Friday, March 25, 2011

हम क्या लिख रहे हैं - सतीश सक्सेना

        अगर किसी लेख़क के व्यवहार और व्यक्तित्व के बारे में जानना हो तो उनके  कुछ लेख ध्यान पूर्वक पढ़ लें  , उस व्यक्तित्व की  मानसिकता और व्यवहार आपको उसके लेखन में से साफ़ साफ़ दिखाई देगा !

        ब्लॉग जगत में एक से एक विद्वजन और सामाजिक विकास के प्रति समर्पित व्यक्तित्व कार्य रत हैं  जिनको पढ़कर अपने आप पर गर्व होता है कि हमने भी इन्हें पढ़ा है वहीँ दूसरी और हिंदी ब्लॉग जगत से वित्रष्णा पैदा करने की क्षमता रखने वालों की भी कमी नहीं है ! कई बार इन्हें पढ़कर लगता है कि यही पढना बाकी था  ?


        लोगों को प्रभावित करने के लिए, लिखे लेखों पर चढ़ा कवर, थोडा ध्यान से पढने पर ही उतरने लग जाता है  ! अपना चेहरा चमकाने की कोशिश में लगे ये लोग, खुशकिस्मत हैं  कि ब्लाग जगत में ध्यान से पढने की, लोगों को आदत ही नहीं है , अतः समाज और  सद्भावी माहौल को बर्वाद करने वाले, इन लोगों की पहचान, काफी समय बाद हो पाती है ! 

         इन  स्वयंभू लेखकों को शायद यह अंदाजा नहीं है कि लेखन के जरिये जो कुछ यहाँ बो रहे हैं यह अमर है ! लेखन और बोले शब्द समाप्त नहीं होते हैं बल्कि परिवार , समाज पर गहरा असर डालते हैं ! यह कभी न भूलें कि आप जो कुछ भी लिख रहे हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि आपके बच्चे , और परिवार के अन्य सदस्य देर सवेर उसे नहीं पढेंगे , उस समय आपको पढ़कर और जानकर वही इज्ज़त और सम्मान आपको देंगे जिसको आपका लेखन इंगित करता है !
  
             मेरा यह विश्वास है कि आने वाला समय बेहतर होगा , हमारी नयी पीढी यकीनन प्यार ,सद्भाव में हमसे अधिक अच्छी होगी अतः आज जो हम ब्लाग के जरिये दे रहे हैं, उसे एक बार दुबारा पढ़ के ही प्रकाशित करें ! कहीं ऐसा न हो कि आपको कुछ सालों के बाद पछताना पड़े कि यह मैंने क्या लिखा था  ?

Tuesday, March 22, 2011

आइये ठहाका लगाएं - सतीश सक्सेना

जनजीवन में हास्य की उपयोगिता, लगता है कम होती जा रही है  ! घर में खुशिया और मुस्कान बिखेरने के लिए, पूर्वजों  द्वारा व्यवस्थित उत्सव आते हैं और चले जाते हैं !  मगर हम लोग ,अपना बनाया गया  अहम्  प्रभामंडल, तोड़ने को तैयार नहीं !

कितने  वर्षों से , शीशे  के ,
सम्मुख आकर मुग्ध हुए हैं 
कितनी बार मस्त होकर के 
अपनी पीठ ,थपथपाई  है  ,
इस होली पर अहम् छोड़ कर, गुरु चरणों में शीश झुकालें !
प्यार और मस्ती  में  डूबें   , आओ  अहंकार   जला दें  !


अक्सर इस मानव जनित अहम् को तोड़ने में , बचपन का प्यार, स्नेह और ममता भी कमजोर पड़ने  लगती  है, कठोर ह्रदय को भी जीत लेने में समर्थ स्नेह और प्यार , इस मानव जनित, जटिल अहम् को कमजोर नहीं कर पाता  और जीत अक्सर अहम् की ही होती है !

ऐसे  ख़राब माहौल में , अपने कालरों को ऊंचा उठाये ब्लोग्स के मध्य, कुछ लोग हास्य बिखेरने का प्रयत्न कर रहे हैं , यह स्वागत योग्य है ..काश लोग हँसना सीखें तो कितने घरों में, मासूमों के चेहरों  पर रौनक  आ जाएगी !

ब्लॉग जगत में इस हास्य रौनक की शुरुआत  वंदना अवस्थी दुबे  ने  "अपनी बेवकूफियां बताइये " के आवाहन के साथ किया था  जो बहुत  कामयाब रहा  ! लोगों ने ऐसी ऐसी बेवकूफ़ियाँ बतायीं कि पाठकों को यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसी भी बेवकूफी की जा सकती है ! मजेदारी यह कि वंदना ने खुद अपनी कोई बेवकूफी नहीं  बताई .... 

