Sunday, August 3, 2014
Friday, July 25, 2014
मुझको सदियों से रुलाता है कोई - सतीश सक्सेना
मुझको रातों में ,रुलाता है कोई,रोज आकर,थपथपाता है,कोई !
करवटें , रोज़ बदलता पाकर ,
हाथ बालों में, फिराता है कोई !
जब कभी दर्द में झपकी न लगे
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !
नींद को, लोरी सुनाता है कोई !
जब कभी आँख भर आयी, तभी
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई
जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !
हिम्मतें मुझको दिलाता है कोई
जब भी मैंने रूठ कर खाया नहीं
एक कौरा,मुंह में दे जाता कोई !
एक बच्चे से, न जाने क्या हुआ
पूरे जीवन , रूठ जाता है कोई !
Saturday, July 19, 2014
दरवाजे पर कौन खड़ा है,इतनी रात बधाई को ! - सतीश सक्सेना
गिरना है, वो गिर के रहेगा, देगा दोष खुदाई को !
सारे फ़र्ज़ निभाए हमने, अब जाने का वक्त हुआ !
दरवाजे पर कौन खड़ा है, इतनी रात बधाई को !
घर मे कीचड़ से खेले हो, गर्वीले दिन भूल गए,
आसानी से दाग़ न जाएँ , करते रहो पुताई को !
लेना देना, रस्म रिवाजों से ही , घर का नाश करें
बहू तो कब से इंतज़ार में बैठी मुंह दिखलाई को !
प्रतिरोपण के लिए वृक्ष की कोमल शाखा दूर हुई,
बरगद की झुर्रियां बताएं , कैसे सहा विदाई को !
Wednesday, July 16, 2014
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा करा कर जाऊँगा ! - सतीश सक्सेना
जाने से पहले दुनियां को,कुछ गीत सुनाकर जाऊंगा !
अनुराग समर्पण निष्ठा का सम्मान बढ़ाकर जाऊंगा !
श्री हीन हुए स्वर,गीतों के , झंकार उठाकर जाऊंगा !
अनजाने कवियों के पथ में,ये फूल चढ़ाकर जाऊंगा !
निष्कपट आस्था श्रद्धा का अपमान न हों,बाबाओं से
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखलाकर जाऊँगा !
लाचार वृद्ध,अंधे,गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिलाकर जाऊँगा !
कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा !
अनुराग समर्पण निष्ठा का सम्मान बढ़ाकर जाऊंगा !
श्री हीन हुए स्वर,गीतों के , झंकार उठाकर जाऊंगा !
अनजाने कवियों के पथ में,ये फूल चढ़ाकर जाऊंगा !
निष्कपट आस्था श्रद्धा का अपमान न हों,बाबाओं से
स्मरण कबीरा का करके,शीशा दिखलाकर जाऊँगा !
लाचार वृद्ध,अंधे,गूंगे, पशु, पक्षी की तकलीफों को !
लयबद्ध उपेक्षित छंदों में,सम्मान दिलाकर जाऊँगा !
कुछ वादे करके निकला हूँ अपने दिल की गहराई से
अब आया हूँ दरवाजे पर,तो विदा कराकर जाऊँगा !
Saturday, July 12, 2014
हमें तुम्हारी, लिखते पढ़ते , जानी कब परवाह रही है -सतीश सक्सेना
हमको कब तुम उस्तादों की
जीवन में परवाह, रही है !
रचनाएं, कवियों की जग में, इकबालिया गवाह रही हैं !
सबक सिखाने की मस्ती में
शायद, सांसें भूल गये हो !
चंद दिनों की मस्ती में ही ,
शायद मरघट भूल गए हो !
स्वाभिमान को पाठ पढ़ाने
चेष्टा बड़ी , अदाह रही है !
जीवन में परवाह, रही है !
रचनाएं, कवियों की जग में, इकबालिया गवाह रही हैं !
सबक सिखाने की मस्ती में
शायद, सांसें भूल गये हो !
