Tuesday, August 11, 2009

समीर लाल का दर्द !


"जिन्दगी से थका हारा ये योद्धा आज आत्मसमर्पण करता है क्योंकि वो औरों के लिए जिया और अपनी शर्तों से ज्यादा दूसरों की भावनाओं को मान देता रहा."

समीर लाल के यह शब्द और यह लेख पढ़ कर ऐसा महसूस हुआ कि इस शानदार संवेदनशील व्यक्तित्व को कोई गहरा आघात लगा है, और वह भी किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे यह अपना मानते रहे हैं !

कुछ लोग संवेदनशीलता का मज़ाक ही नहीं उडाते बल्कि उन्हें कमज़ोर,मूर्ख और नपुंसक जैसे शब्द कहते हुए, यह सबूत देते नज़र आयेंगे कि आप सर्वथा अयोग्य हैं और इन लोगों को कोई सरोकार नहीं कि समीर के दिल में उस व्यक्ति के प्रति भी कोई दुर्भावना नहीं है बल्कि वे हर समय विनम्रता के साथ, सेवा भाव लिए, हाथ जोड़े तत्पर हैं !

इस दुनिया में निस्वार्थ किसी अन्य की मदद करने का अर्थ, अपने प्यार, स्नेह और सेवा भाव पर शक का प्रश्नचिंह लगवाना है और ब्लाग जगत में तो ऐसे उदाहरण हर जगह नज़र आयेंगे !

मगर भौतिकता वादी जगत के रहने वाले सामान्य नागरिकों को , जिन्हें बात बात में "बदले में" , "हमें क्या फायदा.."कोई क्या समझेगा " "मेरा है " जैसे तकिया कलाम, बचपन से पारिवारिक विरासत के स्वरुप में मिले है, क्या यह संवेदनशीलता को समझ पाएंगे ? क्या कुछ लोग इस योग्य भी हैं कि वे इस दर्द को महसूस भी कर सकें !

भावुक और सच्चे इंसान प्यार के लायक ही होते हैं ! ऐसे लोगों को अगर सहयोग या सम्मान देना नहीं सीख पाए हैं, तो कम से इनका अपमान नहीं करना चाहिए .... आज के निष्ठुर समय में ऐसे लोग वास्तव में दुर्लभ हैं !

ऐसे प्यारों के साथ सम्मान और इज्ज़त का ही व्यवहार होना चाहिए जिसके यह सर्वथा योग्य है !

Tuesday, August 4, 2009

आधुनिक पीढी से !

क्या आपको कभी कभी ऐसा लगता है ?
-कि अपने व्यस्त समय के कारण, कुछ बहुत आवश्यक चेहरों को भूलता जा रहा हूँ ! एक समय, जिन चेहरों के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, आज वे धुधले पड़ते जा रहे हैं !!
-आजकल बीमार माँ की अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उँगलियों से खाया खाना, कभी तृप्ति का पर्याय लगता था !!
-इन दिनों असहाय और कमज़ोर पिता की भी, अब उतनी याद नहीं आती जिसकी उंगली पकड़ कर, मैं अपने आपको, दुनिया का सबसे शक्तिशाली बच्चा समझता था !!
-दुनिया में सबसे अधिक मुझे प्यार करने वाली बहिन या भाई, को जानबूझ भुलाने का प्रयत्न करना !!

बहुत आसान होता है अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाना...... बस अपनी सोच को थोडा सा परिवर्तित करना है, और हमें सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है ! !
-सोचिये कि आपके माता-पिता आर्थिक तौर पर सर्व समर्थ हैं और वे मेरे बिना भी अपनी समस्याएं सुलझा सकने में समर्थ हैं !!
-सोचिये कि माँ को कोई बीमारी नहीं हैं क्योंकि वे आज भी अपना सारा काम बखूबी अंजाम देती हैं !!
-सोचिये कि बहन भी मुझे अब पहले जैसा प्यार नहीं करती !!
और यकीन रखें माँ बाप की यह मजबूरी है कि वे बच्चों के सामने अपने आपको स्वस्थ और हंसमुख दिखाने का प्रयत्न करते रहें, और पड़ोसियों और मित्रों के सामने हमेशा की तरह आपकी तारीफ करते रहें !!