वैसे  आम तौर पर लड़कियां कोई बेवकूफी करती भी नहीं  ... ;-) 

धूमधाम और नगाड़ों के मध्य, ब्लॉग जगत के सबसे बड़े चालबाज   ताऊ रामपुरिया ने,  शरीफ और सीधे साधे  चच्चा पिटलिए  को  पिटवाने के लिए ब्लॉग जगत के मशहूर पहलवानों  कनाडा से  समीर लाल जी, पिट्सबर्ग वाले अनुराग शर्मा , हैदराबाद से विजय कुमार सप्पति  एवं  बड़ी मूंछ वाले ललित शर्मा  को बुलवाकर , जर्मनी वाले राज भाटिया  के नेतृत्व  में पिटवाने का प्लान बनाया गया  ! बेचारे चच्चा इन भयंकर  और ताकतवर लोगों के सामने क्या बच पाते,  सो पिटे और बुरी तरह, निर्दयता से पिटे,  और जर्मनी वाली  रजिया भौजी गुलाबी चुन्नी में  मुस्कराती रही  :-)    

इस बार  ब्लॉग जगत के वकील साहब भाई द्विवेदी जी भी पीछे नहीं रहे ...ताऊ रामपुरिया के बारे में उनके विचार पढ़ कर हंसी छुट गयी ! एक बानगी देखिये....
"मारे कवि महोदय पिट-लिए उर्फ श्रीमान सतीश सक्सेना जी ही एक मात्र सीधे-सादे प्राणी निकले जो उधर ताऊ के गरही कवि सम्मेलन में सब के लट्ठ खा कर, वहाँ से किसी तरह जान बचा कर भागे थे। जल्दी में उन की अक्ल की पोटली ताऊ के घर ही छूट गई थी या फिर रास्ते में छोड़ आए थे। (रास्ते में छूटी होगी तो भी ताऊ के किसी बंदे ने ताऊ के पास पहुँचा दी होगी, इसी तरह दूसरों की अक्ल की पोटलियाँ समेट कर आज कल ताऊ अक्ल का जागीरदार बना बैठा है ...."   

परस्पर शिकायते और वैमनस्य  पालते हम लोग अगर इन प्रयासों के फलस्वरूप , भवें चढाने की जगह, मुस्करा सकें तो देखने में साधारण लगता यह कार्य, अपना महत्व बताने में कामयाब हो जायेगा !    

Wednesday, March 16, 2011

इस होली पर क्यों न साथियो,आओ रंग गुलाल लगा लें ? -सतीश सक्सेना

इस उत्सव में ,रंगों में डूब कर, वसंत का स्वागत करते हैं हम लोग ! पूरा परिवार ही रंगों में सराबोर होकर कुछ समय के लिए जैसे मस्ती में डूब जाता है  ! इस ख़ूबसूरत मौसम में  लगभग हर इंसान की,गैरों से भी गले मिलने की इच्छा पैदा हो जाती है ! एक बार अपने अन्दर झांक कर देखने से ,एक आवाज आती है ...


अपने घर में ही आँखों पर 
कैसी पट्टी , बाँध रखी है  ! 
इन  लोगों ने जाने कब से ,
मन में रंजिश पाल रखी है !
इस होली पर क्यों न सुलगते,
दिल के ये अंगार बुझा दें !
मुट्ठी भर कुछ रंग,फागुन में, अपने घर में भी, बिखरा दें 

मानव जीवन पाकर कैसे , 
बुद्धि गयी है,बिलकुल मारी ! 
खनक चूड़ियों की सुनते ही 
शंख ध्वनि से, लगन हटायी !
अपनों की वाणी सुनने की,
क्यों न आज से चाह जगा लें !
इस होली पर माँ पापा की ,चरण धूल को शीश लगा लें !

बरसों मन में गुस्सा बोई
ईर्ष्या  ने ,फैलाये  बाजू ,
रोते  गाते,हम लोगों ने 
घर बबूल के वृक्ष उगाये 
इस होली पर क्यों न साथियों,
आओ रंग गुलाल लगा लें ?
भूलें उन कडवी बातों को, आओ  अब  घर द्वार सजा लें !!

कितना दर्द दिया अपनों को 
जिनसे हमने चलना सीखा  !
कितनी चोट लगाई उनको 
जिनसे हमने,हँसना सीखा  !
स्नेहिल आँखों  के  आंसू , 
कभी नहीं जग को दिख पायें !
इस होली पर,घर में आकर,कुछ गुलाब के फूल चढ़ा लें !

जब से घर से दूर  गए हो ,
ढोल नगाड़े , बेसुर लगते !
बिन प्यारों के,मीठी गुझिया,
उड़ते रंग, सब फीके लगते !
मुट्ठी भर गुलाल फागुन में, 
फीके चेहरों को महका  दें !
सबके संग ठहाका लेकर,अपने घर को स्वर्ग  बना लें !

Friday, March 11, 2011

अरुणा शानबाग और हम लोग -सतीश सक्सेना

अरुणा शानबाग पर, गिरिजेश कुमार का यह लेख प्रसंशनीय है  ! शायद मेरे लेख की भी लोग तारीफ़ करेंगे मगर क्या हम लोग अरुणा के लिए कुछ भी ठोस कर पा रहे हैं ?? 