चंद दिनों की मस्ती में ही ,
शायद मरघट भूल गए हो !
स्वाभिमान को पाठ पढ़ाने
चेष्टा बड़ी , अदाह रही है !
तुम पर कलम उठाने , अपनी इच्छा बड़ी अथाह रही है !
अरे ! तुम्हारा चेला कैसे
तुम्हें भूलकर पदवी पाया
तुम गद्दी को रहे सम्हाले
औ वो पद्म विभूषण पाया !
कोई सूर बना गिरिधर का,
कोई मीरा, रंगदार रही है !
हंस, हंस खूब तमाशा देखें , जानी कब परवाह रही है !
सबके तुमने पाँव पकड़ कर
गुरु के सम्मुख बैठ, लेटकर
कवि सम्मेलन में बजवाकर
दांत निपोरे, हुक्का भरकर
तितली फूल फूल इठलाकर
करती खूब धमाल रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ की ? दुनिया में अफवाह रही है !
बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो
जीवन भर जो पाँव दबाये
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित ,
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित, चेतन मुक्त प्रवाह बही है !
गुरुवर तेज बनाये रखना
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बल पर
खुद को कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने कर ली, उतनी ही तनख्वाह रही है !
सूर्यमुखी में महक कहाँ की ? दुनिया में अफवाह रही है !
बड़े, बड़े मार्तण्ड कलम के
जो न झुकेगा उसे मिटा दो
जीवन भर जो पाँव दबाये
उसको पद्मश्री दिलवा दो !
बड़े बड़े विद्वान उपेक्षित ,
चमचों पर रसधार बही है !
अहमतुष्टि के लिए समर्पित, चेतन मुक्त प्रवाह बही है !
गुरुवर तेज बनाये रखना
चेलों के गुण गाये रखना !
भावभंगिमाओं के बल पर
खुद को कवि बनाये रखना !
समय आ गया भांड गवैय्यों
को, हिंदी पहचान रही है !
जितनी सेवा जिसने कर ली, उतनी ही तनख्वाह रही है !
Thursday, July 10, 2014
कैसे कैसे लोग भी, गंगा नहाये इन दिनों ! ! -सतीश सक्सेना
अनपढ़ों के वोट से , बरसीं घटायें इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !
साधू सन्यासी भी आ मूरख बनायें इन दिनों !
झूठ, मक्कारी, मदारी और धन के जोर पर ,
कैसे कैसे लोग भी , गंगा नहाये इन दिनों !
कैसे कैसे लोग भी , गंगा नहाये इन दिनों !
सैकड़ों बलवान चुनकर , राजधानी आ गए !
आप संसद के लिए, आंसू बहायें इन दिनों !
देखते ही देखते सरदार को , रुखसत किया ,
बंदरों ने सीख लीं कितनी कलायें इन दिनों !
ये वही नाला है जमुना नाम था,जिसके लिए,
साफ़ करने के लिए,चलती हवायें इन दिनों !
Friday, July 4, 2014
अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो - सतीश सक्सेना
अल्लाह हर बशर को, रमज़ान मुबारक हो
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !
सब को इबादतों का, अरमान मुबारक हो !
माता पिता को रखना ताउम्र प्यार से तुम !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो !
अल्लाह का दिया ये , अहसान मुबारक हो !
इन रहमतों के क़र्ज़े , कैसे अदा करोगे ?
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !
माँ-बाप का ये प्यारा दालान मुबारक हो !
रहमत के माह में तो कुछ काम नेक कर ले
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !
जो दे सवाब तुम को रहमान , मुबारक हो !
मुझ को मेरे ख़ुदाया तू राहे हक़ पे रखना
तेरा अता किया , ये ईमान मुबारक हो !
तेरा अता किया , ये ईमान मुबारक हो !
