Tuesday, May 27, 2014

अहंकार,अभिमान,को अपना स्वाभिमान बतलाये रखना - सतीश सक्सेना

श्रद्धा, निष्ठा, सत्य, प्रतिष्ठा, का सम्मान सजाये रखना !
तुम पर गीत लिखे हैं मैंने, इनकी लाज बचाये रखना !

चंचल मन काबू कर पाना इतना भी आसान नहीं पर 
निष्ठा पूजा याद रहे तो , कुछ विश्वास जगाये रखना !

वेद ऋचाएँ सुनते सुनते, बे मतलब का तर्क न करना !
आशय भले समझ न आये तो भी भ्रान्ति बनाये रखना !

जैसी भी हम किस्मत लाये , ये जीवन बेकार गया, पर
पति पत्नी की सुन्दर जोड़ी का आभास दिलाये रखना !

थके हुए नाविक अब तो नींद से बोझिल होती पलकें,
नज़र  दूर से ही आ जाओ , इतने दीप जलाये रखना !

Monday, May 26, 2014

हमको अपने ताल,समंदर लगतें हैँ -सतीश सक्सेना

भाषण देते, मस्त सिकंदर लगते हैं !
भोले वोटर, सचमुच बंदर लगते हैं !

भीड़तंत्र का किला, मीडिया ने जीता
नेताजी अब और , मुछन्दर लगते हैं !

और किसी के, रंग रूप से क्या लेना,
हमको इनके गाल, चुकंदर लगते हैं !

कंगूरों को, सर न झुकाया जीवन में !
चंदा , सूरज , घर के अंदर लगते हैं !

हमें तुम्हारी धन दौलत से क्या लेना,
हमको अपने ताल, समंदर लगते हैं !

Sunday, May 25, 2014

दुनियां वाले कैसे समझें , अग्निशिखा सम्मोहन गीत -सतीश सक्सेना

कलियों ने अक्सर बेचारे
भौंरे  को बदनाम किया !
खूब खेल खेले थे फिर भी  
मौका पा अपमान किया !
किसने शोषण किया अकेले, 
किसने फुसलाये थे गीत !
किसको बोलें,कौन सुनेगा,कहाँ से हिम्मत लाएं गीत !

अक्सर भोली ही कहलाये
ये सजधज कर रहने वाली !
मगर मनोहर सुंदरता में 
कमजोरी , रहती हैं सारी !
केवल भंवरा ही सुन पाये, 
वे  धीमे आवाहन  गीत !
दुनियां वाले कैसे समझें, कलियों के सम्मोहन गीत !

स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम
देवो न जानाति कुतो मनुष्यः
शक्तिः एवं सामर्थ्य-निहितः 
व्यग्रस्वभावः , सदा मनुष्यः !
इसी शक्ति की कर्कशता में, 
पदच्युत रहते पौरुष गीत !
रक्षण पोषण करते फिर भी, निन्दित होते मानव गीत !

नारी से आकर्षित  होकर
पुरुषों ने जीवन पाया है !
कंगन चूड़ी को पहनाकर
मानव ने मधुबन पाया है !
मगर मानवी समझ न पायी, 
मंजुल मधुर समर्पण गीत !
अधिपति दीवारों का बनके , जीत के हारे पौरुष गीत !

निर्बल होने के कारण ही 
हीन भावना मन में आयी 
सुंदरता  आकर्षक  होकर  
ममता भूल, द्वेष ले आयी 
कड़वी भाषा औ गुस्से का 
गलत आकलन करते गीत ! 
धोखा खायें सबसे ज्यादा,  अपनी  जान गवाएं गीत !

दीपशिखा में चमक मनोहर
आवाहन  कर, पास बुलाये !
भूखा प्यासा , मूर्ख  पतंगा , 
कहाँ पे आके, प्यास  बुझाये  ! 
शीतल छाया भूले घर की,
कहाँ सुनाये जाकर गीत !
जीवन कैसे आहुति देते , कैसे जलते  परिणय गीत !

 (स्वप्न गीत के लिए )

Thursday, May 22, 2014

अब दुमदार,दलाल मीडिया - सतीश सक्सेना

पहले था , दिग्पाल मीडिया !
अब दुमदार,दलाल मीडिया !

जबसे मुंह में , खून लगा है !
तब से  है,कव्वाल मीडिया !

राजनीति  से,  बकरे  आये  ! 
करता खूब हलाल मीडिया !

