खुशदीप भाई फोन करके बताया कि अलबेला खत्री ने, अपनी पोस्ट में तिलयार लेक पर, रात्रि भोज और पैग शैग के बाद लिखा कि "सतीश सोने चले गए " ! इस पोस्ट से महसूस होता है कि आप रात में वहाँ मौजूद थे, जबकि आप उस दिन हमारे साथ थे ! इसपर क्या स्पष्टीकरण दोगे ??
ब्लॉगजगत के इस मजाकिया कैरेक्टर के लिखे हुए शब्दों में, दोधारी धार तो होती ही है ! अपने द्विअर्थी शब्दों से दादा कोंडके को पीछे छोड़ता यह "कलाकार " वाकई धुरंधर है और आजके रोते पीटते समय और लोगों के बीच, अगर मुझे वाकई जमीन पर बैठ, उस दिन डिनर का मौका मिला होता तो मैं अपने आपको घाटे में नहीं मानता !
इस स्पेशल कैरेक्टर को जानते हुए , मैंने इस पर खुद शिकायत करने से परहेज किया ! खुद शिकायत करने के बदले में अलबेला का जो जवाब मिलता उसका मुझे अंदाजा था कि
"सतीश जी, उस पार्टी में किचन के रसोइये का नाम भी सतीश था ....हा...हा...हा...हा...."
और मैं ऐसी कोई ग़लतफ़हमी नहीं पालना चाहता कि ब्लाग जगत में मैं इतना प्रसिद्द हूँ कि यहाँ हर जगह लिखे गए "सतीश ...","सतीश सक्सेना" और "सक्सेना" मेरे लिए ही लिखा गया है, चाहे संकेत मेरी तरफ ही क्यों न हो ! रोज सैकड़ों लेख़क अपनी अपनी व्यक्तिगत डायरी लिख रहे हैं, किसी ने मेरे लेख को पढ़कर क्या अंदाजा लगाया और मेरे बारे में क्यों लिखा .. इस को लेकर तनाव में आना मैं अपनी मूर्खता ही मानूंगा ! मेरा विचार है कि आरोप प्रत्यारोप कभी समाप्त नहीं हो सकते... प्रसिद्धि की तमन्ना लिए लोग ये मौके ढूँढ़ते रहते हैं !

हास्य और मनोरंजन के बिना जीवन अधूरा मानता हूँ , मैं उन्हें बदकिस्मत मानता हूँ जिनके मित्र नहीं होते और उन्हें सबसे बुरा मानता हूँ जो अपने बारे में बताते हुए, समाज की निगाह में बुराइयाँ, छिपा कर अच्छी अच्छी बाते करते हैं और मौका मिलते ही वे सब काम करते हैं जो "बुरे " माने जाते हैं !
मुझे यह शेर बहुत पसंद है, जिसमें ईमानदारी और निडरता साफ़ नज़र आते हैं !
साकी शराब पीने दे , मस्जिद में बैठकर !
या वो जगह बता,कि जहाँ पर खुदा न हो !
साल में बहुत कम मौकों पर पीने वाला मैं ,उसदिन योगेन्द्र मौदगिल के विशेष अनुरोध करने पर, बार में बैठकर, जिसमें ललित शर्मा शामिल थे , बाकियों ( खुशदीप सहगल,अजय झा और शाहनवाज सिद्दीकी )को बिना बताये एक पैग लेने से रोक न सका जिससे योगेन्द्र मौदगिल और ललित शर्मा की कंपनी, थोड़े समय और मिले !
और इस मस्ती के समय में, यकीनन मस्त चर्चाएँ हुई !
कृपया ध्यान रहे कि...
यह लेख "सतीश सक्सेना जी " अथवा "सतीश जी", का लिखा नहीं है ! यह एक ईमानदार आत्मा ने लिखा है, जो सतीश के साथ अक्सर रहती है !
इस लेख से जिसे जिसे कष्ट हो, उससे पहले ही, अपनी हर हाल में खुश रहने की आदत के कारण, क्षमा याचना कर लेते हैं ! !
जिंदगी जिन्दादिली का नाम है ...
मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं
( यह लेख विशुद्ध हास्य है जिसमें अपने ऊपर व्यंग्य किया है ..कृपया विद्वान्, और मुझे बड़ा मानने वाले न पढ़ें. किसी अन्य का नाम लेकर आरोप लगाने वाली गंभीर टिप्पणिया इस लेख पर स्वीकार नहीं हैं . पुरानी बातों का स्पष्टीकरण पहले ही दिया जा चुका है )
ब्लॉगजगत के इस मजाकिया कैरेक्टर के लिखे हुए शब्दों में, दोधारी धार तो होती ही है ! अपने द्विअर्थी शब्दों से दादा कोंडके को पीछे छोड़ता यह "कलाकार " वाकई धुरंधर है और आजके रोते पीटते समय और लोगों के बीच, अगर मुझे वाकई जमीन पर बैठ, उस दिन डिनर का मौका मिला होता तो मैं अपने आपको घाटे में नहीं मानता !
इस स्पेशल कैरेक्टर को जानते हुए , मैंने इस पर खुद शिकायत करने से परहेज किया ! खुद शिकायत करने के बदले में अलबेला का जो जवाब मिलता उसका मुझे अंदाजा था कि
"सतीश जी, उस पार्टी में किचन के रसोइये का नाम भी सतीश था ....हा...हा...हा...हा...."
और मैं ऐसी कोई ग़लतफ़हमी नहीं पालना चाहता कि ब्लाग जगत में मैं इतना प्रसिद्द हूँ कि यहाँ हर जगह लिखे गए "सतीश ...","सतीश सक्सेना" और "सक्सेना" मेरे लिए ही लिखा गया है, चाहे संकेत मेरी तरफ ही क्यों न हो ! रोज सैकड़ों लेख़क अपनी अपनी व्यक्तिगत डायरी लिख रहे हैं, किसी ने मेरे लेख को पढ़कर क्या अंदाजा लगाया और मेरे बारे में क्यों लिखा .. इस को लेकर तनाव में आना मैं अपनी मूर्खता ही मानूंगा ! मेरा विचार है कि आरोप प्रत्यारोप कभी समाप्त नहीं हो सकते... प्रसिद्धि की तमन्ना लिए लोग ये मौके ढूँढ़ते रहते हैं !

हास्य और मनोरंजन के बिना जीवन अधूरा मानता हूँ , मैं उन्हें बदकिस्मत मानता हूँ जिनके मित्र नहीं होते और उन्हें सबसे बुरा मानता हूँ जो अपने बारे में बताते हुए, समाज की निगाह में बुराइयाँ, छिपा कर अच्छी अच्छी बाते करते हैं और मौका मिलते ही वे सब काम करते हैं जो "बुरे " माने जाते हैं !
मुझे यह शेर बहुत पसंद है, जिसमें ईमानदारी और निडरता साफ़ नज़र आते हैं !
साकी शराब पीने दे , मस्जिद में बैठकर !
या वो जगह बता,कि जहाँ पर खुदा न हो !
और इस मस्ती के समय में, यकीनन मस्त चर्चाएँ हुई !
कृपया ध्यान रहे कि...
यह लेख "सतीश सक्सेना जी " अथवा "सतीश जी", का लिखा नहीं है ! यह एक ईमानदार आत्मा ने लिखा है, जो सतीश के साथ अक्सर रहती है !
इस लेख से जिसे जिसे कष्ट हो, उससे पहले ही, अपनी हर हाल में खुश रहने की आदत के कारण, क्षमा याचना कर लेते हैं ! !
जिंदगी जिन्दादिली का नाम है ...
मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं
( यह लेख विशुद्ध हास्य है जिसमें अपने ऊपर व्यंग्य किया है ..कृपया विद्वान्, और मुझे बड़ा मानने वाले न पढ़ें. किसी अन्य का नाम लेकर आरोप लगाने वाली गंभीर टिप्पणिया इस लेख पर स्वीकार नहीं हैं . पुरानी बातों का स्पष्टीकरण पहले ही दिया जा चुका है )
