Sunday, June 29, 2014
अनु को मेरे पूरे प्यार के साथ -सतीश सक्सेना
विद्वानों में गिने जाते हम लोग, अक्सर जीवन की सबसे बड़ी हकीकत, मौत की याद नहीं आती जब तक सामने कोई हादसा न हो जाए ! आज अनु की जन्मदिन पर वह मनहूस दिन याद आ गया जब उसने अपने नन्हें अजन्में पुत्र के साथ अंतिम सांस ली थी ! वह अपने घर की सबसे प्यारी लड़की थी जिसका खोना हम कल्पना भी नहीं सकते मगर घर के सब बड़े बूढ़ों को छोड़ सबसे पहले, वही, यहाँ से चली गयी !
दूर देश जाना, था उसने ,
पंखों से, उड़ जाना उसने
प्यार बांटकर हँसते हँसते
परियों सा खो जाना उसने
कहाँ खो गयी, हंसी तुम्हारी ,किसने छीन लिया संगीत ?
ऐसा लगता , हँसते गाते
तुझको कोई छीन ले गया !
एक निशाचर,सोता पाकर
घर से तुमको उठा ले गया !
जबसे तूने छोड़ा हमको,
शोक मनाते मेरे गीत !
जबसे तूने छोड़ा हमको,
शोक मनाते मेरे गीत !
सोते जगते, अब तेरी, तस्वीर बनाएं मेरे गीत !
नाम बदलते,तुझे छिपाते
बुरी घडी भी कट जायेगी !
बुरी घडी भी कट जायेगी !
बड़े शक्तिशाली बनते थे ,बचा न पाए तुझको गीत !
रक्त भरे वे बाल तुम्हारे , कभी न भूलें मेरे गीत !
ऐसा पहली बार हुआ था
हंसकर उसने नहीं बुलाया
हम सब उसके पास खड़े थे
उसने हमको, नहीं बिठाया !
बिलख बिलख कर रोये हम सब,
टूट न पाई उसकी नींद !
उठ जा बेटा तुझे जगाते , सिसक सिसक कर रोये गीत !
कितनी सीधी कितनी भोली
हम सब की हर बात मानती
बच्चों जैसी, लिए सरलता,
स्वागत करने हंसती आती !
जब जब, तेरे घर पर जाते,
तुझको ढूंढें मेरे गीत !
हर मंगल उत्सव पर बच्चे, शोक मनाएं मेरे गीत !

जाकर भी वरदान दे गयी
श्री धर पुत्री, दुनिया को !
खुद केशव की रक्षा करके ,
दान दे गयी , दुनिया को !
रक्त भरे वे बाल तुम्हारे , कभी न भूलें मेरे गीत !
ऐसा पहली बार हुआ था
हंसकर उसने नहीं बुलाया
हम सब उसके पास खड़े थे
उसने हमको, नहीं बिठाया !
बिलख बिलख कर रोये हम सब,
टूट न पाई उसकी नींद !
उठ जा बेटा तुझे जगाते , सिसक सिसक कर रोये गीत !
कितनी सीधी कितनी भोली
हम सब की हर बात मानती
बच्चों जैसी, लिए सरलता,
स्वागत करने हंसती आती !
जब जब, तेरे घर पर जाते,
तुझको ढूंढें मेरे गीत !
हर मंगल उत्सव पर बच्चे, शोक मनाएं मेरे गीत !
जाकर भी वरदान दे गयी
श्री धर पुत्री, दुनिया को !
खुद केशव की रक्षा करके ,
दान दे गयी , दुनिया को !
बचपन अंतिम , साँसे लेता ,
सन्न रह गये सारे गीत !
देवकि पुत्री के जीवन को ,बचा न पाए मेरे गीत !
सन्न रह गये सारे गीत !
देवकि पुत्री के जीवन को ,बचा न पाए मेरे गीत !
