Thursday, October 14, 2010

इस देश का यारो क्या कहना -सतीश सक्सेना

आपको याद होगा जब १९९१ में देश का फोरेक्स रिज़र्व घट कर १ बिलियन डालर से भी कम रह गया था और हमारे पास ३ सप्ताह तक के आयात लायक धन बचा था उस समय आने वाले खतरे से बचने के लिए हमें विदेशों में सोना गिरवी रखने के लिए मजबूर होना पड़ा था  !
आज वही देश (लगभग २९५ बिलियन डालर फोरेक्स रिज़र्व के साथ ) अपनी मज़बूत अर्थव्यवस्था के साथ विश्व के अग्रणी देशों की कतार में है ! आज हमारे देश का फोरेक्स रिजर्व , अमेरिका , स्वित्ज़रलैंड , जर्मनी  और फ़्रांस जैसे ताकतवर देशों से कहीं अधिक है   !
बेहद कीमती आधुनिकतम फाइटर विमानों से लैस, भारतीय वायुसेना ,अमेरिका ,रूस और चीन के बाद चौथे नंबर की मारक शक्ति रखती है ! भारतीय वायु सेना के आधुनिकतम विमान , परमाणु हथियार और मिसाइल ले जाने की क्षमता रखते हैं  और विश्व की किसी भी हमले को निष्प्रभावी बनाने में सक्षम हैं  !
विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक भारत सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीट के लिए सबसे मज़बूत दावेदारों में से एक है और अगले कुछ वर्षों में भारत को सुरक्षा परिषद् में वीटो पावर मिल जाये, तो यह आश्चर्य जनक नहीं होगा ! 
बरसों बाद कामनवेल्थ देशों के खेलों का सफल आयोजन कर, इन समस्त देशों में दूसरे स्थान पर पंहुचने में कामयाब रहे हैं ! विश्व के विभिन्न कोनों से आकर एकत्र हुए पचास से अधिक देशों के बीच अंततः वह प्रसंशा हासिल करली जिसकी इस समय सबसे अधिक आवश्यकता थी ! समापन समारोह में जिस तरह देश और संगठनों के अध्यक्षों ने हमारे देश की सराहना करते हुए धन्यवाद दिया निस्संदेह हमारे नौजवानों में एक नया उत्साह और आत्मविश्वास जगाने के लिए काफी है !  

Tuesday, October 12, 2010

भाषा इन मासूमों की -सतीश सक्सेना

कुछ दिन पूर्व, घर के बाहर, ४ नन्हें दुधमुहों ने जन्म लिया, माँ द्वारा एक झुरमुट में सुरक्षित छिपाए जाने के बावजूद ये नन्हे भाग भाग कर सड़क पर आ जाते और जाती हुई कारों को सावधानी से चलाने के लिए कहतीं इनकी माँ ,द्वारा कार के पीछे भौंकते हुए दौड़ने से, नींद में पड़ते खलल से, पडोसी परेशान थे  ! 
गुडिया के कहने पर मैं बाहर गया तो एक को छोड़ सारे बच्चे, भाग कर माँ के पास छुप गए ! केवल एक था जो निडरता के साथ खड़ा रहा और बढे हुए हाथ की उंगलियाँ अपने नन्हे दांतों से काटने का प्रयत्न करने लगा ! कुछ बिस्कुट इन बच्चों और उस वात्सल्यमयी को देकर हम दोनों बापस आ गए !
अगले दिन सुबह ,घर के बाहर अजीब सन्नाटा देख बाहर गया दो दिल धक् से रह गया , वही निडर बच्चा,आजकल की तेज और असंवेदनशील कार द्वारा सड़क पर कुचला पड़ा था और उसकी माँ बिना भौंके अपने ३ बच्चों के साथ उदास निगाहों से मुझसे पूंछ रही थी मेरे बच्चे का कसूर क्या था , क्यों मार दिया तुम लोगों ने  ?? 

Friday, October 8, 2010

मौन को आजमाना चाहिए - सतीश सक्सेना

"है मुमकिन दुश्मनों की दुश्मनी पर सबर कर लेना 
मगर यह दोस्तों  की  बेरुखी , देखी  नहीं  जाती  "

हमारे बड़े कहते रहे हैं कि जब मन शांत न हो तो  मौन व्रत रखें , इस बार यह आजमाते हैं !
शुभकामनायें  ! 

Thursday, October 7, 2010

मेरे ब्लाग के आदरणीय पाठकों से एक विनम्र अनुरोध -सतीश सक्सेना

आज बेहद कष्ट में हूँ ...

वे शंकित, कुंठित मन लेकर,
कुछ पत्थर हम पर फ़ेंक गए
हम समझ नही पाए, हमको 
क्यों मारा ? इस बेदर्दी से ,
हम चोटें लेकर भी दिल पर, अरमान लगाये बैठे हैं !



