Sunday, July 20, 2008

अम्मा ! -सतीश सक्सेना

किस अतीत की याद आ रही 
कौन ध्यान में तुम खोई हो !
चारों धामों का सुख लेकर,
किस चिंता में पड़ी हुई हो !
ममतामयी कष्ट में पाकर, 
सारी खुशियां खो जाएंगी 
एक हँसी के बदले घर में , फिर से मस्ती छा जायेगी !

सारे जीवन , हमें हंसाया, 
सारे घर को स्वर्ग बनाया,
कितने कष्ट उठाकर तुमने
हम सबको मजबूत बनाया
तुमको अब कष्टों में पाकर,
खुशियाँ कैसे हंस पाएंगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, फिर से रौनक आ जायेगी !

कष्ट कोई न तुमको आए
हम सब तेरे साथ खड़े हैं,
क्यों उदास है चेहरा तेरा,
इन कष्टों में साथ खड़े हैं !
ऐसे दुःख में अम्मा मुंह में, 
कैसे रोटी चल पाएगी !
एक हँसी के बदले अम्मा, घर में दीवाली आयेगी !

सबका, भाग्य बनाने वाली,
सबको राह दिखाने वाली
क्यों सुस्ती चेहरे पर आयी
सबको हँसी सिखाने वाली 
तुमको इस दुविधा में पाकर ,
घर में मायूसी छायेगी !
तेरी एक हँसी के बदले,सबकी दुनियां खिल जायेगी !

भारत मां के ये मुस्लिम बच्चे ! (प्रथम भाग)


"...............हिंदी लेखन-पत्रकारिता में जान खपा रहे मुस्लिम साथियों की दर्द-ए-दास्तान बहुत तवील है भाई ।फिर कभी. कहीं नागवार गुजरी हों तो क्षमा करेंगे."
आपका अनुज
शहरोज

उपरोक्त लाइने एक मर्म स्पर्शी ख़त का हिस्सा है ,जो शहरोज ने मुझे लिखा हैं ! शहरोज एक हिन्दी विद्वान्, जिससे मेरा परिचय सिर्फ़ चंद खतों तक सीमित है, जिसने मेरी रचनाओं को छपवाने के लिए, अपनी सहायता का वायदा किया, उस दिन मुझे यह बिल्कुल आभास नहीं था की जो अपनी रचनाओं को छपवाने के लिए ख़ुद परेशान है, वह अपनी परेशानी भूल कर मेरी मदद को आगे आ रहा है ! प्रकाशकों और सरकारी तंत्र का चक्कर लगाते हुए भी शहरोज, हम जैसे अनजान लोगों की मदद में तत्पर नजर आते हैं !
"शब्द सृजन" को लिखे गए मेरे एक लाइन के पत्र ( ६ जुलाई ०८ ) "मेरे निम्न लिंक्स पर क्लिक कर, अगर छपने योग्य हों तो कृपया सूचित करें ! मैं अपना मूल्यांकन करने मैं असमर्थ हूँ " का शहरोज़ ने इस प्रकार जवाब दिया,
"रचनाकार होने और प्रकाशनों में काम करने के दोरान मिले अनुभव से ये जाना कि पुस्तक प्रकाशन और खरीद बिक्री , फिर लेखकों की रोयल्टी में कितनी बेईमानी शैतानी होती है .ऐसा नहीं है कि कथित मुख्य धारा के नामवर लेखक इन से अनजान हों .चकित करने वाला और शोक की सूचना ये है कि कई जगहों पर ये नामी-गरामी साहित्यकार प्रकाशकों की मदद करते ही दिखलाई देते हैं .यदि आपका कोई आका नहीं है तो पुस्तक प्रकाशन के लिए शायद ही कोई प्रकाशक मिले"इन सारी विषम परिस्थितियों के मद्देनज़र हम कुछ नवजवान मित्रों ने प्रकाशन योजना की शुरुआत की है .-हमारा उद्देश्य लाभ अर्जन न होकर साहित्य -सेवा कहूँ तो अत्युक्ति नहीं .-ये एक समान धर्मा युवा रचनाकारों का अपना मंच है "

पिछले १२ दिनों में लिखे, शहरोज़ का हर ख़त सहेजने योग्य है, दूसरों की मदद में तत्पर, हिन्दी भाषा की सेवा में लगा, भारत का यह सपूत, नौजवानों में एक आदर्श कायम करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है !

अपने देश के समाज की मुख्य धारा में आने के लिए जद्दोजहद करते हुए, अपने इन मुस्लिम बच्चों को देख, मेरी मां का दिल आज रो रहा होगा ! कहीं नही लगता कि यह वही देश है जिसकी सहिष्णुता की हम दुहाई देते कही नहीं थकते,

अभी बहुत काम बाकी है....... बरसों पहले, जब देश में जबानी एकता की दुहाई दी जा रही थी, कोई सोच भी नही पाता होगा कि उर्दू जैसी खूबसूरत भाषा के आँगन में पले और बड़े हुए, हमारे ये बच्चे एक दिन हिन्दी भाषा के उत्थान के लिए, हिन्दी भाषियों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर आगे चलेंगे ! और आज ये चल ही नही रहें हैं, हिन्दी के महा विद्वानों में से एक हैं, मगर चंद हिन्दी भाषी, इन्हे रास्ता चलते, गिराने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते ! संकीर्ण मन यह विश्वास ही नहीं कर पा रहा कि यह भी इस क्षेत्र के जानकर हो सकते हैं और हमसे बेहतर भी हो सकते हैं !