अनु के असमय जाने को याद करते समय, आज सोंच रहा था कि पिछले ३७ साल की नौकरी में लगभग हर चार वर्ष बाद एक ट्रांसफर हुआ है , इस वर्ष ऑफिस वाला आखिरी ट्रांसफर (रिटायरमेंट) भी होना है , अगर इसी क्रम में गिनता जाऊं तो शायद दुनियां से, ट्रांसफर होने में अधिक समय बाकी नहीं है ! फोटोग्राफी का बचपन से शौक रहा है , शायद मैं अकेला लेखक हूँ जो कि अपनी हर रचना के साथ अपना चित्र अवश्य लगाता है ताकि सनद और मुहर लगती रहे इन कविताओं और विचारों पर कि ये किसके हैं ! जाने के बाद हम सिर्फ अपने निशान छोड़ सकते हैं , और अगर वे अच्छे और गहरे हों तो अनु की तरह ही, हमें भी लोग याद करेंगे और आंसुओं के साथ करेंगे !!
love you sweet girl !
Saturday, June 28, 2014
Friday, June 20, 2014
विदेश जाने में डर..- सतीश सक्सेना
बचपन में सुनता था कि जवाहर लाल नेहरु के कपडे पेरिस धुलने जाते थे ! धनाड्य लोगों के किस्से सुनकर उनके आनंद को, हम निम्न मध्यम वर्ग , महसूस कर, खुश हो लेते थे ! उड़ते हवाई जहाज की एक झलक पाने को, खाना छोड़कर छत पर भागते थे कि वह जा रहा है एक चिड़िया जैसा जहाज और फिर अपने सपने समेट कर, चूल्हे के पास आकर, रोटी खाने लगते थे ! उन दिनों उड़ते हवाई जहाज में बैठने की, कल्पना से ही डर लगता था !
| पेरिस रेलवे स्टेशन |
मुख्य कारण दो ही थे, पहला पता नहीं कितना खर्चा कितना होगा और दूसरा विदेशियों के परिवेश में घुलने, मिलने, बात करने में, आत्मविश्वास की कमी ....
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
निमंत्रण दिया था ! उसके पत्र मिलने के साथ ही, अप्पाजी ने, अपने साथ साथ मेरा टिकट भी, मेरे द्वारा कभी हाँ कभी न के बावजूद , बुक करा लिए थे ! उस शाम आफिस से लौटने पर पहली बार लगा कि मैं वाकई यूरोप यात्रा पर जा रहा हूँ ! उसके बाद, सफर पर जाने के लिए आवश्यक, बीमा कराया गया ! 15 दिन के इस सफर के लिए, आई सी आई सी आई लोम्बार्ड ने लगभग ५५०० रुपया लिया था ! इस बीमा के फलस्वरूप हमें बीमारी अथवा किसी अन्य वजह से होने वाली क्षति का मुआवजा शामिल था !
और यह भय इतना था कि अगर यूरोप के टिकट अचानक बुक नहीं किये जाते तो शायद मैं अपने जीवन काल में कभी विदेश यात्रा का प्लान नहीं बना पाता !
यह प्रोग्राम अचानक ही बन गया जब नवीन ने वियना से अपने माता पिता के साथ मुझे भी वियना आने का
| वेनिस की पानी से लबालब गलियां |
| वियना ट्राम |
| स्वारोस्की फैक्ट्री ऑस्ट्रिया |
| इंटरलेकन, स्विट्ज़रलैंड |
अगर आपकी ट्रिप ४ दिन की है तो एक आदमी के आने जाने का खर्चा लगभग मय होटल ४५०००.०० तथा भोजन और पब्लिक ट्रांसपोर्ट मिलकर ५००००-६०००० रुपया
में ! अगर आप यही ट्रिप किसी अच्छे टूर आपरेटर के जरिये करते हैं तो आपका कुछ भी सिरदर्द नहीं, साल दो साल में ५० - ६० हज़ार रुपया बचाइए और ४ दिन के लिए पेरिस, मय गाइड घूम कर आइये !
