह आपकी रक्षा करने में पूर्ण समर्थ है !

Tuesday, December 20, 2022

हमारी जय हो -सतीश सक्सेना

कल एक बर्थ डे पार्टी में दो घंटा रुकना पड़ा, डीजे की तेज आवाज़ में हम वहाँ जबतक रहे , मेज़बान और मेहमान , बोली हुई आवाज़ सुनना नामुमकिन रहा, एक दूसरे का हालचाल तक न पूँछ सके, मेरी हेल्थ वाच लगातार शोर का लेवल १०३ db दिखाते हुए मेसेज फ़्लेश कर रही थी कि, इस समय noise लेवल 102 DB है, अधिक देर तक बैठने से आपके कानों में स्थायी नुक़सान हो सकता है !

यूरोप में अवकाश के दिन आप अपने घर में, ज़ोर ज़ोर से बोलना, तेज आवाज़ में टीवी चलाना, किसी तरह ड्रिलिंग, घरेलू मरम्मत का शोर नहीं कर सकते, यहाँ तक कि रात में वॉटर फ़्लश करने का शोर भी नहीं होना चाहिए, शोर को वे हेल्थ के लिए नुक़सान देह व क्राइम मानते हैं और भारी पेनल्टी है मगर हमारे यहाँ किसी को पता ही नहीं कि तेज आवाज़ से बच्चों और बुजुर्गों के कान पर बेहद बुरा असर पड़ता है !

हमारे यहाँ घरेलू एरिया में ५५ DB तक का शोर की इजाज़त है , १० बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाने की इजाज़त नहीं, मगर यहाँ यह अपराध धड़ल्ले से होता है, दूसरों की असुविधा से हमारा कोई मतलब ही नहीं और अपने स्वास्थ्य की समझ नहीं !

मानसिक विकास के बिना ही विकास हो रहा है !

Saturday, December 10, 2022

रोबो चेयर, एक वरदान -सतीश सक्सेना

घर में कुर्सी पर बैठ कर लैपटॉप पर या कम्बल में टीवी , बाहर निकलो गाड़ी से ऑफिस में , लिफ्ट से ऑफिस में अपनी कुर्सी तक ,शाम को गाड़ी से घर वापसी , घर के अंदर सोफा तैयार , डाइनिंग कुर्सी पर बैठकर डिनर , और बाद में गर्म बिस्तर 

सोचता हूँ कि पैरों का काम ही क्या है , घर में खड़े होकर कार तक  पैदल जाना पड़ता है , हाई क्वालिटी रोबो व्हील चेयर बनवा लेता हूँ उसमें सामने लैपटॉप स्क्रीन लगी हो , सेंसर सड़क पर किसी से टकराने भी नहीं देंगे ! घुटनों की जरूरत भी सिर्फ उठते समय पड़ेगी जब सोने जाना होगा , यह कुर्सी लगभग एक लाख की आएगी , खरीदने की सोच रहा हूँ , आराम के लिए पैसा उपयोग न किया तो फिर किस काम आएगा  !

 घर में पूरे दिन बैठे रहकर टीवी देखते समय मेरी स्पोर्ट्स वाच रिमाइंडर देती रहती है कि अब कम से कम खड़े ही हो जाओ भैया ? इसे फेंक ही दूँगा किसी दिन गुस्से में  !

Friday, December 9, 2022

हम पाखंडी -सतीश सक्सेना

यह सच है कि हम भारतीय पाखंड अधिक करते हैं, प्रौढ़ावस्था के कपड़े अलग, जवानों के अलग और बुढ़ापे में रंगहीन कपड़े और मोटा चश्मा, दाढ़ी के साथ ! विधवा है तब रंगीन कपड़े , चूड़ी पायल कंगन आदि सब त्याज्य अन्यथा सब लोग क्या कहेंगे !

अगर लेखक हैं और आम लोगों में मशहूर होना है तो सबसे पहले नाम बदलिए , बेहतरीन सांस्कृतिक नाम रखिए, दाढ़ी बढ़ा लीजिए बड़े बाल कंधे तक बनाइए, खादी कुर्ता पजामा, चेहरे पर गंभीरता , और कुछ चेले लेकर चलना शुरू करें फिर देखिए जलवा !

सबसे बढ़िया धंधा करना हो तो बाबा बन जाइए, सतीश सक्सेना जैसे बकवास नाम की जगह सत्यानंद सरस्वती अधिक प्रभावशाली रहेगा, दाढ़ी और सर के बाल बढ़ाकर नारंगी रंग की धोती पहनिए, पैरों में खड़ाऊँ हों तो क्या कहने, राह चलते लोगों में पैर छूने की होड़ लग जाएगी , आशीर्वाद दो और धन बरसने लगेगा !