ऐसे मार्मिक मौकों पर, समाज ,पाठकों एवं तमाशबीनों की उपस्थिति  के बाद , इतिश्री हो जाती है ! इलेक्ट्रोनिक अथवा प्रिंट मीडिया की सफलता, लेख के सफल प्रदर्शन और प्रभाव पर निर्भर करती है और हम पाठक अक्सर तालियाँ बजा कर लेख का स्वागत करते हैं !

इसके बाद दर्शक गण, मदारी की तारीफ़ करते अपने घर जाते हैं और मदारी  किसी नए खेल और जमूरे के साथ  किसी और भीड़ भरी जगह की तलाश में !


क्या अरुणा को बचाने के प्रयास बंद कर देना चाहिए केवल इसीलिए कि उसका साथ  देने वाले परिवार जन न के बराबर है  ? क्या  और कुछ नहीं किया जा सकता  ? सम्मिलित शक्ति के साथ, अगर हम सब थोडा समय इस जीवंत समस्या  में लगायें तो शायद यह बदकिस्मत लड़की बच जाए !     

अरुणा का इलाज़ एलोपैथिक सिस्टम में संभव नहीं है  ....

मगर क्या आदिमकाल से मानव, पूरे विश्व में सिर्फ एलोपैथिक सिस्टम से इलाज़ करवाता आया है  ? 
क्या यह विज्ञानं व्यवस्था,  हमें एलोपैथिक सिस्टम के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर नहीं करती  ?? शक्तिशाली प्रचार तंत्र के होते , बंद  दिमाग लेकर चलते और जीते हम लोग, एलोपैथिक सिस्टम के आगे और कुछ सोंच ही नहीं पाते  ! 

एलोपैथी को छोड़ अगर हम वैकल्पिक चिकित्सा पर ध्यान  दें तो अरुणा को कोमा से बाहर लाया जा सकता है !  होमिओपैथी एवं विश्व की अन्य कई ऐसी विधियाँ हैं जो मृत प्राय लोगों को जिलाने की शक्ति रखती हैं ! 

अगर हो सके तो अरुणा के मित्र अथवा उसको मदद करते संगठन का पता लगा कर , उससे जुड़ने का प्रयत्न करें तो अभी भी कुछ हो सकता है !


मानव चाहे तो क्या नहीं कर सकता ......आवश्यकता सिर्फ सामूहिक ताकत का उपयोग करने का ही है , रास्ता निकल ही आएगा  !

Monday, March 7, 2011

गायब होती मान मनुहार -सतीश सक्सेना

पाश्चात्य प्रेम का अनुकरण बड़े उत्साह के साथ करते  हम लोग , आज अपने स्वाभाविक प्यार की शक्ति को, लगभग भूलते से जा रहे हैं ! अपने प्यारों को समझने और उसे अहसास करने के लिए समय ही नहीं मिलता ! 

अहंकार, जिसे अक्सर हम स्वाभिमान का नाम दे देते हैं, में डूबे हम लोग, अकसर अपनों से कड़वा बोलते, यह ध्यान नहीं कर पाते कि बरछी जैसे वाक्यों से, हम अपने प्यारों का दिल ही छलनी कर रहे हैं ! इस आहत दिल  को देख ,पास पड़ोस के परिजन भी, मलहम लगाने की जगह, अक्सर नमक छिडकते देखे जाते हैं ! और इन ईर्ष्यालु मित्रों की बदौलत, इस आग को और भड़कने का मौका मिलता है ! 

इससे बेहतर तो यह होता कि अपने दिल के ज़ख्म दिखाए ही न जाएँ , शायद समय के साथ भर जाते ! एक बार सुज्ञ जी ने यह शेर, मुझे भेजा था , आज भी भुला नहीं पाया हूँ ... 

क्यों दिखाते हो गहरे ज़ख्म,  अपने  सीने     के  ! 
लोग मुट्ठी में अक्सर , नमक लिए फिरते हैं   !   

याद है, एक शब्द हमारी भाषा में बहुत प्रचलित था " मनुहार  " ! अक्सर हम इस शब्द का उपयोग अपने बड़ों को या उन्हें, जिन्हें देख हमारे चेहरे खिल जाते थे, को मनाने में उपयोग करते थे  ! मान सम्मान के साथ, जब भी मनुहार की जाती थी, उस समय  कठोर वज्र समान दिल को भी, पिघलते देर नहीं लगती थी  ! मगर आज कोई मान मनुहार नहीं करता , पहले से ही, हीन ग्रंथियों से जकड़ा कमजोर मन , मान मनुहार को, दासत्व का नाम देने में, बिलकुल नहीं हिचकता ! 

और जुड़ने की इच्छा लिए, हम लोग और दूर होते चले जाते हैं !