हिन्दी सिर्फ़ हिन्दुओं की भाषा नहीं, बल्कि सारे देश की जबान है, अगर हमारे मुस्लिम भाइयों ने, अपनी मादरी जबान, उर्दू पर, इसे तरजीह देकर इसे खुशी के साथ अपनाया है तो इसका कारण ,देश के लिए उनका अपनापन और सब कुछ करने के अरमान है ! विपरीत परिस्थितियों में हिन्दी का अध्ययन, कर हिन्दी के विद्वानों में शामिल होने की कोशिश..... यह कोई मामूली बात नहीं ! जहाँ हमें आज आगे बढ़ कर, अपने इन छोटे भाइयों का शुक्रिया अदा करना चाहिए था वहीं उल्टा हम उन पर छींटा कशी कर रहे हैं !चंद बरस पहले जहाँ कभी हिन्दी का एक भी मुस्लिम लेखक नज़र नहीं आता था वहीं आज नासिर शर्मा, असद जैदी, असग़र वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह, शहंशाह आलम, अनवर सुहैल , मजीद और शहरोज़ जैसे लोग चर्चा में हैं ! तकलीफ तो इन्हें उर्दू जबान के नुमाइंदों से मिलनी चाहिए थी पर मिल रही है उनसे, जिन्होंने इन्हे गले लगाना चाहिए ! हमें गर्व होना चाहियें अपने देश के इन मुस्लिम हिन्दी विद्वानों पर, जो सही मायनों में इस देश कि संस्कृति का एक हिस्सा बनकर, इसे हर तरह आगे बढ़ाने में मदद कर रहें हैं !

मैं अपने देश के विशाल ह्रदय को अच्छी तरह से जानता हूँ , और अपने मुस्लिम भाइयों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मेरे जैसे हजारो दोस्त, और सच्चे भारतीय हैं जो इस शुरूआती दर्द में आपके साथ देंगे , भले ही वह परोक्ष रूप में सामने नहीं दिखाई पड़ रहे ! मेरा यह भी विश्वास है कि एक दिन हिन्दी जगत से वह आदर - सम्मान आपको जरूर मिलेगा जिसके आप हक़दार हैं !
मेरा यह मानना है , लेखक तथा कवि , चाहे वह किसी भाषा के क्यों न हों , संकीर्ण स्वाभाव के हो ही नहीं सकते ! संकीर्ण स्वभाव का अगर कोई लेखक है तो वह सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए, बना हुआ लेखक है उसे आम पाठक , उन्मुक्त ह्रदय से कभी गले नहीं लगायेगा ! ऐसे व्यक्तियों को लेखक नहीं कहा जाता ! वे सिर्फ़ अपने ज्ञान का दुरुपयोग करने आए है और ढोल बजाकर चले जायेंगे ! कवि ह्रदय, समाज में अपना स्थान सम्मान के साथ पाते हैं और शान के साथ पाते हैं !

जहाँ ह्रदय में धारा बहती
प्रेम भरे अरमानों की,
प्यार हिलोरे लेता रहता,
वहीं रचा जाता है गीत

नहीं द्वेष पाखंड दिखावा
नही किसी से मन में बैर
जहाँ नही धन का आड्म्बर,
वहीं रचा जाता है गीत !

सरल भाव से सबको देखे
करे सदा सबका सम्मान
निश्छल मन और दृढ विश्वास,
वहीं रचा जाता है ,गीत !

प्रिये गीत की रचना करने
पहला कवि जहाँ बैठा था
निश्चय ही वसुधा के मन में,
फूट पड़ा होगा संगीत !

कविता नहीं प्रेरणा जिसकी
गीत नहीं भाषा है दिल की
आशा और रुझान जहाँ पर
प्रिये उसे कहते हैं गीत !

Friday, July 18, 2008

मत पढिये इन ब्लाग्स को !

                           मैंने कुछ समय पहले, कहीं पढ़ कर, ब्लाग के बारे, सोचना, शुरू किया था,! मेरा मानना था कि अपने विचार व्यक्त करने का यह अच्छा साधन है, और इसके ज़रिये शायद समाज सेवा करने का अपना शौक पूरा कर पाउँगा ! जिन मशहूर ब्लाग्स के बारे में अखबारों में पढा था कि वे बहुत अच्छा कार्य कर रहें हैं, उन्हें रोज पढ़ना शुरू किया, मगर जल्दी ही समझ में आ गया कि कहीं कोई बड़ी गड़बड़ है, और लगभग २ महीने बाद, अब तो यह समझ ही नही आता कि किस ब्लाग को अच्छा कहूं और किस को बुरा, जिसको अच्छा कहता हूँ वही कुछ दिन में अपनी असलियत पर आ जाता है !
                       हर ब्लाग पर अपने अपने ग्रुप बने हुए हैं, जो हमले से बचने और दूसरे से मुकाबला करते हैं , और यह सभी स्वनामधन्य साहित्यकार और मशहूर पत्रकार हैं जिनसे सब कोई डरते हैं, यह वो हैं जो दावा करते हैं कि देश को कभी सोने नहीं देंगे ! आज एक बहुत मशहूर ब्लाग ( जिसको मैं बहुत पसंद करता हूँ/ था शायद नाम के कारण ) के द्बारा, बताई गयी एक ब्लाग पर गया तो लगा कि किसी पॉर्न ब्लाग पर आ गया, अपने विश्वास को बहुत गालियाँ दी और बाहर आ गया, साथ ही एक तकलीफ भी कि पढ़े लिखे व्यक्ति जिम्मेवार क्यों नहीं हैं ? क्या उनका कोई परिवार नही है या कभी होगा भी नही, इंटरनॅशनल नेटवर्क पर हम भारतीय क्या दे रहे हैं ? हर एक ब्लाग बेहतर प्रदर्शन करने के लिए नए हथकंडे आजमा रहा है, और जो ब्लाग लोकप्रिय हैं, वे भी एक दूसरे की टांग खींचने पर लगे हैं !
                       अजीब स्थिति में हूँ, कष्ट के साथ !मैं किसी कि आलोचना नहीं करना चाहता, क्योंकि सब कहीं न कहीं अच्छा कार्य भी कर रहे हैं ! मगर चाहता हूँ कि यह अपनी एनर्जी देश हित में लगाये, उस से ही भला होगा, अपनी विद्वता का उपयोग इस कम पढ़े लिखे देश में, हम जैसे कम पढ़े लोगों को, कुछ अच्छा देकर, सुखी बनायें !

