Wednesday, June 2, 2010

अपनी माँ को धुंधली यादों में ढूँढता बच्चा - सतीश सक्सेना

"माँ " पर प्रकाशित, एक पुरानी पोस्ट  दुबारा प्रकाशित कर रहा हूँ ...शायद आप मेरी माँ के बारे में वेदना महसूस कर सकें  ....


माँ ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता ! अपने बचपन की यादों में उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा ! 
मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....जो कभी नही लिखना चाहता था !
-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में तपते, अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ .... 
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....

बस यही यादें हैं माँ की ......

45 comments:

  1. -जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....
    मन भर आया,जब की मेरी माँ अभी जिन्दा है | उम्दा भावनात्मक प्रस्तुती के लिए *******

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  2. ma ki mahima apar he jitna gungan karo kam he

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  3. हरि मेहता साहब के धुंधले शेर की याद दिला दी कि ‘जिसने बख्शी थी ज़िंदगी मुझको, मैं उसे ख़ाक में मिला लाया.’… दुनिया का सबसे पवित्र लफ्ज़. मीना कुमारी के कोई औलाद नहीं थी और मैंने एक बार पुष्पा दी (मेरी दूसरी माँ, आकाशवाणी की) से कह दिया कि अगर मीना कुमारी माँ होती, तो दुनिया की बेहतरीन माँ होती. तो उनका जवाब मुझे लाजवाब कर गया, “माँ भी बेहतर और बुरी होती है क्या?” … ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे!!

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  4. kaash !

    har aadmi ko har pal maa mayassar rahti....

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  5. आपकी इस वेदना ने अन्दर तक हिला दिया है. मुझे अभी कुछ दिन पहले ही एक ऐसे अंतिम संस्कार में शामिल होना पढ़ा था जहाँ माँ कि अंतिम यात्रा में चार साल के अबोध का क्रंदन देखकर कलेजा मुंह को आ गया था. वास्तव में अगर कभी गलती से भी ऐसा बुरा ख़याल दिमाग में आ जाता है तो सिहर उठता हूँ और आपने तो इस अहसास को जिया है............

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  6. ख़ाक जन्नत है इसके क़दमों की
    सोच फिर कितनी क़ीमती है मां
    इसकी क़ीमत वही बताएगा
    दोस्तो ! जिसकी मर गई है मां
    http://vedquran.blogspot.com/2010/05/mother.html

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  7. गुरू जी!! कुछ कहने लायक छोड़बे नहीं किए हैं … अब हम का टिप्पणी करें...

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  8. रुला दिया आपने...दर्द भीतर से महसूस किया..

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  9. कहीं भीतर तक छू गई आपकी बात

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  10. होठ तो बस हिल रहे थे कविता तो दिल ने पढ़ा और मैं पूरा का पूरा खो गया..बेहद संवेदनशील और सुंदर कविता...प्रस्तुति के लिए धन्यवाद सतीश जी..कुछ अलग और बेहतरीन भी...बधाई

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  11. rula diya sir aaj hi maa par ek post maine bhi daali thi...ho sake to padhiyega coment na bhi de to chalega

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  12. satishji! Pranaam !
    waapsi ke liye badayee ! maine yeh socha ki ,aap ki yatra ke bare mei kuch khaas padne ko milega ! Lekin aapne tho kuch alag likh kar humhe rula deya ! Kya kahoon ! Kya tippane doon ! koi shabd nahi hai .... !

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  13. उफ़, भैया रुला ही दिया आपने, बहुत मार्मिक और संवेदनशील, आपकी वेदना हमारी वेदना में बदल चुकी है !

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  14. फिलहाल कुछ कहने की स्थिति में नहीं....
    वैसे भी इस पोस्ट पर कोई सारगर्भित टिप्पणी नहीं की जा सकती....मां से ज़्यादा सार कहां है....
    भावनाओं का मोल क्या.....
    आंसू कोरों तक आ चुके हैं...अभी विराम...