एक इलेक्शन, के आने पर ! 
जम के मालामाल मीडिया !

मूरख जनता  को , भरमाये !
रोज बजाये  गाल  मीडिया !

Monday, May 19, 2014

खो रहे विश्वास को,बापस बुलाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

सुलगते घर में,मधुर धारा बहाना चाहता हूँ ! 
हो रहे बरसों से ये,झगडे मिटाना चाहता हूँ !

मानवों को ज्ञान नफरत का पढ़ाया है बहुत
पंडितों  से दूर,इक बस्ती,बसाना चाहता हूँ !

साधुओं के रूप  में, शैतान सम्मानित न हो !
आस्था मासूम की,केवल बचाना चाहता हूँ !

जो भी जन्में साथ में,उनका भी हक़ पूरा रहे !
खो रहे विश्वास को,बापस बुलाना चाहता हूँ !

ढोंगियों ने देश को, बरबाद करके रख दिया !
मेरा घर खुशहाल हो ये गीत गाना चाहता हूँ !

Tuesday, May 6, 2014

दुम को हिलाते रहिये -सतीश सक्सेना

अपने अरमानों के ये दीप , जलाते रहिये !
हर सड़े फूल को , फ़िरदौस बताते रहिये !

हाथ जोड़े , नज़र  मुस्तैद , दिखाये  रहिये ! 
आँख नीची रखें और दुम को हिलाते रहिये 

कौन जाने वे आज ,घर से लड़ के आएं हो 
उनके हमदर्द बन ,आँखों को भिगाते रहिये 

जब कभी आग लगी पाओ तो सब लोगों को 
आँख भर ख़ुद की ही तकलीफ़ दिखाते रहिए !

क्या पता कौन दिन, उम्मीद नज़र आ जाये 
हर इक महताब को, आदाब बजाते रहिये !