Wednesday, July 16, 2008

असद जैदी और इरफान !

इस तकलीफ में कोई बोलता क्यों नही ?
कम से कम साहित्य तथा प्रकाशन क्षेत्र में कार्य करने बाले लोगों में, संकीर्ण विचारधारा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए ! मुझे आश्चर्य है कि जब प्रतिष्ठित विद्वान् भी असंयत भाषा का उपयोग करने लगते हैं ! यह कौन सी विद्वता है और हम क्या दे रहे हैं, अपने पढने वालों को ? अगर हम सब मिलकर अपनी रचनाओं में १० % स्थान भी अगर, सर्व धर्म सद्भाव पर लिखें , तो इस देश में हमारे मुस्लिम भाई कभी अपने आपको हमसे कटा हुआ महसूस नहीं करेंगे, और हमारी पढ़ी लिखी भावी पीढी शायद हमारी इन मूर्खताओं को माफ़ कर सके !
दोनों भाइयों ने इस मिटटी में जन्म लिया, और इस देश पर दोनों का बराबर हक है ! हमें असद जैदी और इरफान सरीखे भारत पुत्रो के अपमान पर शर्मिन्दा होना चाहिए !
कवि और लेखक स्वाभाविक तौर पर भावुक और ईमानदार होते हैं , विस्तृत ह्रदय लेकर ये लोग समाज में जब अपनी बात कहने जाते हैं तो वातावरण छंदमय हो उठता है , कबीर की बिरादरी के लोग हैं हमलोग, न किसी से मांगते हैं न अपनी बात मनवाने पर ही जोर देते हैं, नफरत और संकीर्ण विचार धारा से इनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नही हो सकता ! ऐसे लोगों पर जब प्रहार होता है तो कोई बचाने न आए यह बड़ी दर्दनाक स्थिति है ! न यह हिंदू हैं न मुसलमान , इन्हे सिर्फ़ कवि मानिये और इनके प्रति ग़लत शब्द वापस लें तो समाज उनका आभारी होगा ! एक कविता पर गौर करिए ....

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशांतर में
वे बुद्धि के ढेर
इन्द्रियां झकाझक उनकीं
सर्दी-खांसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते......

उपरोक्त कविता लिखी है विजय शंकर चतुर्वेदी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार ने और इसे प्रकाशित किया है " पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊंगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए " नाम के शीर्षक से "कबाड़खाना " में ! http://kabaadkhaana.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html

ताज्जुब है कि कोई पहाड़ नहीं टूटा , न तूफ़ान आया , कोई प्रतिक्रिया नही हुई , कहीं किसी को यह रचना अपमानित करने लायक नहीं लगी। और लोगों ने, सारी रचनाओं की, चाहे समझ में आईं या नहीं, तारीफ की, कि वाह क्या भाव हैं, और कारण ?

-कि अशोक पाण्डेय तथा चतुर्वेदी हमारे अपने हैं !
-लिखने से क्या होता है, हमारे धर्म में कट्टरता का कोई स्थान नहीं ! अतः कोई आहत नहीं हुआ ! इस कविता से सबको कला नज़र आई !

मजेदार बात यह है कि यह उपरोक्त कविता लोगों की प्रतिक्रिया जानने को ही लिखी गयी थी, कि आख़िर असद जैदी जैसे मशहूर साहित्यकार की लोगों ने यह छीछालेदर करने की कोशिश क्यों की ! और जवाब मिल भी गया !

एक ख़त मिला मुझे गुजरात से रजिया मिर्जा का उसे जस का तस् छाप रहो हूँ , बीच में से सिर्फ़ अपनी तारीफ़ के शब्दों को हटा दिया है ( मेरी तारीफ यहाँ छापना आवश्यक नही है ) जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ...

नमस्ते सतिश जी, आपका पत्र पढा। पढकर हैरान नहीं हुं क्यों कि मै ऐसे लोगों को साहित्यकार मानती ही नहिं हुं जो लोग धर्मो को, ईंसानों को बाटते चलें। मै तो ---------------------------------------------------------------------------------------------------आपकी पहेचान है। उन लोगों को मैं' साहित्यकार' नहिं परंतु एसे विवेचकओं की सुचिमें रखुंगी जो अपनी दाल-रोटी निकालने के लिये अपने आपको बाज़ार में बिकने वाली एक वस्तु बना देते है। मैं अस्पताल में काम करती हुं । मेरा फ़र्ज़ है कि मै सभी दीन-दुख़ियों का एक समान ईलाज़ करुं, पर यदि मैं अपने कर्तव्य को भूल जाऊं तो इसमें दोष किसका? शायद मेरे "संस्कार" का ! हॉ, सतिष जी अपने संस्कार भी कुछ मायने रखते है। हमको हमारे माता-पिता, समाज, धर्म, इमान ने यही संस्कार दीये है कि ईंसान को ईंसानों से जोडो, ना कि तोडो।सतिष जी आपकी बडी आभारी हुं जो आपने एसा प्रश्न उठाया। मैं एक अपनी कविता उन मेरे भाइ-बहनों को समर्पित करती हुं जो अपने 'साहित्य' का धर्म निभा  रहे है। सतीश आपसे आग्रह है मेरी इस कविता को अपने कमेन्ट में प्रसारित करें। आभार

दाता तेरे हज़ारों है नाम...
कोइ पुकारे तुज़े कहेकर रहिम,
और कोइ कहे तुज़े राम।...
दाता..........
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पहेरा,
तेरा 'राज़'बड़ा ही गहेरा,
तेरे ईशारे होता सवेरा,
तेरे ईशारे हिती शाम।...
दाता......
ऑंधी में तुं दीप जलाये,
पथ्थर से पानी तुं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तु बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।...
दाता.........
क़ुदरत के हर-सु में बसा तु,
पत्तों में पौन्धों में बसा तु,
नदीया और सागर में बसा तु,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तु,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।...
दाता..........
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सुरज और ये तारे,
पतज़ड हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देख़ुं मैं ले के तेरा नाम।.........
दाता........