मेरे ब्लाग के आदरणीय पाठकों से एक विनम्र अनुरोध है कि मेरे लेख पढ़ते समय कृपया ध्यान रखें -
  • वे नफ़रत बांटे इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं ...मेरा प्रमुख उद्देश्य है ! और यहाँ छपे प्यार के लेख
    दिखावटी नहीं बल्कि दिल से निकले हैं ! किसी व्यक्ति , धर्म अथवा पार्टी का नाम लेकर, अपमान करने के उद्देश्य से कहे कमेन्ट यहाँ नहीं छापे जायेंगे ! कुछ लोगों का यह मानना है कि विरोध की आवाज सहन करने की हिम्मत नहीं है वे इसे शौक से मेरी कायरता मान लें इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है !
  • आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !
  • ब्लागजगत में , मैं  अपनी  की गयी प्रतिक्रियाओं अथवा लेखों से पहले मैं यह जानने की कोशिश कभी नहीं करता कि जिनकी मैं तारीफ़ कर रहा हूँ वे काफी समय से मुझसे नफरत करते रहे हैं अथवा बेहद नाराज हैं ! जो व्यक्तित्व मुझे अच्छे लगे मैंने उनसे बिना चर्चा किये और बताये उनकी तारीफ और सम्मान में ही लिखा  अगर उन्हें मेरे द्वारा अपनी तारीफ करना ख़राब लगा हो या किसी विशेष उद्देश्य को लेकर लगा हो तो मुझे बताएं ताकि मैं अपनी गलती सुधार सकूं अथवा स्पष्टीकरण दे सकूं !कमसे कम इसका उद्देश्य उनका सहयोग पाना तो बिलकुल नहीं रहा है ! हाँ अपनी "मूर्खता " और उनके  "बड़प्पन" को न समझ पाने पर, पछतावा अवश्य रहा है !  
  • मेरे लेख पढ़ते समय गलत फहमी न पालें कृपया  ध्यान रहे कि मुझे गीत ,कविता और ग़ज़ल के शिल्प का कोई ज्ञान नहीं है न ही हिंदी भाषा का विद्वान् हूँ  तथा लिखते समय टंकण तथा वर्तनी की गलतियाँ स्वाभाविक हैं !
  • मेरा उद्देश्य किसी को भावनात्मक चोट पंहुचाने का कभी नहीं रहा अगर किसी को दुःख हुआ हो तो  हार्दिक क्षमा प्रार्थी हूँ !
जिगर मुरादाबादी का एक शेर आपकी नज़र है ...


उनका जो फ़र्ज़ है वो अहले सियासत जाने
मेरा पैगामें मुहब्बत है , जहाँ तक पंहुचे !

Monday, October 4, 2010

स्वागत है नवीन दिल्ली का - सतीश सक्सेना

एशियाड १९८२ के दिनों में ,भारत में कलर टी वी का आगमन मुझे सबसे अच्छा लगा था ! उन दिनों बाज़ार में जाते हुए किसी टीवी के डिब्बे पर कलर टी वी लिखा होता था तो रुक के  देखने का मन करता था !  काले सफ़ेद टी वी को देखने के आदी हम लोगों ने, जब पहली बार टी वी के पर्दें में कलर देखे तो एक सुखद आश्चर्य ही था ! और बहुत दिनों तक इस नशे से उबर नहीं पाए थे !
इस बार शायद बहुत कम लोगों को पता है कि कामनवेल्थ गेम्स में हाई डेफेनिशन टी वी का आगमन हुआ है , पहली बार भारतीय दूरदर्शन ने हाई डेफिनिशन प्रसारण शुरू किया है , बाज़ार में पहले से ही उपलब्ध टीवी सेट्स पर इस प्रसारण के फलस्वरूप गज़ब की क्लेअरिटी उपलब्ध हुई है !
दूसरी उपलब्धि संयोग से ही हाथ लग गयी ! आज यमुना भी नयी स्फूर्ति और स्वच्छ धारा के साथ बह रही थी , कुछ दिन पहले नाले के रूप में बह रही यमुना नए रूप और चमक के साथ जैसे विदेशियों का स्वागत कर रही हो  ! इंद्रदेवता ने मानों अहसान किया हो दिल्ली पर सैकड़ों करोड़ की यमुना  सफाई का असंभव कार्य , अभूतपूर्व बाढ़ के फलस्वरूप , सात लाख क्यूसेक पानी, द्वारा एक ही झटके में कर दिया गया !
 तीसरी उपलब्द्धि दिल्ली की सड़कों और रास्तों का निर्माण रहा है ! पिछले एक सप्ताह के भीतर दिल्ली के दो रूपों को देखकर, अचानक आये  परिवर्तन पर विश्वास नहीं होता ! स्वच्छ साफ़, विशाल चौड़ी सड़कें और फ्लाईओवर्स ,जगह जगह पर लगीं रेड लाईट जैसे गायब ही हो गयीं , नए रास्तों से पहले से,आधे समय में घर  पंहुचने की चर्चा आज हर जगह हो रही है !देखते ही देखते दिल्ली की कायापलट हो गयी और लोगों को पता ही नहीं चला ! आज २० किलो मीटर दूर अपने आफिस पंहुचने में एक भी रेड लाईट पर न रुकना एक सुखद आश्चर्य ही रहा ! 
गेम्स विलेज में फाइव स्टार होटलों के शेफ द्वारा परोसे खाने को विश्व स्तरीय खिलाडियों द्वारा अब तक के खेलों में सबसे अत्युत्तम बताया जा रहा है ! अपनी डयूटी पर मुस्तैद एक लाख पुलिस अधिकारियों के साथ , आसमान पर निगाह लगाये  तैनात एयरफोर्स  के अधिकारी , किसी भी आने वाले खतरे को बेकार करने के लिए काफी हैं ! 
गर्व से कहें कि हमारा देश पूर्ण सक्षम है और विश्व की पहली कतार के देशों में से एक है ! हर देशवासी का आत्मविश्वास बढाने के लिए आज़ाद भारत का इतिहास काफी है  जिस पर हमें गर्व है !  