Saturday, August 1, 2009

डॉ अमर ज्योति के जन्मदिन पर !

आज सुबह सुबह, डॉ. अमर ज्योति के जन्मदिन के अवसर पर, माँ शारदा पुत्र - राकेश खंडेलवाल की चार पंक्तियाँ पढ़कर अनायास मेरे जैसे लापरवाह व्यक्ति को भी, अमर ज्योति की कुछ रचनाओं की याद आगई !

अपना कष्ट भूल कर ( लम्बे समय से डॉ अमरज्योति एक सड़क दुर्घटना के कारण लगभग बिस्तर पर ही हैं ) कमज़ोर, गरीबों के बारे में हमारी आँखे खोलने का प्रयत्न करते अमर वास्तव में माँ शारदा के सच्चे सुपुत्र हैं ! अंधे बहरे समाज के लिए उन्होंने वह सब लिखा जो हमारी आँखे खोलने को पर्याप्त होता.... अमर ज्योति लेखकों से कहते हैं ...

राजा लिख और रानी लिख,
फिर से वही कहानी लिख ,
बैठ किनारे लहरें गिन,
दरिया को तूफानी लिख

गोली बारी में रस घोल
रिमझिम बरसा पानी लिख
रामराज के गीत सुना
हिटलर की कुर्बानी लिख

राजा को नंगा मत बोल
परजा ही बौरानी लिख
फिरदौसी के रस्ते चल ,
मत कबीर की बानी लिख

उपरोक्त कविता में आज के लेखकों पर तीखा व्यंग्य है , उनकी अधिकतर कवितायें कमजोरों और जीवन को ढोते हुए लोगों का प्रतिनिधित्व करती है ! उनकी हर ग़ज़ल, दर्द में तडपती हुई जिंदगियों की, हकीक़त दिखाती नज़र आती है !

एक गरीब विधवा रज्जो की अम्मा का शब्दचित्रण देखिये आपको एक जवान बेटी की विधवा गरीब माँ के जीवन का यह चित्र बहुतों के लिए शायद कल्पना ही होगा मगर अगर आप बुंदेलखंड के किसी सुदूर ग्राम में जाएँ तो यह आम समस्या है !

राम के मंदिर पर लिखते हुए अमर को अपने देश में कप प्लेट धोते लव कुश याद आ रहे हैं ! इनका पूछना है कि "रख सकेंगे क्या अंगूठे को बचा कर एकलव्य;रामजी के राज में शंबूक जी पायेंगे क्या!"

एक और बानगी देखिये- कि कुछ लोगों को शायर और कवियों के लिए पसंदीदा मौसम सावन और बदली छाये माहौल से दहशत होती है, बदली के छाने से .....यह भी जीवन है ! कितने लोग इनके बारे में सोचते हैं

डॉ अमर ज्योति random rumblings की रचना को एक बार पढ़ कर मन नही भरता ! हर रचना एक वास्तविक चित्रण करती है एक सच्चाई का जिसको हम आम जीवन में नज़रन्दाज़ करते हैं ! विनम्रता की हालत यह है, अपने परिचय में एक पूरी लाइन भी नही लिखी ! जनाब इंग्लिश साहित्य में Ph.D. हैं, और सेवा हिन्दी की कर रहे हैं ! डॉ अमर ज्योति जैसे स्वच्छ लेखक हिन्दी जगत की आंख में गुलाब जल के समान हैं जो बेहद शीतलता देते हैं !

जन्मदिन पर मेरी शुभकामनयें और ईश्वर से प्रार्थना है ,वे इस लम्बी बीमारी से शीघ्र ठीक होकर सानन्द जीवन व्यतीत करें !