ऐसी कवितायें कबीर दास जी लिखते थे , मैं रजिया जी का हार्दिक शुक्रगुजार हूँ , यह कविता प्यार का एक ऐसा संदेश देती है जो कहीं देखने को नहीं मिलता ! यह गीत गवाह है की कवि की कोई जाति व् सम्प्रदाय नहीं होता
वह तो निश्छलता का एक दरिया है जो जब तक जीवन है शीतलता ही देगा !रजिया मिर्जा की ही कुछ पंक्तियाँ और दे रहा हूँ !

"झे मालोज़र की ज़रुर क्या?
मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये !
जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले,
मुझे वो जहाँ की तलाश है।
जो अमन का हो, जो हो चैन का।
जहॉ राग_द्वेष,द्रुणा न हो।
पैगाम दे हमें प्यार का ।
वही कारवॉ की तलाश है।"

मुझे बेहद अफ़सोस है कि इस विषय पर बहुत कम लोग बोलने के लिए तैयार है , मैं मुस्लिम भाइयों की मजबूरी समझता हूँ, भुक्ति भोगी होने के कारण उनका न बोलना या कम बोलना जायज है परन्तु, सैकड़ों पढ़े लिखे उन हिंदू दोस्तों के बारे में आप क्या कहेंगे जो अपने मुस्लिम दोस्तों के घर आते जाते हैं और कलम हाथ में लेकर अपने को साहित्यकार भी कहते हैं !
आज कबाड़ खाना पर असद जैदी के बारे में तथाकथित कुछ हिंदू साहित्यकारों की बातें सुनी, शर्मिंदगी होती है ऐसी सोच पर ! मेरी अपील है उन खुले दिल के लोगों से , कि बाहर आयें और इमानदारी से लिखे जिससे कोई हमारे इस ख़ूबसूरत घर में गन्दगी न फ़ेंक सके !

Monday, July 14, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! ( तीसरा भाग )

सारा जीवन किया समर्पित परमारथ में नारी ही ने , विधि ने ऐसा धीरज लिखा केवल भाग्य तुम्हारे ही में !उठो चुनौती लेकर बेटी, शक्तिमयी सी तुम्ही दिखोगी !!

दृढ़ता हो, सावित्री जैसी ,
सहनशीलता हो सीता सी !
सरस्वती सी, महिमा मंडित

कार्य साधिनी अपने पति की !
अन्नपूर्णा बनो, सदा ही

घर की शोभा तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नारी के सुंदर चेहरे पर,
क्रोध कभी न आने पाये !
क्षमा, दया और ममता बेटी
सदा विजेता होते आये !
गुस्सा कभी पास न आये ,

रजनीगंधा सी  महकोगी  !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !


स्वागत मेहमानों का करने 
दरवाजे पर हंसती आये !  
घर के दरवाजे से पुत्री ,
याचक कभी न खाली जाए !
मान करोगी अगर मानिनी,
महिमामयी तुम्हीं  दीखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

नर नारी में परम त्याग की 
शिक्षा देती, सारे जग को !
माता, पिता, सहोदर भाई
और छोड़ती है, निज घर को !
भूल पुराने घर को अपने
नयी रौशनी लानी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं रहोगी

सारा जीवन किया समर्पित
परमारथ में , नारी ही ने !
विधि ने ऐसा धीरज लिखा
केवल भाग्य, तुम्हारे ही में !
उठो चुनौती लेकर बेटी ,
शक्तिमयी सी तुम्हीं दिखोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

Next http://satish-saxena.blogspot.in/2008/08/blog-post.html

Saturday, July 12, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ( दूसरा भाग )

पत्र के पहले भाग में, बेहद प्रतिष्ठित लेखिकाओं तथा लेखकों ने अपनी उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएं दी, मैं यह स्पष्ट करना कहता हूँ कि इस कविता में बेटी को नसीहत नहीं बल्कि एक बेहद प्यार करने वाले पिता की इच्छा है कि जितना प्यार तुम मुझे करती हो उतना ही प्यार अपने नए पिता, मां और बहिन को करना और इस प्यार की शुरुआत, वहां जा कर तुम्हे करनी है, बिना उनसे उम्मीद किए !

चूंकि यह ख़त पुत्री के लिए है, स्वाभाविक है कि मुझे उसकी भावी ससुराल से कोई उम्मीद नही करनी चाहिए ! समझाने का अधिकार मुझे केवल अपनी पुत्री को ही है ...

सदा अधूरा , पति रहता है
यदि तुम साथ नहीं दे पाओ !
अगर , पूर्ण नारीत्व चाहिए
पति की अभिलाषा बन जाओ !
बनो अर्ध नारीश्वर जैसी ,
हर साधना तुम्हारी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

पति-पत्नी हैं एक डाल पर
लगे फूल दो बगिया  में  !
जब तक खिलें  न साथ ,
अधूरे लगते हैं सुंदरता में !
एक खिले , दूजा मुरझाये ,
बिन बोले सब बात कहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कमजोरों का साथ दिया तो  
ईश्वर देगा, साथ तुम्हारा !
वृद्ध जनों का प्यार मिला ,
सारा जीवन सफल तुम्हारा 
आशीर्वाद बड़ों का लेकर ,
सबसे आगे तुम्हीं रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कार्य करो संकल्प उठा कर
खुशियां घर में हंसती आये !
स्व-अभिमानी बनकर रहना
पर अभिमान न होने पाये !
दृढ़ विश्वास ह्रदय में लेकर, 
कार्य करोगी सफल रहोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