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  15. इमोशनल कर दिया सक्सैना साहब आपने। मैं कभी अपनी मां की किसी बात पर हंसता हूं या मजाक करता हूं तो वो कहती है कि मेरे जाने के बाद तुम मेरी बात याद करोगे। और मैं पत्थरदिल फ़िर हंस देता हूं।
    आपने जो देखा है, भोगा है, जानकर समझकर बहुत देख हुआ।

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  16. aasheesh sadaiv sath rahega ...........
    janha tak maine blog pada hai jijjee ne kamee pooree karane kee koshish kee hai hai na.....?
    Camera wale prasang me unaka jikr hai........
    yatra kaisee rahee.......

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  17. main ek maa hun aur ek bachche kee is ankahi bhasha ko samajh sakti hun, ........mann bhar aaya

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  18. ओह ! बेहद मार्मिक ।
    माँ ।
    आप वापस आ गए क्या ?

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  19. फ़िराक गोरखपुरी की यह कविता पढियेगा। इसमें बीस बरस के उस नौजवान के जज्बात हैं,जिसकी माँ उसी दिन मर गयी जिस दिन वह पैदा हुआ।
    http://hindini.com/fursatiya/archives/142

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  20. माँ शब्द निःशब्द कर देता है ।

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  21. Rula diya aapne, bas anshu tapakate-tapakate ruk gaya.

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  22. behad marmik ........nishabd hun....kuch kahne ki himmat hi nahi hai.

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  23. -जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं

    अत्यंत हृदयस्पर्शी ....

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  24. संवेदनशील प्रस्तुति !!!

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  25. मै तो खुद अपने हाथो मां को शमशान छोड कर ही नही, बल्कि अग्नि भी दे कर आया, मेरी मां मेरी सब से अच्छी दोस्त थी, खुब लडता भी था मां से... इसी लिये अग्नि भी दे दी... ओर लडाई भी खत्म

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  26. satishji !
    very touchy & sentimental post.
    No words.....

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  27. अत्यंत मार्मिक....शब्द चित्र खींच दिया...

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  28. सतीश जी, आपने मेरी कल की टिपण्णी पब्लिश ही नहीं की???

    :-(

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  29. भाबुक कर दिया सक्सेना जी आपने

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  30. मार्मिक प्रसतुति

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  31. aye maa ! teri surat se alag bhagwaan ki surat kya hogi...kya hogi?

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  32. सचमुच आपकी पोस्ट दिल को लग गई

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  33. एक मां की ही ऐसी कोर्ट होती है जो हर बेटे का हर जुर्म माफ कर देती है।

    प्रणाम

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  34. marmik...dil ko chhoone valee ghatana.

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  35. Aapki ye post dubara padhne par bhee utanee hi nistabdh kar gaeee. ma ko khokar aap kitane bade uplabdhee se wanchit rahe.

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  36. @ शाहनवाज भाई !
    आपकी टिप्पणी मुझे नहीं मिली , कृपया दुबारा दें . स्नेह के लिए आभारी हूँ !

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  37. @अपनत्व,
    आपके ममत्व के लिए आभारी हूँ !

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  38. मैंने तो बस इतना ही लिखा था, क्या आप वापिस आ गए हैं? और एक पसंद का चटका लगाया था आपके लेख पर.

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  39. सतीश जी..कुछ अलग और बेहतरीन

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  40. बहुत मार्मिक और संवेदनशी

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  41. आपका मार्मिक संस्मरण दिल को छू गया.
    पितृदेवो भव:!

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एक निवेदन !
आपके दिए गए कमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं, कई बार पोस्ट से बेहतर जागरूक पाठकों के कमेंट्स लगते हैं,प्रतिक्रिया देते समय कृपया ध्यान रखें कि जो आप लिख रहे हैं, उसमें बेहद शक्ति होती है,लोग अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार पढेंगे, और तदनुसार आचरण भी कर सकते हैं , अतः आवश्यकता है कि आप नाज़ुक विषयों पर, प्रतिक्रिया देते समय, लेखन को पढ़ अवश्य लें और आपकी प्रतिक्रिया समाज व देश के लिए ईमानदार हो, यही आशा है !


- सतीश सक्सेना

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