Thursday, September 30, 2010

मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ - सतीश सक्सेना

 आज के माहौल में कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा है , समझ नहीं आ रहा कि अपने ही घर में क्यों चेतावनी प्रसारित की जा रही है ! बेहद तकलीफदेह है यह महसूस करना कि इसी देश की संतानों को आपस में ही, एक दूसरे से ही खतरा है  ! शायद हमारे इतिहास को कलंकित करने वाले कारणों में से सबसे बड़ा कारण यही है !
आज देश के जाने माने शायर और एक बेहतरीन इंसान भाई सरवत जमाल साहब की ग़ज़ल आपके सामने पेश कर रहा हूँ ...मेहरवानी करके एक एक शेर को ध्यान से पढ़ें और महसूस करें  ! शायद यही दर्द आप महसूस करेंगे !


मैं भी इस दौर के बशर सा हूँ 
आँखें होते हुए भी अँधा हूँ !
मेरी हालत भी धान जैसी है
पक रहा हूँ, नमी में डूबा हूँ !



जब मैं सहरा था, तब ही बेहतर था 
आज दरिया हूँ और प्यासा हूँ  !
जबकि सुकरात भी नहीं हूँ मैं 
फिर भी हर रोज़ जहर पीता हूँ 


आप के भक्त हार जाएंगे
आप भगवान हैं, मैं पैसा हूँ 
मेरे हमराह मेरा साया है 
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ 


मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन 
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ
मैं न पंडित, न राजपूत, न शेख 
सिर्फ इन्सान हूँ मैं, सहमा हूँ  !

Tuesday, September 28, 2010

सैकड़ों देशों के बीच,देश की पगड़ी उछालते यह लोग -सतीश सक्सेना

उदय भाई,
             आज जब हर तरफ देश की कार्यक्षमता पर तथाकथित देशभक्त उंगली उठाते हुए विदेशियों को खुश कर रहे हैं कि " हम भी यही कह रहे हैं " ! इस मानसिकता का विरोध करने कोई सामने आने की हिम्मत नहीं कर रहा है तब आपका यह लेख आशा की ज्योति दिखा रहा है कि चलो अभी कुछ लोग हैं जो इस मानसिकता के विरोध में खड़े होने का जज्बा रखते हैं !
चार सौ एकड़ यमुना की तलहटी से निकला एक पानी का एक सांप "कुछ कमी  ढूँढ़ते इन महान खोजियों" को मिल गया है, और सारे खिलाड़ियों की जान के लिए खतरा बताते हुए पूरे दिन वह खबर ब्राडकास्ट होती रही !


           एक विशाल स्टेडियम की फाल्स सीलिंग से निकली एक टाइल जो अक्सर बिजली के लाइनमैन निकाल कर भूल जाते हैं इन्हें कुछ दिन पहले दिखी और दो दिन तक चिल्ल पों मचती रही कि छत गिर गयी !

           दो डरपोक विदेशी खिलाडियों ने इन ख़बरों से घबराते हुए आने को मना कर दिया ! हमारे न्यूज़ चैनल पूरे दो दिन वह खबर दिखाते रहे जैसे यह हमारी मीडिया की यह बहुत बड़ी जीत हो !
फूट ओवर ब्रिज गिरने का हादसा दुखद था जिसे एक प्राइवेट फर्म कर रही थी मगर इतने विशाल और बड़े स्केल पर होते काम के मध्य, यह दुर्घटना होना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी !

             अन्तराष्ट्रीय मापदंडों से होने वाले इन विशाल निर्माण कार्यों में बहुत सावधानी रखी जाती है, मगर मानवीय भूलें सिर्फ हमारे यहाँ ही नहीं बल्कि विदेशों में भी होती रहीं हैं मगर उनकी मीडिया और ब्लागर इतनी जान नहीं निकालते बल्कि उसे प्रयोग और सीखने की एक प्रक्रिया भर मानते हैं !
                             गंदे बाथरूम का फोटो खींचना हो तो किसी फाइव स्टार में जाकर कर्मचारियों का बाथ रूम देखिये यह भी उसी फाइव स्टार होटल का एक भाग माना जाता है ..कर्मचारियों के लिए बाथरूम खेल गाँव में भी हैं !
                             भोजन करने को बुलाये मेहमानों के सामने, अपने घर में कुश्ती ( भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार चिल्लाना ) ठीक नहीं ....
                              भारतीय मीडिया को सकारात्मक रोल अदा करना चाहिए खास तौर पर जब हमें बाहर वाले शक की नज़र से देख रहे हूँ ! रह गयी बात एक्सिडेंट की , तो विश्व में ऐसा कोई देश नहीं जहाँ कार्य होते समय दुर्घटनाएं नहीं घटती हों , आप गूगल पर सर्च कर इमेज देख लें ! जिस पैमाने पर देश में विकास कार्य हो रहे हैं उसमें एक दो एक्सिडेंट होना बेहद स्वाभाविक और मामूली घटना है ! मानवीय गलतियाँ कहाँ नहीं होती ! 
हम बुरे हैं, हम बुरे हैं, कहते रहिये .... पहले से ही भयभीत विदेशी आपके देश में झांकेंगे भी नहीं और आपके दुश्मनों को, आपका मुंह काला करने का मौका आसानी से मिलेगा !