और अगर 69-70 की उम्र में आकर, टी शर्ट, शॉर्ट पहन लिया तब लोगों से यह सुनने को तैयार रहिए, चढ़ी जवानी बुड्ढे नू ! मन को मारना सीख ले, इस उम्र में यह रंग, सब लोग क्या कहेंगे !

अभी हमें मानसिक तौर पर विकसित होने में, कम से कम 100 साल लगेंगे !

Monday, November 28, 2022

मिलावटी संसार और हम लोग -सतीश सक्सेना

मुझे अपने बचपन की याद है जब त्योहारों और शादी विवाह के दिनों में , बाजार में दूध और दही सुबह के दस बजे तक ही ख़तम हो जाता था , खोया और पनीर तो मिलता ही नहीं था ! मगर आजकल पूरे देश में शहर हो या गांव कस्बा , इन चीजों की भरमार है , दूध को छोड़ , हर फ़ूड प्रोडक्ट की कमी बाजार में अक्सर सुनाई पड़ती है और उसका रेट बढ़ जाता है मगर हमारे देश में लगता है दूध दही की नदियां बहती हैं , जिस कारण इसकी कोई कमी नहीं , आप किसी भी समय पड़ोस की दुकान से जितना चाहे दूध दही खोया या पनीर खरीद सकते हैं , सप्लाई कभी कम नहीं होती मानो हर घर में कामधेनु आ गयी है ! 

रविवार को सेक्टर 47 में लगी फॉर्मर मार्किट में एक डेरी वाली महिला (Hetha Organics) से गाय का घी (2000 /kg ) और दूध (150 /kg) के रेट पर बात कर रहा था , तो उनका कहना था कि हमारे फॉर्म हाउस में 1000 गाय हैं उनमें से एक समय में मात्र 200 ही दूध देती हैं मगर इन सबको हमें पूरे वर्ष खिलाना और रखरखाव पर खर्चा करना पड़ता है ! आप एक दिन फॉर्म हाउस पर आकर देखें कि एक किलो शुद्ध घी हमें कितने का पड़ता है ? और यह भी कि हमें नहीं मालुम कि बाजार में शुद्ध घी 500 रूपये किलो कैसे मिल जाता है ?

भारत सस्ता चाहने वालों का मार्किट है यहाँ कोई अखबार उठाकर देखें तो दस पर्सेंट से लेकर 50 पर्सेंट तक घटे हुए रेट के विज्ञापनों की भरमार है , शायद ही कोई दुकान ऐसी मिलेगी जो यह कहती हो कि रेट में कोई रिबेट नहीं मिलेगी अगर कोई यह लिखे भी तो शायद ही उसकी कोई बिक्री होगी ,हम मजबूर करते हैं हम व्यापारी को चोरी करने को , हमें सस्ता चाहिए सो हर व्यापारी भी चालाकी सीख गया तीन गुना कीमत लिखकर 50 प्रतिशत घटे रेट पर सेल , और ग्राहकों की भीड़ आएगी दूकान पर इस तरह से एक चालाक पर दूसरा चालाक हावी होता है ! हमारे यहाँ हर व्यक्ति अपनी अपनी औकात में भरपूर चालाक है !

कल HP वाईफाई लेज़र प्रिंटर ठीक कराने को मैंने एक मैकेनिक घर पर बुलाया , जिसने प्रिंटर खोलकर बताया कि आपका पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक कार्ड खराब है इसे बदलना होगा , यह थोड़ा  महंगा है , मैंने मुस्कराकर कहा शाब्बाश मगर मेरा कोई कार्ड खराब नहीं है ध्यान से सुनो मेरा प्रिंटर अगर एक स्क्रू कसने पर ठीक हो जाए या कोई पार्ट बदलने के बाद ,तुम्हे फिक्स 2000/- दूंगा , शर्त यह भी है कि कार्ड नहीं बदला जाएगा क्योंकि उसमें कोई खराबी आ ही नहीं आ सकती ! और वह चुपचाप बिना जवाब दिए काम करता रहा , थोड़ी देर में ही वह बिना कोई पार्ट बदले ठीक हो गया , मैंने उसे 2000/- रूपये दिए तो वह बोला क्या करें साहब आप जैसे लोग नहीं मिलते हमें , एक घंटे काम करके हमें कोई 100 रूपये से अधिक खुश होकर नहीं देगा जब तक उस काम को बढ़ा चढ़ा कर न बताया जाए जिसमें एक पार्ट बदलना शामिल हो , 100 रुपया तो आने जाने में पेट्रोल का खर्चा है मेरा, इसके अतिरिक्त काम में लगाया समय, जानकारी और मेहनत को कोई नहीं गिनता !