कमजोरों के लिए सुपुत्री,
जिस घर के दरवाजे खुलते !
आदि शक्ति परमात्मा ऊपर,
जिस घर श्रद्धासुमन बिखरते !
कभी अँधेरा पास न आए 
सूर्य-किरण सी तुम निखरोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !
next part http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_14.html

refer :

http://sumanpatil-bhrashtachar-ka-virus.blogspot.in/2014/01/blog-post_11.html

Friday, July 4, 2008

एक पिता का ख़त पुत्री को ! (प्रथम भाग )

आधुनिकतावाद की ओर भागते भारतीय समाज में, पाश्चात्य सभ्यता की जो बुराइयाँ आईं, हम भारतीयों के लिए , बेहद तकलीफदेह रहीं ! और आग में घी डालने का कार्य किया, पैसा कमाने की होड़ में लगे इन टेलीविजन चैनलों ने, चटखारे लेकर, सास के बारे में एक्सपर्ट कमेंट्स देती तेजतर्रार बहू, लगभग हर चैनल पर नज़र आने लगी और फलस्वरूप तथाकथित, शिक्षित विवाहित भारतीय महिलाएं यह भूल गईं कि इस टीवी चैनल का आनंद, उनकी ही तरह उसकी भाभी भी ले रही है , और इस तरह भारतीय महिलाओं के लिए नए संस्कार हर घर में पनपने लगे ! नए "गुणों" को सीखतीं, हमारी विवाहित पुत्रियाँ यह भूलती जा रही हैं कि वह एक दिन इसी घर में सास एवं मां का दर्जा भी पाएँगी तथा वही संस्कार उनके आगे होंगे !

भले ही कोई पुरूष या महिला नकार दे, पर क्या यह सच नहीं है कि किसी घर ( मायका या ससुराल ) में, माँ को वो सम्मान नही मिलता जिसकी वो पूरी हकदार है ! और जननी का सम्मान गिराने का अपराध सिर्फ़ भावी जननी ( बेटी ) ने किया और असहाय पिता (सहयोगी पति ) कुछ न कर पाया !

हर स्थान पर पुत्री यह भूल गई कि सास भी एक पुत्री है और मेरी भी कहीं मां है, जिस बहू ने सास का मजाक उड़ाया उसे उस समय यह याद ही नही आया कि मेरी मां के साथ भी यह हो सकता है, और जब मां के साथ वही हुआ तो वो लड़की ( एक बहू) असहाय सी, अपनी भाभी का या तो मुंह देखती रही या उसको गाली दे दे कर अपना मन शांत किया !

नारी जागरण का अर्थ यह बिल्कुल नही कि हम अपने बड़ों की इज्जत करना भूल जायें, या बड़ों की निंदा करने और सुनाने में गर्व महसूस करें ! अपनी सास का सम्मान, अपनी मां की तरह करके, बच्चों में संस्कार की नींव डालने का कार्य शुरू करें ! सास और ससुर के निर्देश, अपने माता पिता के आदेश की तरह स्वीकार करने लगें तो हर घर एक चहकता, महकता स्वर्ग बन सकता है !

मैं, एक कविह्रदय, यह नहीं चाहता कि मेरी पुत्री यह दर्द सहे व महसूस करे ! और यही वेदना यह ख़त लिखने के लिए प्रेरणा बनी !

मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं ,
याद लाडली रखना इसको
यदि तुमको कुछ पाना हो

तो देना पहले सीखो पुत्री !
कर आदर सम्मान बड़ों का,
गरिमामयी तुम्हीं होओगी  !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

उतना ही कोमल मन सबका  
जितना बेटी, तेरा मन है !
उतनी ही आशाएँ  तुमसे ,
जितनी तुमने लगा रखी हैं !
परहित कारक बनो सुपुत्री , 
भागीरथी तुम्हीं  होओगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं रहोगी !

उनकी आशाओं को पूरा,
करने का है धर्म तुम्हारा
जितनी आशाओं को पूरा
करवाने का स्वप्न तुम्हारा
मंगलदायिनि  बनो लाडली,
स्वप्नपरी सी तुम्हीं लगोगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

पत्निमिलन की आशा लेकर
उतना ही, उत्साह ह्रदय में  !
जितनी तुमको पिया मिलन
की अभिलाषा है गहरे मन में
प्यार किसी का कम न मानो, 
साध तुम्हारी पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !

पति है जीवन भर का साथी

दुःख के साथ ख़ुशी का साथी ! 
तेरे होते, कभी अकेलापन 
महसूस  न  , करने  पाये ! 
सदा सहायक रहो पति की, 
हर अभिलाषा पूरी होगी !
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्हीं  रहोगी !
......क्रमश
http://satish-saxena.blogspot.in/2008/07/blog-post_12.html