                               भ्रष्टाचार पर निर्ममता से चोट करना चाहिए इस बात का विरोध कौन करेगा ? मगर विदेशियों का इससे क्या लेना !

                               काश इतनी नकारात्मकता से हम अपना दिल भी टटोलें कि हम खुद कितने गंदे हैं ...कितना आसान है किसी अच्छे कार्य में बुराई निकलना अगर यह देखना हो इस समय ब्लाग जगत और मिडिया  की काँव काँव देखिये ! अपने नाम को चमकाने में लगे यह तथाकथित लेखक किस प्रकार देश को नंगा करने में लगे हुए हैं !

                                अपने ही घर में दावत देकर बुलाये दुनिया भर के लोगों को अपनी नंगई और नीचता किस बेशर्मी से दिखलाई जा रही है ...जिससे यह बेचारे विदेशी दुबारा आने का साहस भी न कर सकें ...

Monday, September 27, 2010

राजधानी दिल्ली में अभूतपूर्व निर्माणकार्य -सतीश सक्सेना

इस समय के नकारात्मक माहौल में डॉ दराल द्वारा धारा के विपरीत लिखा गया यह है दिल्ली मेरी जान ... पढ़कर
ही इस लेख को लिखने की प्रेरणा मिली ! पहली बार देश में इतने बड़े स्केल पर अभूतपूर्व निर्माण कार्य हुआ है ...पहली बार देश में इतने बड़े मेगा स्ट्रक्चर बनाए गए हैं और शायद पहली बार ही इतनी बड़ी संख्या में विदेशी हमारे देश को देखने, इन खेलों के बहाने यहाँ आ रहे हैं ! पिछले ३ वर्षों में तमाम लालफीताशाही और तमाम सरकारी एजेंसियों ने, लाखों रुकावटों के बावजूद जितना कार्य किया गया है वह कार्य पिछले २० वर्षों में पूरे देश में नहीं हो पाया ...... 
याद कीजिये, ५ साल पहले दिल्ली में ट्रेफिक व्यवस्था की क्या स्थिति थी ? अभी हाल में मैंने अपनी यूरोप यात्रा के दौरान जिन रेलों में और मेट्रो में सफ़र किया था मेरा दावा है कि दिल्ली मेट्रो उन सबमें बेहतरीन है  और वाकई ऐसी दाग रहित सफाई, हमारे रहनसहन के साथ, आश्चर्य की ही बात थी मगर मैंने आज तक भारतीय मीडिया को मेट्रो के आधुनिकतम कुशल कार्य की तारीफ़ करते नहीं सुना  ! हर ३ मिनट के अंतराल पर विश्व के सबसे अच्छी वातानुकूलित तथा प्रदूषणरहित गाड़ियों को दिल्ली में चलते देखना, निस्संदेह बेहद सुखद था ! आटोमेटिक डोर, सीढियाँ , और सिक्यूरिटी को देख, हमें अपने महान देश का गौरव शाली नागरिक होने का बोध क्यों नहीं हुआ  ?  मेट्रो के आने से पहले कोई सोच भी नहीं पाता था कि चांदनी चौक और चावडी बाज़ार में भी ट्रेन से जाया जा सकता है ! दिल्ली की बनी घनी आबादी और खड़े पुराने भवनों के नीचे से सुरंग बना कर, केवल ८ वर्षों में लगभग २०० किलोमीटर स्टेट आफ आर्ट दिल्ली मेट्रो को चलाना कोई मज़ाक नहीं था ! मगर चौबीस घंटों काम करने का फल मेट्रो इंजीनियरों को , एक मेट्रो गर्डर गिरने पर, गालियों के रूप में दिया गया  ! इतने विशाल निर्माण कार्य पर शायद ही किसी पुरस्कार की घोषणा हुई होगी ! यह स्थिति बेहद अफ़सोस जनक है ...
राजीव चौक में  आमूल चूल परिवर्तन करना, ठीक इसी प्रकार का कार्य है कि जैसे बसे बसाए शहर को, बिना मिटाए दुबारा नए सिरे से बनाया जाए ! कनाट प्लेस के घनी आबादी को बिना छेड़े और विस्थापित किये उनकी सड़ी गली सर्विस सुविधाओं , सीवर लाइन, बिजली और जल सप्लाई को बहाल करते हुए, नया बनाना किसी भी इंजिनियर विभाग के लिए बेहद जटिल और पसीने लाने वाला काम है और विश्व के विकसित देशों में यह लगभग असंभव जैसा ही है मगर बिना इसकी जटिलता जाने राजीव चौक की खुदाई पर इन अनपढ़ों ने जितनी मज़ाक बनाई है उसे देख अपने बाल नोचने का ही दिल करता है !  
है मुमकिन दुश्मनों की दुश्मनी पर सबर कर लेना 
मगर  यह  दोस्तों  की  बेरुखी , देखी नहीं जाती  !
इसकी विशाल और भव्य निर्माण कार्य की, हम सबको मुक्त ह्रदय से तारीफ़ करनी चाहिए थी ! मगर हमारी भारतीय मीडिया को चटपटी खबर चाहिए और इस के चलते सैकड़ों कैमरामैन रात दिन इस अभूतपूर्व निर्माण कार्य में कमियां निकालने के लिए दिन रात मेहनत करते रहे और जो कुछ भी मिला,फाल्स सीलिंग की गिरी टाइलों से लेकर भारी बाढ़ के फलस्वरूप पैदा गन्दगी और मच्छरों तक को, दिन में २०-२० बार दिखाया गया  ......ऐसा लग रहा है कि पूरे विश्व में हमसे अयोग्य,घटिया, भ्रष्ट और निकम्मा कोई है ही नहीं ! और यह पूरे विश्व को बताना बहुत आवश्यक है कि हम कितने अयोग्य तथा शेष विश्व के लिए बेकार हैं ! आप लोग इस देश में आकर सुरक्षित नहीं हैं ! देश के विश्वास को जितनी ठेस इन दिनों हम भारतीयों ने दी है शायद दुश्मन देश पिछले दसियों वर्षों में नहीं कर पाए थे ! असद बदायुनी का एक शेर मुझे याद आ रहा है !
गैरों को क्या पड़ी है कि रुसवा मुझे करें 