Wednesday, March 2, 2011

ब्लॉग सरदार ?? -सतीश सक्सेना

"यह मेरी पहली पोस्ट थी वर्ष 2005 में सितम्बर माह की 18 तारीख को, जिसे संशोधित कर रहा हूँ। ब्लॉग बनाया था 17 सितम्बर को, विश्वकर्मा जयन्ती वाले दिन। कुछ पता नहीं था, ब्लॉग क्या होता है, इसकी उपयोगिता क्या है, कैसे लिखा जाए। सीखते सीखते आगे बढ़ा। उस समय यूनीकोड से भी परिचय नहीं था, तो विभिन्न अक्षरों में लिखे का snapshot लेकर यहीं चित्र के रूप में चिपका कर खुश हो लेता था। लगभग डेढ़ वर्ष में ही खुमार उतर गया क्योंकि स्वभाववश: इतनी ज़ल्दी-ज़ल्दी पोस्ट प्रकाशित करता था कि गूगल बाबा ने परेशान होकर तीन बार मुझे स्पैमर मानते हुए चेतावनी दे डाली और खाता बंद करने की धमकी भी दे डाली। इस बीच यहीं कई प्रयोग भी किए।
'और भी गम है जमाने में ब्लॉगिंग के सिवा' का भाव लिए अपन खिसक लिए और इन्डियाटाइम्स से एक सर्वर किराए पर ले, अपने शहर की वेबसाईट ही बना डाली। ब्लॉगजगत से नाता तो नहीं छूटा था। गाहे बगाहे नजर पड़ती ही रहती थी, मन मचलता ही रहता था फिर लौटने के लिए। कुच्छेक और विषय आधारित ब्लॉग बनाए। लेकिन व्यक्तिगत ब्लॉग होना ही चाहिए, ऐसा मेरी बिटिया का कहना था।

इसलिए यहाँ से पूर्व प्रकाशित (अजीबोगरीब) 953 पोस्ट हटा कर पुन: प्रवेश कर रहा हूँ।"

एक मस्तमौला सरदार द्वारा, १८ सितम्बर २००५ में लिखी गयी उपरोक्त ब्लॉग पोस्ट से, लेखक की ईमानदारी और एक विस्तृत दिल का पता चलता है ! बदकिस्मती से इतनी खूबसूरत पोस्ट किसी ने नहीं पढ़ी मगर इस सरदार ने वर्षों पहले अकेले शुरू किया सफ़र ख़त्म नहीं किया  , बल्कि आज भी जारी है !

इतने वर्षों में ब्लॉग जगत में यह सबसे विवादित लोगों के रूप में मशहूर हो गए ! अभी कुछ दिन पहले इनके द्वारा  , मेरे ब्लॉग पर आकर  गुस्से में दी गयी वह टिप्पणी "......हमें क्या पागल समझ रखा है " टाइप मुझे बिलकुल पसंद नहीं आई और डिलीट  कर दी  और काफी दिन तक इस "पागल" सरदार से कोई संबंध न रखूंगा , तय कर इनका ब्लॉग पढना बंद कर दिया !

मगर ब्लॉग जगत बहुत छोटा है ...कुछ न कुछ सरदार की हरकतों ( पोस्ट ) पर निगाह पड़ती ही रहती थी ! कुछ दिनों में यह महसूस होने लगा यह अजीब पर्सनालिटी  में ऐसा कुछ अवश्य है जो मुझे खींचता है इन्हें पढने के लिए ! जो बेहतरीन गुण लगे वे थे मददगार, गर्व रहित, ईमानदारी और निश्छलता और शायद यही गुण ब्लॉग जगत में कम से कम मिलते हैं ,  और मुझे लगा कि यह सरदार कुछ अलग है, प्यारा है !

पहचानिए कौन है ? 
अपनी पूर्व प्रकाशित अजीबोगरीब 953 पोस्ट हटाकर, दुबारा ब्लॉग जगत में प्रवेश करने वाला यह मिलनसार, बेवाक, मददगार मगर बेहद विवादित ब्लॉग सरदार......अजय कुमार झा  व हम सबके  परम मित्र, श्री बी एस पाबला हैं ! ! 
शुभकामनायें पाबला जी ! 
  

Wednesday, February 23, 2011

हताश अपेक्षाएं - सतीश सक्सेना

जिनको पूरे जीवन आपने भरपूर प्यार किया हो , जिनके हर कष्ट को, आपने अपने दिल पर महसूस किया हो, अगर वही प्यारा, आपको मार्मिक चोट पंहुचाने लगे, तब कोमल दिल कहीं गहराई तक घायल होता है ! अक्सर इस चोट से आहत दिल, आने वाले समय में किसी भी प्यार और स्नेह पर विश्वास नहीं कर पाता  ! 


अपने प्यारों से अपेक्षा करने को, अक्सर मानवीय कमजोरी बताया जाता है , प्यार के साथ अधिकार की भावना आ ही जाती है  जबकि आपके अधिकार को,  उचित सम्मान देने वाले नहीं मिलते  और यह आवश्यक तो बिलकुल नहीं कि आपका प्यारा भी आपको उतना हो प्यार करे जितना आप कर रहे हों ! हताशा यहीं से शुरू होती है  ...

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो  हुई
लेकिन तमाम उम्र का आराम मिल गया  ! 