Wednesday, July 29, 2009

एक पुत्री की तलाश -सतीश सक्सेना

अपने घर के लिए भावी मालकिन और स्वयं के लिए पुत्री का विकल्प खोजते हुए जहाँ बहुत अच्छे अच्छे लोगों से भेंट और बातचीत हुई वहीं कई स्थानों पर कष्टदायक अनुभव भी कम नहीं थे ! अधिकतर लोगों ने "बढ़िया शादी" का वायदा , "हमारे यहाँ कोई कमी नहीं है " आपकी कोई इच्छा हो तो खुल के कहें हमें कोई समस्या नहीं है " आदि वाक्य सामान्यतयः प्रयुक्त किये और मैं हर बार अपना स्पष्टीकरण देने पर मजबूर होता फिर भी संदेह भरी आँखें बता देतीं कि उन्हें इसपर विश्वास नहीं हो पा रहा है !

किसी की मदद करने के बदले धन की चाह और अपना काम कराने के लिए धन का लालच देने का प्रयत्न करना दोनों ही मानव अवगुण सदियों से चले आ रहे हैं, मगर धन से जीवन भर के लिए प्यार और भावी पीढियों के लिए सम्मानित भविष्य खरीदना संभव है ? ऐसा विश्वास रखने वालों के लिए क्या कहा जाये ! रिश्ते खरीदने का यह प्रयत्न हमारे समाज को बर्बाद करने के लिए काफी होगा, ऐसा मेरा मानना है !

Tuesday, July 7, 2009

मज़हब के आदेश !




दिल्ली राजनेताओं में से एक चौधरी मतीन अहमद जो कि विधान सभा सदस्य (सीलमपुर ) हैं, से मिलकर ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी राजनेता से बात कर रहा हूँ, बल्कि एक बेहद शांत, सुलझे, विद्वान् और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व से मिलने के बाद लगा कि काश सारे राजनेता ऐसे ही हों !


आतंकवाद और धर्म पर मतीन अहमद कहते हैं -

" इस मज़हब (इस्लाम) में आदेश दिया गया है कि कोई पिता बाहर अन्य बच्चों के साथ खेलते हुए बच्चे को बेटा कहकर आवाज़ न दे बल्कि उसका नाम लेकर बुलाये क्योंकि उन बच्चों में अगर कोई बिना बाप का बच्चा है तो उसका दिल न दुखे कि काश आज कोई मुझे भी बेटा कहने वाला होता !

कोई भी सच्चा मुसलमान किसी का दिल दुखाने का काम नहीं कर सकता सवाल सिर्फ नफरत फैलाने वालों की पहचान का है, फिर वे चाहे किसी कौम के हों ! "

Tuesday, June 30, 2009

सरकारी नौकरियों में बेटियों का आरक्षण !

केंद्रीय गृहमंत्री श्री चिदम्बरम का यवक्तव्य (टाईम्स ऑफ़ इंडिया दिनांक ३० जून से साभार) कि आने वाले लोकसभा सत्र में सरकार लड़कियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बिल लाएगी, हमारी बच्चियों के लिए एक उत्साह वर्धक खबर है ! इस अभूतपूर्व सरकारी कदम से हमारी मेहनती लड़कियों के लिए सरकारी क्षेत्र में अपने आपको स्थापित करने के लिए बेहतर मौका मिला है और मुझे उम्मीद है कि लड़कियां भविष्य में अपने आपको देश चलाने वालों की लाइन में पाएँगी, और वे देश में सरकारी तंत्र को मज़बूत बनाने में अपना बेहतर योगदान कर पाएंगी ! सरकार के इस कदम से, निस्संदेह भविष्य में, अशिक्षित माता पिता, घ्रणित कन्या भ्रूण हत्या जैसा पाप न करके, कन्या जन्म पर गौरवान्वित महसूस करेंगे ! अच्छे भविष्य के लिए बेटियों को शुभकामनायें !