इन साजिशों में हाथ किसी आशना का है 
इससे भी भयावह है हमारे देश की भीड़ चाल , एक न्यूज़ को सुनकर वही काँव काँव , उसके बाद अन्य न्यूज़ एजेंसी  और बाद में  आम आदमी  ! यही दुर्दशा ब्लाग जगत में देखने को मिली इस मानसिक गरीबी पर क्या खेद व्यक्त किया जाए सिवा अफ़सोस के !
खैर मुझे अपनी दिल्ली में हुए इस अभूतपूर्व निर्माण कार्य पर गर्व है , कि इन राष्ट्र मंडल खेलों के बहाने हम विश्वस्तरीय शहर में रहने लायक हो पाए हैं !
आइये अच्छे कामों पर हम अपने मजदूरों और अभियंताओं को शाबाशी देना सीखें  ! दिल्ली के तेजी से बदलते स्वरुप पर आप सब को हार्दिक शुभकामनाये !
   

Sunday, September 26, 2010

आपके स्वर्ण आभूषण और उनका रख रखाव - सतीश सक्सेना

भारतीय महिलाओं में स्वर्ण मोह विश्व में सबसे अधिक पाया जाता है ! कुछ दिन पहले मेरी धर्मपत्नी अपनी गले की चेन को साफ़ कराने की जिद कर रही थीं अतः मैंने उनसे तनिष्क पर जाने की सलाह दी क्योंकि टाटा कंपनी होने के कारण यह विश्वसनीय अधिक थी ! मगर साफ़ कराने के कुछ दिनों में ही उसके जोड़ जगह जगह पर काले पड़ गए और पूरी चेन ही बदरंग हो जाने के कारण कुछ दिनों में ही उसे बेचना पड़ा ! बहुत पछतावा हुआ कि ज्वेलर के पास साफ़ कराने के लिए ले जाने की क्या आवश्यकता थी ! अक्सर सुनार से साफ़ कराने में विभिन्न तरह के कैमिकल उपयोग किये जाते हैं जिनकी प्रतिक्रिया स्वरुप सोने की सफाई के साथ साथ सोना भी साफ़ हो जाता है ,जिसका अंदाज़ा बहुत बाद में होता है ! 
अक्सर प्राकृतिक स्किन आयल ,पसीना ,साबुन, क्रीम आदि लगने से स्वर्ण और हीरे आदि के आभूषण अपनी स्वाभाविक चमक खो देते हैं साथ ही वातावरण में उपलब्ध धूल जमने के साथ ही वे बेहद ख़राब लगने लगते हैं !अतः सबसे पहले इनसे धूल और चिकनाई हटानी आवश्यक होती है! ध्यान रखें कि सोने का रंग कभी ख़राब नहीं होता अतः उसको घर पर ही साफ़ करना आसान होता है  ! 
-स्वर्ण आभूषणों को साफ़ करने के लिए ,गरम पानी में थोडा शैम्पू या अन्य कोई सोफ्ट डेटरजेंट मिला कर उसमें अपने गंदे और पुराने आभूषणों को एक मिनट के लिए डाल दें !थोडा ठंडा होने पर उसे टूथब्रश से साफ़ कर ,स्वच्छ पानी में धो लें  ! आपकी ज्वेलरी चमक उठेगी !
-चाँदी पर वातावरण का असर बहुत जल्दी होता है अतः शीघ्र ही बदरंग होने का खतरा होता है ! एक बार बदरंग होने के बाद इनको साफ़ करना आसान नहीं होता , बाज़ार से सिल्वर पोलिश लेकर उसको एक स्पोंज में लगा कर धीरे धीरे रगड़ने से  सिल्वर में पुरानी चमक बापस आ जाती है !  
-डायमंड इयर रिंग साफ़ करने के लिए, गरम पानी में थोडा घर में प्रयुक्त होने वाला ग्लास क्लीनर मिला दीजिये और आभूषण इसमें लगभग २ मिनट के लिए डाल दें ,गन्दगी और चिकनाई हटाने के लिए सोफ्ट टूथब्रश का प्रयोग कर साफ़ पानी से धो लें !  