हम सब चतुर हो गए हैं आजकल , हर आदमी दूसरे से या तो दिखावा करता है या झूठ बोलकर उसका फायदा उठाता है यहाँ तक कि परिवार में बच्चों की छोड़िये माता पिता अपने बच्चों से सफाई से झूठ बोलते दिखते हैं कि हर बात बच्चों को बताने की जरूरत नहीं , धन और पैसे तो कोई बताता ही नहीं , पिता बेटा तक से छिपाता है और उम्मीद प्यार की  करता है ! अपने खुद के परिवार में खुले दिल से खुलकर बात न कर पाने वाले लोग , दूसरों के लिए गालियाँ देते , ताल ठोकते लोग,  बढ़े हुए रक्तचाप लिए परिवार में लड़ते लोग, सोचते हैं कि रोज सुबह आधा घंटा बिना मन को स्वस्थ बनाये, वाक करने से उन्हें बीमारियां नहीं होंगी , हास्यास्पद है ! 

हमें गहराई से बिना किसी को गुरु बनाये खुद सोचना पड़ेगा कि खाना पीना और दौड़ना क्यों आवश्यक है, कितना आवश्यक है , आँखें खुल जाएंगी आपकी , खुद कहेंगे कि हमने कभी गौर ही नहीं किया था इस बात पर ! खुद को बदलें तो शारीरिक मानसिक बदलाव अवश्य आएगा, बिना दवा रोगमुक्त होकर आप दुबारा बच्चों की तरह हंसना सीख जाएंगे  ! पहचानिये खुद को , झूठ को पहचानना सीखें और खुद को उससे बचाएं ! मन स्वस्थ होते ही सब कुछ खूबसूरत नजर आने लगेगा ! 

      

Friday, November 25, 2022

आइये मेरी नन्नू से मिलिए - सतीश सक्सेना

यह साढ़े तीन साल की छोटी सी लड़की नन्नू है , म्यूनिक जर्मनी में पैदा हुई भारतीय लड़की ,दो वर्ष से ही अपने पापा से हिन्दी में बात करती है क्योंकि उन्हें जर्मन और इंगलिश नहीं आती , मां से इंग्लिश में अपनी बात समझाती है क्योंकि उन्हें जर्मन और हिन्दी नहीं आती , और पूरे दिन स्कूल में जर्मन बच्चों और टीचर से जर्मन भाषा में बोलतीं है क्योंकि उन्हें हिन्दी और इंग्लिश नहीं आती !
मीरा सक्सेना ( नन्नू) ने तीन भाषाओं में बात करने की अपनी समस्या, पिछले महीने जब मैं जर्मनी में था, बतायी कि Baba, mamma knows only English , papa knows only hindi , Eadita (her German care taker) knows only German but Meera knows all languages!! )


इसके पैदा होते ही इसके माँ बाप ने अपनी अपनी भाषाएँ फिक्स कर ली थीं , तब से अब तक मीरा के सामने गौरव हमेशा हिन्दी में , उसकी माँ हमेशा इंगलिश में ही बात करते आये हैं , अन्य भाषा सुनते समय वे दोनों अपनी बेटी के सामने अनजान बने रहते सो नन्नू उनकी भाषाओं में ही बोलती रही और आज उसकी तीनों भाषाओं पर ज़बरदस्त पकड़ है , जर्मन तो धाराप्रवाह है ही जबकि उसके माँ बाप को वह काम चलाऊ ही आती है !
यह पोती है मेरी, अपने बाबा की जान , इसके साथ रहता हूँ तो लगता है सबसे बड़ा सुख यही है !
प्रणाम आप सबको

Tuesday, November 22, 2022

ख़याल तुमने किया है कभी इन अंगों का ? -सतीश सक्सेना

 कल मैंने पहली बार गौर किया कि मैंने अपनी आँखों का व्यायाम पूरे जीवन नहीं किया और न उनको शक्तिशाली बनाने की चेष्टा की, फिर भी ये आँखें, उपेक्षित होकर भी सात दशकों से अपना साथ दे रही हैं ! सो आज सहज मानवीय बुद्धि से उनका व्यायाम किया और आगे भी करता रहूँगा , यदाकदा चश्मे का उपयोग त्याग रहा हूँ, सो यह पोस्ट बिना चश्मे लिख रहा हूँ !