Saturday, May 3, 2014

आदत बदलो यार, नहीं तो जल्दी जाओगे -सतीश सक्सेना

                           डायबिटीज़, ब्लडप्रेशर, मोटापा, एसिडिटी एवं गैस यह सामान्यतः हर घर में मौजूद हैं , कारणों को जानने का न समय है और न रूचि , बस ड़ाक्टर ने, कुछ दवाएं खाने मे और बढ़ा दी हैँ !
हज़ारो वर्ष से मानव जमीन पर रह रहा है , प्रकृति के विपरीत, मानव जनित भोज्य सामग्री से, सबसे अधिक हानि मानव ने ही उठायी  है ! 
प्रकृति ने जीवात्माओं को जन्म के साथ ही,उसमें प्राकृतिक तौर पर, समझ विकसित कर दी थी !
  • हमें उसने लगातार,सांस लेने की  मशीनरी दी जिससे रक्त स्वच्छ रहे !प्राणस्वरूप हवा,जीने का आधार थी ! जिसकी आज हम कद्र नहीं करते हैं ! गहरी सांस लेने के भी फायदे हम भूल गये 
  • उसने बचपन मे, हमें माँ का दूध दिया , और कुछ समय बाद दूध सुखा कर हमारे दांत निकाले , जिससे अब हम ढूध छोंड़कर , हम अन्न , फल और पत्ते खा सकें ! प्रकृति द्वारा, माँ का दूध सुखाने का अर्थ, बड़े होते मानव  का अनावश्यक तेलीय दूध बन्द कर, अन्न फल सब्जियों पर आश्रित करना था !
  • प्राकृतिक भोजन में , तेल और और फ़ैट बेहद कम मात्रा में उपलब्ध थे , मगर इन्सान ने उसका  अधिक मात्रा में निकाल कर परांठे,समोसा,पूरी,लड्डू, एवम चीनी जैसे केमिकल आदि बनाकर खाने शुरु कर दिये जो निर्धारित और प्रकृतिक मात्रा से, बेहद अधिक खतरनाक थे !
  • प्रकृति ने मानव शरीर में , अपने आपको स्वस्थ करने के लिये सेल्फ हीलिंग सिस्टम दिया था , मगर इन्सान ने अपनी बुद्धि चलाते हुए, उसमें व्यवधान उत्पन्न करना शुरू कर दिया ! बुखार द्वारा शरीर अपने आपको ठीक करने का प्रयत्न करता है तब इन्सान की कोशिश बढे हुए टेंप्रेचर को कम करने की रहती है ! फोड़े द्वारा प्रकृति, शरीर के बढे हुए इन्फेक्शन को एक जगह केन्द्रित कर, उसे पस स्वरूप में बाहर निकालना चाहता है तब हमलोग उस फोड़ें से निज़ात पाने के लिये , उसे सुखाने का प्रयत्न करते हुए, शरीर मे बेहद खतरनाक एंटी बायोटिक्स एवम जान लेवा स्टीरॉइड , प्रवेश करा रहे होते हैं !हमने मानव शरीर के प्रतिरक्षा सिस्टम को केमिकल दवाओं द्वारा बरवाद  करने की कसम खा रखी है !
  •  पहले इन्सान को जीवन यापन के लिये रोज लगभग १० किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था और अब इन्सान सब्जी लेने भी, कार से जाना चाहता है और पचास वर्ष पूरे करते करते,घुटनों का आपरेशन करा चुका होता है !
                             सो बुद्धिमान मित्रों,  मैने पिछले ६ माह से अपनी साइंटिफिक बुद्धि का कम प्रयोग करते हुए , प्राकृतिक वस्तुओँ पर निर्भरता बढ़ायी है एवम सुबह ४५ मिनट टहलने के अतिरिक्त , ४५ मिनट शुद्ध वायु को फेफड़ों में भरते और निकालते हुए , बन्द पड़े, जंग लगे फेफड़े खोलना शुरु किया है , इससे रक्त आश्चर्यजनक रूप से साफ़ हुआ है और ४ मंजिल  सीढियाँ चढ़ने में,  हांफना बन्द हो गया , क्या कहते हैं टचवुड  !! 
                             सबसे खतरनाक केमिकल चीनी चाहे वह किसी भी रूप मे हो , का त्याग हमेशा के लिये करके अपने  स्वास्थ्य  को, ३५ वर्षीय बनाये रखने में कामयाबी हासिल की है ! परांठे, समोसे , जलेबी और बेहद गंदे तरीके से बनायी मिठाइयां बंद कर मित्रों के साथ खूब हँसता हूँ व हंसाता हूँ !
इस वक्त ६० वर्ष की जवानी में,  डायबिटीज़ , गैस , एसिडिटी , बीपी , जॉइंटपेन , सरदर्द , तनाव, दांत और बालों  समस्याओं से मुक्त हूँ !  एलोपैथिक दवा व उपायों से हमेशा दूर रहता हूँ , यहां तक कि साबुन और टूथ पेस्ट  का उपयोग नहीं करता क्योंकि जब शेर अपने सबसे आवश्यक मज़बूत दांत कभी नहीं माँजते  तो मैं केवल इसलिए मांजू कि सब लोग क्या कहेंगे  ??
माय फुट !!

Monday, April 28, 2014

जाते जाते रुला गया है कोई - सतीश सक्सेना

our dear Goofy (31 Dec 2006 -27april 2014)
अपना घर त्याग,वो गया है कहीं ! 
थक के लगता है सो गया है कहीं !

बड़ी हिम्मत से , लड़ रहा था वह !
अपनी चौखट से,खो गया है कहीँ ! 

बड़े मज़बूत दिल का,  बच्चा था !
लड़ते लड़ते ही , तो गया है कहीं !

जाने किस कष्ट से, भिडा इकला !
मर के भी  प्यार,बो गया है कहीँ !

किसने छीना है,उसका घर यारोँ 
आज विश्वास , रो गया है  कहीं ! 

Sunday, April 20, 2014

इक असंभव गीत, गाना चाहता हूँ -सतीश सक्सेना

              अपने बचपन के उन सबसे बुरे दिनों में,जब माँ की मृत्यु हुई , मैं इतना छोटा था कि अपनी माँ का चेहरा भी याद नहीं ……
               काश एक बार वे सपने में ही दिख जाएँ ! ऐसी कौन सी भूल हुई मुझ बच्चे से, जो वे छोड़ कर हमेशा को, वहां चली गयीं जहाँ से कोई कभी बापस नहीं लौटा !! 

             यह मात्र एक रचना न होकर माँ को लिखा एक एक पत्र है,मेरा अपना, माँ के लिए …… 

माँ ,तुझे वापस , बुलाना चाहता हूँ !
इक असंभव गीत , गाना चाहता हूँ !

इक झलक तेरी, मुझे मिल जाये तो,
एक कौरा ही, खिलाना चाहता हूँ !