Friday, September 24, 2010

जैसलमेर में १८ करोड़ वर्ष पुराने पथरीले जंगल के अवशेष -सतीश सक्सेना

मुझे हमेशा से पहाड़ और घने जंगल आकर्षित करते रहे हैं ! हजारों साल पुराने खोये हुए अवशेष अगर किसी पहाड़ी पर मिल जाएँ तो मैं वहाँ अपने कैमरे के साथ, बिना खाए पिए अकेला पूरे दिन आराम से रह सकता हूँ !राजस्थान यात्रा से पहले मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि वहाँ मुझे इतिहास लिखे जाने से भी पहले का, बेशकीमत खज़ाना मिल जायेगा, जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था !
जैसलमेर से १७ किलोमीटर दूर जैसलमेर - बारमेड रोड पर, अकाल वुड फोसिल पार्क, जिसमें सैकड़ों की संख्या में फासिल भरे पड़े हैं, कौन विश्वास करेगा कि यहाँ १० स्कुआयर किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के पेंड, पत्थर बने हुए अपने अतीत की गवाही दे रहे हैं ! और यह पथरीले पेंड़ों  के तने ,यहाँ १८० मिलियन वर्ष पुराने जंगल होने के गवाह हैं !



समय और धरती में आये बदलाव के कारण, यह जंगल बाद में सागर  की तलहटी में समा गया और लगभग ३६ मिलियन वर्ष पहले जब सागर यहाँ से बापस लौटा तो पीछे पूरा पत्थर रुपी जंगल छोड़ गया !
सरकार द्वारा सुरक्षित घोषित इस फासिल पार्क में, जहाँ तहां पत्थर बन चुके, लकड़ी के तने बिखरे पड़े हैं ! पथरीले पहाड़ पर २५ तने नज़र आते हैं इनमें से १० पेंड के तने बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट दीखते हैं ! सबसे बड़ा तना 13मीटर लम्बा और डेढ़ मीटर चौड़ाई में है !इन विशाल पेंड़ों की उपस्थित यह बताती है कि कभी यहाँ की जलवायु घने जंगल के लिए अनुकूल रही होगी और समय के साथ, यह गिरे हुए पेंड, मिटटी में दबते चले गए और लाखों वर्षों से जमीनी दवाब और गर्मी के कारण पत्थर में बदल गए ! बाद में पानी के कटाव और मिटटी के क्षरण के साथ प्रकृति की यह दुर्लभ रचना जमीन के ऊपर आ गयी  ! आज सैकड़ों वर्ष पुराने समुद्री शैल ,सीप,शंख  इत्यादि के साथ पत्थर बने यह पेंड, रेगिस्तान में करोड़ों साल पहले समुद्र की उपस्थिति को, सबूत के साथ बयान करते हैं !
राजस्थान यात्रा में तमाम ऐतिहासिक खूबसूरत इमारतों और स्वादिष्ट भोजन के मध्य, मैं इस पथरीले जंगल को कभी नहीं भूल पाऊंगा !

Thursday, September 16, 2010

विवाह गीत - सतीश सक्सेना

हरियाली बन्ने ! दुल्हन करे है इंतजार
चटक मटकती फिरें भाभियाँ
हुलस हुलस बारी जायें !
हरियाले बन्ने ....


बुआ तुम्हारी लेयं बलाएँ 
फिरें नाचती द्वार द्वार में

घुंघरू करें झंकार ! 
हरियाले बन्ने ....


बहना तुम्हारी हुई बाबरी 
घर घर में वो फिरे हुलसती

बार बार बलिहार ! 
हरियाले बन्ने ....


मां के दिल से पूछे कोई
बारम्बार बलाएँ लेती

नज़र नहीं लग जाए !
हरियाले बन्ने ....

मौसी तुम्हारी रानी जैसी
घर में खुशियाँ लेकर आयी

करे प्रेम - बौछार ! 
हरियाले बन्ने ....


मामी तुम्हारी फिरें मटकती
सब लोगों को नाच नचाती

करती नयना - चार ! 
madhurima,bhasker-2-12-15
हरियाले बन्ने ....


चाची तुम्हारी खुशियाँ बांटे
रंग - बिरंगी बनी घूमती

गाएं गीत मल्हार ! 
हरियाले बन्ने ....


दादी तुम्हारी घूमें घर में
पैर जमीं पर नहीं पड़ रहे


खुशी कही ना जाए ! 
हरियाले बन्ने ....


बाबा तुम्हारे , घर के मुखिया
चार पीढियां देख के हरसें 

शान कही ना जाय ! 
हरियाले बन्ने ....


पिता तुम्हारे फिरें घूमते
घर में सबका हाल पूंछते 

खुशी छिपे न छिपाय ! 
हरियाले बन्ने ....


भइया तुम्हारे फिरें महकते
मेहमानों की खातिर करते 

इत्र फुलेल लगाय ! 
हरियाले बन्ने ....


चाचा तुम्हारे आए दूर से

नए नवेले कपड़े पहने 
मस्त फिरे बतियायं ! 
हरियाले बन्ने ....


जीजा तुम्हारे हुए बावरे

फिरें घूमते बन्ना लिखते
हाल कहा ना जाए !
हरियाले बन्ने ....

http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/02122015/mpcg/1/

एक अन्य खूबसूरत विवाह गीत के लिए यहाँ जाइये  - कैसे जाओगे यहाँ से लेके  प्यार सजना !

Saturday, September 11, 2010

आँखें - सतीश सक्सेना

कई बार मन के अस्थिर होने के कारण कुछ नया लिखने का मन नहीं करता , आज एक एक बहुत पुरानी रचना  (लगभग 30 वर्ष पुरानी ), प्रकाशित कर  रहा हूँ  !