- शरीर के अन्य अंग जिनका उपयोग कम किया उनमें घुटने शामिल हैं, कल से पाँच मंज़िल से कम ऊँचाई में लिफ़्ट का उपयोग नहीं करना !
ग़र जकड़ जाएँ जोड़ देह के , रोना कैसा
ख़याल तुमने कौन सा रखा इन अंगों का ?

Wednesday, November 16, 2022

साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा अढसठ साल का -सतीश सक्सेना

धीमे धीमे लम्बा दौड़ना सीखिए, बिन प्रयास फेफड़ों का व्यायाम , आपके गाढ़े होते रक्त में, भरपूर शुद्ध आक्सीजन पम्प कर, जमा थक्के घोल, उसे शुद्ध कर, उसका संचार आपके ढीले शरीर में कर आपको स्फूर्ति देगा और आपका डायबिटीज ग़ायब हो जाएगा !आपकी ढीली मांसपेशियाँ इस तथाकथित बुढ़ापे में आपको जवानी का अहसास कराएँगी, इसका भरोसा रखें , बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, पेट की गैस, ख़राब हाज़मा, और कमजोरी कब ग़ायब हो गयी पता भी नहीं चलेगा , साथ ही बॉडी कोर में अवस्थित अंगों में दौड़ते समय महसूस कम्पन, उनके स्वास्थ्य में सुधार कर, अतिरिक्त एनर्जी पाने के लिए आपके शरीर में जमा अनावश्यक फ़ैट को खा जाएँगे और आपका शरीर सुडौल दिखेगा इसका यक़ीन रखें और इस पर विचार करें ! मगर दौड़ना सीखना दुनियाँ के सबसे मुश्किल कार्यों में से एक है इसके लिए आवश्यक है कि

- मन प्रफुल्लित रहें , उदास और बेमन आप कभी नहीं दौड़ सकेंगे ! अवसाद और स्ट्रेस दूर करना सीखना हो तो दौड़ना सीखें !
-पूरे दिन में कम से कम १२ गिलास पानी एवं रात का डिनर हल्का और सोने से तीन घंटे पहले करना होगा !
-दौड़ने का समय सुबह ६ बजे के आसपास और खुली जगह में जहां आक्सीजन हो, दौड़ने का अभ्यास करना होगा !
-स्वास्थ्य के लिए दौड़ने में गति का महत्व नहीं, मस्ती से बिना हाँफे दौड़ना अगर नहीं आए तो दौड़ना आपके लिए बेहद ख़तरनाक साबित होगा !
- अंत में अगर आप पसीना नहीं बहा सकते तब दिन में एक बार ही भोजन पर अपना हक़ मानिए ! तीन बार भोजन पर केवल श्रमिक का ही हक़ होता है आप जैसे आलसी और आराम पसंद का नहीं ! सो अगर इसका आनंद लेना है तो सुबह दो घंटे दौड़िए और जम के भोजन खाइए अन्यथा बीमारियाँ झेलने को तैयार रहें ! मुझे देखें ...

मैराथन आसान ,भरोसा हो क़दमों की ताल का
साथ तुम्हारे दौड़ रहा है, बुड्ढा अढसठ साल का !

करत करत अभ्यास, पहाड़ों को रौंदा इस पाँव ने
हार न माने किसी उम्र में, साहस मानवकाल का !

इसी हौसले से जीता है, सिंधु और आकाश भी
सारी धरती लोहा माने , इंसानी इकबाल का !

गिरते क़दमों की हर आहट,साफ़ संदेशा देती है !
हिम्मत,मेहनत,धैर्य,ज़खीरा इंसानों की चाल का !

बहे पसीना कसे बदन से, मस्ती मेहनत की आयी !
रुक ना जाना, उठता गिरता रहे कदम भूचाल सा !

Monday, November 14, 2022

बढ़ी उम्र में , कुछ समझना तो होगा, तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा -सतीश

विकसित समाज में हमने श्रम करना गरीबों का काम मान लिया और जुटाई गयीं सुख सुविधाओं  का उपयोग अपने आराम के 
लिए 
करते समय यह भूल गए कि शरीर लम्बे समय तक किसी भी अभ्यास को आसानी से स्वीकार कर लेता है , और कुछ समय बाद उस आदत से बाहर निकलना उसके लिए असम्भव सा लगने लगता है ! अपने काम खुद न करने का अभ्यास हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा शक्ति को बर्बाद करने में सक्षम है !