आप सब लोगों का अक्सर एक ही सलाह होगी यहाँ ...अपेक्षा मत करिए !
मगर क्या संवेदनशील दिल को समझाना इतना आसान है ??

Monday, February 14, 2011

देख लूं ....उड़नतश्तरी द्वारा सस्नेह -सतीश सक्सेना

               सरल भाषा में ,समीर लाल द्वारा लिखी गयी इस सफल उपन्यासिका का ,पहला अध्याय पढ़कर ही, मन में एक सपना सा जग गया कि अपने ब्लॉग लेखों को एक किताब का रूप दिया जा सकता है !
                 शिवना प्रकाशन शायद देश में अकेला प्रकाशन संस्थान है जो बेहतरीन ब्लॉग लेखकों का परिचय, आम जनता को कराने में बड़ी भूमिका अदा कर रहा है ! शायद ब्लोगिंग को प्रोत्साहन देने में, पंकज सुबीर अपनी व्यक्तिगत शक्ति और धन का उपयोग कर, सबसे अधिक हिम्मत का काम कर रहे हैं ! वे वाकई सम्मान के अधिकारी हैं ! काश कुछ और पंकज सुबीर, देश को मिल जाएँ  :-)
                किताबी फार्म में समीर लाल को पढना बेहद सुखद रहा ! सामान्य भाषा में गर्व रहित उड़न तश्तरी  को पढ़ते हुए लगता है कि समीर लाल सामने बैठे बाते कर रहे हैं ! ईमानदारी से कहे सौम्य शब्द, आपको मंत्र मुग्धता की स्थिति का अहसास कराने में कामयाब रहेंगे !!
                मांट्रियाल सफ़र में, गाड़ी चलाते समय रास्ते के अनुभव, हमसे बाँटते हुए समीर लाल की शैली की एक बानगी देखें....
          
" सामने ट्रक को देखता हूँ ! सूअर लदे हैं ! एक छेद से मुंह निकाले ठंडी हवा की  मौज लेने की  फ़िराक में देखा ! उसे क्या पता कि गंतव्य पर पंहुचते ही मशीन उसे फाइनल नमस्ते कहने का इंतज़ार कर रही है ! उस पर गुलाबी निशान है और बहुतों की तरह ! शायद गुलाबी मतलब , पहला स्टॉप ! तो वहीँ कटेगा और फैक्ट्री में से दूसरी तरफ पैकेट में पैक निकलेगा, पीसेस में बिकने को  !
छेद से झांकता सूअर ....
वैसे ये तो हमें भी पता नहीं कि कौन सा निशान हम पर लगा है ......"  
                 इन पंक्तियों द्वारा, लेख़क अनजाने में ही अपने संवेदनशील दिल का परिचय  दे देता है ! एक दूसरे से जलते भुनते, हम लोगों की आखिरी शाम कहाँ हो जाये  यह कौन जानता है  ??
"उजाले अपनी यादों के , हमारे साथ रहने दो  ! 
न जाने किस घडी में जिंदगी की शाम हो जाए !" 

Tuesday, February 8, 2011

एक बेहतरीन ब्लॉग परिचय -सतीश सक्सेना


"अगर मेरा बस चले, तो आपके ब्लॉग को "सबसे अच्छा ब्लॉग " का अवार्ड दूं ! आम आदमी के भले के लिए, आपकी दी हुई जानकारी, बेशकीमती हैं ! शुभकामनायें आपको ! "
                   उपरोक्त कमेन्ट मैंने कुमार राधारमण के ब्लॉग पर दिया है  ! आम आदमी के स्वास्थ्य की सुरक्षा के द्रष्टि से, जो ब्लॉग बनाये गए हैं,  उनमें कुमार राधारमण की सरल भाषा में दी गयी जानकारी मुझे बहुत प्रभावित करती रही है !
                    हाल में पढ़ा एक बेहतरीन लेख  " अकेलापन है सबसे बड़ा रोग ...." पढ़कर आनंद आ जाता है ! इनकी लेखनी स्वास्थ्य सम्बन्धी ही नहीं, सामाजिक विषयों और मानवीय संबंधों पर भी समान अधिकार रखती है ! इनके लेखों से , लेख़क के अन्दर की मानवीय संवेदनाओं का अथाह भण्डार का पता भी चलता है !
                     मेरा खुद का मानना भी है कि आपस में स्नेह और भावनात्मक जुड़ाव बहुत महत्वपूर्ण है , जिन सम्बन्धों , परिवारों  में यह बंधन होता है वे अक्सर निरोगी पाए जाते हैं ! भयंकर बीमारी के समय, माथे पर स्नेह युक्त हाथ का एक स्पर्श, आधी बीमारी ठीक करने के लिए पर्याप्त होता है !