यह दर्द उठा क्यों दिल में है
या याद किसी की आई है 
लगता है कोई चुपके से
दस्तक दे रहा, चेतना की 
वे भूले दिन बिसरी यादें ,
क्यों मुझे चुभें शूलों जैसी  
लगता कोई अपराध मुझे , है याद दिलाये करमों  की 

रजनीगंधा की सुन्दरता,
फूलों की गंध उठे  जैसे 
उन भूली बिसरी यादों से ,
ये गीत सजे, अरमानों के
मैं कभी सोचता क्यों मुझको, 
ही शांति नहीं है, जीवन में
यह क्यों उठती अतृप्त भूख, सूनापन सा इस जीवन में


लगता है जैसे इंगित कर
है मुझको याद करे कोई
लगता कोई हर समय मेरी
भूलों पर रोता है , जैसे ,
वे कोई भरी भरी आँखें , 
यादों से  जुड़ी हुईं ऐसे !
दिल में कोई भी दर्द उठे, सम्मुख जीवित होती आँखें !


Tuesday, August 31, 2010

आदर पाने की चाह - सतीश सक्सेना

                             बिना आपको आदर दिए , हर इंसान आपसे यह उम्मीद रखता है,कि आप उसका आदर करें  ! एक भुलावा लेकर हम जीते रहते हैं कि हम आदर सम्मान के पूर्ण योग्य हैं ! हम यह सोचने का प्रयत्न क्यों नहीं करते कि अगर हमें सम्मान चाहिए तो सामने वाले को पहले देना होगा तब आपको तुरंत कृतज्ञता पूर्वक सम्मान मिलेगा !
                              दूसरों द्वारा हमारे प्रति सम्मान प्रदर्शन ,हमारे सुकार्यों के प्रति, एक स्वाभाविक मानवीय अभिव्यक्ति है ,जिससे हमें संतोष महसूस होता है ! मगर अधिकतर सम्मान दिखावे के लिए किया जाता है और मानवीय कमजोरियों के रहते, हम अक्सर अपने प्रति किये गए सम्मान का सदुपयोग न करके, दुरुपयोग अधिक करते हैं !
                                लेखकों के बारे में मेरी स्पष्ट राय है कि उनकी कोई भी कमजोरी ,बनावट अथवा नाम कमाने के लिए किये गए प्रयत्न ,लम्बे समय तक छिपाए नहीं जा सकते ! विभिन्न समय और मनस्थिति में लिखे उनके लेख उनकी कमजोरियां उजागर करने को काफी हैं ! इसी कारण ब्लागजगत में होती छीछालेदर में, अपने प्रति लगाये आरोपों के जवाब में मेरा यही कहना होता है कि पाठक अधिक विद्वान् होते हैं, उन्हें पढने दीजिये और फैसला भी उन्ही को करने दीजिये कि कौन क्या लिख रहा है !
                               अगर हम अपने कार्यो के प्रति ईमानदार नहीं है तो देर सबेर हमारी हरकतें समाज को पता चल ही जायेंगी  लम्बे समय तक लोगों को मूर्ख बनाना संभव नहीं है ! हार झूठ को छिपाने के लिए, अपने बोले हर झूठ को याद रखना और उसके विपरीत कार्य करने पर हमेशा अंकुश लगा कर रखना पड़ेगा जब भी चूके आपकी मक्कारी सबके सामने होगी ! इसी समाज में, हमारे आसपास  ही ऐसे लोग रहते हैं जो अपने से अधिक समझदार एवं चालाक और किसी को कुछ नहीं समझते  ! कहीं हम भी तो इन में से एक नहीं  ? मुझे लगता है कम से कम सप्ताह में एक बार अंतर्मन के शीशे में, अपनी इस विद्रूप छवि को पहचाननें का प्रयत्न अवश्य करें जिससे कि अपने मन की गन्दगी को, अगली पीढ़ी से छिपा सकें अन्यथा यकीन मानिए बदले में हर जगह से यही चालाकी मिलेगी !

Monday, August 30, 2010

डॉ अमर कुमार ! एक बेहतरीन व्यक्तित्व - सतीश सक्सेना

ब्लाग जगत में  जिन उस्तादों को पसंद करता रहा हूँ वे धीरे धीरे अपने असली रंग में दिखने लगे हैं और  मुझे अपनी नादान समझवश ,पहचानने में बहुत समय लगा ! मगर एक डॉ अमर कुमार जरूर  ऐसे रहे जो अपने आपको नहीं बदल पाए  ! तीखे और चुभने वाले कमेन्ट के लिए मशहूर अमर दादा कहीं नहीं बिक पाए ..... किसी गैंग में भी शामिल नहीं हो पाए ! सो यह जबरदस्त शख्शियत इस ब्लाग जगत में कम आकलन का शिकार सी रही है  ,आज का यह लेख उन्ही को समर्पित कर रहा हूँ !

कल उनका जन्म दिन था और मुझे पाबला जी द ग्रेट   की बदौलत आज ही पता चला !


कल  ब्लाग जगत के एक निठल्ले तरुण  ने  दुसरे निठल्ले पर एक बड़ी प्यारी पोस्ट लिखी  बदकिस्मती से यह बेहतरीन पोस्ट लोगों की निगाह में नहीं आ पायी अतः सोचा कि अमर दादा के लिए कुछ लिख कर अपने  बेकार लेखों  की श्रंखला में कुछ अच्छा भी लिख सकूं !   