जब कोई एक्सरसाइज़, योगासन, जिम और स्ट्रेचिंग की बात करता है तब मुझे लगता है कि वह यह करने की कोशिश तो कर रहा है मगर शारीरिक श्रम करने जैसे मानवीय शक्ति के मूल आधार को ही भूल गया है जिसके सामने यह सब मात्र औपचारिकता है ! मेडिकल व्यवसाय का प्रचार इंसान पर इस कदर हॉवी हो चुका है अपने अपने छोटे से बच्चे को चश्मा लगवाते समय वह यह नहीं सोच पाता कि चश्मे का अविष्कार कब हुआ और उससे पहले हजारों वर्षों से हमारे बच्चे और बूढ़े कैसे देखते होंगे ? घुटने का ऑपरेशन करवाना तो हास्यास्पद ही है जो सिर्फ घुटनों का उपयोग न करने के कारण हुआ है ! बिना उपयोग, शरीर का हर अंग मानवीय मूर्खता पर, धीरे धीरे कराहते हुए बर्बाद होता जाता है और हम उसकी कराह और दर्द को बिना समझे मेडिकल व्यवसायियों की और भाग कर, अपने शरीर को सुधारने की कोशिश में और तेजी से नष्ट करते है !

स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही, बढ़ी उम्र में पछताने का मौक़ा भी नहीं देती ! हमें अपनी गलतियां मनन करते हुए समझना होगा कि पार्क में भीड़ के संग हाथ उठाकर हो हो कर हंसने को कोशिश से , निर्मल और मस्त हँसी का लाभ कभी नहीं मिलेगा ! बेहतरीन स्वास्थ्य के कुछ मूल बिंदुओं पर संकेत कर रहा हूँ , मित्रों से निवेदन है हर बिंदु को मनन करते हुए ही उसे पढ़ने का प्रयत्न करें  !
  • कोई भी शारीरिक एक्सरसाइज़ निरर्थक है जब तक मन उसे स्वीकार न कर ले , चाहे वह हंसने की चेष्टा, वाक या जॉगिंग ही क्यों न हो ! अपने अपने कष्ट भुलाकर खुलकर हंसना सबसे पहले सीखें इसके फलस्वरूप आयी मस्ती से बाकी सब सीखना आसान हो जाएगा ! इस बिंदु को कई बार पढ़ना और समझना होगा स्वास्थ्य को सही रखने की प्रमुख 10 बातों में यह सबसे महत्वपूर्ण एवं मेडिकल उपचार सबसे अंतिम आवश्यकता होनी चाहिए  !
  • मानवीय जीवन के लिए आवश्यक हवा , पानी , धूप ,नींद भरपूर लेनी है एवं भोजन उतना ही लें जितनी दिन में मेहनत की हो , बिना पसीना बहाये दिन में तीन बार भोजन करना आपको शीघ्र शारीरिक क्षरण की ओर ले जाएगा ! बिना मेहनत के तीन बार भोजन लेना इस खूबसूरत मानवीय शरीर के प्रति अपराध है ऐसे लोगों को एक बार भोजन करना स्वस्थ शरीर के लिए पर्याप्त है ! कुछ भी अभक्ष्य न खाएं , दूध सिर्फ अपनी मां का पीना था उनका दूध सूखने के साथ ही दांत निकलने के प्राकृतिक अर्थ पर विचार गहराई से करें तो आप जानवरों के शरीर का चर्बी युक्त हानिकारक दूध का निस्संदेह त्याग करने पर मजबूर होंगे ! दूध और मांस भोजन का एक विकल्प मात्र है और यह विकल्प सोचकर ही उपयोग में लाएं ! 
  •  मानवीय आलस्य जनित आदतों पर गौर करें , फेफड़ों पर दया करें उनका साइज पर गौर करते हुए उन्हें उतना खोलना  सीखें जिसके लिए वे बने हैं आपको बिना गुरु के योग क्या है समझ आएगा और धीमे धीमे खराब हवा में साँस लेने के कारण, आपके गाढ़े होते खून के लिए शुद्ध हवा की जरूरत है , बंद फेफड़े खोलने का प्रयत्न करें !
  • पैरों को मानवीय शरीर का आधा हिस्सा मिला है सो दिन के आधे समय में इनका उपयोग करना होगा , इसमें धीमे धीमे दौड़ना शामिल करें मगर हांफते हुए दौड़ने से आप अपने कमजोर हृदय को खतरे में डालेंगे उम्र चाहे कोई भी क्यों न हो, इसे न भूलें ! हर 40 मिनट वाक को बिना हांफे धीमे धीमे दौड़ कर समाप्त करें , इस आदत से आप अगले दो महीने में बिना हांफे दौड़ना सीख जाएंगे  !