Sunday, June 29, 2008

शिंजिनी सेनगुप्ता, १६ वर्ष

                    एक मशहूर डांस रियलिटी शो "धूम मचा दे धूम" में, शिंजिनी सेनगुप्ता, १६ वर्ष , क्लास XI स्टुडेंट, बाल कलाकार के रूप में भाग ले रही थी, बताया जाता है कि एक जज ने उसे काफी डांट लगाई, और शो से बाहर कर दिया, यह बच्ची वह अपमान न सह सकी तथा इस सदमे के फलस्वरूप अपनी आवाज खो बैठी, इस समय वह, इस पैरालैटिकल अटैक के इलाज के लिए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ एंड साइंस (निमहंस ) बंगलौर, में भरती है !
                      १६ वर्षीय बच्ची शिंजिनी सेनगुप्ता एक रियलिटी डांस शो में इस लिए शामिल हुई थी कि उसकी प्रतिभा का सम्मान होगा ! पर इस बच्ची को मिला, सबके मध्य जज द्वारा अपमान, जिस को वह झेल न सकी ! कैमरों के सामने, स्टेज शो में, हर कोई अपने आप को सबसे आगे लाना चाहता है, और पैसा बरसने की जगह पर, अगर यह मौका जज साहब को मिले तो सामने कोई मासूम बच्ची ही क्यों न हो , अपनी बुद्धिमत्ता के प्रदर्शन का मौका, अनजाने में शिकार होती एक मासूम बच्ची और चैनल के सामने बैठे हुए इस देश के करोडो दर्शक !
Show must go on !
मगर क्या यह मशहूर लाइन, जो सर्वथा जीवंत सत्य है, शिंजिनी केस में आप स्वीकार करेंगे ? क्या यह शो किसी कला का प्रतिनिधित्व कर पा रहे हैं या सिर्फ़ पैसा कमाने का सर्वश्रेष्ठ मौका दे रहे हैं !

Monday, June 16, 2008

तुम्हारे दर्द में, मैं शामिल हूँ ( ओपन लैटर )

यह ख़त मैंने इरफान को "टूटी हुई बिखरी हुई" ब्लाग पर दिनांक ११-६ -०८ को छपे बीकानेर का एक संस्मरण के जवाब में लिखा है ! यह ख़त बहुत तकलीफ से लिखा है सो चाहा की अपने ब्लाग पर अन्य भाइयों के लिए प्रकाशित करूं शायद इससे कुछ लोगों का भला हो ! मुझे आप सबसे, सहमति चाहिए , कृतार्थ हूँगा !

इरफान भाई !
"अलाउद्दीन खिलजी मुसलमान था परन्तु दयालु था !" निस्संदेह यह तोडे मरोड़े भारतीय इतिहास का एक हिस्सा है जो इस देश के बच्चे बचपन से पढते चले आ रहे हैं ! संकीर्ण बुद्धि के हिंदू विद्वानों द्वारा लिखे गए इस कुत्सित इतिहास के वदौलत ही, हम दोनों भाई प्यार के साथ, सच्चे मन से हंस भी नही पाते हैं. इस इतिहास में हर मुसलमान बादशाह को निर्दयी तथा कट्टर व हर हिंदू राजा को आदर्श बताया गया ! बालमन इसी इतिहास को सही मान कर आचरण करने लगा
जिसकी परिणिति स्वरूप आप जैसे भारत पुत्र को भी अपने देश में अपमान झेलना पड़ा !
अशिक्षा और असहिष्णुता ने इस देश के दोनों बच्चों का बहुत नुकसान किया है ! खासतौर पर मुस्लिम भाई अविश्वास और असुरक्षा के वातावरण में न केवल रह रहे हैं बल्कि उन्हें बार-बार अग्निपरीक्षा भी देने को मजबूर किया जाता रहा है कि यह देश उनका भी है !
हजारों जातियों वाले इस देश में अपनी जाति और कौम का साथ देते, हजारों स्वाभाविक उदाहरण हैं ! मगर मुस्लिम उदाहरण हमें नागवार लगते हैं ! मोहम्मद शुएब को आई पी एल में खेलते देख लाखो हिन्दुओं ने तालियाँ बजाई तो कोई बात नहीं मगर इस टूर्नामेंट से पहले अगर कोई, किसी भारतीय मुस्लिम को पाकिस्तान - ऑस्ट्रेलिया मैच में शुएब की तारीफ में तालियाँ बजाते देखता, तो भवें तन जाती !
हम शिक्षित हिन्दुओं व तथाकथित साहित्यक विद्वानों का यह दायित्व बनता है कि बहुमत में सामाजिक चेतना जगाकर सही बात लोगों को बताने का प्रयत्न करें, खास तौर पर मासूम बच्चों को इस ग़लत इतिहास पढने से रोकें ! जिससे हमारा भविष्य गर्व से आगे बढ़ सके ! लगभग १३ वर्ष पहले एक कविता लिखी थी शायद आपको पसंद आए !

जाति पांति और भेदभाव
के नाम चढ़े भगवान भी
नास्तिक आज बचाने जाते जन्मभूमि श्रीराम की !

राजनीति के लिए ख़रीदे
जाते हैं भगवान भी
रामनाम को बेच रहे हैं धर्म के ठेकेदार भी !

अन्तिम सच को भूल
फिरें इतराते झूठी शान में
धर्म आड़ में लेकर लड़ते क़समें खाते राम की !

मानवता की बली चढाते
सीना ताने खून बहाते
रक्त होलिका खेलें, फिर भी गाते महिमा राम की !

दिल में घ्रणा समेटे मन
में बदले की भावना लिए
राज्यपिपासु खोजने जाते, जन्मभूमि श्रीराम की !

परमपिता परमात्मा की भी
जन्मभूमि सीमित कर दी
मां शारदा निकट नही आईं, करते बातें ज्ञान की !

प्राणिमात्र पर दया, धर्म
सिखलाता बारम्बार है
पवनपुत्र के शिष्य, लुटाते मर्यादा श्रीराम की !
सादर आपका
सतीश

Sunday, June 15, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( चौथा भाग ) - सतीश सक्सेना


इस पृष्ठ पर लिखी अधिकांश पंक्तियाँ, मेरे १३ वर्षीय , किशोर विद्यार्थी बेटे के उलझन भरे प्रश्नों के उत्तर तथा एक पिता के सुझाव हैं ! ज्ञात हो की यह कविता १९९३ में लिखी गई थी !
समाज की बुराईयों तथा अन्याय के खिलाफ लड़ने की एक अतिरिक्त इच्छा मेरे अन्दर शुरू से थी, उस दर्द की परिणिति इन रचनाओं के माध्यम से हुई! मगर कभी प्रसिद्धि की इच्छा नही थी इसलिए यह कवितायें डायरी में बंद रहीं ! गूगल  ट्रांसलिटरेशन एवं ब्लोगिंग के कारण यह सम्भव हुआ ! और वो कवितायें आपके सम्मुख आ पा रहीं हैं, अगर पसंद आयें तो लेखन सफल मानूंगा  !