जहाँ तक खर्चे की बात है , हर परिवार में पूरे साल घूमने फिरने और बाहर खाने पर जो खर्चा होता है ,उसमें हर महीने कटौती कर पैसा बचाना शुरू करें तो कुछ समय में ही आधा पैसा बच जायेगा, बाकी का इंतजाम करने में बाधा नहीं आएगी !एक बार विदेश जाने के बाद आपके और बच्चों के आत्मविश्वास में जो बढोतरी आप पायेगे, उसके मुकाबले यह खर्चा कुछ भी नहीं खलेगा !
| यूनाइटेड नेशंस , जेनेवा |
" न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ..."
विदेश जाकर अच्छी इंग्लिश न बोल पाने के लिए न बिलकुल न डरें , आप वहाँ पंहुच कर पायेंगे कि अधिकतर जगह पर, इंग्लिश जानने वाले बहुत कम हैं ! आपको लगेगा कि आप ही सबसे अच्छी इंग्लिश / अंगरेजी बोलते हैं :-))
जिंदगी जिंदादिली का नाम है !!
Monday, June 16, 2014
उनको द्वारे पे ही अल्लाह याद आएंगे -सतीश सक्सेना

आज हम मुद्दतों के बाद , वहाँ जाएंगे !
ये तो तय है ,वे मुझे देख के घबराएंगे !
एक अर्से के बाद,दर पे उनके आया हूँ !
सामने पा ,उन्हें अल्लाह याद आएंगे !
काश उस वक़्त,सहारे के लिए हो कोई !
वे मुझे देख के हर हाल, लडख़ड़ायेंगे !
वे तो शायद मुझे, पहचान ही नहीं पाएं !
जवां आँखों से छिने ख्वाब याद आएंगे !
यादें उनको तो वहीँ छोड़ के आना होगा !
वरना मिलने पे तो , वे होंठ थरथराएँगे !
Sunday, June 15, 2014
अलंकार,श्रंगार बिना हम दिल की बातें करते हैं ! -सतीश सक्सेना
ओठों पर आ जाए जो उस गीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उस संगीत की बातें करते हैं !
अम्मा दादी नानी बाबा से हम चलना सीखे हैं ,
स्नेही आँचल में कटे , अतीत की बातें करते हैं !
जो मन को छू जाये उस संगीत की बातें करते हैं !अम्मा दादी नानी बाबा से हम चलना सीखे हैं ,
स्नेही आँचल में कटे , अतीत की बातें करते हैं !
जीवन भर तस्वीर संजोये , लेकिन ढूंढ न पाए हैं,
अपने सपनों में आये उस मीत की बातें करते हैं !
हमको कौन शाबाशी देगा , सन्नाटों में रहते हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से, प्रीत की बातें करते हैं !
कंगूरों से रही लड़ाई , इंसानों से प्यार किया !
ऐसे बुरे समय में भी हम, जीत की बातें करते हैं !
अपने सपनों में आये उस मीत की बातें करते हैं !
हमको कौन शाबाशी देगा , सन्नाटों में रहते हैं !
कब्रों के संग बैठ जमीं से, प्रीत की बातें करते हैं !
कंगूरों से रही लड़ाई , इंसानों से प्यार किया !
ऐसे बुरे समय में भी हम, जीत की बातें करते हैं !
Wednesday, June 11, 2014
अगर याद ईश्वर की आये, माँ के पैर दबाना सीख ! - सतीश सक्सेना
ज्ञान सदा सम्मानित होगा खूब पुस्तकें पढ़ना सीख !
हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे
जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !
पुस्तक पढ़ने से पहले ही,बच्चे ध्यान लगाना सीख !
कड़ी धूप में, बहे पसीना, हार न माने, जीना सीख !
हंसकर करें हमेशा स्वागत, मित्रों का अपने दरवाजे
सारे धर्मों का,आदर कर,साथ बैठ कर,खाना सीख !
जब भी जीना लगे असंभव,ढृढ़ निश्चय ले आंसू पोंछ
बिना रुके,मंजिल पाओगे,कछुवे जैसा चलना सीख !
दुःख में कभी नहीं घबराना,अपने हाथ नहीं फैलाना
अगर याद ईश्वर की आये , माँ के पैर दबाना सीख !