  • दौड़ा या जॉगिंग करना या तेज चलना आपके शरीर में अवस्थित अंगों में कम्पन उत्पन्न करेगा यह कम्पन आपके जीर्ण और आलसी अंगों को फुर्ती देगा एवं  सारी बीमारियों को दूर करने में समर्थ होगा , इसे न भूलें  !
  • बेहतरीन और पूरी नींद लेना हमारी मूलभूत आवश्यकता है , मन से क्रोध अपमान आदि को भुला कर सोने का प्रयत्न करें , मानवीय कष्ट आपको सोने नहीं देंगे , इन्हें भूलकर हंसना सीखना ही होगा तभी बेहतर नींद आएगी याद रखें कि भूतकाल की घटनाएं केवल भूत ही हैं , वे अगर याद हैं तब आपको उदासी की और ले जाने में समर्थ भी होंगी और उदासी के साथ आप हंस नहीं पाएंगे , हंसना भूल जाना ही मौत है ! जब भी कष्ट याद आये उसे थूकना सीख लें क्योंकि इसे साथ लेकर चलना आपका नुकसान एवं कष्ट देने वाले का फायदा करेगा !
  • अभक्ष्य न खाएं , पहचान जो चीज आप की जीभ स्वीकार न करें उसे त्यागिये जैसे तेल और चर्बी , क्या आप सरसों के कुछ दाने खा सकते हैं अगर नहीं तब लाखों सरसों के दानों से निकले तेल में तले हुए पकौड़े क्यों , स्वाद को मारना ही होगा !
  • एक दिन कस कर मुट्ठी बंद कर रुमाल से बाँध लीजिये और तीन दिन बाद खोलिये आपको महीने भर व्यायाम करना होगा तब जकड़े जोड़ खुल पाएंगे अब घुटने के दर्द की कल्पना करें जिन्हे आप चलाते ही नहीं , सीढ़ी चढ़ना और दौड़ना तो शायद सोच भी न पाएं , मनन करियेगा अपनी भूलों पर  !
  • आजकल शायद ही कोई इंसान होगा जो वाक न करता होगा मगर उनका थुलथुल शरीर देखिये जिसपर वाक का कोई असर नहीं होता , कभी वाक के ऊपर सोचने का समय निकालिये, उत्तर मिलेगा ! वाक अकेले करें , और उसका उद्देश्य पर विचार करते हुए करें कि आप यहाँ क्या करने आये हैं , गौर करें अपने विभिन्न अंगों पर, उँगलियों पर, पैरों पर , पिंडलियों पर और पेट के उन अंगों पर जो वाक करते समय भी हिल नहीं रहे , फिर आप वाक कर क्यों रहें हैं ? वाक करने का अर्थ 45 मिनट रोज शरीर के फेफड़े , किडनी , लिवर , पेन्क्रियास , हृदय और जोड़ों को व्यायाम कराना होता है न कि दोस्तों के साथ चलते हुए अपने दफ्तर में की हुई बहादुरी का बखान करना !   
मेरा परिचय जान लीजिये , सतीश सक्सेना उम्र ६८ वर्ष , रिटायर होने से पहले जीवन में कभी वाक या व्यायाम नहीं किया , रिटायर होते समय उम्र जनित बीमारियों , जिसमें बीपी और बढ़ा पेट शामिल था को देखते हुए अपने मित्रों से कहा था कि अगले दो साल नहीं जी पाऊंगा , एक फ्लोर चढ़ने पर हांफता था और रुकना पड़ता था ! मगर मन में जीने की इच्छा और बच्चों से और कर्तव्य से प्यार के फलस्वरूप अपने खुद के कायाकल्प का संकल्प लिया था आलस्य का हाल यह था कि सब्जी लेने के लिए भी गाडी चाहिए और कभी दिल्ली के बस में नहीं चढ़ सका कि उसमें भागना पड़ता था !

६१ वर्ष की उम्र से दौड़ना सीखना सिखाया अपने ढीले वाले थुलथुल शरीर को और दो वर्षों में ही 12 किलो वजन घटाने के कारण आये उत्साह में लम्बी दौड़ें दौड़ना शुरू की , अब तक 10000 km दौड़ चुका हूँ  और शरीर हर बीमारी से मुक्त है ! 2021 में 100 days of running विश्व प्रतियोगिता में शामिल हुआ जिसमें 100 दिन लगातार दौड़ते हुए कुल 1849 km की दूरी तय करते हुए पूरे विश्व में दौड़ते हुए 13068 जवानों के मध्य रैंक 88/13068 एवं अपने उम्र ग्रुप (65-69) में 1/58 रहा ! अपने बारे में बताने का उद्देश्य अपना प्रचार न होकर आपको यह बताना है कि मेरे जैसा सुख सुविधा युक्त जीवन जीने वाला आलसी उम्र दराज अगर यह सब कर खुद का काया कल्प कर सकता है तो आप क्यों नहीं ?