Monday, June 29, 2009

हम लोग -सतीश सक्सेना

हम लोग, एक बड़े देश के निवासी "अनेकता में एकता " का नारा अक्सर सुनते आये हैं, और लगता है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब लोग एक जुट हैं, मगर हाल में एक उत्तर पूर्वीय प्रान्त के मुख्यमंत्री का यह कथन कि मेरे देशवासी मुझे अक्सर नेपाली समझते हैं , और इस कारण अक्सर मुझे कहना पड़ता है कि मैं आपकी तरह भारतीय हूँ किसी अन्य देश का नहीं ! अपने ही देशवासियों के समक्ष एक देश भक्त का यह स्पष्टीकरण उन्हें खुद कितना कष्टदायक लगता होगा यह तो मैं नहीं जानता, मगर व्यक्तिगत तौर पर मुझे वेहद नागवार लगता है, एक आवेश सा आता है कि कितनी अज्ञानता है मेरे देश में, ऐसी धारणाओं के कारण हम अपनी समझ की, बाहर वालों से कितनी मजाक बनवाते हैं ?

हम लोग इस विशाल देश की सीमाओं तथा विविधिताओं से अनजान रहते हुए, खुद अपनी समझ पर इतराते हुए, बिहारी, पञ्जाबी, मद्रासी एवं पुरबियों की मज़ाक बनाते समय इसके दूरगामी परिणामों के बारे में नहीं सोचते !

कब विकसित होगी हम लोगों की समझ ??

Saturday, June 20, 2009

मांगलिक अवधारणा एवं ज्योतिष शास्त्र !

कुछ समय से अपने लिए पुत्रवधू की तलाश में हूँ, जो कि आने वाले समय में मेरी बेटी का रिक्त स्थान भर सके, इस जटिल मानसिक काम को करने में कुछ नए नए अनुभव हुए, कुछ सुखद तो कुछ कष्टदायक ! एक सादा तथा बेहद विनम्र पिता से बात हुई, उन्होंने अपनी पुत्री के स्वभाव के बारे में जो कुछ बताया उसे सुन कर लगा कि शायद खोज पूरी हो गयी, शायद ऐसी ही बेटी की तलाश थी मुझे !

वास्तव में उस विदुषी मगर सामान्य वस्त्र पहने लडकी के फोटो ने मुझे काफी प्रभावित किया ! मगर रात में उस बच्ची के पिता का फ़ोन आया कि साहब आपका बेटा जन्मपत्री के हिसाब से मांगलिक है, यह तो आपने बताया ही नही ?

मुझे लगा जैसे एक अपराध बोध से घिर गया मैं ! लगा कि जैसे मैंने " मेरा पुत्र मांगलिक या आंशिक मांगलिक है" यह बात मुझे शादी की चर्चा में सबसे पहले बतानी चाहिए, चाहे मुझे इस मिथक धारणा पर विश्वास हो या न हो !मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ की मैं इस घटना का दोष उन्हें दूं अथवा अपने आपको को !

पल भर को ऐसा लगने लगा कि एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत और विश्व की आधुनिकतम टेक्नालोजी में एक्सपर्ट मेरा बेटा हिन्दू धर्म के एक बड़े वर्ग के हिसाब से हर किसी लड़की से विवाह करने योग्य नहीं है, अब उसका विवाह सिर्फ मांगलिक लडकी से ही होगा ! जो पुत्र अपने परिवार तथा मित्रों में अपने सद्गुणों से हमेशा सम्मान पता रहा है, जिसके स्वभाव एवं चरित्र पर आजतक किसी ने ऊँगली नहीं उठाई, ज्योतिष के लिहाज़ से वह क्रूर तथा झगडालू हो सकता है ! मेरे लिए यह तथाकथित धार्मिक तथ्य बेहद कष्टदायक लायक लगा !

जन्मकुण्डली के 1,4,7,8, एंव 12वें भाव में मंगल के होने से जातक/जातिका मांगलिक कहलाते हैं ! बड़ी संख्या में (१२ में से ५ स्थानों पर) मंगल देख वर और वधु को तुंरत मंगली घोषित कर देना कहाँ तक ठीक है ? अगर यह सच है तो लगभग हर तीसरा इन्सान मांगलिक होगा एवं वह तामसी गुणों से युक्त होगा, इस धारणा को अगर बल दिया जाये तो हिन्दू समाज में शादी विवाह सामान्यतः हो पाएंगे इसमें संदेह है !

Tuesday, March 10, 2009

मिलाद अन नबी मुबारक !

समस्त भाइयों को हज़रत मोहम्मद साहब 
का जन्म दिन मुबारक हो !