मुझसे हो नाराज, मत मिलना मुझे,
अपने बच्चों से, मिलाना चाहता हूँ !

जानता हो अब न तुम आ पाओगी
सिर्फ सपने में , बुलाना चाहता हूँ !

जाने कितनी बार ये, रुक -रुक बहे !
माँ, मैं आंसू को, जिताना चाहता हूँ !

देख तो लो माँ , कि बेटा है कहाँ ?
तेरा घर तुझको दिखाना चाहता हूँ !

बहुत दिन से चल रहे हैं , बिन रुके !
आज दिनकर को बिठाना चाहता हूँ !

(आज पता चला कि यह कतील शिफ़ाई की जमीन पर लिखा गया , अनजाने में ) - ३१ अगस्त १५  

Saturday, April 19, 2014

मुझको इस देश के आँगन में दिखता है चन्दा कोई नहीं -सतीश सक्सेना

इन बुरी अँधेरी रातों में , दिखता है  बंदा  कोई नहीं !
तारों को हिम्मत दिलवाए, ऐसा भी चंदा कोई नहीं !

बच्चियां सिर्फ खतरा झेलें इंसानों के इस जंगल में 
सारी दुनिया के जीवों में, मानव से गंदा कोई नहीं ! 

वृद्धों को घर में ही लूटा, बिन ममता मोह शातिरों ने 
ज़िंदा रहने की चाह नहीं, पर घर में फंदा कोई नहीं !

उस रात बिना पैसे आकर, इक  बूढ़ा द्वार सुधार गया   
दिखने में बढ़ई लगता था, पर हाथ में रंदा कोई नहीं !

लाखों कतार में राष्ट्रभक्त , बैठे हैं, नोट कमाने को !
इन दिनों राज नेताओं के , धंधे में मंदा कोई नहीं !

Wednesday, April 16, 2014

गीतकार की हर कविता के, जाने कितने माने होंगे -सतीश सक्सेना

घने कष्ट  और वीरानों में , तुम्हें गीत भी गाने होंगे !
कितनी बार अकेले बेमन,उत्सव तुम्हें मनाने होंगे !

सांस नहीं ले सके सुबह से,ऐसे कैसे शाम हो गयी,
बारिश के आने से पहले,उजड़े छप्पर छाने होंगे !

अंतिम क्षण तक टूट न पाएं , ऐसे हों ये रिश्ते नाते ,
आधी जान हमारी उस घर ,वे कैसे अनजाने होंगे !

अर्थ, समीक्षाकार लिखेंगे,कैसे उनकी बात बताऊँ ,
गीतकार की हर कविता के,जाने कितने माने होंगे !

स्वाद हमें कड़वे शब्दों का,बड़े सबेरे ही मिल जाता,

जलतरंग सी मीठी ध्वनि को, चूड़ी कंगन लाने होंगे !

गिनती के दिन चुकने आये,अपने सारे काम करा लें !
कौन जानता कल सतीश के जाने कहाँ ठिकाने होंगे !


Sunday, April 13, 2014

अब तो मंदिर के इश्तिहार छपाया करिये -सतीश सक्सेना

धर्म की आड़ में,दुश्मन को डराया करिये !
दहशते भीड़ को, वोटों से भुनाया करिये !

इसी  दुनियां  में , दरिंदे भी तो पाये जाते
कभी लोबान को,बस्ती में घुमाया करिये !

काश लड़ते हुए मंदिर औ मस्जिदों के लिए 
कोई  कबीर भी , मिलने को बुलाया करिये !

सियासी दावतें, अक्सर ही खूब छपती हैं , 
कभी गरीब को इफ़्तार, खिलाया करिये !

आजकल आपकी, हैवानियत के चरचे हैं !
अजी ये रात की बातें, तो छिपाया करिये !

Thursday, April 10, 2014

ये ग़ज़ल के कद्रदां भी क्या करें ? -सतीश सक्सेना

ये बेचारे बागबां , भी क्या करें !
बिन बुलाये खामखां भी क्या करें !


अब ये जूता और चप्पल ही सही
ये वतन के नौजवां, भी क्या करें !

भौंकने पर किस कदर नाराज हो
ये  बेचारे बेजुबां ,भी क्या करें !


हाले धरती, देख कर ही रो पड़े,
दूर से ये आस्मां भी , क्या करें !

झाँकने ही झांकने , में फट गए ,
ये हमारे गिरेबां भी , क्या करें !