डॉक्टरों और ऑपरेशन थियेटर से बचने का एकमात्र विकल्प यही है जिसे मेडिकल व्यवसायी कभी नहीं बताएँगे वे आपके भगवान बना रहना चाहते हैं ताकि आपके शरीर से उन्हें धन लाभ होता रहे  !

सादर प्रणाम आपको शुभकामनाओं के साथ !



  

Friday, October 7, 2022

मानवीय रोग और निराकरण प्रयास -सतीश सक्सेना

मानव व्यक्तित्व की कमियों में , रोजमर्रा की समस्याओं से जूझते हुए उन पर खुद विचार न करना, शामिल है !अधिकतर लोग विचारवान हैं ही नहीं, वे वह हर काम करते हैं जो उनके आसपास सब लोग कर रहे होते हैं , जो दुनिया करे सो करो के कारण उन्हें बिना मानसिक श्रम किये फल व सम्मान जिसकी उन्हें बहुत भूख होती है , मिलता रहता है , मेरे अधिकतर मित्र गण विद्वान है मगर इस वर्ग के साथ दिक्कत यह है कि इनके पास समय ही नहीं कि वे बीमारियों के बारे में एकाग्रचित्त होकर सोच सकें ! उनके पास एक ही चारा बचता है कि वे इस समस्या के विशेषज्ञ के पास जाकर खुद को उसके हवाले कर दें और दवा खाना शुरू कर दें ऐसे लोगों के पास 60 तक पहुंचते पहुँचते कम से कम दो तीन दवाएँ आ जाती हैं जिनका सेवन नियमित तौर पर उन्हें करना होता है ! बिना दवा जीवन उनकी समझ से बाहर की बात है !

शरीर की शक्ति अपरिमित है यह हम सब जानते हैं मगर इस पर मनन कभी नहीं किया , कभी सोचा ही नहीं होगा कि बच्चा माँ के शरीर से निकला उसका एक अंग है , जिसके पैदा होते ही उसके शरीर के ऊतकों अवयवों ने उसके सीने में ,उसके रक्त और चर्बी को खींच कर सफ़ेद दूध बनाना शुरू कर दिया जिससे माँ को असहाय अवस्था में कहीं भटकना न पड़े और इस दूध में वह सब था जो उसके रक्त में पाया जाता था ! मानव शरीर का सारा प्रबंध मस्तिष्क देखता है , अगर कोई कोशिका बेतरतीब बढ़ने लगती है तो शरीर उस कोशिका को अपने ऊतकों / मांसपेशियों से जकड़ कर उसे गाँठ के रूप में बाँध देती है ताकि उनका अनावश्यक विकास न हो जिसे हम कैंसर कहते हैं , गाँवो कस्बों में लाखों लोग, मिल जाएंगे जिनके शरीर में यह गांठें बरसों से हैं मगर शहर में एलोपैथिक लोग उसका तुरंत ऑपरेशन कर उसे हटा देते हैं और उसकी दुआएँ मुफ्त में लेते हैं  ! मुझे याद है ५० वर्ष पहले ऑपरेशन थियेटर दो चार ही होते थे और सर्जन को कोई जानता तक नहीं था मगर आज बिना ओ टी हॉस्पिटल की कल्पना मुश्किल है  ! यह उस असहाय और मूर्ख रोगी से उसके पूरे जीवन की जमा पूँजी खींचने का सबसे बेहतरीन तरीका है

अगर कोई डॉक्टर आपका मित्र हो तो आप जानते होंगे कि उसके घर में एलोपथिक दवाएँ ढूंढने पर भी नहीं होंगी क्योंकि वह अपने परिवार में इन खतरनाक दवाओं का उपयोग ही नहीं करते , वे सिर्फ सामान्य दवाओं का प्रयोग करते हैं चाहें उसमें समय कितना ही लगे , मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे डॉक्टर मेरे हितैषी हैं जब भी मुझे मेडिकल व्यवसाय की याद आती है मैं उनसे बात कर खुद को हल्का ( रोग भय से ) महसूस करता हूँ  ! 