Saturday, March 7, 2009

नफ़रत या प्यार !

"संकीर्ण सोच" श्रीकांत पराशर के उन लेखों में से एक है जो मुझे बहुत पसंद है और बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है ! अफ़सोस है कि हर समाज का नुकसान करने वाले अधिकतर यही संकुचित सोच वाले "बुद्धिमान" व्यक्ति ही रहे हैं !यह सच है कि संकीर्ण विचारधारा को बदलना अगर असंभव नही तो बेहद मुश्किल कार्य अवश्य है

आज भी ऐसे लोगों की कमी नही है जो हर समय नफरत पालते हैं और नफरत में ही सोना पसंद करते हैं, इन लोगों को प्यार और स्नेह का आनंद ही मालुम नही ! अधिकतर ऐसे लोगों की प्रारिवारिक प्रष्ठभूमि में सहोदर भाई बहनों में भी प्यार की जगह एक दूसरे को नीचा दिखाना तथा पूरे जीवन एक दूसरे के साथ दिखावा करना ही रहा है !

घर में माता-पिता की भूमिका को नकारते समय, हमें यह याद क्यों नही रहता कि भविष्य में यही भूमिका हमारी भी होगी, और हमारी संतान हमें उतना ही महत्व देगी !

Saturday, February 14, 2009

ढाई आखर प्रेम का ..

चिटठा चर्चा पर आज मुझे तरुण का लेख , ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय पढ़ कर पाश्चात्य प्यार के इस अवसर पर सुदामा और केशव का प्यार याद आ गया और मुंह से निकल पड़ीं नरोत्तमदास रचित कुछ पंक्तियाँ !

पत्नी के द्वारा बार बार कहने पर महागरीब सुदामा, भेंट के लिए, पड़ोस से मांगे कुछ मुट्ठी चावल की पोटली लेकर, अपने बालसखा द्वारकाधीश से मिलने पंहुचे तो द्वारपाल के ये शब्द ....

"सीस पगा न झगा तन पै प्रभु जाने को आहि बसै केहि गामा
धोती फटी सी लटी दुपटी औ पायं उपानह को नहि सामा,
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा
पूछत दीनदयाल को नाम , बतावत आपनो नाम सुदामा ,

सुदामा पांडे का नाम सुनते ही, कन्हैया सारे राजकाज छोड़, हाथ जोड़ भाग पड़े अपने उस बालसखा से मिलने दरवाजे पर ! द्वार पर अपने मित्र की दुर्दशा देख करूणानिधि रो पड़े ...

"ऐसे बेहाल बिवाइन से पग कंटक जाल लगे पुनि जोए ,
हाय महादुख पाय सखा तुम आए इतै ना कितै दिन खोये
देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिके करुणा निधि रोये
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैनन के जल से पग धोये !"

कांख में दबी पोटली को छिपाने का प्रयास करते देख , मुस्कराते केशव ने सुदामा से कहा जैसे बचपन में गुरुमाता के दिए चने तुम अकेले खा जाते थे वैसे ही भाभी के भेजे ये मीठे चावल भी तुम छिपा रहे हो, चोरी की तुम्हारी आदत अभी भी नही गयी , कहकर द्वारकानाथ, वे चावल लेकर खाने लगे ! प्यार का यह स्वरुप वर्णन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं !इतने में ही प्रभु ने जो देना था अपने मित्र को दे चुके थे .....

खाली हाथ दरवाजे से विदा लेकर दुखी मन, कुढ़ते हुए सुदामा जब अपने गाँव पहुंचे तो अपने महल नुमा घर और पत्नी को पहचान भी नही पाए ......
प्यार का यह स्वरुप आज कहीं सुनने को भी नही मिलता .....शायद आज यह शब्द ही बेमानी है जिसकी किसी को आवश्यकता ही नही ...

Wednesday, December 24, 2008

नए वर्ष पर प्यार सहित, ये मेरे गीत तुम्हे अर्पण हैं !

बरसों पूर्व (1997) लिखा यह गीत बिना किसी बदलाव के प्रस्तुत कर रहा हूँ !