Friday, February 4, 2011

नज़रिए हो गए छोटे हमारे -सतीश सक्सेना

                 डॉ अरविन्द मिश्रा की एक पोस्ट मैं भुला नहीं पाता  ! निस्संदेह सोम ठाकुर के लिखे इस अमर गीत  नजरिये हो गए छोटे हमारे  की एक एक लाइन, आज के समाज और वातावरण पर बिलकुल सटीक उतरती है ! मगर आज इस पोस्ट लेखन का कारण ,यह महान गीत कम, बल्कि इसके दोनों गायक अधिक हैं  !
                 खाली समय में, इंग्लिश मीडियम में पढ़े अधिकतर नवजवानों की रुचि, माता पिता का साथ देने में कम और इंग्लिश उपन्यास अथवा पाश्चात्य संगीत में अधिक रहती है ! अधिकतर इस झुकाव का कारण कॉन्वेंट शिक्षा परिवेश में भारतीय संगीत, भाषा और संस्कारों की उपेक्षा रही है !
                  आज के व्यस्त समय और समाज में, जहाँ पिता और वयस्क पुत्र के बीच संवाद होना भी, कम आश्चर्य नहीं माना जाता वहीँ  एम एस रमैया कॉलेज बंगलुरु का मैनेजमेंट क्षात्र  कौस्तुभ  द्वारा, अपने पिता डॉ अरविन्द मिश्र  का, एक हिंदी गाने में संगत देना, एक सुखद आश्चर्य है ! 
                   निस्संदेह इस युग्म गीत के जरिये, अरविन्द जी के परिवार में प्यार और स्नेह के अंकुर नज़र आते हैं ! मुझे आशा है पिता पुत्र का यह प्यार प्रेरणास्पद रहेगा !

Monday, January 31, 2011

हर लंगड़ा तैमूर दिखाई देता है -सतीश सक्सेना

सदियाँ गुज़री लेकिन तुमको दहशत
में , हर लंगड़ा तैमूर दिखाई देता है !

धोखा पहले पाप बताया जाता था
लेकिन अब दस्तूर दिखाई देता है !


सरवत जमाल  साहब के यह शेर हमारी असलियत बयान कर देते हैं ! शक और नासमझी की वदौलत हमारे अपने परिवार और प्यारे रिश्तों में पड़ी दरारें साफ़ नज़र आती हैं सिर्फ दिखावे के लिए आवरण डालकर एक दूसरे को सम्मान देते नज़र आते हैं ! बरसों बीत जाने के बाद भी  परिवारों की रंजिशें बरकरार हैं ! 
बरसों  पहले एक लंगड़े तैमूर ने जो जुल्म ढाया था  उसके निशान आज भी बाकी हैं ! मगर अगर उस भय को सीने में लिए, तैमूर के भूत से आज भी दहशतजदा होने को, सिवाय कायरता के और क्या कहा जाएगा ! परस्पर बढ़ते हुए अविश्वास के फलस्वरूप जो रंजिश नज़र आती है कई बार दिलों को छील कर रख देती है ! दोनों अपनी जगह पर ईमानदार हैं , दोनों बेहतरीन भी हैं  मगर एक दूसरे पर शक के गहराते बादलों के कारण, उत्पन्न संवाद हीनता ने स्थिति और बिगाड़ दी है !
अपने अपने खेमों में, तलवारों पर धार लगाते हम लोग, अपनी अपनी रक्षा की जुगत में , स्नेह लगभग भूल ही गए हैं ! कैसे समझेंगे हम कि एक गुनाहगार के कारण सारा परिवार बुरा नहीं होता है ! आपस की लड़ाई में ,दूसरों की गलतियाँ निकालते हम लोग,  अक्सर यह याद नहीं रख पाते कि हम दूसरों को नीचा दिखाने के लिए झूठ बोल रहे हैं और अनजाने में झूठ बोलने की शिक्षा अपने ही बच्चों को दे देते हैं !!    
बड़ी से बड़ी गलतफहमियां और झगडे बात करने से निपटाए जा सकते हैं !मगर पहल करना, हर पक्ष को अपमानजनक लगता है ! ऐसी विकट स्थिति में अपने पुराने प्यार को याद करें और बेझिझक पहल करें तो चेहरों पर मुस्कान आते देर  नहीं लगेगी !

Wednesday, January 26, 2011

कम ब्लागिंग -सतीश सक्सेना

मेरा विचार है कि अगर आपके पास समय है, तो व्यस्त रहने के लिए, ब्लागिंग से बेहतरीन और कुछ नहीं ! एक से एक बेहतरीन लोग यहाँ उपस्थित हैं जिनसे आप बहुत कुछ सीख सकते हैं !टिप्पणियों लेते और देते , कब एक दूसरे के नज़दीक होते चले जाते हैं पता ही नहीं चलता !

इस ब्लॉग परिवार में आपस में बढ़ते स्नेह के कारण मित्रों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक हैं ! फलस्वरूप ई मेल में अधिकतर, उनके लिखे लेखों पर, टिप्पणी करने के अनुरोध रहते हैं जिन्हें समयाभाव के कारण ,पूरा करना लगभग असंभव हो जाता है !

