Tuesday, March 31, 2020

शाही सलाम में कलम, क्या ख़ाक लिखेगी ? -सतीश सक्सेना

जयकार में उठी कलम,क्या ख़ाक लिखेगी
अभिव्यक्ति को वतन में,खतरनाक लिखेगी !

अवसाद में निराश कलम , ज्ञान लिखेगी ?
मुंह खोल जो कह न सके,चर्वाक लिखेगी ?

जिसने किया बरवाद , वे बाहर के नहीं थे !
तकलीफ ए क़ौम को भी इत्तिफ़ाक़ लिखेगी !

किसने दिया था दर्द, वह बतला न सकेगी !
कुछ चाहतें दिल में छिपा, बेबाक लिखेगी ?

सुलतान की जय से ही, वो धनवान बनेगी !
मालिक की जो रज़ा हो वही बात लिखेगी !

Tuesday, February 11, 2020

शायर बनकर यहाँ , गवैये आये हैं -सतीश सक्सेना

काव्यमंच पर आज मसखरे छाये हैं !
शायर बनकर यहाँ , गवैये आये हैं !

पैर दबा, कवि मंचों के अध्यक्ष बने,
आँख नचाके,काव्य सुनाने आये हैं !

रजवाड़ों से,आत्मकथाओं के बदले 
डॉक्ट्रेट , मालिश पुराण में पाये हैं !

पूंछ हिलायी लेट लेट के,तब जाकर 
कितने जोकर, पद्म श्री कहलाये हैं !

अदब, मान मर्यादा जाने कहाँ गयी,
ग़ज़ल मंच पर,लहरा लहरा गाये हैं !

Monday, January 20, 2020

थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी -सतीश सक्सेना

मुर्दा हुए शरीर को , जीना सिखाइये !
रोते हुए ज़मीर को , पीना सिखाइये !

थोड़े से दर्द में ही,क्यूँ ऑंखें छलक उठी 

गुंडों की गली में इन्हें , रहना सिखाइये !

गद्दार कोई हो , मगर हक़दार सज़ा के 
उस्ताद, मुसलमां को ही चलना सिखाइये  !

अनभिज्ञ निरक्षर निरे जाहिल से देश को !
सरकार, शाही खौफ से,डरना सिखाइये !

अखबार, मीडिया, सभी ताली बजा रहे ,
किन्नर के रोजगार को, बचना सिखाइये ! 

नज़रें उठायीं तख़्त पे दिलदार, तो खुद को,
सरकार के डंडों को भी,सहना सिखाइये ! 
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