रोगी को रोग के बारे में बताना और इस तरह बताना कि वह सब ज्ञान भूलकर सिर्फ यह सोचे कि हे डॉक्टर देवता किसी तरह इस बार बचा दे , सर्व शक्तिमान मेडिकल व्यवसाय का एक बड़ा सहारा है , सारा विश्व इसके आगे घुटने टेकने को विवश है , प्रधानमन्त्री , राष्ट्रपति या कोई अरबपति सब इस मृत्यु भय के आगे नाचने लगते हैं जबकि उन्हें इस बात का ज्ञान है कि मैं सामान्य उम्र को पार कर चुका हूँ और मृत्यु आने वाले कुछ वर्षों में होनी ही है , फिर भी आखिरी वक्त ऑपरेशन थिएटर जाने को लालायित रहते हैं कि शायद डॉक्टरों का प्रयत्न उन्हें बचा ले जबकि खुद कोई विश्व प्रसिद्ध डॉक्टर भी 90 साल न जी सका ! हम यह विचार करना ही नहीं चाहते कि बढ़ी उम्र में शारीरिक क्षरण एक सामान्य प्रक्रिया है , मेरा विश्वास है कि अढ़सठ वर्ष की आयु में मेरा शरीर का अढ़सठ प्रतिशत क्षरण हो चुका है और मेरी बची उम्र सत्तर या 85 के हिसाब से दो साल से लेकर 17 साल और है , कल भी मर सकता हूँ  ! मेरा प्रयास शारीरिक क्षरण रोकने पर न होकर सिर्फ अनावश्यक रोगों के शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को नियंत्रण करना मात्र रहता है और इसमें मैं सफल हूँ , देखिये मेरा आज का फोटो ! 

राजकुमार सिद्धार्थ जैसे संवेदनशील लोग जिन्हें मानव कष्टों का कोई ज्ञान नहीं था , एक मृत शरीर पर रोते, बिलखते परिवार जनों को देख इतने विचलित हुए कि घर छोड़कर जंगल में अकेले निकल पड़े , और घने जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठकर खुद से प्रश्न करने शुरू किये ,  सैकड़ों नौकरों सहायकों के बिना पहली बार अकेले खाना कैसे खाया होगा , क्या खाया होगा क्या पिया होगा ?इस पर एकाग्रचित्त होकर आज पूरे दिन विचार करें आपकी आँखें और बुद्धि खुल जाएगी ऐसा मुझे विश्वास है  ! असहाय सिद्धार्थ के पास कोई सहायक न था और न किसी को उनका स्थान पता था , वीरान जगह पर उन्होंने सबसे पहले सांस लेते लेते, सांसों की गति पर नियंत्रण करना सीखा क्योंकि उन्हें पता चला गया कि बिना भोजन वे महीनों , बिना पानी कुछ दिनों और बिना साँस मिनटों ही ज़िंदा रहा पाएंगे  ! बीमार अवस्था में आहिस्ता आहिस्ता गहरी सांस लेना है और स्वस्थ शरीर में धौंकनी की तरह साँस लेने से, पेट की तमाम बीमारियों से मुक्ति मिली होगी ! विश्व के तमाम योगियों ने यह विधा अपने आप सीखी और वे कामयाब हुए उन्हें सिर्फ यह समझ आ गया कि शरीर में उपस्थित आंतरिक सुरक्षा शक्ति , असामयिक मृत्यु से रक्षा करने में समर्थ है  !

क्षरण होते शरीर को रोग मुक्त करने हेतु मेडिकल व्यवसाय की शरण में जाना एक आत्मघाती कदम होता है , एलोपैथिक दवाओं का दुष्प्रभाव आपके शरीर को और जल्दी संसार से मुक्ति दिलाने में समर्थ है , उनका उपयोग बढ़ी अवस्था में कम से कम करना चाहिए और केवल उसी डॉक्टर के पास जाना चाहिए जिसपर आपको अपने से अधिक भरोसा हो सिर्फ तभी आप सुरक्षित हैं  !

Friday, September 16, 2022

उनसे कहिये, चलने का अन्दाज़ बदल लें !

सुनी सुनाई खबरों पर , एतबार न कर लें !
झूठी खबरों के, सस्ते अखबार बदल लें !

चलते, अहंकार की चाल , नज़र आती है !
उनसे कहिये, चलने का अन्दाज़ बदल लें !

बचपन से जो सीखा , सारा सच न होता
दादी नानी के कल्पित विश्वास बदल लें !

गोश्त न खाते फिर भी, चर्बी चढ़ती जाती,
शाकाहारी होकर भी 
दुखी न हों पर , जानवरों का दूध छोड़ दें  !

जो भी खाएं , ध्यान से देखें ,सोचें पहले 
बचपन से बैठे मन के, विश्वास बदल लें !
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