मैं एक नासमझ ब्लागर के नाते, इस बेहतरीन निष्पक्ष ब्लागर को  आज तक समझ नहीं पाया , हर जगह और हर महत्वपूर्ण विषय पर आपको यह मिल जाते हैं अपनी विशिष्ट शैली में साफ़ साफ़ बोलते हुए ! शायद ब्लाग जगत के सबसे अच्छे जानकारों में से एक डॉ अमर कुमार को आम ब्लागर समझने में बहुत समय लगाएगा  ! मगर निस्संदेह वे उन सर्वश्रेष्ठ ईमानदार लोगों में से एक हैं जिन्हें ब्लाग जगत की सबसे अधिक समझ है  !     

कभी उलझे अमर , 
कभी दादा अमर, 
कभी जल्दवाज अमर, 
कभी गुस्सैल अमर, 
कभी महीनों गायब रहने वाले लडाका अमर, 
और कभी रख्शंदा जैसी प्यारी लड़की को दुलारते हुए अमर कुमार, पूरे ब्लाग जगत में अलग खड़े नज़र आते हैं ! मगर मैं इन्हें डरते हुए पसंद करता हूँ जो मस्त जवानों की ऐसी तैसी करने की सम्पूर्ण क्षमता रखते हैं और खुद मस्त रहते हैं !


लिंक्डइन प्रोफाइल में अनके प्रति मेरे कमेंट्स आपके लिए नज़र करता हूँ.... 

"Dr Amar Kumar, a Graduate in Medicine, is not only one of the most honest,empathetic in nature and a fearless writer of hindi language, but also having dynamic command over vast social subjects and heritage of Indian society and culture, he has the caliber to fight against injustice. Besides managing and practicing own nursing home successfully he is also able to devote time to serve his own national language with great zeal"

कहीं इन्हें हमारी नज़र न लग जाए .... 
खुदा महफूज़ रखे हर बला से हर बला से 



मगर मैं इनकी तारीफ़ क्यों कर रहा हूँ इससे तो ब्लागर इन्हें मेरा गुरु मान लेंगे :-( .....
ऐसा करते हैं यह लेख किसी अनाम का मान लें तो अच्छा होगा ! अपने नाम से तारीफ़ करना ठीक नहीं कहीं अमर कुमार से कल को लड़ाई हो गयी तो इन्हें गरिया भी न पाऊंगा  !

Thursday, August 26, 2010

भगवान् कहाँ हैं ? -सतीश सक्सेना

प्रवीण शाह अपने साइंटिफिक सोच और तथ्यपरक लेखों के लिए मशहूर हैं अक्सर अंधविश्वास के खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं और निस्संदेह उनके कथन पर अविश्वास करना आसान नहीं होता ! मगर आज मामला कुछ अलग सा था ! आज भाई प्रवीण शाह ने भगवान् को ही छेड़ दिया , खूब जम कर लिखा कि भाई लोग किस प्रकार हार -जीत दोनों का क्रेडिट भगवान् को ही देते हैं , लेख लिख तो दिया, मगर उसके बाद परेशान कि हे प्रभु आज लगता है कि कोई टिप्पणी नहीं आएगी वह तो भला हो कि इनकी प्रार्थना सुन ली गयी और घूमते घामते अली साहब कहीं से आ गए तब जान में जान आयी  !
फिर भी क्रेडिट भगवान् को नहीं दिया अली साहब को कहते हैं कि ...
@ अली साहब,
शुक्रिया आपका,
मुझे लग रहा था कि कहीँ खाता ( टिप्पणियों का ) ही न खुल पाये आज... ;)


उसके बाद मेरे कमेन्ट ये रहे ....

"प्रवीण भाई !
खाता न खुलने का अंदाजा था फिर भी पंगे जरूर लेना था हा...हा...हा...हा.....
भगवान् से भी पंगा... और कोई काम नहीं है क्या ?"
अली सा से दोस्ती मधुर रखना ...आड़े वक्त काम आते रहेंगे !
:-) "

प्रवीण जी उन लोगों में से हैं धारा के विपरीत तैरना पसंद करते हैं ! इनके द्वारा अपने विषय पर पकड़ और अभिव्यक्ति शैली  मुझे शुरू से आकर्षित करती रही है ! इस बार परम शक्ति को चुनौती दे डाली तो मुझे खूब हंसी आई ! घबरा तो प्रवीण भाई भी रहे होंगे सो अली साहब का कमेन्ट आते ही शुक्रिया अता कर दिया कि आज जाने कमेन्ट आयें भी या नहीं  !
प्रवीण भाई !
हमें भी क्या पता कि भगवान् होते हैं या नहीं मगर बचपन में एक शक्ति को माथा नवाने की आदत डाल दी गयी ! बड़े होकर जब कभी दिल घबराता है तो कभी कभी इनकी शरण में जाने का दिल करता है, उसमें बड़ी राहत मिलती है ! यकीनन मामला श्रद्धा का ही है ...फिर मत्था कहीं भी क्यों न झुक जाए ! ज्ञान भाई की गंगा मैया हो अथवा  खुद केशव  ...आनंद आ जाता है ..!
दिल है क़दमों पर किसी के गर खुदा हो या न हो 
बंदगी  तो अपनी फितरत है , खुदा हो या न हो  ! 
मानते हैं कि यह धर्म भीरुओं का हथियार है , मगर मानवीय कमजोरियों के चलते कहीं न कहीं सर झुकाने से राहत मिलती है तो नुकसान भी क्या ?
( चित्र गूगल से साभार )


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