मन के सोये तार जगाती
याद तुम्हारी ऐसे आयी ,
ऐसी लगन लगी है मन में
गीत झरें बरसातों जैसे !
पहले भी थे गीत यही पर
गाने वाला मिला ना कोई
जबसे तुमने हाथ सम्हाला 
इन गीतों की हुई सगाई
जीवन भर की सकल कमाई,
इन कागज़ के टुकडों में है
नए वर्ष पर प्यार सहित , ये मेरे गीत तुम्हें अर्पण है !

प्रश्न तुम्हारा याद मुझे है ,
क्या मैं दे सकता हूँ तुमको
मेरे पास बचा ही क्या है ?
जो दे मैं उऋण हो जाऊं
रहा अकेला जीवन भर मैं,
इस जग की सुनसान डगर पर
अगर सहारा तुम ना देते ,
बह जाता अथाह सागर में
बुरे दिनों की साथी, तुमको
और भेंट मैं क्या दे सकता !
मेरे आंसू से संचित , ये मेरे गीत  तुम्हें अर्पण हैं !

ऐसा कोई मिला ना जग में
जिसको मन का दर्द सुनाऊं
जग भर की वेदना लिए मैं
किसको गहरी टीस दिखाऊँ
जिसको अपना समझा था 
उसने ही धक्का दिया मुझे 
ऐसी चोट लगी है दिल पर
सारा जग बंजर लगता है !
और मानिनी क्या दे सकता,
तुमको इस बिखरे मन से मैं
विगत वर्ष की अन्तिम संध्या पर , ये गीत तुम्हें अर्पण है !

Tuesday, December 9, 2008

भारतीय संस्कार - सतीश सक्सेना

"भाषा और शब्‍दावली किसी व्‍यक्ति की संस्‍कारशीलता की परिचायक होती है । जोर से और फूहड भाषा में कही बात सच हो, यह कतई जरूरी नहीं ।आप अशिष्‍ट शब्‍दावली और भाषा वाली टिप्‍पणियां मत हटाइए । लोगों को मालूम हो जाने दीजिए कि कौन अपने दामाद को 'मेरी लडकी का घरवाला' और कौन 'हमारे जामाता' कह रहा है ।
जिन्‍हें भाषा के संस्‍कार नहीं मिले उनसे शालीनता, शिष्‍टता, सभ्‍यता की अपेक्षा कर आप उन पर अत्‍याचार कर रहे हैं ।वे आक्रोश के नहीं, दया के पात्र हैं । बीमार पर गुस्‍सा मत कीजिए ।"

श्री विष्णु वैरागी जी ने यह बेहतरीन प्रतिक्रिया दी है, रोशन के ब्लाग दिल एक पुराना सा म्यूज़ियम है पर लिखे एक लेख "टिप्पणियों में संयत भाषा का प्रयोग करें" पर !

मुझे याद आया कि हम अपने संस्कार किस कदर भूल गए हैं, मगर हिंदू धर्म की मूलभूत शिक्षाएं भूल कर भी, हम धर्मरक्षा की बातें खूब करते हैं, कौन है दोषी इस बीमारी का ? कौन है जिम्मेदार है हमारे बच्चों के मध्य परस्पर प्यार और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना समाप्त करने का ?

उन लोगों को दोष मुक्त किया जा सकता है, जिनको किसी ने कभी प्यार ही नही किया, मगर उनके लिए क्या कहें जिनके माता,पिता,भाई,बहिन और बड़े वुजुर्ग सबके होते हुए भी , उनकी भावनाओं से, प्यार और ममता को , यही पाश्चात्य सभ्यता, जिसमे वे पढ़े और बड़े हुए , निगल गयी !

इसी सभ्यता का अनुकरण करते हुए नयी पीढी शायद कभी पछतावा भी न करे क्योंकि उन्होंने इस प्यार की गरमी और अपनत्व को कभी महसूस ही नही किया ! उनके लिए प्यार और स्नेह, केवल हाय, हेल्लो और थैंक्स तक ही सीमित है, फिर दोषी केवल वे परिवार हैं, जिनमें यह संस्कार कभी दिए ही नही गए और इन परिवारों में आपस में स्नेह का वह मज़बूत बंधन कहीं दीखता ही नही !आज के आधुनिक समय में, ऐसे लोगों से शिष्टता और शालीनता की अपेक्षा करने वाले को ही मूर्ख कहना उचित होगा !