सदियों का खोया स्वाभिमान
वापस दिलवाना है इनको ,

हम  लोगों द्वारा ही बोये  
काँटों से मुक्ति मिले इनको 
ठुकराए गए भाइयों का
अधिकार दिलाने आ आगे ,
अधिकार किसी का छीन अरे,क्यों लोग मनाते दीवाली?

कुछ कार्य नया करने आओ
आओ नवयुग की संतानों

अपने समाज में व्याप्त रहीं  
इन बुरी रीतियों को जानों  
हो शादी विवाह मानवों में,

जाति बन्धन का नाम मिटे ,
रूढ़ि  बन्धन में बंधे बंधे , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?

बच्चों मानवकुल ने अपने
कुछ लोग निकाले घर से हैं !

बस्ती के बाहर ! जंगल में ,
कुछ और लोग भी रहते हैं !
निर्बल भाई को बहुमत से , 

घर बाहर फेका है हमने !
आचरण बालि के जैसा कर क्यों लोग 
मनाते दीवाली?

घर के आँगन में लगे हुए
कुछ वृक्ष बबूल देखते हो !
हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,

कांटे राहों में, देखते हो !
काटो बिन मायामोह लिए,

इन काँटों से दुःख पाओगे
घर में जहरीले वृक्ष लिए , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

आओ हम शक्ति आजमाएं 
उन दुर्योधनों  से लड़ते हैं !
जो निर्बल, बाल ,ब्रद्ध, नारी
कुल को अपमानित करते हैं
रक्षित बन इनके जीवन में , 

तुम पुण्य कमाओगे भारी
शक्ति का करके दुरुपयोग , क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?
......क्रमश







Friday, June 13, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? ( तीसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

मुझे एक मित्र ने कहा कि आज स्थिति , ऐसी नहीं जैसी अपने वर्णित की है ! जो लोग शहरों में रहते हैं , उन्हें शायद वस्तुस्थिति का ज्ञान नही है, मूल भारत में आज भी स्थिति वैसी ही है ! मेरा यह मानना है कि सच्चाई को सामने आना ही चाहिए चाहे वह कितनी ही कड़वी क्यों न हो !

छाया प्रकरण से भी आगे 

कुछ महा धर्म ज्ञानी आये 
पदचिन्ह मिटे पैदल चलते 
पैरों में झाड़ीं, बांधी थी !
पशुओं से भी बदतर जीवन,

कर दिया धर्म रखवालों ने !
मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

पानी पीने को पनघट पर
कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
छू जाए , महा अपराधी है
प्यासा गरीब जल के बदले,

पिटता है वस्त्र रहित होकर !
मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

अधिकार नाम से दिया नहीं
कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
धन अर्जित संचित करने का
अधिकार लिया रखवालों ने
जूठन एकत्रित कर खाओ, 

धन का तुम को कुछ काम नहीं !
तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

वंचित रखा पीढियों इन्हें
बाज़ार ,हाट, दुकानों से !
सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
मीठा, खरीद कर खाने से !
हर जगह सामने आता था, 

अभिमान सवर्णों का आगे !
मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें !
संस्कृत का,क ख ग न पढ़ा,

व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं !
ऐसे पंडित कुलगुरु बना , क्यों लोग मनाते दीवाली  ?


भोजन में लेते मांस और 
मदिरा पीते जल के बदले
पूजा में बैठ आचरण पर
वेदों की ऋचा सुनाते हैं
ऐसे ज्ञानी पुरोहितों से है  
त्राहि त्राहि माँ  सरस्वती  !
अधकचरा ज्ञान धर्म का ले क्यों लोग मनाते दीवाली ?

ईश्वर समक्ष अपने को रख
बनियों को अर्थ हेतु माना
क्षत्रिय को सौंपी निज रक्षा
खुद पूज्य बने सारे युग के
सेवा करने को निम्न कोटि,
शूद्रों को जन चाकर माना ,
करवा संशोधित,आदि ग्रन्थ क्यों लोग मानते दीवाली ?

ऐसा कोई अवतार धरो ,
जो नष्ट वर्ण संकट करदे !
अपने अपने कर्मानुसार
मानव,समाज का काम करे !
मिल बैठें आपस में सारे 
व्राह्मण और शूद्र साथ होकर
औरों के लिए घृणा लेकर,क्यों लोग मनाते दीवाली ?

Thursday, June 12, 2008

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (दूसरा भाग ) - सतीश सक्सेना

जिन्हें सीने से लगाना चाहिए , उन्हें आज भी इस देश में अछूत कहा जाता है ! इस दुर्भाग्य से निकलने हेतु मेरा यह प्रयास है और आशा है कि काश एक दिन यह कलंक दूर हो सके ! और हम अपने को सभ्य कहलाने लायक बन सकें !


बीसवीं सदी में पले बड़े
कंगूरों  के ठेकेदारो  !
मन्दिर के द्वारे खड़े हुए ,

मासूमों के चेहरे देखो ! 
बचपन से इनको गाली दे , 

क्या बीज डालते हो भारी !
इन फूलों को अपमानित कर,क्यों लोग मनाते दीवाली !

तीसरा भाग जनसंख्या का
शूद्रों के हिस्से में आया !

हँसते समाज के साथ जियें 
ऐसा अधिकार नहीं पाया ! 
मन्दिर प्रवेश वर्जित करते, 

कैसे ब्राह्मण ? अपराधी हैं !
परमेश्वर के कर द्वार बंद , क्यों लोग मनाते दीवाली  !