तालियां, वे  मांग कर बजवा रहे
ये गज़ल के कद्रदां भी, क्या करें !

Monday, April 7, 2014

मूर्खों को हर बार,चेताना पड़ता है ! -सतीश सक्सेना

जीवन में कितना, पछताना पड़ता है !
गलती का भुगतान चुकाना पड़ता है !

राजनीति में, धन का धंधा होता है,
ऐसे क्यों हर बार ,बताना पड़ता है !

नाग देख के , कौवे  शोर मचाते हैं !
मूर्खों को हर बार,चिताना पड़ता है ! 

हम पर हमले से पहले तो, सोचोगे !
बीच में अपने,राजपुताना पड़ता है !

रोटी,पानी,कपडे, दवा और दारु को  
उनको कितनी बार,सताना पड़ता है !

Thursday, April 3, 2014

लालची राजनैतिक झंडेबरदार -सतीश सक्सेना

आज कल राजनीतिक नेताओं के झंडेबरदार ,बहुत अधिक क्रियाशील हैं , देश में ४-५ प्रमुख पार्टियों के प्रचार के लिए,नेताओं के इन एजेंटों को, आप फेसबुक पर, मुंह से झाग निकालते हुए, विपक्षी नेता को गालियाँ देते देख सकते हैं ! जबतक किसी विशेष पार्टी की आप बुराई न कर रहे हों तब तक ठीक हैं अगर आपने कोई खामी बता दी तो ये तुरंत आपको विपक्षी पार्टी का आदमी बताकर, गाली गलौज पर उतर आयेंगे ! 

बदचलन, असंस्कारी एवं भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की सम्मान रक्षा के लिए, यह झंडाबरदार, किसी भी हद को पार करते देखे जा सकते हैं ! पार्टी कार्यकर्ता का तमगा लगाए ये लोग, वास्तव में , पार्टी के झंडाबरदार हैं , जो दुम हिलाए अपने नेता के पैरों में, इस उम्मीद से बैठे रहते हैं कि कभी तो उनका हिस्सा उन्हें मिलेगा और वारे न्यारे होंगे ! इस बीच में अपने राजा को खुश करने के लिए, जब तब , विरोधी पक्ष की निकलती हुई गाडी के पीछे दौड़ते हुए, तब तक भौंकते हैं जब तक खुद राजा उन्हें चुप हो जाने के लिए न कह दे !

आज संतोष त्रिवेदी ने एक बयान दिया जिसमें उन्होंने दुःख व्यक्त किया कि इस कट्टरता के चलते कुछ मित्रों ने उनसे किनारा कर लिया , अपने संवेदन शील मित्र को, मेरा सुझाव था कि अच्छा हुआ जो इन राजभक्तों से तुम्हारी जान छुड गयी वे मित्र क्या जो वैचारिक मतभेद तक न स्वीकार कर सकें !

कट्टर समर्थन अथवा नफरत दोनों ही इन भक्तों में आम है , लगता है सड़क पर चलते वक्त, खाते पीते , परिवार में बैठे हो अथवा बाहर, इन्होने राजनैतिक आकाओं का नाम,अपनी पीठ पर गुदवा लिया है , वे किसी पार्टी के हो सकते हैं मगर उनकी अपनी व्यक्तिगत पहचान नष्ट हो चुकी है अतः वे चाहे कुछ भी हों पर वे संवेदनशील मित्र नहीं हो सकते !

राजनैतिक पार्टियों के इन झंडाबरदारों को यह खूब पता है कि राजनीति में नोट कैसे कमाए जाते हैं और सारे नेताओं का उद्देश्य, राजनीति में आने का क्या है ? करोड़ों रूपये दाव पर लगा, सौ गुना बापस , आने का इंतज़ार करते इन चमचों को, अपना हिस्सा मिलने की पूरी उम्मीद है ! अतः देश भक्ति , वीररस, धर्म और शहीदों के गीत गाते इन देश भक्तों ने कमर कस , अपने उस्तादों के लिए, जिताने हेतु जिहाद का आवाहन कर रखा है !

मूरख जनता खूब लुटी है, पाखंडी सरदारों से !
देश को बदला लेना होगा, इन देसी गद्दारों से !

पूंछ हिलाकर चलने वाले,सबसे पहले भागेंगे !
सावधान ही रहना होगा, इन झंडेबरदारों से !
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