एक लती ब्लागर अमूमन ४ -६ घंटे रोज कम्पयूटर पर देता है और रोज इतना समय, एक व्यक्ति के लिए देना, आँखों और स्पाइनल कार्ड  को बीमार करने के लिए काफी होता है  :-(
अतः नए साल से एक निश्चय किया है कि सप्ताह में एक लेख से अधिक लिखने से बचूंगा  ! शायद अधूरे काम  आसानी से निपटा पाऊंगा  !

हालाँकि आदतें छोड़ना आसान नहीं होता..."कैफ" भोपाली का एक शेर है ..
आग का क्या है,पल दो पल में लगती है !
बुझते  बुझते, एक  ज़माना  लगता  है  !

आप सबको शुभकामनायें ! 

Wednesday, January 19, 2011

माँ - सतीश सक्सेना

कुछ समय पहले माँ की मर्ज़ी के बिना इस घर का पत्ता भी नहीं हिलता था, अक्सर उनकी एक हाँ से, कितनी बार हमारे जीवन में खुशियों का अम्बार लगा मगर धीरे धीरे उनकी शक्तिया और उन शक्तियों का महत्व कम होते होते आज नगण्य हो गया !
 अब अम्मा से उनकी जरूरतों के बारे में कोई नहीं पूछता, सब अपने अपने में व्यस्त है, खुशियों के मौकों और पार्टी आयोजनों से भी अम्मा को खांसी खखार के कारण दूर ही रखा जाता है ! 
बाहर डिनर पर न ले जाने का कारण भी हम सबको पता हैं..... कुछ खा तो पायेगी नहीं अतः होटल में एक और प्लेट का भारी भरकम बिल क्यों दिया जाये, और फिर घर पर भी तो कोई चाहिए ... 
और परिवार के मॉल जाते समय, धीमे धीमे दरवाजा बंद करने आती माँ की आँखों में छलछलाये आंसू कोई नहीं देख पाता !

Monday, January 17, 2011

ब्लाग प्रकाशन, भारतीय कानून एवं सजा - सतीश सक्सेना

                 ब्लॉग जगत में आजकल लेखन के नाम पर, सबसे अच्छा विषय, अपने स्वयंनिर्मित प्रभामंडल को और विस्तार देने के लिए, किसी के प्रति अपशब्द और कड़वाहट भरे शब्द लिखना रह गया है जिससे आसपास भीड़ इकट्ठी होती रहे और डुगडुगी बजती रहे ! अफ़सोस है कि ऐसी बातों का विरोध करना तो दूर लोग नापसंद करते हुए भी, तालियाँ बजाने को मजबूर किये जाते हैं ! और तालियाँ खूब बजती हैं ....

मुन्ना भाइयों पर.....
मुन्नी बाइयों पर ....

                 इन तालियों से ताकत पाकर यह भाई लोग और बाईयां सारे समाज को नपुंसक मानने में देर नहीं लगाते हैं और फलस्वरूप अगले दिन और ऊंचे बांस पर चढ़ कर करतब दिखाते हैं और किसी भी निर्दोष को सूली पर चढ़ा पब्लिक को दिखाते हैं और हम सब हिंदी ब्लागर तालियाँ बजाते रहते हैं !

                अगर हम जिम्मेवार समाज का हिस्सा हैं तो ऐसी हरकतों को रोकना ही चाहिए इसका विरोध करने के लिए मैं कानून के जानकारों से सलाह आमंत्रित कर रहा हूँ  !

                -मैं चाहता हूँ कि वकीलों का एक पैनल बनाया जाए जो भारतीय प्रावधानों के अंतर्गत ऐसे लोगों के विरुद्ध शिकायत मिलने पर, स्वचालित नोटिस देते हुए ऐसे व्यक्ति को कटघरे में खड़े करने की कार्यवाही शुरू करे जो व्यक्तिगत लांछन लगाने के दोषी पाए जाएँ ! मुझे भरोसा है कि पहले १० केस होते ही ऐसे लोगों का नशा उतर जाएगा जो  बेनामी या सुनामी बनकर रोज केवल ताल ठोंकने का काम ही करते हैं !
                  जो भी लोग आज के बाद, भारतीय कानूनों के प्रावधान के तहत, ऐसे लोगों को सूची बद्ध करते हुए आरोपित करेंगे और कोर्ट में कार्यवाही  करेंगे  ! उसके लिए एक सार्वजनिक फंड तैयार करने के लिए मैं प्रतिवद्ध हूँ ! जिसकी मदद से ऐसे दोषियों को सजा दिलाने की ठोस कार्यवाही भारतीय न्यायालय में शुरू की जाए ! इसके लिए ५ लोगों की कमेटी बनाने का विचार है जो इससे जुड़े फैसले लेगी !
                  