Tuesday, December 2, 2008

नफरत या प्यार ?

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे ! लेख के जवाब में प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं , उनमें से नफरत भरी कुछ प्रतिक्रियाओं ने जो मैंने प्रकाशित नही की, मुझे मजबूर किया यह जवाब देने को ! उक्त प्रतिक्रियाओं में से एक प्रतिक्रिया मेरे पुत्र की उम्र के एक नवजवान की है जिनकी लेखन शैली मुझे बहुत पसंद है ! सशक्त लेखनी का धनी, इस भारत पुत्र के प्रति मेरा यह कर्तव्य है कि मैं स्पष्टीकरण दूँ !
कृपया विश्वास करें कि लेखन के प्रति, मेरा किसी वर्ग विशेष के प्रति मोह या उसमें लोकप्रियता अर्जित करना बिल्कुल नही है ! आप प्रतिक्रियाएं अगर ध्यान से देखें तो इस देश के अल्पसंख्यक  बच्चों ने मेरी कभी तारीफ़ नहीं की जिससे मैं उत्साहित होकर यह लेख लिख रहा हूँ ! मगर यह लेख इस समय की पुकार हैं, और जो मैं समाज को समझाना (सर्व धर्म सद्भाव ) चाहता हूँ, उसी की सफलता में देश की नयी पीढी और आपकी अगली पीढी का स्वर्णिम भविष्य सुनिश्चित होगा !
  • उग्रवादियों के बारे में मेरी कोई सहानुभूति नही है, यह एक देश के प्रति, नफरत में अंधे पथभ्रष्ट नवयुवक हैं, जिन्होंने कुछ अच्छे वक्ता एवं तथाकथित धर्मगुरुओं का अँधा आदेश मानते हुए निर्दोष बच्चों, स्त्रियों वृद्धों के खिलाफ महज इसलिए हथियार उठा लिए क्योंकि उनके दिलोदिमाग में नफरत और सिर्फ़ नफरत भरी गयी है, और इन लड़कों की नासमझी यह कि इन्होने इसके पीछे छिपे वास्तविक उद्देश्य को जानने का प्रयत्न ही नही किया ! इनके तथाकथित आकाओं का प्रभामंडल व व्यक्तित्व इतना शक्तिशाली था कि इन युवकों में अपना स्वर्णिम भविष्य तथा अच्छा सोचने समझने की शक्ति आदि सब नष्ट हो गयी !
  • इन बहके हुए मार्गदर्शकों ने उनकी मौत हो जाने की दशा में उनके परिवार की सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए इन पढ़े लिखे मगर अपरिपक्व बुद्धि वाले नवजवानों को, नफरत की आग में जलने के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी शिक्षा और बुधिमत्ता का उपयोग, अपने अनुयाइयों में अपना नाम कमाने में किया !
  • अमेरिका और भारत जैसे उदार देशों पर हमला करते समय यह मुखिया ख़ुद आगे नही आए बल्कि आप जैसे नवजवानों को इस नफरत की आग में झोंक दिया !
  • चूंकि आप जैसे नवजवान ईमानदार और वचनवद्ध होते हैं , उनका उपयोग विध्वंसक होगा ही , यह पुरानी घटिया मानसिकता वाले , एवं इन नवजवानों के लिए श्रद्धेय लोग , यह बात भली भांति जानते हैं ! एक वर्ग विशेष के प्रति नफरत में जलते हुए , इन काइयां , धूर्त और चालक धर्मगुरुओं ने श्रद्धा का दुरूपयोग करते हुए इन जवान लड़कों को निर्मम हत्यारा बना दिया !
  • आपकी उम्र के लोगों से अपनी इच्छा पूर्ति करवा पाना बहुत मुश्किल कार्य नही होता है , सवाल सिर्फ़ एक बार सामने वाले के प्रभाव में आने का है ! कृपया सोचें कि आपकी पीठ पर किसी और का नाम तो नही लिखा है ?
  • अल्पसंख्यक  बच्चे इसी देश के नागरिक हैं , बहुमत होने के कारण हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम उन पर शक न करें और दूसरों के बहकावे में आकर आपस में न लड़ें !
  • नफरत का जहर हमें गुस्से के कारण चैन से जीने नही देगा और वही नफरत एक दिन हमारे घर में भी जरूर घर कर जायेगी ! आप किसी नफरत करने वाले व्यक्ति का चेहरा और एक निश्छल व्यक्ति का सौम्य चेहरा ध्यान से देखें और जरा सोचें क्या फर्क है !
  • क्या कोई कौम दूसरी कौम को ख़त्म कर पाई है अगर नही तो फिर आप लोग इस नफरत को फैला कर सिर्फ़ अपनी आदतें और भविष्य ख़राब कर रहे हो जिसका असर आपकी संतानों पर अवश्य पड़ेगा !अंत में मेरा अनुरोध है कि प्यार बाँटने का प्रयत्न करें, नफरत से सिर्फ़ तिरस्कार और बर्बादी बांटी जा सकती है और बदले में यही मिलेगी भी ! हो सके तो जो आपको उकसा कर, आपसे मदद ले रहा है उस चेहरे को पहचानने का प्रयत्न करें तो आप पायेंगे कि ऐसे चेहरे में ममता और प्यार का नामोनिशान नहीं मिलेगा !
  • मैं हमेशा इन अल्पसंख्यक  बच्चों के लिए लेख क्यों लिखता हूँ ?-मुसलमान - हिन्दुस्तान का दूसरा बेटा ! अवश्य पढ़ें ! क्योंकि मैं बहुमत से सम्बंधित हूँ और अल्पमत के लिए आवाज़ उठाना और उनको अपने समाज के दिल में जगह दिलाने का प्रयत्न करना ही मैं भारत माँ की सबसे बड़ी इच्छा मानता हूँ सो नफरत फैलाने वाले अपनी दूकान चलायें मैं प्यार बांटूंगा देखता हूँ कौन शक्तिशाली है ? नफरत या प्यार ?