आरक्षण का विरोध करने
वालो कुछ सहकर तो देखो

सदियों से तड़पाया जैसा   
अहसास दर्द सह कर देखो 
कितने प्यासों ने जाने दी थीं,
तड़प तड़प कर बिन पानी ,
पीने का पानी वर्जित कर , क्यों लोग मनाते दीवाली !

आरक्षण अगर मिटाना है
तो शुरू करो ब्राह्मण कुल से

अनपढ़ वामन रक्षित होकर  
सम्मानित होता समाज से ! 
अनपढ़ वामन पंडित होता,
शिक्षित अछूत को हेय मान
इस महाज्ञान को धर्म मान, क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?

वे भी हम जैसे इंसान थे   
कैसे अपमान झेलते थे !
छाया शूद्रों की पड़ने पर
कोढे लगवाए जाते थे !
यों धर्म नष्ट हो जाने पर , 

करते थे  प्रायश्चित्त, महा
गंगा में धोकर महापाप ! क्यों लोग 
मनाते दीवाली ?


Friday, June 6, 2008

किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है -सतीश सक्सेना

लड़कियां घूरें आँखें फाड़ ,

उम्र में लगते बाप समान 
न आता मर्यादा का ध्यान 
हमारे मन में उठें सवाल ,
किसी के गंजे सर पर , 
हाथ फिराने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है !

बने फिरते गाँधी के शिष्य
आचरण पर देते व्याख्यान
सुरा सुंदरियों में है मस्त,
देश के नेता बने महान
भरे चौराहे इनको जूत, 

लगाने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है!

पढाएँ कक्षा में मन मार
बेचते शिक्षा खुले बाज़ार
पुराने गुरुकुल के वे गुरु
और ये गुरु के नाम कलंक
हमारा अपने सिर के बाल 
नोचने का दिल करता है !
किसी घटिया दिल का उपहास उड़ाने का दिल करता है !!

क्यों लोग मनाते दीवाली ? (पहला भाग) - सतीश सक्सेना


निम्न कविता की रचना इस देश से कुरीतियाँ व अस्पृश्यता   मिटाने के प्रयास में शामिल होने हेतु लिखी गई थी (1992-93)! निस्संदेह यह मेरी सर्वोत्तम कविताओं में से एक है ! इसे स्वान्तः सुखाय ही लिखा था ! बहुत लंबा गीत है , कुछ लाइने निम्नलिखित हैं !


मानव कुल में ले जन्म, बाँट
क्यों रहे, अरे अपने कुल को ?
कर वर्ण व्यवस्था नष्ट,संगठित
कर पहले अपने कुल को ,
हो एक महामानव विशाल ! 

त्यागो यह भेदभाव भारी !
तुलसी की विह्वलता में बंध, क्यों लोग मनाते दीवाली !

हरिजन को सेवा करने के
बदले में नफरत देते हो   ?
यह तो कुल में लक्ष्मण जैसा
क्यों पास नहीं बैठाते हो  ?
सेवा सम्मानित कर न सके,

उपहास घृणा का पात्र बना ,
लक्ष्मण का सेवा भाव भूल , क्यों लोग मनाते दीवाली ?

मत भूलो रचनाकार प्रथम
श्री रामचरित रामायण के,
थे महापुरुष श्री बाल्मीकि
ऋषि,ज्ञानमूर्ति,रामायण के
हो शूद्र कुलोदभव,फिर भी 

जगजननी को पुत्री सा समझा
उनके वंशज , अपमानित कर, क्यों लोग मनाते दीवाली ?


बचपन से ही कक्षाओं में 
गुणगान देश का सुनता था
गौतम,गाँधी से महापुरुष
अपनी शिक्षा में पढता था
गौतम ने छोड़ा राजपाट, 

क्या यही न्याय दिलवाने को ,
अंगुलिमालों का हार पहन, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

गाँधी ने अपने जीवन में ,
कुछ माँगा देशवासियों  से
चाहा दिलवाना हरिजन को
सामाजिक न्याय हिन्दुओं से
माँगा इस लज्जाजनक रूप से,

मुक्ति मिले इन दलितों को
बापू इच्छा को रौंद तले , क्यों  लोग  मनाते  दीवाली  ?
.....क्रमश

Sunday, June 1, 2008

पुत्र को -सतीश सक्सेना


पिता पुत्र का रिश्ता तुमको
कैसे शब्दों में समझाऊँ !
कुछ रिश्ते अहसासों के हैं
समझाने की बात नही !
जीवन और रक्त का नाता, 

नहीं बनाये से बनता है
यह तो विधि की देन पुत्र, समझाने की है बात नहीं

अगर तर्क की करें तो ,

सत्य हमेशा ध्यान रहे  
जन्मदायनी माता है ,
पिता कष्ट नाशक तेरा
पुत्र हेतु मानव रूपों में, 

माता पिता मिले ऐसे
शास्त्र और वेदों ने इनको, इष्ट सरीखा माना है

और पिता के लिए, पुत्र ! 
तुम आँखों के तारों जैसे

बिन जीवन संसार मध्य  
होता है, अंधकार जैसे !

इस कठोर संसार मध्य, 
कष्टों के झंझावातों में
वृद्ध पिता के लिए सहारा होता निज औलादों का !

अगर बात कर्मों की हो ,
तो पुत्र याद रखना इसको
छूटे कार्य पिता अपने के
पूर्ण करो संकल्प सदा ले
करो सार्थक नाम हमेशा, 

आशा और विश्वास लिए !
कुलगौरव कुलदीपक अपने कुल का रखना मान यही !

मेरे कुल के गौरव ,
तुमको देता आशीर्वाद यही
प्रखरबुद्धि और दृढनिश्चय से
पार करो , जीवन सागर !
आशीर्वाद पिता का,मां का 

प्यार , साथ में लेकर तुम
करो प्रकाशित सारा जग तो जीवन सफल हमारा हो !

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