                   मैं उन समस्त लोगों से सुझाव आमंत्रित कर रहा हूँ जो बिना किसी के प्रति रंजिश की भावना को लेकर समाज के प्रति दायित्व की भावना रखते हों और स्वेच्छा से आगे आने को तत्पर हों ! इस लेख का तात्पर्य आपसे और कोई मदद मांगना नहीं है मेरा यह विश्वास है कि किसी अच्छे कार्य करने की पहल करने के लिए, केवल मात्र दृढ  संकल्प की आवश्यकता होती है और वह मुझमें पर्याप्त है !
कोर्ट और एडवोकेट के खर्चे की परवाह नहीं है .......समाज के कार्यों के लिए एक मज़बूत ट्रस्ट और उसके लिए प्रतिबद्ध साथी हैं मेरे पास !  
                  इसमें गलतियाँ क्या होंगी ? कहीं कोई भूल न हो जाये इसीलिए विचार आमंत्रित हैं !

Sunday, January 16, 2011

मेरे मरने के बाद ...- सतीश सक्सेना

कभी सोचा आपने कि हमारे जाने के बाद क्या फर्क आएगा हमारे परिवार में ....कुछ ऐसा काम कर चलें जिससे कुछ यादें दर्ज हो जाएँ हमेशा के लिए, जो हमारे अपनों को सुख दे पायें ! आज मैं याद करना चाहता हूँ अपने उन प्यारों को, जिन्होंने मुझे खड़ा करने में मदद की !
  • सबसे पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे उंगली पकड़ के चलना सिखाया , अगर वे हाथ मुझे सहारा न देते तो शायद मेरा अस्तित्व और यह भरा पूरा परिवार और मुझे चाहने वाले , कोई भी न होते ! उनमें से कुछ हैं और कुछ मेरी  अथवा परिवार की लापरवाही के कारण, समय से पहले, छोड़ कर चले गए  ! शायद समय रहते उनकी अस्वस्थता पर उचित ध्यान दिया जाता तो वे अभी हम लोगों के साथ होते !  इन बड़ों के साथ, मैं अपने आपको हमेशा स्वार्थी महसूस करता हूँ , उनके साथ ही सबसे कम कर पाया और हमेशा उनका ऋणी ही रहूँगा , उनका कर्जा लेकर मरना मेरी नियति होगी ...
  • इसके बाद वे, जो मेरे अपने नहीं थे , जिनसे कोई रिश्ता नहीं था उसके बावजूद इन "गैरों " ने , जब जब मुझे अकेलापन और अँधेरा महसूस हुआ , मेरा साथ नहीं छोड़ा ! मुझे लगता है पिछले जन्म का कोई रिश्ता रहा होगा, जिसका बदला उन्होंने इस जन्म के कष्टों में, साथ देकर पूरा किया ! निस्वार्थ प्यार और स्नेह का कोई मोल नहीं होता ! जब भी अकेले में, मैं इन प्यारों का दिया संग याद करता हूँ तो आँखों में आंसू छलक आते हैं ...बस यही कीमत अदा कर सकता हूँ इन अपनों की ! और मेरे पास कुछ नहीं इन्हें देने को !      
  • पत्नी को किसी के आगे हाथ न फैलाना  पड़े , आज हमारे दोनों बच्चे बेहतरीन कंपनियों में मैनेजर हैं और अपनी माँ को बहुत प्यार करते हैं ! इतना है उनके पास कि  बचे शेष जीवन में वे इतनी मज़बूत रहें कि उनके आँख में कभी धन की कमी के कारण आंसू  न आ पाए  ! शायद पत्नी की अपेक्षाओं पर उतरना बेहद मुश्किल होता है और मैं भी अपवाद नहीं रहा . जो काम मैं नहीं कर सका उसके  लिए  मैं अपनी अयोग्यता को दोषी ठहराता हूँ  !
  • पिता के जाने के बाद, बेटी अपने को, अधिक असुरक्षित महसूस करती है , एक संतोष है कि अपने दोनों बच्चों के लिए मैंने बराबर किया है !  भाई के बेहद प्यार के बावजूद कही न कहीं  मायके में उसका भविष्य, भाभी के व्यवहार पर निर्भर होता है ! उम्मीद करता हूँ कि मेरा सुयोग्य बेटा अपनी प्यारी बहिन को कभी अकेले  महसूस नहीं होने देगा ! मेरी पुत्री का बेहद मेहनती और स्नेही होना, उसका सुखद भविष्य  सुनिश्चित करने को काफी है ! उसकी बेहतरीन कार्यक्षमता, दिन पर दिन निखरेगी इसका मुझे विश्वास है !  
  • पुत्र में, मैं अपना अंश और व्यवहार पाता हूँ ! चूंकि मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूँ सो अपने बेटे पर पूरा विश्वास है कि वह जीवन में अच्छा करेगा और सारे कर्त्तव्य हँसते हुए पूरे करेगा ! मैं जानता हूँ कि मेरे द्वारा पैदा किया गया, शून्य उसे बहुत खलेगा ! कुशाग्रबुद्धि और आत्मविश्वास उसे अपनी कठिनाइयों पर विजय दिलाने में सहायक रहेंगे !              अपनी इच्छाएं सार्वजनिक करने का मतलब ताकि सनद रहे , मेरे न रहने पर, यह मेरे  प्यार का दस्तावेज होगा  उन सबके लिए जो मेरे बाद मेरी कमी महसूस करेंगे !
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