Monday, June 9, 2014
इंतज़ार है, क्षितिज में कबसे, काले, घने, बादलों का
इंतज़ार है ! क्षितिज में कबसे,काले घने,बादलों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !
गर्म हवा के लगे, थपेड़े,
वृक्ष न मिलते राही को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के,
सीना जलता जननी का !
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !
चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों से !
पीने का जल,जहर बनाये
मानव अपने हाथों से !
मां के गर्भ को खोद के ढूंढे ,
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !
उसी वृक्ष को काटा हमने
जिस आँचल में, सोते थे !
पृथ्वी के आभूषण, बेंचे
जिनमें आश्रय पाते थे !
मूर्ख मानवों की करनी से,
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन, बुझाने का !
जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले
हमसे प्यार , चाहती थी !
दर्द से तडप रही मां घर में,
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !
जल से झरते, झरने सूखे
नरम मुलायम पत्ते, रूखे
कोयल की आवाज़ न आये
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,
है आवाहन मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !
पृथ्वी, मानव को सिखलाये, पाठ जमीं पर रहने का !
गर्म हवा के लगे, थपेड़े,
वृक्ष न मिलते राही को ,
लकड़ी काट उजाड़े जंगल
अब न रहे ,सुस्ताने को !
ऐसे बिन पानी, छाया के,
सीना जलता जननी का !
रिमझिम की आवाजें सुनने,तडपे जीवन धरती का !
चारो तरफ अग्नि की लपटें
निकलें , मानव यंत्रों से !
पीने का जल,जहर बनाये
मानव अपने हाथों से !
![]() |
| डेली न्यूज़ के सौजन्य से , अच्छा लगता है जब लोग बिना भेजे, रचना को छपने योग्य समझे !आभार ! |
लालच होता रत्नों का !
आखिर मां भी,कब तक देगी संग,हमारे कर्मों का !
उसी वृक्ष को काटा हमने
जिस आँचल में, सोते थे !
पृथ्वी के आभूषण, बेंचे
जिनमें आश्रय पाते थे !
मूर्ख मानवों की करनी से,
जलता छप्पर धरती का !
आग लगा फिर पानी ढूंढे,करता जतन, बुझाने का !
जननी पाले बड़े जतन से
फल जल भोजन देती थी !
शुद्ध हवा, पानी के बदले
हमसे प्यार , चाहती थी !
दर्द से तडप रही मां घर में,
देखे प्यार मानवों का !
नईं कोंपलें , सहम के देखें , साया मूर्ख मानवों का !
जल से झरते, झरने सूखे
नरम मुलायम पत्ते, रूखे
कोयल की आवाज़ न आये
जल बिन वृक्ष, खड़े हैं सूखे
यज्ञ हवन के, फल पाने को,
है आवाहन मेघों का !
हाथ जोड़ कर,बिन पछताये,इंतज़ार बौछारों का !
Saturday, May 31, 2014
जाने कैसी नज़र लगी,खलिहानों को !-सतीश सक्सेना
मूरख जनता चुन लेती धनवानों को !
बाद में रोती, रोटी और मकानों को !
रामलीला मैदान में, भारी भीड़ जुटी,
आस लगाए सुनती, महिमावानों को !
काली दाढ़ी , आँख दबाये , मुस्कायें ,
अब तो जल्दी पंख लगें, अरमानों को !
रक्तबीज शुक्राचार्यों के , पनप रहे
रक्तबीज शुक्राचार्यों के , पनप रहे
निंदा, नहीं सुनायी देती , कानों को !
दद्दा , ताऊ कितने, गुमसुम रहते हैं !
दद्दा , ताऊ कितने, गुमसुम रहते हैं !
जाने कैसी नज़र लगी, खलिहानों को !
नोट : यह रचना आज जयपुर में छपी , बताने के लिए संतोष त्रिवेदी का आभार
http://dailynewsnetwork.epapr.in/283149/Daily-news/04-06-2014#page/8/2
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