Tuesday, October 12, 2010

भाषा इन मासूमों की -सतीश सक्सेना

कुछ दिन पूर्व, घर के बाहर, ४ नन्हें दुधमुहों ने जन्म लिया, माँ द्वारा एक झुरमुट में सुरक्षित छिपाए जाने के बावजूद ये नन्हे भाग भाग कर सड़क पर आ जाते और जाती हुई कारों को सावधानी से चलाने के लिए कहतीं इनकी माँ ,द्वारा कार के पीछे भौंकते हुए दौड़ने से, नींद में पड़ते खलल से, पडोसी परेशान थे  ! 
गुडिया के कहने पर मैं बाहर गया तो एक को छोड़ सारे बच्चे, भाग कर माँ के पास छुप गए ! केवल एक था जो निडरता के साथ खड़ा रहा और बढे हुए हाथ की उंगलियाँ अपने नन्हे दांतों से काटने का प्रयत्न करने लगा ! कुछ बिस्कुट इन बच्चों और उस वात्सल्यमयी को देकर हम दोनों बापस आ गए !
अगले दिन सुबह ,घर के बाहर अजीब सन्नाटा देख बाहर गया दो दिल धक् से रह गया , वही निडर बच्चा,आजकल की तेज और असंवेदनशील कार द्वारा सड़क पर कुचला पड़ा था और उसकी माँ बिना भौंके अपने ३ बच्चों के साथ उदास निगाहों से मुझसे पूंछ रही थी मेरे बच्चे का कसूर क्या था , क्यों मार दिया तुम लोगों ने  ?? 

31 comments:

  1. मार्मिक और दर्दनाक....!!
    कभी 'शब्द-शिखर' पर भी पधारें !!

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  2. गाड़ी में बैठने के बाद हमें सिर्फ़ आसमान ही दिखाई देता है सतीश जी ,हम धरती और उस से जुड़ी हर चीज़ से कट जाते हैं शायद, चाहे वो जानवर हो या इंसान तभी तो आए दिन फ़ुट्पाथ पर रहने वाले इस का शिकार होते हैं

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  3. ओह! मार्मिक ...

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  4. इसे नेचुरल रिजेक्शन तो नहीं कहेगें न !

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  5. उफ ...जिन्दगी का कोई पता नहीं होता कब मोत को गले लगा ले ...जो सत्कर्म कर सकते हो समय रहते कर लो ..

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  6. सच मे बहुत दुखद होती है ऐसी घटनाये। हम कम से कम सावधानी तो बरत ही सकते हैं कि उन्हें नुकसान ना हो।

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  7. बस ऐसा कहीं सुन कर हमारी कोमल सम्वेदनाएं जाग उठे।
    हमारे ह्रदय, गाडी के टायरों से निष्ठूर न बन जाय।

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  8. सतीश जी , बच्चे तो सभी मासूम होते हैं । फिर वो चाहे आदमी के हों या जानवरों के ।
    aapka एनिमल लव प्रेम अत्यंत सराहनीय है ।

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  9. उफ़ ! बेहद मार्मिक्।

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  10. क्या कहें!!!

    दुखद!

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  11. मन खराब हो गया.

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  12. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  13. आसमां पर है खुदा और जमीं पर हम।

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  14. यह कोई आवश्यक नहीं की कार वाले की ग़लती ही रही हो. जानवर के अक्ल ही कितनो होती है. सतीश जी सराहनीय है आप की यह पोस्ट. ऐसे इंसान तो हैं, इस जहाँ मैं जो जानवरों के दर्द को भी समझ सकते हैं.

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  15. दुखद प्रसंग बताया आपने ओह

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  16. क्या कहें..................।

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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