Monday, December 1, 2008

मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे !

"इस्लाम को बदनाम करने वाले इन आतंकवादियों को भारत की सरजमीं पर नही दफनाया जाएगा !"

अखबारों में छपी ख़बर के अनुसार ,यह फ़ैसला है मुंबई की मुस्लिम संस्थाओं का, कि इन ९ हत्यारों की लाशों को, मैरिन लाइन बड़ा कब्रिस्तान में कोई जगह और इज्ज़त नहीं बख्शी जायेगी ! मुस्लिम काउन्सिल देश के बाकी संस्थाओं को भी यह मैसेज भेजने का प्रयत्न कर रही है!

इन उग्रवादियों ने सोचा होगा कि इस महान संगठित देश पर हमला करके वह हिन्दू मुस्लिम एकता में दरार डाल पाएंगे जिससे उन्हें शहीद का दर्जा मिलेगा ! शायद यह उन्होंने सपने में भी न सोचा होगा कि उनकी ऐसी दुर्दशा भी हो सकती है !

१५ अगस्त को प्रकाशित मेरे एक गीत ये समझ नहीं आता इनको में उन्हें कहा गया था .....

तुम मासूमों का खून बहा
ख़ुद को शहीद कहलाते हो
औ मार नमाजी को बम से
इस को जिहाद बतलाते हो
जब मौत तुम्हारी आएगी, तब बात शहादत की छोडो
मय्यत में कन्धा देने को, अब्बू तक पास न आयेंगे
!


मुझे खुशी है कि इन मानवता के दुश्मनों का साथ देने कोई पास नही आया ! इस देश के बच्चों को आपस में लड़ाने की साजिश नाकाम हुई ! कुछ नासमझों की मानसिकता के बाद भी बहुमत हमारी एकता बनाये रखने में कामयाब होगा, ऐसा मेरा विश्वास है !


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